Thursday, November 19, 2009

फिर मिलोगे कभी इस बात का वादा कर लो...

जिंदगी के इस सफ़र में ना जाने कितने लोग हमारे संपर्क में आते हैं। पर बीते समय में झाँक कर देखने पर क्या आपको नहीं लगता कि कुछ ऐसे चेहरे रह गए जिनसे अपने रिश्तों को समय रहते हम वो रूप नहीं दे पाए जो देना चाहते थे।

दिल खुशफहमियाँ पालता रहता है कि काश कभी उनसे एक मुलाकात और तो हो जिसमें हम ऍसे मरासिम बना सके जिन्हें परिभाषित करने में हमारे अंतरमन को कोई दिक्कत ना हो। पर अव्वल तो ऍसी मुलाकातें हो नहीं पाती और होती भी हैं तो माहौल ऐसा नहीं बन पाता कि रिश्तों के अधखुले सिरों को फिर से टटोला जा सके।

ये तो हुई वास्तविक जिंदगी की बात पर फिल्मों में ऐसी मुलाकातें अक्सर हो जाया करती हैं क्यूँकि उनके बिना कहानी आगे बढ़ती नहीं। इसीलिए तो गीतों का ये आशावादी दृष्टिकोण हमारे मन को सुकून देता है। साथ ही उन्हें गुनगुनाकर हम अपने आप को पहले से तरो ताज़ा और उमंगों से भरा महसूस करते हैं।

ऍसा ही एक गीत गाया था रफ़ी साहब ने फिल्म ये रात फिर ना आएगी के लिए और क्या कमाल गाया था। १९६५ में आई ये फिल्म अपने गीतों के लिए बेहद चर्चित रही थी। चाहे आशा जी का गाया 'यही वो जगह है... हो या फिर महेंद्र कपूर का गाया मेरा प्यार वो है..... हो, ओ पी नैयर द्वारा संगीत निर्देशित इस फिल्म के सारे गीत लाज़वाब थे। और इस गीत का तो शमसुल हूदा बिहारी ने, मुखड़ा ही बड़ा जबरदस्त लिखा था ...

फिर मिलोगे कभी इस बात का वादा कर लो
हमसे एक और मुलाकात का वादा कर लो


वैसे बिहारी साहब अपने नाम के अनुरूप सचमुच बिहार के ही थे और पटना के पास स्थित आरा में उनका जन्म हुआ था। संगीतकार ओ पी नैयर के करीबियों का कहना है कि ओ पी नैयर ने बिहारी के मुखड़े को आगे बढ़ाते हुए पहला अंतरा ख़ुद ही रच डाला था। ये अंतरा गुनगुनाना मुझे बेहद पसंद रहा है इसलिए आज इसे यहाँ लगा दे रहा हूँ



वैसे आप मुझे ना झेलना चाहें तो रफ़ी साहब की गायिकी का आनंद यहाँ ले सकते हैं।




फिर मिलोगे कभी इस बात का वादा कर लो
हमसे एक और मुलाकात का वादा कर लो

दिल हर बात अधूरी है अधूरी है अभी
अपनी इक और मुलाकात ज़रूरी है अभी
चंद लमहों के लिये साथ का वादा कर लो
हमसे एक और मुलाकात का वादा करलो
फिर मिलोगे कभी .....

आप क्यूँ दिल का हसीं राज़ मुझे देते हैं
क्यूँ नया नग़मा नया साज़ मुझे देते हैं
मैं तो हूँ डूबी हुई प्यार की तूफ़ानों में
आप साहिल से ही आवाज़ मुझे देते हैं
कल भी होंगे यहीं जज़्बात ये वादा करलो
हमसे एक और मुलाकात का वादा करलो
फिर मिलोगे कभी .....


इस गीत का दूसरा अंतरा आप इस वीडियो में देख सकते हैं जिसे आशा जी ने गाया है। ये गीत पर्दे पर फिल्माया गया था विश्वजीत और शर्मिला टैगोर जी पर

Saturday, November 14, 2009

'बुढ़िया कबड्डी' और बचपन के वे अनमोल दिन .....

तो आज है बच्चों का दिन यानि बाल दिवस ! तो क्यूँ ना इस दिन बचपन की कुछ बातों को साझा किया जाए एक बेहद दिलअज़ीज़ गीत के साथ। समय के साथ कितना बदल गया है तब और आज का बचपन। तब भी मस्तियाँ और शैतानियाँ होती थीं और आज भी। फर्क आया है इनके तौर तरीकों में, तब के और आज के माहौल में। बचपन की स्मृतियों पर नज़र दौड़ाऊँ तो बहुत सारी बातें अनायास ही मन में आती हैं। पेड़ों पर रस्सी लगा कर झूला झूलना, इमली के पेड़ की डरते डरते चढ़ाई करना, टोकरी को तिरछा कर रस्सी के सहारे चिड़िया को पकड़ने की कोशिश करना, हारने या खेल में ना शामिल किए जाने पर टेसुए बहाना, मन का ना होने पर बार बार घर छोड़ने की धमकी दे डालना और ऐसी ही ना जाने कितनी और बातें। पर आज बात उन खेलों की जिन्हें खेलते हुए बचपन का एक बड़ा हिस्सा बीता।

बचपन में पहला खेल जो हमनें सीखा था वो था बुढ़िया कबड्डी। अगर आप इस खेल से वाकिफ़ ना हों तो ये बताना जरूरी होगा कि इस खेल में अपनी साँस बिना तोड़े बारी बारी से विपक्षी दल के खिलाड़ियों को दौड़ाना और इन्हें छू कर वापस आना होता था। ऍसा इसलिए किया जाता था ताकि एक गोल रेखा के अंदर खड़ी अपने दल की बुढ़िया को भागने का रास्ता मिल जाए। कबड्डी के इस परिवर्तित रूप में गोल रेखा के अंदर खड़े खिलाड़ी को बुढ़िया क्यूँ कहा जाता था ये अभी भी मेरी समझ के बाहर है।

ज़ाहिर है जितनी लंबी साँस होगी उतने ही अधिक खिलाड़ियों को दौड़ाकर आप बुढ़िया का काम आसान कर सकते थे। अब एक साँस को लेने के लिए कई तरीके थे। सबसे प्रचलित होता था

शैल तीईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईई............. या फिर
कबड्डी के बाड बड्डी बाड बड्डी बाड बड्डी......

पर इन दोनों तरीकों में साँस में हेर फेर यानि चीटिंग करने की गुंजाइश काफी कम होती थी तो हम लोग इनका इस्तेमाल कम ही करते थे। सबसे मज़ेदार रहता

शैल दल्ले छू दल्ले छू...

बोलना क्यूँकि ये इतनी धीमी गति से बोला जाता कि साँस ले लेने का पता ही न चलता। अगर विपक्षी खिलाड़ी शिकायत करते तो हम अपने दूसरे सहारे प्रकाश लाल की शरण में चले जाते। अब ये न पूछिएगा कि ये प्रकाश लाल कौन था क्यूंकि हम तो उसे जाने बगैर ही उसका मर्सिया पढ़ देते थे यानि

शैल कबड्डी आस लाल मर गया प्रकाश लाल मेरा....लाल लाल लाल लाल...

बुढ़िया कबड्डी का शुमार तो अब लुप्तप्राय खेलों में कर लेना चाहिए। पर गिल्ली डंडा, रस्सी और लट्टू, कंचों पिट्टो, कोनों की अदला बदली और रुमाल ले कर भागने वाले खेल तो कस्बों और गाँवों में जरूर खेले जाते होंगे। आज तो बाजार में हर आयु वर्ग के लिए तरह तरह के आकर्षक खेल हैं खासकर तब जब आपकी जेब में इनके लिए पर्याप्त पैसे हों। वैसे भी आज के बच्चों के हाथ, मोबाइल और कम्प्यूटर के कीबोर्ड में गेम खेलने को इतने सिद्धस्त हो जाते हैं कि उन्हें गिल्ली और डंडे को पकड़ने की जरूरत ही क्या है। पर जो बच्चे इन सुविधाओं से अभी भी दूर हैं उनके लिए तो ये खेल आज भी मौज मस्ती की तरंग जरूर लाते होंगे।

तो आइए आज आपको वो गीत सुनाऊँ जो मुझे अपने बचपन की इन्हीं यादों के बहुत करीब ले जाता है। सुजाता फिल्म के इस गीत के बोल लिखे थे मजरूह सुल्तानपुरी ने और संगीतबद्ध किया था सचिन देव बर्मन साहब ने। गीता दत्त और आशा जी ने जो चुनिंदा युगल गीत गाए हैं उनमें से ये एक था। गायिकी, संगीत और बोल तीनों के लिहाज़ से ये गीत मुझे पसंद हैं ..



बचपन के दिन बचपन के दिन
बचपन के दिन भी क्या दिन थे हाय हाय
बचपन के दिन भी क्या दिन थे
उड़ते फिरते तितली बन के बचपन....

वहाँ फिरते थे हम फूलों में पड़े
यहाँ ढूँढते सब हमें छोटे बड़े
थक जाते थे हम कलियाँ चुनते
बचपन के दिन भी क्या दिन थे
उड़ते फिरते तितली बन के बचपन.....

कभी रोये तो आप ही हँस दिये हम
छोटी छोटी ख़ुशी छोटे छोटे वो ग़म
हाय रे हाय हाय हाय हाय रे हाय
कभी रोये तो आप ही हँस दिये हम
छोटी छोटी ख़ुशी छोटे छोटे वो ग़म
हाय क्या दिन थे वो भी क्या दिन थे

बचपन के दिन भी क्या दिन थे
उड़ते फिरते तितली बन के बचपन ...


और चलते चलते आज के बचपन को अपने क़ैमरे में क़ैद करने की मेरी कोशिश


तो क्या आपको ये प्रविष्टि आपके बचपन तक खींच कर ले जा सकी ?

Tuesday, November 10, 2009

तुम्हारे शहर का मौसम बडा सुहाना लगे : अनूप जलोटा के साथ सुनिए जनाब क़ैसर उल ज़ाफरी को !

जब भी पुरानी ग़ज़लों की बात सोचता हूँ मुझे अस्सी का दशक रह रह कर याद आता है। अब अगर कोई ये कहे कि मियाँ तुम क्या देर से जगे हो ग़ज़लें तो हमारे बाप दादा के ज़माने से चलती आ रही हैं तो वो बात भी सही है। अस्सी के दशक से पुरानी कई ग़ज़लें सच पूछिए तो पिछले एक दशक में ही सुन पाया हूँ। पर अब करें क्या ग़ज़ल की भावनाओं को समझने की उम्र भी तो 1985 के बाद ही आई।

वैसे भी जिस संगीत को आप सुनते हुए बड़े होते हैं वो आपकी वास्तविक ज़िंदगी का हिस्सा हो जाता है। जब भी ऐसी ही कोई ग़ज़ल या गीत बरबस याद आता है तो अपने साथ उस समय की बहुत सी यादों को समेटता हुआ आता है।

आज एक ऐसी ही ग़ज़ल आपके सामने पेश है जिसे अस्सी के दशक में ख़ासी लोकप्रियता हासिल हुई थी। इसे अपनी आवाज़ दी थी भजन सम्राट कहे जाने वाले अनूप जलोटा साहब ने। ये ग़ज़ल 1984 में रिलीज़ हुए उनके एलबम फरमाइश का अहम हिस्सा थी। पहली बार जब इसे सुना था तो मुझे जलोटा साहब का ग़ज़ल शुरु करने के पहले कहा गया शेर असमंजस में डाल गया था।

ग़ज़ल में बंदिशो अल्फाज़ ही नहीं काफी
जिगर का ख़ून भी चाहिए असर के लिए


इस 'जिगर के ख़ून' का मर्म समझने में मुझे तीन चार साल और लगे। फिर तो इस शेर के साथ पूरी ग़ज़ल को सुनना मुझे बहुत अच्छा लगने लगा। इसकी एक वज़ह ये भी थी कि क़ैसर उल ज़ाफरी साहब ने एक ऍसी रूमानी ग़ज़ल लिखी थी जो आसानी से एक हिंदी भाषी को भी समझ आ जाए। वैसे भी किशोरावस्था की दहलीज़ पर ऍसी भावनाएँ कुछ ज्यादा ही असर करती थीं।

वैसे अनूप जी ने भी बड़ी तबियत से इसका हर शेर गाया है। मतले में मौसम को छः बार कहने का उनका अंदाज़ निराला है। खूबसूरत वाद्य संयोजन के साथ साथ अपने चिरपरिचित अंदाज़ में अनूप भाई वाह वाही बटोरने वाला शास्त्रीय आलाप लेना भी नहीं भूले हैं।

अनूप जलोटा एक ऐसे गायक हैं जो उस ज़माने से लेकर आज तक सुने जाते रहे हैं। वे बारहा देश विदेशों में कनसर्ट देते रहते हैं। भक्ति संगीत के सैकड़ों एलबम में अपनी आवाज़ देने के बाद आजकल वो अपना समय भावी गायकों को सिखाने में लगाते हैं। उन्होंने गजल गायिकी बिल्कुल बंद तो नहीं की पर ग़ज़लों के अब उनके इक्का दुक्का एलबम ही आते हैं। तो देर किस बात की..बात शुरु की जाए उनके प्यारे शहर की


तुम्हारे शहर का मौसम बडा सुहाना लगे
मै एक शाम चुरा लूँ अगर बुरा ना लगे

जो डूबना है तो इतने सुकून से डूबो
कि आसपास की लहरों को भी पता ना लगे


तुम्हारे बस मे अगर हो तो भूल जाओ हमें
तुम्हें भुलाने मे शायद हमें ज़माना लगे

न जाने क्या है किसी की उदास आँखों में
वो मुँह छुपा के भी जाये तो बेवफ़ा ना लगे


हमारे प्यार से जलने लगी है इक दुनिया
दुआ करो किसी दुश्मन की बद्दुआ ना लगे

अनूप जलोटा की इस ग़ज़ल में जनाब क़ैसर-उल-जाफ़री के ये अशआर नहीं हैं..
कुछ इस अदा से मेरे साथ बेवफ़ाई कर
कि तेरे बाद मुझे कोई बेवफ़ा ना लगे

वो फूल जो मेरे दामन से हो गया मंसूब,
ख़ुदा करे उसे बाज़ार की हवा ना लगे

तुम आँख मूँद के पी जाओ ज़िन्दगी 'क़ैसर',
कि एक घूँट मे शायद ये बदमज़ा ना लगे

क़ैसर-उल-जाफ़री एक ऍसे शायर हैं जिन्होंने मुशायरों की शोभा तो बढ़ाई ही है कई फिल्मों के गीत भी लिखे हैं। इतना ही नहीं क़ैसर साहब एक बुलंद आवाज़ के मालिक भी हैं। बड़ा आनंद आता है जब भी क़ैसर साहब की आवाज़ में ये ग़ज़ल सुनता हूँ। तो क्यूँ ना चलते चलते आप सब को भी उनकी आवाज़ से रूबरू कराता चलूँ !



चाँदनी था, कि ग़ज़ल था, कि सबा था क्या था
मैंने इक बार तेरा नाम सुना था क्या था

ख़ुदकुशी कर के भी बिस्तर से उठा हूँ ज़िंदा
मैंने कल रात को जो ज़हर पिया था क्या था

तुम तो कहते थे ख़ुदा तुमसे ख़फ़ा है क़ैसर
डूबते वक़्त इक हाथ बढ़ा था क्या था

Friday, November 06, 2009

मुझे दर्द-ए-दिल का पता ना था, मुझे आप किसलिए मिल गए...

आदमी की फ़ितरत अज़ीब सी है। चाहता कुछ और है और कहता कुछ और। अब भला जिंदगी की राहों में कोई हसीन हमसफ़र मिल जाए तो इसमें दिक्कत कहाँ हैं जनाब ! पर देखिए अब कोई मिल गया तो इतरा रहे हैं ये कहते हुए कि मैं तो अकेले ही बड़े आराम से था। अब भइया एक अदद दिल की तलाश में मारे मारे फिरोगे और एक के साथ एक फ्री वाली स्कीम में दर्द लाज़िमी तौर पर मिलेगा तो क्या कलपने लगोगे :)?

पर ये तो हमारे आपके दिखाने की बात है। अंदर ही अंदर तो हम दर्द-ए-दिल को भी शिद्दत से महसूस करना चाहते हैं। फ़राज़ ऍसे तो नहीं कह गए

पहले पहल का इश्क़ अभी याद है फ़राज़
दिल खुद से चाहता है कि रुसवाइयाँ भी हों


पर जहाँ ये बात सही है, वहाँ इस सच्चाई से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि जब हमारी समझ से अपने स्तर से बहुत अच्छा हमें अपना लेता है तो एक ओर तो हमें बड़ी खुशी मिलती है पर दूसरी ओर रह रह कर अंदर की हीन ग्रंथि हमें अपनी तुच्छता का अहसास भी दिलाती रहती है।

तो आज ऍसे ही भावनाओं से ओतप्रोत इस गीत की बात करना चाहता हूँ। इसे लिखा था मजरूह सुल्तानपुरी ने और इसकी धुन बनाई थी चित्रगुप्त ने। मजरूह ने ये गीत शायद ऍसे ही किसी क़िरदार के लिए लिखा होगा। शायद इसलिए कि जिस फिल्म का ये गीत है वो मैंने देखी नहीं। फिल्म का नाम था 'आकाशदीप' जो १९६५ में प्रदर्शित हुई थी। वैसे यू ट्यूब के वीडिओ से ये स्पष्ट है कि इसे फिल्माया गया था धर्मेन्द और नंदा जी पर।

ये गीत रफ़ी साहब के गाए मेरे पसंदीदा गीतों में से एक है तो सुनिए रफ़ी की गायिकी का कमाल ..


वैसे यू ट्यूब के वीडिओ में इस गीत के तीनों अंतरे सुनने को मिलेंगे।


मुझे दर्द-ए-दिल का पता ना था
मुझे आप किसलिए मिल गए
मैं अकेला यूँ ही मजे में था
मुझे आप किसलिए मिल गए....

यूँ ही अपने अपने सफ़र में गुम
कही दूर मैं, कही दूर तुम
चले जा रहे थे जुदा, जुदा
मुझे आप किसलिए मिल गए....

मैं गरीब हाथ बढ़ा तो दूँ
तुम्हें पा सकूँ कि ना पा सकूँ
मेरी जाँ बहुत हैं ये फ़ासला
मुझे आप किसलिए मिल गए....

ना मैं चाँद हूँ, किसी शाम का
ना च़राग हूँ, किसी बाम का
मैं तो रास्ते का हूँ एक दीया
मुझे आप किसलिए मिल गए....


वैसे चलते चलते कुछ बाते संगीतकार चित्रगुप्त यानि चित्रगुप्त श्रीवास्तव के बारे में। यूँ तो चित्रगुप्त भोजपुरी फिल्मों के मूर्धन्य संगीतकार माने जाते हैं, पर हिंदी फिल्मों के लिए भी उन्होंने कुछ नायाब नग्मे दिए। चित्रगुप्त का ताल्लुक बिहार से था और रोचक तथ्य ये है कि मुंबई की मायानगरी में संगीतकार बनने के पहले वो कॉलेज में लेक्चरर थे। वैसे क्या आपको पता है कि चित्रगुप्त की सांगीतिक विरासत को किसने आगे बढ़ाया ? वही 'क़यामत से क़यामत तक ' की संगीतकार जोड़ी आनंद-मिलिंद ने, जो चित्रगुप्त के सुपुत्र हैं।

Tuesday, November 03, 2009

क्या होगा जब श्रेया घोषाल और सुखविंदर दिखलाएँ आपको जीवन की डगर ?

पिछले साल जब वार्षिक संगीतमाला के अपने पसंदीदा गीतों का चयन कर चुका था, तब ये गीत मुझे सुनने को मिला। लिहाज़ा ये मेरी वार्षिक संगीतमाला 2008 का हिस्सा नहीं बन पाया था। ये गीत था फिल्म ब्लैक एंड व्हॉइट (Black & White) का। अगर आपको इस फिल्म का नाम याद नहीं आ रहा तो इसमें आपका कोई क़सूर नहीं। फिल्म सिनेमाघर के पर्दे की शोभा ज्यादा दिनों तक नहीं बढ़ा सकी थी। वैसे विशुद्ध व्यवसायिक फिल्म बनाने वाले सुभाष घई ने इस फिल्म के ज़रिए वास्तविक ज़िंदगी के करीब आने की कोशिश की थी। पर सुभाष घई जैसी भी फिल्में बनाएँ अपनी फिल्मों के संगीत के चयन के प्रति बेहद सजग रहे हैं। इस हट के बनाई गई फिल्म के संगीतकार के तौर पर उन्होंने चुना था लोकप्रिय गायक सुखविंदर सिंह को। और आज जिस गीत की बात मैं आपसे कर रहा हूँ उसमें सुखविंदर जी के हुनर का क़माल साफ दिखाई देता है...


चिड़ियों की चहचहाट, गायिका का मधुर आलाप, चलती रेल की आवाज़ के साथ सम्मोहित करती आरंभिक धुन के साथ इस गीत से आप रूबरू होते हैं। जब तक आप इस आरंभिक सम्मोहन से निकलें श्रेया घोषाल की खनकती आवाज़ और इब्राहिम अश्क़ के बोल ज़िदगी की राहों में साथ साथ चलने पर मज़बूर कर देते हैं। शुरुआती धुन को इंटरल्यूड्स में बरक़रार रख कर सुखविंदर इस गीत का मज़ा दूना कर देते हैं। तो आइए पहले सुनें कोकिल कंठी श्रेया घोषाल के स्वर में ये गीत..


मैं चली मैं चली
इस गली उस गली
इस डगर उस डगर
इस तरफ़ उस तरफ़
साथ मेरे चले ज़िंदगी का सफ़र...

हँसती हैं तितलियाँ, मुस्कुराए ज़मीं
बादलों की हँसी गुनगुनाए कहीं
दिल की धड़कन चले, वक़्त की छाँव में
दर्द की मस्तियाँ नाचती पाँव में..

इस गली उस गली
इस डगर उस डगर, ऍ मेरे हमसफ़र
मैं चली मैं चली
सारी दुनिया से मैं हो गई बेख़बर
साथ मेरे चले जिंदगी का सफ़र...


मेरी पायल में हैं बोल सब प्यार के
चूड़ियों में भी हैं लफ़्ज़ इक़रार के
मेरे होठों पे हैं गीत इज़हार के
ख़्वाब आँखों में है तेरे दीदार के
है यही तो मेरे प्यार की रहगुज़र
मैं चली मैं चली..मैं चली मैं चली


वैसे इस गीत का एक और वर्सन है जिसे सुखविंदर ने अपनी आवाज़ से सँवारा है। श्रेया वाले वर्सन में गीत का मूड जहाँ रोमांटिक हैं वहीं सुखविंदर के इस वर्सन में गीतकार फिलासफिकल नज़रिए से जिंदगी के बदलते रास्तों से हमें ले जाते हैं। इस बार अंतरे में पिआनो की धुन भी कर्णप्रिय लगती है। तो सुखविंदर जी के गाए इस गीत को सुनिए ..



मैं चला मैं चला
इस गली उस गली
इस डगर उस डगर
इस तरफ़ उस तरफ़
साथ मेरे चले ज़िंदगी का सफ़र...

अज़नबी रास्ते, अज़नबी है ज़हाँ
मैं कहाँ से कहाँ आ गया हूँ यहाँ
अज़नबी रास्ते, अज़नबी है ज़हाँ
मैं कहाँ से कहाँ आ गया हूँ यहाँ.......
सात रंगों की है तेरी दुनिया हसीं
है उजाला कहीं तो है अँधेरा कहीं
है कहीं शाम तो क्यूँ कहीं है सहर
मैं चला मैं चला...

कैसी हैं उलझनें कैसे हालात हैं
दिल में उमड़े ये कैसे जज़्बात हैं
कैसी हैं उलझनें कैसे हालात हैं
दिल में उमड़े हुए कैसे जज़्बात हैं.......
है धुआँ ही धुआँ रास्तों के निशां
हर क़दम पर मेरे हौसले है जवाँ
मेरी मंजिल मुझे आ रही है नज़र

मैं चला मैं चला
इस गली उस गली
इस डगर उस डगर
इस तरफ़ उस तरफ़
साथ मेरे चले ज़िंदगी का सफ़र...

Monday, October 26, 2009

दुष्यन्त कुमार की एक प्रेरणादायक ग़ज़ल : रोज़ सपने देख, लेकिन इस क़दर प्यारे न देख ..

वीर रस की कविताएँ तो बचपन से ही पढ़ते सुनते आए हैं। दिनकर व सुभद्रा कुमारी चौहान जैसे कवि कवयित्रियों की रचनाएँ छुटपन से ही हमारी शिराओं में रक़्त प्रवाह को तेज कर देती थीं।

पर ये बताइए कि कितनी ग़ज़लों को पढ़ने के बाद भी वैसे ही अहसासात से आप रूबरू हुए हैं। निश्चय ही अपेक्षाकृत ये संख्या कम रही होगी। ग़ज़लें अपने स्वाभाव से ही कोमल भावनाओं को समाहित करती चलती हैं पर जैसा हम सभी जानते हैं कि कई ग़ज़लकारों ने बदलते वक़्त और माहौल के साथ इनमें अलग अलग रंग भरने की कोशिश की है। फ़ैज की कई नज़्में इसी श्रेणी की रही हैं पर जब ग़ज़लों के बारे में सोचता हूँ तो मेरे ज़हन में दुष्यन्त कुमार जी की कई ग़ज़लें एक साथ उभर कर सामने आती हैं।

भारत में हिंदी ग़ज़लों के जनक कहे जाने वाले दुष्यन्त कुमार की ऍसी ही एक ग़ज़ल आपके सामने पेश कर रहा हूँ। ये ग़ज़ल हमें उत्प्रेरित करती है इस बात के लिए कि किसी भी कार्य को पूरा करने के लिए, दूसरों की तरफ़ आशा भरी नज़रों से देखने के बजाए ख़ुद कुछ करने की ललक होनी चाहिए। दुष्यन्त जी ने इस ग़ज़ल के हर शेर में विभिन्न रूपकों की मदद से इस बात को पुरज़ोर ढंग से रखा है।

दुष्यन्त जी को कभी सुनने का अवसर नहीं मिला इस बात का मुझे हमेशा अफ़सोस रहा है। इस महान शायर की लिखी ये प्रेरणादायक पंक्तियाँ मेरे दिल पर क्या असर डालती हैं इसे व्यक्त करने का सबसे अच्छा ज़रिया यही है कि इसे मैं पढ़कर आप तक पहुँचाऊँ। तो ये रहा मेरा प्रयास..



आज सड़कों पर लिखे हैं सैंकड़ों नारे न देख
घर अँधेरा देख तू, आकाश के तारे न देख।

एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ
आज अपने बाजुओं को देख पतवारें न देख।

अब यक़ीनन ठोस है धरती हक़ीक़त की तरह
यह हक़ीक़त देख, लेकिन ख़ौफ़ के मारे न देख।

वे सहारे भी नहीं अब, जंग लड़नी है तुझे
कट चुके जो हाथ, उन हाथों में तलवारें न देख।

दिल को बहला ले, इजाज़त है, मगर इतना न उड़
रोज़ सपने देख, लेकिन इस क़दर प्यारे न देख।

ये धुँधलका है नज़र का, तू महज़ मायूस है
रोग़नों को देख, दीवारों में दीवारें न देख।

राख, कितनी राख है, चारों तरफ़ बिखरी हुई
राख में चिंगारियाँ ही देख, अँगारे न देख।


आशा है इसे सुनने के बाद ऍसी ही कुछ भावनाओं का संचार आपके दिल में भी हुआ होगा..

Saturday, October 24, 2009

उ जे मरबो रे सुगवा धनुक से सुगा गिरे मुरझाय : सुनिए मेरा सबसे पसंदीदा छठ गीत

आज छठ पर्व है। आज श्रृद्धालु डूबते सूरज को अर्घ्य देंगे और कल भोर में दूसरा अर्घ्य उगते सूरज को दिया जाएगा। छठ का नाम बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के सबसे पावन पर्वों में शुमार होता है। विश्व में जहाँ कहीं भी इन प्रदेशों के लोग गए हैं वो अपने साथ इसकी परंपराओं को ले कर गए हैं। छठ जिस धार्मिक उत्साह और श्रृद्धा से मनाया जाता है इसका अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि जब तीन चौथाई पुलिसवालों के छुट्टी पर रहते हुए भी बिहार जैसे राज्य में इस दौरान आपराधिक गतिविधियाँ सबसे कम हो जाती हैं।

अब छठ की बात हो और छठ के गीतों का जिक्र ना आए ये कैसे हो सकता है। बचपन से मुझे इन गीतों की लय ने खासा प्रभावित किया था। इन गीतों से जुड़ी एक रोचक बात ये है कि ये एक ही लए में गाए जाते हैं और सालों साल जब भी ये दिन आता है मुझे इस लय में छठ के गीतों को गुनगुनाने में बेहद आनंद आता है। यूँ तो शारदा सिन्हा ने छठ के तमाम गीत गा कर काफी प्रसिद्धि प्राप्त की है पर आज जिस छठ गीत की मैं चर्चा कर रहा हूँ उसे मैंने टीवी पर भोजपुरी लोक गीतों की गायिका देवी की आवाज में सुना था और इतने भावनात्मक अंदाज में उन्होंने इस गीत को गाया था कि मेरी आँखें भर आईं थीं।

इससे पहले कि ये गीत मैं आपको सुनाऊँ, इसकी पृष्ठभूमि से अवगत कराना आपको जरूरी होगा। छठ में सूर्य की अराधना के लिए जिन फलों का प्रयोग होता है उनमें केला और नारियल का प्रमुख स्थान है। नारियल और केले की पूरी घौद गुच्छा इस पर्व में प्रयुक्त होते हैं।

इस गीत में एक ऐसे ही तोते का जिक्र है जो केले के ऐसे ही एक गुच्छे के पास मंडरा रहा है। तोते को डराया जाता है कि अगर तुम इस पर चोंच मारोगे तो तुम्हारी शिकायत भगवान सूर्य से कर दी जाएगी जो तुम्हें नहीं माफ करेंगे। पर फिर भी तोता केले को जूठा कर देता है और सूर्य के कोप का भागी बनता है। पर उसकी भार्या सुगनी अब क्या करे बेचारी? कैसे सहे इस वियोग को ? अब तो ना देव या सूर्य कोई उसकी सहायता नहीं कर सकते आखिर पूजा की पवित्रता जो नष्ट की है उसने।

ये गीत थोड़ी बहुत फेर बदल के बाद सभी प्रमुख भोजपुरी गायकों द्वारा गाया गया है। तो पहले सुनें मेरी इसे गुनगुनाने की कोशिश


केरवा जे फरेला घवद से
ओह पर सुगा मेड़राय


उ जे खबरी जनइबो अदिक (सूरज) से
सुगा देले जुठियाए


उ जे मरबो रे सुगवा धनुक से
सुगा गिरे मुरझाय


उ जे सुगनी जे रोए ले वियोग से
आदित होइ ना सहाय
देव होइ ना सहाय


अब देवी का गाया हुआ ये गीत तो मुझे नहीं मिल सका पर आप सब के लिए अनुराधा पोडवाल के स्वर में ये गीत प्रस्तुत है



Wednesday, October 21, 2009

आए कुछ अब्र कुछ शराब आए: फ़ैज़ के क़लाम पर रूना लैला का खनकता स्वर

दीपावली एक ऐसा त्योहार है जिसकी गहमागहमी में ब्लॉग की ओर भी रुख करने को जी नहीं चाहता। साल के इन दिनों में पुरानी स्मृतियों से गुजरना अच्छा लगता है। आप कहेंगे दीपावली से पुरानी स्मृतियों का क्या लेना देना? दरअसल जब भी घर की साफ सफाई में अपने आप को लगाता हूँ, कुछ पुराने ख़तों, तसवीरों,काग़ज़ातों और उनसे जुड़ी यादों से अपने आप को घिरा पाता हूँ। दीप से लेकर पटाखे जलाने तक में अपने बच्चे के साथ खुद भी बच्चा बनने की ख़्वाहिश रहती है मेरी। फिर भला एक बार नेट से दूर जाने पर ब्लॉग की बात भी क्यूँ याद आए?

पर अब तो दीपावली भी खत्म हो गई है। और शुक्र की बात है कि इस बार की दीपावली बिना किसी मानव निर्मित हादसे के बिना ही गुजर गई। पर मन अभी भी अनमना सा है। क्यूँ है ये अनमनापन पता नहीं। शायद छुट्टियों से लौट कर फिर दैनिक दिनचर्या से बँधने की खीज़ है या मन में अटका कोई बिना बात का फ़ितूर। दीपावली के पहले फ़ैज़ के एक क़लाम को ढूँढ कर रखा था तबियत से सुनने के लिए और आज वही कर भी रहा हूँ ...


और जब फैज़ की ग़ज़ल के कुछ अशआरों को रूना लैला की खनकती आवाज़ का सहारा हो तो ग़जल की तासीर ही कुछ और हो जाती है




आए कुछ अब्र1 कुछ शराब आए
उसके बाद आए जो अज़ाब2 आए

1-बादल, 2-मुसीबत

बाम-ए-मीना3 से महताब4 उतरे
दस्त-ए-साकी5 में आफ़ताब6 आए

3 - स्वर्ग की छत, 4- चाँदनी, 5 - साकी के हाथों में, 6 - सूर्य किरणें

हर रग-ए-ख़ूँ में फिर चरागाँ हो
सामने फिर वो बेनक़ाब आए


कर रहा था ग़म-ए-ज़हाँ का हिसाब
आज तुम याद बेहिसाब आए


ना गई तेरे ग़म की सरदारी7
दिल में यूं रोज इनकिलाब आए

7 - तांडव, आतंक

इस तरह अपनी खामोशी गूँजी
गोया हर सिमत8 से जवाब आए

8 - तरफ़

फ़ैज़’ थी राह सर-बसर मंज़िल
हम जहाँ पहुँचे क़ामयाब आए


ऐसी आवाज़..ऍसी कम्पोजीशन को सुने अब अर्सा बीत गया। वैसे पिछले महिने रूना जी म्यूजिक टुडे के विभिन्न अवसरों में गाए जाने वाले पंजाबी गीतों के इस एलबम के लिए दस साल बाद भारत की यात्रा पर आईं थीं। रूना जी ने उस दौरान दिए गए एक साक्षात्कार में बताया

मैंने जब गाना शुरु किया तो मैं बारह साल की भी नहीं थी। उस ज़माने की फिल्में परिवारोन्मुख सामाजिक परिवेश से जुड़ी होती थीं। ऍसा नहीं कि आज की फिल्में ऍसी नहीं हैं पर आजकल ध्यान स्टंट और सुंदर स्थलों पर की जाने वाली शूटिंग पर कहीं ज़्यादा है। उस ज़माने की बात करूँ तो संगीत बेहद अहम हिस्सा हुआ करता था फिल्मों का। उस वक़्त लोग संगीत सुनने के लिए फिल्म देखते थे। संगीत रिकार्डिंग एक सामाजिक उत्सव लगता था जहाँ सब अपने किरदारों को बिना थोड़ी सी गलती के निभाना अपना कर्तव्य समझते थे।
आज तो स्टूडिओ में आए पूछा गाना क्या है, अलग अलग पंक्तियाँ या कभी कभी तो शब्द गा दिए और हो गया जी गीत तैयार। ये बेहद आसान है पर मुझे लगता है कि ऍसा करते वक़्त उन भावनाओं को खो देते हैं जो पूरे गीत को एक साथ गाने में आती हैं।
बिल्कुल वाज़िब फर्माया रूना लैला जी ने ! वैसे मुझे तो लगता है कि आज भी लोग अच्छे संगीत की वज़ह से सिनेमा देखने जाना चाहते हैं। पर वैसा संगीत देने के लिए जिस मेहनत की जरूरत है उस मापदंड को साल में चार पाँच फिल्में ही पूरी तरह पैदा कर पाती हैं। अगर हमारे रूना लैला जैसे शैदाइयों की खुशकिस्मती रही तो हिंदी फिल्म जगत में भी रूना की आवाज़ को सुनने का मौका एक बार फिर मिल पाएगा।
 

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