Tuesday, February 12, 2008

वार्षिक संगीतमाला २००७ :पायदान ९ - क्यूँ दुनिया का नारा जमे रहो ?

तो नवें नंबर पर है वो गीत जिसे गाया विशाल-शेखर की जोड़ी वाले विशाल ददलानी ने। ये एक ऍसा गीत है जो आपको ये सोचने पर विवश कर देता है कि क्यूँ सब जानते समझते भी हम अपने बच्चों को गलाकाट प्रतिस्पर्धा के इस दौर में अपनी आंकाक्षाओं के बोझ तले दबा डालते हैं ? ज्यादातर बच्चे समाज और माता पिता की इच्छा अनुसार इस सिस्टम में अपने आप को ढ़ाल लेते हैं।


पर क्या सारे बच्चे ऍसा कर पाते हैं?

अगर ऍसा हो पाता तो अवसाद, अलगाव और यहाँ तक की अपने जीवन को समाप्त करने की निरंतर होती घटनाओं को अपने सामने घटते हुए हम नहीं देख रहे होते।

गीत के पहले हिस्से में जहाँ लायक कहलाने वाले बच्चों की जीवनशैली का चित्रण है तो दूसरे में ठीक इससे पलट वैसे बच्चों का जो अपनी ही दुनिया में जीने की तमन्ना रखते हैं पर ये शिक्षा प्रणाली और ऊपर उठने की ये दौड़ उन्हें वैसा करने नहीं देती। शंकर-अहसॉन-लॉए ने अपने संगीत को गीत के मूड के हिसाब से बदलते रखा है।


ये गीत मुझे अगर इतना पसंद है तो वो इस वज़ह से कि बच्चों के इस दर्द को इतनी सहजता से ऊपर लाते हुए ये दिल पर सीधी चोट करता है। ये अहसास दिलाता है कि समाज के एक हिस्से के रूप में चाहे माता-पिता या अध्यापक की हैसियत से, इस तंत्र को फलने फूलने में हमारा भी कुछ दोष बनता है।

तो पहले पढ़ें प्रसून जोशी के उठाए गए इन मासूम से सवालों को..
कस के जूता कस के बेल्ट
खोंस के अंदर अपनी शर्ट
मंजिल को चली सवारी
कंधों पे जिम्मेदारी

हाथ में फाइल मन में दम
मीलों मील चलेंगे हम
हर मुश्किल से टकराएँगे
टस से मस ना होंगे हम

दुनिया का नारा जमे रहो
मंजिल का इशारा जमे रहो
दुनिया का नारा जमे रहो
मंजिल का इशारा जमे रहो

ये सोते भी हैं अटेन्शन
आगे रहने की हैं टेंशन
मेहनत इनको प्यारी है
एकदम आज्ञाकारी हैं

ये आमलेट पर ही जीते हैं
ये टॉनिक सारे पीते हैं
वक़्त पे सोते वक़्त पे खाते
तान के सीना बढ़ते जाते

दुनिया का नारा जमे रहो
मंजिल का इशारा जमे रहो...

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यहाँ अलग अंदाज़ है
जैसे छिड़ता कोई साज़ है
हर काम को टाला करते हैं
ये सपने पाला करते हैं

ये हरदम सोचा करते हैं
ये खुद से पूछा करते हैं
क्यूँ दुनिया का नारा जमे रहो ?
क्यूँ मंजिल का इशारा जमे रहो ?


ये वक़्त के कभी गुलाम नहीं
इन्हें किसी बात का ध्यान नहीं
तितली से मिलने जाते हैं
ये पेड़ों से बतियाते हैं

ये हवा बटोरा करते हैं
बारिश की बूंदे पढ़ते हैं
और आसमान के कैनवस पे
ये कलाकारियाँ करते हैं

क्यूँ दुनिया का नारा जमे रहो ?
क्यूँ मंजिल का इशारा जमे रहो ?


शायद आपके पास इन प्रश्नों का कोई सीधा सादा हल ना हो पर ये गहन चिंतन का विषय है इस बात से आप इनकार नहीं कर सकेंगे।

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और हाँ एक बात और, तारे जमीं पर फिल्म के इस गीत को देखते हुए सबको अपने घर के सुबह वाली भागमभाग के दृश्य जरूर याद आएँगे।


इस संगीतमाला के पिछले गीत

7 comments:

yunus said...

सुंदरतम गीत । मुझे ये गीत कुछ ज्‍यादा ही पसंद है । बच्‍चों के नजरिये से बहुत कम गीत लिखे जाते हैं । बहुत पहले मजरूह ने लिखा था--वो तो है अलबेला हजारों में अकेला सदा तुमने ऐब देखा हुनर तो ना जाना । और तमाम होपलेस चिल्‍ड्रन के लिए ये गीत एक एन्‍थेम बन गया था । अब तारे जमीं पर ने भी इसी तरह का एंथेम दिया है । शुक्रिया मनीष ।

mamta said...

अच्छी लगी आपकी पसंद । वैसे इस फिल्म के तो सभी गाने अच्छे है।

भुवनेश शर्मा said...

प्रसूनजी की कलम से झरने वाली संवेदनाओं के हम भी कायल हैं.

शुक्रिया इस गीत के लिए.

Rachana said...

I just love this song!!!

जोशिम said...

यार मुझे भी ये कविता खासी पसंद है [ हॉल में झटका लगा था देखते वक्त ] - इसका पहला सफा जवानी / नौकरी की याद देता है और दूसरा स्कूल हॉस्टल की लेफ्ट राईट की [ तीसरा सपने में रहा] - - दूसरी बात पता नहीं क्यों इसे मैं pink floyd के another brick in the wall से मिलता सुनता हूँ - [कान बजते होंगे[:-)] ] - rgds - मनीष

charu said...

in sawaalon ke jawab to shayad hi kisi ke paas hon. alag andaz me zindagi jeene walon ke saath aksar duniya yahi salook karti hai.

Manish said...

यूनुस यथार्थ केइतना करीब लगता है इसीलिए दिल पर इसका असर ज्यादा होता है।

जोशिम बिलकुल मेरी भी ऍसी ही भावनाएँ हैं। आपने Pink floyd के जिस गीत का जिक्र किया उसकी लिंक दीजिएगा ।

रचना जी, भुवनेश गीत और प्रसून जोशी के बोल आपको भी अच्छे लगे जानकर खुशी हुई।

चारु सही कहा तुमने। तकलीफ़ तो ज्यादा होती है लीक से हट कर चलने वालों को पर उनमें से ही कुछ नया रास्ता भी देते हैं समाज को।