Sunday, April 13, 2014

हज़ार शानदार सूर्यों वाला काबुल ! A Thousand Splendid Suns..

अस्सी के दशक की आख़िर और नब्बे के दशक में अफ़गानिस्तान, आकाशवाणी के सुबह और रात में आने वाले समाचारों में सुनाई जाने वाली अंतरराष्ट्रीय ख़बरों का अहम हिस्सा हुआ करता था। यही वो समय था जब मैं नजीबुल्लाह, अहमद शाह मसूद, गुलुबुद्दीन हिकमतयार और दोस्तम जैसे लड़ाकों के नाम से परिचित हुआ था। समाचार पत्रों और पत्र पत्रिकाओं में छपे लेखों की बदौलत दो दशकों के अंतराल में सोवियत संघ द्वारा नियंत्रित उदारवादी व्यवस्था से लेकर भरे मैदान में जनता के सामने तथाकथित अपराधियों को सज़ा देते तालिबानी लड़ाकों तक काबुल के बदलते रूप देखे। सोवियत शासन हो या मुज़ाहिदीन या फिर तालिबान किसी भी दौर में ये देश हिंसा और प्रतिहिंसा के दौर से मुक्त नहीं रहा। समझ नहीं आता था कि इस देश के लोग किस मिट्टी के बने हैं कि इतनी आपसी तबाही के बाद भी एक दूसरे को नेस्तानाबूद करने का जज़्बा जाता नहीं है?


यही वज़ह रही कि जब अफ़गान लेखक ख़ालिद होसैनी की किताब चार दिन पहले पढ़नी शुरु की तो ये आशा थी कि इस देश की व्यथा को और करीब से समझने का मौका मिलेगा। इसे कहने में मुझे कोई संशय नहीं कि ख़ालिद मेरी आशाओं पर पूरी तरह खरे उतरे। काबुल में जन्मे 49 वर्षीय होसैनी अपनी पहली किताब The Kite Runner से विख्यात हुए। 1980 में वो अमेरिका चले गए। लेखन और डॉक्टरी के आलावा वो विश्व में फैले अफ़गानी शरणार्थियों की मदद के लिए भी तत्पर रहते हैं।


सालों साल हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों में सामाजिक संरचना ही क्षत विक्षत हो जाती है और अगर ये समाज कट्टर इस्लामी अनुयायियों द्वारा संचालित हो तो सबसे बुरी दशा होती है महिलाओं और बच्चों की। ख़ालिद ने अपनी किताब में  इस सामाजिक प्रताड़ना को सहती और उससे सफलता पूर्वक जूझती दो महिलाओं की कथा कही है। यूँ तो कथा अफ़गानिस्तान के शहर हेरात से शुरु होती है पर उपन्यास का केंद्र काबुल ही है और इसीलिए लेखक ने पुस्तक का शीर्षक सत्रहवीं शताब्दी में साइब ए तबरीज़ी द्वारा लिखी कविता 'काबुल' से लिया है। साइब काबुल के बारे में लिखते हैं..

One could not count the moons that shimmer on her roofs,
Or the thousand splendid suns that hide behind her walls. 
(Translated by Josephine Davis)

साहित्य समीक्षकों का ऐसा मानना है कि यहाँ चाँद और सूरज की तुलना काबुल के नर नारियों से की गई है। जहाँ काबुल की छतों पर चमकते चाँद वहाँ के घरों के जाँबाज़ मुखिया हैं तो वहीं घर के परकोटों में रहने और उसे सँभालने वाली स्त्रियाँ हज़ारो चमकते सूर्य की भांति हैं जिनकी सुंदरता और ममत्व से अफ़गानी समाज जीवंत है। पर मुगलिया सल्तनत की हुकूमत वाला सत्रहवीं शताब्दी का वो काबुल तीन सौ सालों बाद भी क्या वैसा रह पाया? ख़ालिद इस प्रश्न का जवाब विगत चार दशकों के अफ़गानिस्तान के हालातों को बताते हुए पुस्तक के दो मुख्य महिला चरित्रों के माध्यम से देते हैं।

उपन्यास के ये दो चरित्र है मरियम और लैला । पहले बात मरियम की। मरियम का सबसे बड़ा दोष ये है कि वो एक हरामी है और इसीलिए रईस बाप के होते हुए भी अपनी माँ के साथ हेरात शहर से दूर एक छोटे से दबड़ेनुमा घर में रहती है। मर्दों के बारे में अपनी माँ के सदवचनों पर मरियम कभी विश्वास नहीं करती। उसकी माँ पुरुषों के बारे में उसे हमेशा कहा करती थी
"A man's heart is a wretched, wretched thing. It isn't like a mother's womb. It won't bleed. It won't stretch to make room for you.............. Learn this now and learn it well, my daughter: Like a compass needle that points north, a man's accusing finger always finds a woman."
वो उसे एक हारी हुई औरत की निराशा मानती। पर ज़िंदगी की राहों पर भटकते हुए उसे इनकी सत्यता का अनुभव हुआ। मरियम के हालात किसी भी विकासशील देश के निम्न मध्यम वर्गीय गरीब महिला जैसे ही हैं जो अपने घरों में अकारण पिटती हैं। जिनकी एकमात्र खासियत उनका शरीर है और जिसे जब चाहे भोगना एक पुरुष का अधिकार। शरीर से खेलते खेलते अगर उनकी कोख एक बेटे को जन्म दे दे तो सौभाग्य नहीं तो फिर किसी दूसरे शरीर से खेलने की पति को छूट। 

मरियम के विपरीत लैला एक मध्यमवर्गीय परिवार में अपने बुद्धिजीवी पिता की लाड़ली बेटी है। अपनी कुशाग्र बेटी के लिए पिता काबुल के बिगड़ते हालातों के बीच भी अच्छी ज़िंदगी की उम्मीद रखता है पर गृहयुद्ध में फँसे काबुल के चारों ओर की पहाड़ियों से चला एक रॉकेट इन सपनों पर तुषारापात करने के लिए काफी होता है। वक़्त की मार लैला को मरियम की सौत के रूप में ला खड़ा करती है। 

मरियम की लैला के प्रति नफ़रत किस तरह प्रेम में बदलती है ये तो मैं आपको नहीं बताऊँगा पर इतना जरूर कहूँगा कि ख़ालिद की लेखन शैली ऐसी है कि चार सौ पृष्ठों की इस किताब से आप बँध कर रह जाते हैं। लेखक जब प्रताड़ना के क्षणों को विस्तार देते हैं तो पाठक की रुह काँप उठती है। वहीं उन्होंने माँ और बच्चे के वातसल्य, अकेलेपन और अवसादग्रस्त ज़िदगी जीने को अभिशप्त पात्रों के मानसिक हालातों और दो प्रेमियों  के मन की भावनाओं का सजीव चित्रण किया है।

तालिबान के बारे में हम सबने सुना है पर महिलाओं के प्रति उनके नज़रिए को एक बार यहाँ फिर से दोहरा देना सही होगा। लड़कियाँ पढ़ नहीं सकती। सज नहीं सकती। घर के बाहर बिना किसी मर्द के नहीं जा सकती। अगर गई तो पीटी जाएँगी मर्दों से नज़रें नहीं मिला सकती। सबके सामने हँस नहीं सकती। काम नहीं कर सकती। बिना पूछे जवाब नहीं दे सकती। नाचना, चित्रकला और गाना, ताश, शतरंज और पतंगबाजी के लिए तो लड़कों को भी मनाही थी। पर ऐसा नहीं हैं कि अफ़गानिस्तान में ऐसी व्यवस्था सबसे पहले तालिबानी लाए। काबुल और कुछ अन्य शहरी इलाकों को छोड़ दें तो अफ़गानिस्तान का अधिकांश कबीलाई इलाका इसी तरह की पाबंदियों के बीच आज भी जी रहा है और अपने आप को बदलने की किसी भी कोशिश का पुरज़ोर विरोध करता है।

लेखक ने काबुल के हालातों को इस किताब में कई रूपकों से इंगित करने की कोशिश की है। उनमें से दो का जिक्र करना जरूरी होगा। वे हेमिंग्सवे के उपन्यास The Old Man and the Sea की बात करते हैं जिसमें एक वृद्ध मछुआरा बड़ी मुश्किल से एक बड़ी मछली का शिकार कर अपनी छोटी नाव से घसीटता हुआ एकदम किनारे तक पहुँचता ही है कि उसका शिकार कई शार्क द्वारा टुकड़े टुकड़े कर दिया जाता है। दरअसल लेखक ये बताना चाहते हैं कि काबुल की हालत उस शिकार की है जिसे जीतने के लिए सब उसे छिन्न भिन्न करने से नहीं हिचकिचाते।
 
अब ज़रा लेखक द्वारा प्रयुक्त एक दूसरे रोचक रूपक पर गौर करें। ये रूपक है फिल्म Titanic का। लेखक तालिबानी समय (2000) में आई फिल्म Titanic के काबुल में जबरदस्त लोकप्रियता का विवरण कुछ यूँ देते हैं।
That summer, Titanic fever gripped Kabul. People smuggled pirated copies of the film from Pakistan- sometimes in their underwear. After curfew, everyone locked their doors, turned out the lights, turned down the volume, and reaped tears for Jack and Rose and the passengers of the doomed ship. At the Kabul River, vendors moved into the parched riverbed. Soon, from the river's sunbaked hollows, it was possible to buy Titanic carpets, and Titanic cloth, from bolts arranged in wheelbarrows. There was Titanic deodorant, Titanic toothpaste, Titanic perfume, Titanic pakora, even Titanic burqas. A particularly persistent beggar began calling himself "Titanic Beggar.""Titanic City" was born.

Titanic की इस लोकप्रियता के कई कारण हो सकते हैं पर लेखक अपने गढ़े चरित्र लैला के माध्यम से कहते हैं कि निराशा और विध्वंस के इस माहौल में काबुल के लोग सोचते हैं कि फिल्म की नायिका की तरह उन्हें भी बचाने कोई जरूर आएगा। अफ़गानिस्तान से जुड़े कई अन्य उपन्यासों की तरह A Thousand Splendid Suns.. में भी रोज़ मरते लोगों और उनकी असहनीय पीड़ा का मार्मिक चित्रण है पर साथ ही किताब ये भी दिखाती है कि लोगों ने इतनी कठिनाइयों से जूझते हुए किस तरह जीवन में आगे बढ़ने की कोशिशें की हैं और इसमें प्रेम की भावना किस तरह सहायक सिद्ध हुई है। ख़ालिद के शब्दों में कहें तो 
"Love can move people to act in unexpected ways and move them to overcome the most daunting obstacles with startling heroism”
निश्चय ही ये पुस्तक पढ़ने योग्य है। आज भारत में कई ताकतें इस मुल्क को पीछे खींचने पर तुली हैं। ऐसे रास्ते किन भयावह परिस्थितियों की ओर ले जाते हैं ये इस किताब को पढ़कर कोई भी महसूस कर सकता है।

Friday, April 04, 2014

तुम्हारी जुल्फ के साये में शाम कर लूँगा..कैसे कह पाए कैफ़ी अपनी पहली ग़ज़ल ? Tumhari Zulf ke saaye..Kaifi Azmi

साठ के दशक में एक फिल्म आयी थी नौनिहाल। संगीतकार थे मदनमोहन। इस फिल्म के सारे गीत कैफ़ी आज़मी ने लिखे थे।  आज भी कैफ़ी आज़मी की पहचान गीतकार के बजाए एक शायर के रूप में ज्यादा है। पर काग़ज़ के फूल से ले कर अर्थ तक जितनी भी फिल्मों में कैफ़ी साहब ने लिखा, उनका काम सराहा गया। लोग उनकी तुलना साहिर से करते हैं। साहिर और कैफ़ी दोनों ही कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित थे। जहाँ साहिर ने फिल्मी गीतों में भी अपनी राजनीतिक सोच को व्यक्त किया वहीं कैफ़ी अपनी विचारधारा को अपनी शायरी की जुबान बनाते रहे पर फिल्मी गीतों में अपने लेखन को उन्होंने इस सोच से परे रखा। इससे पहले कि मैं आपसे नौनिहाल की इस ग़ज़ल की चर्चा करूँ, कैफ़ी साहब की ज़िंदगी से जुड़ा एक वाक़या आपसे बाँटना चाहूँगा।


एक इंसान.शायर कैसे बनता है ये हर काव्य प्रेमी जानना चाहता है। अब कैफ़ी साहब को ही ले लीजिए। उनके अब्बाजान ख़ुद तो शायर नहीं थे पर उन्हें कविता की पूरी समझ थी। उनसे बड़े तीनों भाई शायरी के बड़े उस्ताद थे। छुट्टियों में वो जब घर आते तो सारा कस्बा उनको सुनने उमड़ पड़ता। बालक कैफ़ी जब अपने भाइयों की वाहवाही सुनते तो उन्हें लगता कि क्या मैं भी कभी इनकी तरह शेर कह पाऊँगा। दुख की बात ये थी की इन महफिलों में उन्हें ज्यादा देर बैठना ही नसीब न होता था। उनके पिता उन्हें जब तब पान बनवाने का काम थमा कर वहाँ से भगा देते थे।

कैफ़ी के पिता जब बहराइच में थे तो वहाँ एक तरही मुशायरा हुआ। तरह थी (Word pattern for Qafiya & Radeef) मेहरबाँ होता, राजदाँ होता...कैफ़ी साहब को मौका मिला तो उनके मन में बहुत दिनों से जो चल रहा था वो शेर की शक़्ल में बाहर आ गया.. उन्होंने पढ़ा

वह सबकी सुन रहे हैं,सबको दाद ए शौक़ देते हैं
कहीं ऐसे में मेरा किस्सा ए गम बयाँ होता

लोगों ने तारीफ़ की  कि बड़ी अच्छी याददाश्त है, क्या बढ़िया ढंग से पढ़ते हो। दरअसल सब यही सोच रहे थे कि  कैफ़ी ने अपने भाईयों की ग़ज़ल उड़ाकर अपने नाम से यहाँ पढ़ दी है। जब उनके पिता ने भी यही शक़ ज़ाहिर किया तो  कैफ़ी फूट फुट कर रो पड़े। सब लोगों ने कहा कि अगर तुमने ये ग़ज़ल लिखी है तो तुम्हें एक इम्तिहान देना पड़ेगा। कैफ़ी साहब को मिसरा (शेर की एक पंक्ति) थमा दिया गया ''इतना हँसों की आँख से आँसू निकल पड़ें''। अब इस कठिन मिसरे पर कैफ़ी को पूरी ग़ज़ल बनानी थी। कैफ़ी उसी कमरे में दीवार की ओर मुँह कर के बैठ गए और थोड़ी देर में तीन चार शेर लिख डाले। आपको जानकर ताज्जुब होगा कि  कैफ़ी साहब तब सिर्फ ग्यारह साल के थे।  कैफ़ी साहब ने लिखा था...

इतना तो ज़िन्दगी में किसी की ख़लल1 पड़े
हँसने से हो सुकून ना रोने से कल2 पड़े

जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी-पी के अश्क-ए-ग़म
यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े

एक तुम के तुम को फ़िक्र-ए-नशेब-ओ-फ़राज़3 है
एक हम के चल पड़े तो बहरहाल चल पड़े

मुद्दत के बाद उस ने जो की लुत्फ़ की निगाह
जी ख़ुश तो हो गया मगर आँसू निकल पड़े
1.विघ्न  2. चैन  3. उतार चढ़ाव

तो ये थी कैफ़ी आज़मी की शायर बनने की दास्ताँ। लौटते हैं नौनिहाल की उस ग़ज़ल पर। क्या लिखा था कैफ़ी आज़मी साहब ने और क्या धुन बनाई मदनमोहन ने..वल्लाह ! मदन मोहन ग़ज़लों को इस खूबी से संगीतबद्ध करते थे कि लता जी आज भी उनको ''ग़ज़लों के शाहजादे'' के नाम से याद किया करती हैं। सितार और वॉयलिन का बेहतरीन इस्तेमाल किया है इस गीत के संगीत संयोजन में उन्होंने। पर कैफ़ी के अशआरों में धार ना होती तो मदनमोहन का संगीत कहाँ उतना प्रभावी हो पाता?

इस  ग़ज़ल के हर मिसरे को पढ़ते ही मन के तार रूमानियत के रागों से झंकृत होने लगते हैं । जिस अंदाज़ में रफ़ी साहब ने इन खूबसूरत लफ्जों को अपनी आवाज़ दी है  लगता है कि वक़्त ठहर जाए, ये ग़ज़ल और उससे उभरते अहसास मन की चारदीवारी से कभी बाहर ही ना निकलें।

तुम्हारी जुल्फ के साये में शाम कर लूँगा..
सफ़र इस उम्र का, पल में.., तमाम कर लूँगा

नजर.. मिलाई तो, पूछूँगा इश्क का.. अंजा..म
नजर झुकायी तो खाली सलाम कर लूँगा,

तुम्हारी जुल्फ ...

जहा..न-ए-दिल पे हुकूमत तुम्हे मुबा..रक हो..
रही शिकस्त. तो वो अपने नाम कर लूँगा
तुम्हारी जुल्फ ...



वैसे जानना चाहूँगा कि आप इस ग़ज़ल को सुनकर कैसा महसूस करते हैं?

Sunday, March 30, 2014

एक शाम मेरे नाम ने पूरे किए अपने आठ साल (2006-2014) !

एक शाम मेरे नाम ने पिछले हफ्ते अपने अस्तित्व का आठवाँ साल पूरा किया। आठ साल की इस यात्रा में ब्लॉगिंग ने मुझे बहुत कुछ दिया है। आज मेरे मित्रों और जानने वालों की फेरहिस्त में संगीत और साहित्य से स्नेह रखने वाले सैकड़ों जन हैं जिनमें से कईयों की प्रतिभा का मैं क़ायल हूँ। भला बताइए पेशे से एक इंजीनियर के लिए ब्लॉगिंग के बिना क्या ये संभव होता ? इसलिए मैं इस माध्यम का और इससे जुड़े मित्रों व पाठकों का तहे दिल से शुक्रगुजार हूँ। सच मानिए मेरी इन आठ सालों की मेहनत का प्रतिफल बस आपके प्रेम की पूँजी है।

साल दर साल इस ब्लॉग से जुड़ने वाले लोगों का काफ़िला बढ़ता रहा है। सात लाख के करीब पेज लोड, हजार से ऊपर ई मेल सब्सक्राइबर्स, आठ सौ के करीब नेटवर्क ब्लॉग फौलोवर्स और तीन सौ के करीब गूगल फौलोवर्स और पिछले साल नवाज़ा गया इंडीब्लॉगर एवार्ड.. ये सभी इस इस बात का द्योतक है कि संगीत और साहित्य के प्रति अपनी रुचियों को आप तक पहुँचाने का जो तरीका मैंने चुना है वो आप सब को भा रहा है।

आजकल सब लोग सवाल करते हैं कि क्या सोशल मीडिया के आने के बाद ब्लॉगिंग का औचित्य समाप्त नहीं हो गया? सच बताऊँ तो मुझे ये प्रश्न बेतुका लगता है। ब्लॉग और सोशल मीडिया पर लेखन की प्रकृति और उद्देश्य दोनों भिन्न हैं। अगर क्रिकेट के खेल से इसकी तुलना करूँ तो मैं यही कहूँगा कि जहाँ ब्लॉग पर लिखना टेस्ट क्रिकेट है तो वही फेसबुक पर वन डे और ट्विटर पर T 20। ज़ाहिर सी बात है भीड़ T 20  ज्यादा जुटती है।   पर इनमें कितने क्रिकेट देखने वाले होते हैं और कितने तमाशाबीन उसका फैसला आप ख़ुद कर सकते हैं।पर जिसने ये खेल खेला हुआ है या जिसे क्रिकेट से सच्चा प्यार है वो ये भली भांति जानता है कि टेस्ट क्रिकेट ही इस खेल की असली धरोहर है।

मैं ख़ुद भी सोशल मीडिया पर सक्रिय रहा हूँ पर उसका उद्देश्य एक ओर तो पाठकों तक इस ब्लॉग की पहुँच का विस्तार करना है तो दूसरी तरफ़ वैसी महान विभूतियों से सीधा संपर्क साधना रहा है जिनके बारे में मैं इस ब्लॉग पर लिखता रहा हूँ। मुझे इस बात की खुशी है कि मुझे अपने इन दोनों उद्देश्यों में अच्छी सफलता मिली है।

वार्षिक संगीतमालाओं के महीने को छोड़ दें तो इस ब्लॉग पर प्रति हफ्ते मैं एक पोस्ट लिखने की कोशिश करता हूँ क्यूँकि यही कोशिश मुझे अपने यात्रा ब्लॉग मुसाफ़िर हूँ यारों के लिए भी करनी पड़ती है। अब कुछ रिसालों के लिए भी नियमित रूप से लिखना शुरु किया है। ज़ाहिर है ये सारी बातें आपका वक़्त माँगती हैं जो दिन भर की नौकरी के बाद नाममात्र ही बच पाता है। दरअसल एक ब्लॉगर के लिए सीमित समय ही उसके लेखन की विविधता और गुणवत्ता को बनाए रखने में सबसे बड़ी बाधा है। नित इसी संघर्ष के बीच आप तक अपनी पसंद को पहुँचाता रहा हूँ और आपका प्रेम इस ब्लॉग के लिए यूँ ही बना रहा तो भविष्य में भी पहुँचाता रहूँगा। एक बार फिर एक शाम मेरे नाम के पाठकों को मेरा ढेर सारा प्यार !

Wednesday, March 26, 2014

मैं इस उम्मीद पे डूबा कि तू बचा लेगा : वसीम बरेलवी / चंदन दास

अस्सी के दशक में जब जगजीत सिंह ग़ज़ल गायिकी को एक नया स्वरूप दे रहे थे तो उनके साथ साथ ग़जल गायकों की एक अच्छी पौध तैयार हो रही थी। उस दौर में पंकज उधास, पीनाज़ मसानी, तलत अज़ीज़ के साथ जो एक और नाम चमका वो चंदन दास का था। 

आप सोच रहें होंगे कि अचानक चंदन दास की याद मुझे कैसे आ गई। दरअसल पिछले हफ्ते चंदन दास का जन्मदिन था। अंतरजाल पर एक मित्र ने उनकी एक ग़ज़ल बाँटी। जबसे वो ग़ज़ल सुनी है तबसे उसी की ख़ुमारी में जी रहे हैं। ख़ैर ग़ज़ल सुनी तो फिर शायर पर भी ध्यान गया। शायर थे वसीम बरेलवी साहब।


ज़ाहिर है बरेलवी साहब का ताल्लुक उत्तर प्रदेश के बरेली शहर से है। जनाब रुहेलखंड विश्वविद्यालय में उर्दू के प्राध्यापक भी रहे। कुछ ही साल पहले वे फिराक़ इ्टरनेशनल अवार्ड से सम्मानित हुए हैं।  वसीम साहब से सबसे पहला तआरुफ जगजीत सिंह की गायी ग़ज़लों से ही हुआ था। अब भला  मिली हवाओं में उड़ने की वो सज़ा यारो, कि मैं जमीं के रिश्तों से कट गया यारों या फिर अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपायें कैसे जैसी ग़ज़लों को कोई कैसे भूल सकता है। वैसे जगजीत की गाई ग़ज़लों में में ये वाली ग़ज़ल मुझे सबसे पसंद है जिसमें वसीम कहते हैं

आपको देख कर देखता रह गया
क्या कहूँ और कहने को क्या रह गया
 
आते-आते मेरा नाम-सा रह गया
उस के होंठों पे कुछ काँपता रह गया

दिल हुआ कि जनाब वसीम बरेलवी को कुछ और पढ़ा जाए। पिछले चार पाँच दिनों में उनकी कई ग़ज़ले पढ़ डालीं। बरेलवी साहब का अंदाजे बयाँ मुझे बहुत कुछ बशीर बद्र साहब जैसा लगा यानि लफ्ज़ ऐसे जो कोई भी सहजता से समझ ले और गहराई ऐसी कि आप वाह वाह भी कर उठें। तो आइए आज की इस पोस्ट में उनके कुछ चुनिंदा अशआर आप की नज़र।

आज के दौर में समाज में बड़बोले और अपनी बेज़ा ताकत इस्तेमाल करने वालों का ही बोलबाला है। बरेलवी साहब बड़ी खूबसूरती से समाज के इस तबके पर इन अशआरों में तंज़ कसते नज़र आते हैं...

ज़रा सा क़तरा कहीं आज अगर उभरता है
समन्दरों ही के लहजे में बात करता है

शराफ़तों की यहाँ कोई अहमियत ही नहीं
किसी का कुछ न बिगाड़ो तो कौन डरता है


मैं हमेशा ये मानता हूँ कि व्यक्ति किसी विधा के बारे में कितना भी जान ले सीखने की गुंजाइश बनी रहती है। जैसे ही ये दंभ आया कि हम तो महारथी हो गए.. औरों की मेरे आगे क्या औकात तो समझो कि अपने सीखने की प्रक्रिया तो वहीं बंद हो गई। वसीम बरेलवी विनम्रता की जरूरत को कितने प्यारे ढंग से अपने इस शेर में समझाते नज़र आते हैं

अपने हर इक लफ़्ज़ का ख़ुद आईना हो जाऊँगा
उसको छोटा कह के मैं कैसे बड़ा हो जाऊँगा


एक जगह और वो लिखते हैं
तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आते
इसीलिए तो तुम्हें हम नज़र नहीं आते

ये तो हुई हमारे आचार और व्यवहार की बातें। अब ज़रा देखें कि इंसानी रिश्तों और प्रेम के बारे में वसीम बरेलवी की कलम क्या कहती है? अव्वल इश्क़ तो जल्दी होता नहीं और एक बार हो गया जनाब तो उसकी गिरफ्त से निकलना भी आसान नहीं। इसीलिए बरेलवी साहब कहते हैं

बिसाते -इश्क पे बढ़ना किसे नहीं आता
यह और बात कि बचने के घर नहीं आते


और रिश्तों के बारे में उनके इन अशआरों की बात ही क्या
कितना दुश्वार है दुनिया ये हुनर आना भी
तुझी से फ़ासला रखना तुझे अपनाना भी

ऐसे रिश्ते का भरम रखना बहुत मुश्किल है
तेरा होना भी नहीं और तेरा कहलाना भी


तो आइए अब उस ग़ज़ल की ओर रुख किया जाए जिसकी वज़ह से ये पोस्ट अस्तित्व में आई...
क्या मतला लिखा है बरेलवी साहब ने ! और अंत के दो शेर तो भई कमाल ही कमाल हैं ..एक बार सुन लीजिए फिर दिल करता है कि अपने ''उन'' के ख़यालों में डूबते हुए बार बार सुनें। क्यूँ आपको नहीं लगता ऐसा?


मैं इस उम्मीद पे डूबा कि तू बचा लेगा
अब इसके बाद मेरा इम्तिहान क्या लेगा 


ये एक मेला है वादा किसी से क्या लेगा
ढलेगा दिन तो हर एक अपना रास्ता लेगा

मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊँगा
कोई चराग़ नहीं हूँ जो फिर जला लेगा

कलेजा चाहिए दुश्मन से दुश्मनी के लिए
जो बे-अमल (बिना ताकत /हुकूमत के) है वो बदला किसी से क्या लेगा

मैं उसका हो नहीं सकता, बता ना देना उसे
लकीरें हाथ की अपनी वो सब जला लेगा


हज़ार तोड़ के आ जाऊँ उस से रिश्ता वसीम
मैं जानता हूँ वो जब चाहेगा बुला लेगा




चंदन दास और उनकी ग़ज़लों में कुछ और डूबना चाहते हों तो उनकी पसंदीदा ग़ज़लों से जुड़ी मेरी फेरहिस्त ये रही....

Saturday, March 15, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 सरताज गीत : सपना रे सपना, है कोई अपना... (Sapna Re Sapna..Padmnabh Gaikawad)

वक़्त आ गया है वार्षिक संगीतमाला 2013 के सरताजी बिगुल के बजने का ! यहाँ गीत वो जिसमें लोरी की सी मिठास है, सपनों की दुनिया में झाँकते एक बाल मन की अद्भुत उड़ान है और एक ऐसी नई आवाज़ है जो उदासी की  चादर में आपको गोते लगाने को विवश कर देती है। बाल कलाकार पद्मनाभ गायकवाड़ के हिंदी फिल्मों के लिए गाए इस पहले गीत को लिखा है गुलज़ार साहब ने और धुन बनाई विशाल भारद्वाज ने। Zee सारेगामा लिटिल चैम्स मराठी में 2010 में अपनी गायिकी से प्रभावित करने वाले पद्मनाभ गायकवाड़ इतनी छोटी सी उम्र में इस गीत को जिस मासूमियत से निभाया है वो दिल को छू लेता है।

पद्मनाभ गायकवाड़

ये तीसरी बार है कि गुलज़ार और विशाल भारद्वाज की जोड़ी एक शाम मेरे नाम की वार्षिक संगीतमालाओं में के सरताज़ गीत का खिताब अपने नाम कर रही है। अगर आपको याद हो तो वर्ष 2009 मैं फिल्म कमीने का गीत इक दिल से दोस्ती थी ये हुज़ूर भी कमीने और फिर 2010 में इश्क़िया का दिल तो बच्चा है जी ने ये गौरव हासिल किया था।

विशाल भारद्वाज सपनों की इस दुनिया में यात्रा की शुरुआत गायकवाड़ के गूँजते स्वर से करते हैं। गिटार और संभवतः पार्श्व में बजते पियानो से निकलकर पद्मनाभ की ऊँ ऊँ..जब आप तक पहुँचती है तो आप चौंक उठते हैं कि अरे ये गीत सामान्य गीतों से हटकर है। गुलज़ार के शब्दों को आवाज़ देने  में बड़े बड़े कलाकारों के पसीने छूट जाते हैं क्यूँकि उनका लिखा हर एक वाक्य भावनाओं की चाशनी में घुला होता है और उन जज़्बातों को स्वर देने, उनके अंदर की पीड़ा को बाहर निकालने के लिए उसमें डूबना पड़ता है जो इतनी छोटी उम्र में बिना किसी पूर्व अनुभव के पद्मनाभ ने कर के दिखाया है।


गुलज़ार को हम गुलज़ार प्रेमी यूँ ही अपना आराध्य नहीं मानते। ज़रा गीत के अंतरों पर गौर कीजिए सपनों की दुनिया में विचरते एक बच्चे के मन को कितनी खूबसूरती से पढ़ा हैं उन्होंने। गुलज़ार लिखते  हैं भूरे भूरे बादलों के भालू, लोरियाँ सुनाएँ ला रा रा रू...तारों के कंचों से रात भर  खेलेंगे सपनों में चंदा और तू। काले काले बादलों को भालू और तारों को कंचों का रूप देने की बात या तो कोई बालक सोच सकता है या फिर गुलज़ार !अजी रुकिये यहीं नहीं दूसरे अंतरे में भी उनकी लेखनी का कमाल बस मन को चमत्कृत कर जाता है। गाँव, चाँदनी और सपनों को उनकी कलम कुछ यूँ जोड़ती है पीले पीले केसरी है गाँव, गीली गीली चाँदनी की छाँव, बगुलों के जैसे रे, डूबे हुए हैं रे, पानी में सपनों के पाँव...उफ्फ

विशाल भारद्वाज का संगीत संयोजन सपनों की रहस्यमयी दुनिया में सफ़र कराने सा अहसास दिलाता है। पता नहीं जब जब इस गीत को सुनता हूँ आँखें नम हो जाती हैं। पर ये आँसू दुख के नहीं संगीत को इस रूप में अनुभव कर लेने के होते हैं।

सपना रे सपना, है कोई अपना
अँखियों में आ भर जा
अँखियों की डिबिया भर दे रे निदिया
जादू से जादू कर जा
सपना रे सपना, है कोई अपना
अँखियों में आ भर जा.....


भूरे भूरे बादलों के भालू
लोरियाँ सुनाएँ ला रा रा रू
तारों के कंचों से रात भर  खेलेंगे
सपनों में चंदा और तू
सपना रे सपना, है कोई अपना
अँखियों में आ भर जा


पीले पीले केसरी है गाँव
गीली गीली चाँदनी की छाँव
बगुलों के जैसे रे, डूबे हुए हैं रे
पानी में सपनों के पाँव
सपना रे सपना, है कोई अपना
अँखियों में आ भर जा....

वार्षिक संगीतमाला 2013 का ये सफ़र आज यहीं पूरा हुआ। आशा है मेरी तरह आप सब के लिए ये आनंददायक अनुभव रहा होगा । होली की असीम शुभकामनाओं के साथ...

Thursday, March 13, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 : पुनरावलोकन (Recap)

तो इससे पहले कि वार्षिक संगीतमाला के सरताज गीत की घोषणा करूँ एक बार पीछे पलट कर देख तो लीजिए कि मेरे लिए इस साल के पच्चीस शानदार गीत कौन से रहे ? अगर इस फेरहिस्त के हिसाब से साल के गीतकार का चयन करूँ तो वो तमगा इरशाद क़ामिल को ही जाएगा। इरशाद ने इस साल कौन मेरा, मेरा क्या तू लागे जैसे मधुर गीत लिखे तो दूसरी ओर जिसको ढूँढे बाहर बाहर वो बैठा है पीछे छुपके जैसे सूफ़ियत के रंग में रँगे गीत की भी रचना की। इतना ही नहीं इरशाद क़ामिल ने आमिर खुसरो की कह मुकरनी की याद ऐ सखी साजन से ताज़ा तो की ही, दो प्रेम करने वालों को पिछले साल शर्बतों के रंग और मीठे घाट के पानी जैसे नए नवेले रूपकों से नवाज़ा। 


 वार्षिक संगीतमाला 2013 संगीत के सितारे

इरशाद क़ामिल के आलावा अमिताभ भट्टाचार्य ने भी  सँवार लूँ, ज़िदा, कबीरा व तितली जैसे कर्णप्रिय गीत रचे। प्रसून जोशी ने भी भाग मिल्खा भाग के लिए कमाल के गीत लिखे। पर धुरंधरों में जावेद अख़्तर की अनुपस्थिति चकित करने वाली थी। मेरे पसंदीदा गीतकार गुलज़ार ने विशाल भारद्वाज की फिल्मों मटरू की बिजली.. और एक थी डायन के गीत लिखे। उनका लिखा गीत ख़ामख़ा मुझे बेहद पसंद है पर विशाल अपनी आवाज़ और धुन से उन बोलों के प्रति न्याय नहीं कर सके वैसे भी गुलज़ार की कविता कभी कभी गीत से ज्यादा यूँ ही पढ़ने में  सुकून देती है..विश्वास नहीं होता तो गीत के इस अंतरे को पढ़ कर देखिए

सारी सारी रात का जगना
खिड़की पे सर रखके उंघते रहना
उम्मीदों का जलना-बुझना
पागलपन है ऐसे तुमपे मरना
खाली खाली दो आँखों में
ये नमक, ये चमक, तो ख़ामख़ा नहीं...


संगीतकारों में इस साल की सफलताओं का सेहरा बँट सा गया। लुटेरा में अमित त्रिवेदी, रांझणा में ए आर रहमान और भाग मिल्खा भाग में शंकर एहसान लॉय ने कमाल का संगीत दिया। नये संगीतकारों में अंकित तिवारी ने सुन रहा है के माध्यम से काफी धूम मचाई। सचिन जिगर ने शुद्ध देशी रोमांस में अब तक का अपना सबसे बेहतर काम दिखाया। प्रीतम बर्फी जैसा एलबम तो इस साल नहीं दे पाए पर  ये जवानी है दीवानी, फटा पोस्टर निकला हीरो, Once upon a time in Mumbai दोबारा के उनके कुछ गीत बेहद सराहे गए।

गायकों में ये साल बिना किसी शक़ अरिजित सिंह के नाम रहा। तुम ही हो और लाल इश्क़ जैसे गीतों को जिस तरह डूब कर उन्होंने गाया है वो आम लोगों और समीक्षकों दोनों द्वारा सराहा गया है। वैसे कुछ नए पुराने कलाकारों ने पिछले साल अपनी खूबसूरत आवाज़ की बदौलत कुछ गीतों को यादगार बना दिया। चैत्रा अम्बादिपुदी द्वारा बेहद मधुरता से गाया कौन मेरा, मिल्खा के पैरों में जोश भरते आरिफ़ लोहार,मस्तों का झुंड में थिरकने पर मजबूर करते दिव्य कुमार, ये तूने क्या किया वाली कव्वाली में अपनी गहरी आवाज़ का जादू बिखेरते जावेद बशीर, अपनी आवाज़ की मस्ती से स्लो मोशन अंग्रेजा में झुमाने वाले सुखविंदर सिंह,भागन के रेखन की बँहगिया में एक प्यारी बन्नो का अपने परिवार से जुदाई का दर्द उभारती मालिनी अवस्थी  और झीनी झीनी में अपनी शास्त्रीय गायिकी से मन मोहते उस्ताद राशिद खाँ पिछले साल की कुछ ऐसी ही मिसालें हैं।

साल के सरताज गीत के बारे में तो आप अगली प्रविष्टि में जानेंगे (वैसे ये बता दूँ कि ऊपर के कोलॉज  में सरताज गीत से जुड़े सभी कलाकारों की तसवीर मौज़ूद है।) तब तक एक नज़र इस संगीतमाला के पिछले चौबीस गीतों पर एक नज़र...

वार्षिक संगीतमाला 2013

Saturday, March 08, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 रनर्स अप : तुझ संग बैर लगाया ऐसा, रहा ना मैं फिर अपने जैसा (Laal Ishq )

वार्षिक संगीतमाला के पिछले दो महीनों का सफ़र पूरा करने के बाद  आज बारी है शिखर से बस एक पॉयदान दूर रहने वाले गीत की और दोस्तों यहाँ पर गीत है फिल्म गोलियों की रासलीला यानि रामलीला का। संजय लीला भंसाली द्वारा निर्देशित फिल्मों के संगीत से मेरी हमेशा अपेक्षाएँ रही हैं। इसकी वज़ह है हम दिल दे चुके सनम, देवदास और साँवरिया का मधुर संगीत। पर जब वार्षिक संगीतमाला के गीतों के चयन के लिए मैंने रामलीला का गीत संगीत सुना तो मुझे निराशा ही हाथ लगी सिवाए इस एक गीत के। पिछले महीने जब ये फिल्म टीवी पर दिखाई गयी तो मेरी उत्सुकता सबसे ज्यादा इस गीत का फिल्मांकन देखने की थी। भगवान जाने देश के अग्रणी समाचार पत्रों ने क्या सोचकर इस फिल्म को पाँच स्टार से नवाज़ा था। गीत का इंतज़ार करते करते मुझे पूरी फिल्म झेलनी पड़ी क्यूँकि पूरा  गीत फिल्म में ना होकर उसकी credits के साथ आया। 


फिल्म चाहे जैसी हो दूसरी पॉयदान के इस गीत को बंगाल के मुर्शीदाबाद से ताल्लुक रखने वाले अरिजित सिंह ने जिस भावप्रवणता से गाया है उसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए कम होगी। मुखड़े के पहले का उनका आलाप और फिर पीछे से उभरता कोरस आपका ध्यान खींच ही रहा होता है कि अरिजित की लहराती सी आवाज़ आपके दिल का दामन यूँ पकड़ती है कि गीत सुनने के घंटों बाद भी आप उसकी गिरफ़्त से मुक्त होना नहीं चाहते।

मेरे लिए ये आश्चर्य की बात थी कि इस फिल्म में संजय लीला भंसाली ने संगीत निर्देशन की कमान भी खुद ही सँभाली है। संजय ने  पूरे गीत में ताल वाद्यों के साथ  मजीरे का इस्तेमाल किया है। साथ ही अंतरों के बीच गूँजती शहनाई भी कानों को सुकून देती है। संजय कहते हैं कि गुजारिश के गीतों को संगीतबद्ध करने के बाद मुझे ऐसा लगा कि एक निर्देशक से ज्यादा कौन समझ सकता है कि पटकथा को किस तरह के संगीत की जरूरत है। मैं ऐसा संगीत रचने की कोशिश करता हूँ  जिसे मैं या मेरे साथ काम करने वाले गुनगुना सकें..गा सकें।

वार्षिक संगीतमाला में शामिल पिछले कुछ गीतों की तरह इस गीत के गीतकार द्वय भी फिल्म के पटकथा लेखक हैं। सिद्धार्थ और गरिमा की इस जोड़ी के लिए ये पहला ऐसा मौका था।

वैसे इस फिल्म के गीतों को लिखने और संजय के साथ काम करने का उनका अनुभव कैसा रहा ये जानना भी आपके लिए दिलचस्प रहेगा..संजय के साथ गीत संगीत को लेकर होने वाली तकरारों  के बारे में वे कहते हैं
"संगीत और बोल, सितार और तबले की तरह हैं। जुगलबंदी तो बनती है। कोई बोल सुनाने के बाद संजय सर की पहली प्रतिक्रिया एक चुप्पी होती थी। हम लोग उनसे पूछते थे सर वो अंतरा आप को कैसा लगा? उनका जवाब होता वो अंतरा नहीं संतरा था। और कुछ ही दिनों बाद संजय सर उस संतरे पर अपनी शानदार धुन बना देते। गीत के बोलों पर उनकी सामान्य सी प्रतिक्रिया कुछ यूँ होती थी तुम कितने cheap हो सालों !"
सिद्धार्थ गरिमा ने इश्क़ को इस गीत में लाल, मलाल, ऐब और बैर जैसे विशेषणों से जोड़ा है जो फिल्म की कथा के अनुरूप है। इश्क़  में मन के हालात को वो बखूबी बयाँ करते हैं जब वो लिखते हैं तुझ संग बैर लगाया ऐसा..रहा ना मैं फिर अपने जैसा। अब इस बैरी इश्क़ का खुमार ऐसा है कि दिल कह रहा है कि ये काली रात जकड़ लूँ ...ये ठंडा चाँद पकड़ लूँ आप मेरे साथ ये कोशिश करेंगे ना ?

ये लाल इश्क़, ये मलाल इश्क़
यह ऐब इश्क़, ये बैर इश्क़
तुझ संग बैर लगाया ऐसा
तुझ संग बैर लगाया ऐसा

रहा ना मैं फिर अपने जैसा
हो.. रहा ना मैं फिर अपने जैसा
मेरा नाम इश्क़, तेरा नाम इश्क़
मेरा नाम इश्क़, तेरा नाम इश्क़
मेरा नाम, तेरा नाम
मेरा नाम इश्क़
ये लाल इश्क़, ये मलाल इश्क़
यह ऐब इश्क़, ये बैर इश्क़

अपना नाम बदल दूँ.. (बदल दूँ)
या तेरा नाम छुपा लूँ (छुपा लूँ)
या छोड़ के सारी याद मैं बैराग उठा लूँ
बस एक रहे मेरा काम इश्क़
मेरा काम इश्क़, मेरा काम इश्क़
मेरा नाम इश्क़, तेरा नाम इश्क़
मेरा नाम, तेरा नाम...

ये काली रात जकड लूँ
ये ठंडा चाँद पकड़ लूँ
ओ.. ये काली रात जकड लूँ
ये ठंडा चाँद पकड़ लूँ
दिन रात के अँधेरी भेद का
रुख मोड के मैं रख दूँ
तुझ संग बैर लगाया ऐसा
रहा ना मैं फिर अपने जैसा
हो.. रहा ना मैं फिर अपने जैसा
मेरा नाम इश्क़, तेरा नाम इश्क़
मेरा नाम इश्क़, तेरा नाम इश्क़
मेरा नाम, तेरा नाम...



Sunday, March 02, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 पॉयदान संख्या 3 : कौन मेरा, मेरा क्या तू लागे (Kaun Mera...Chaitra )

वार्षिक संगीतमाला की तीसरी पॉयदान पर एक ऐसा गीत है जिसके मुखड़े को गुनगुना कर उसमें छुपी मधुरता को आप महसूस कर लेते हैं। पिछले छः महिने से इस गीत की गिरफ्त में हूँ और आज भी इसे सुनते हुए मेरा जी नहीं भरता। ये गीत है फिल्म स्पेशल 26 से और इसके संगीतकार हैं एम एम करीम ( M M Kreem)। आपको जानकर ताज्जुब होगा कि इस नाम का वो प्रयोग सिर्फ हिंदी फिल्मों के लिए करते हैं। वैसे उनका असली नाम एम एम कीरावानी (M M Keeravani)  है। 


आँध्रप्रदेश से आने वाले करीम ने सभी दक्षिण भारतीय भाषाओं में संगीत दिया है। हिंदी फिल्मों में अपना हुनर दिखाने का पिछले दो दशकों में जब भी उन्हें मौका मिला है, उन्होंने अपने प्रशंसकों को कभी निराश नहीं किया है। याद कीजिए नब्बे के दशक मैं फिल्म क्रिमिनल के गीत तुम मिले दिल खिले और जीने को क्या चाहिए ने क्या धमाल मचाया था। फिर फिल्म इस रात की सुबह नहीं का उनका गीत तेरे मेरे नाम नहीं है और चुप तुम रहो बेहद चर्चित हुए थे। इसके बाद जख़्म, सुर, जिस्म और रोग जैसी फिल्मों में उनका संगीत सराहा गया।

फिल्म स्पेशल 26 के लिए करीम ने बतौर गीतकार इरशाद क़ामिल को चुना और देखिए क्या मुखड़ा लिखा उन्होंने..
कौन मेरा, मेरा क्या तू लागे
क्यों तू बाँधे, मन से मन के धागे
बस चले ना क्यों मेरा तेरे आगे

समझ नहीं आता ना कि जब हम किसी अनजान को पसंद करने लगते हैं तो फिर दिल के तार उसकी हर बात और सोच से जुड़ने से लगते हैं और फिर ये असर इतना गहरा हो जाता है कि अपने आप पर भी वश नहीं रहता।

एम एम करीम ने इस रूमानी गीत को तीन अलग अलग कलाकारों पापोन, सुनिधि चौहान और चैत्रा से गवाया है। पर मुझे इन सबमें चैत्रा अम्बादिपुदी (Chaitra Ambadipudi) का गाया वर्सन पसंद है। करीम गीत की शुरुआत पिआनो और फिर बाँसुरी से करते हैं। इंटरल्यूड्स में वॉयलिन की धुन आपका ध्यान खींचती है पर इन सब के बीच चैत्रा अपनी मीठी पर असरदार आवाज़ से श्रोताओं का मन मोह लेती हैं।

तेलुगु फिल्मों में ज्यादातर गाने वाली बाइस वर्षीय चैत्रा के लिए हिंदी फिल्मों में गाने का ये पहला अवसर था। दिलचस्प बात यह भी है कि चैत्रा एक पार्श्व गायिका के साथ साथ सॉफ्टवेयर इंजीनियर भी हैं और फिलहाल माइक्रोसॉफ्ट में कार्यरत हैं। अपनी गुरु गीता हेगड़े से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लेने वाली चैत्रा दक्षिण भारतीय फिल्मों में सौ से भी ज़्यादा नग्मों में अपनी आवाज़ दे चुकी हैं। वैसे उन्हें जितना संगीत से लगाव है उतना ही सॉफ्टवेयर से भी है और वे दोनों क्षेत्रों में अपना हुनर दिखाना चाहती हैं। तो आइए पहले सुनें उनकी सुरीली आवाज़ में ये बेहद मधुर नग्मा


कौन मेरा, मेरा क्या तू लागे
क्यों तू बाँधे, मन से मन के धागे
बस चले ना क्यों मेरा तेरे आगे


छोड़ कर ना तू कहीं भी दूर अब जाना
तुझको कसम हैं
साथ रहना जो भी हैं तू
झूठ या सच हैं, या भरम हैं
अपना बनाने का जतन कर ही चुके अब तो
बैयाँ पकड़ कर आज चल मैं दूँ, बता सबको

ढूंढ ही लोगे मुझे तुम हर जगह अब तो
मुझको खबर हैं
हो गया हूँ तेरा जब से मैं हवा में हूँ
तेरा असर है
तेरे पास हूँ, एहसास में, मैं याद में तेरी
तेरा ठिकाना बन गया अब साँस में मेरी


इस गीत का पापोन वाला वर्सन भी श्रवणीय है। उनकी आवाज़ का तो मैं हमेशा से कायल रहा हूँ। एम एम करीम ने बस यहाँ संगीत का कलेवर पश्चिमी रंग में रँगा है।

Friday, February 28, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 पॉयदान संख्या 4 : दिल से इतना क्यूँ हारा मैं, ये तूने क्या किया. (Ye Tune Kya Kiya..)

वार्षिक संगीतमाला के शिखर तक पहुँचने के लिए अब बस तीन पॉयदानों का सफ़र तय करना बाकी रह गया है। पिछली दो पॉयदानों की तरह इस सीढ़ी पर एक अलग कोटि का गीत है। जी हाँ इस गीतमाला की चौथी पॉयदान पर है एक कव्वाली। आप कहेंगे कव्वालियाँ तो पुरानी फिल्मों में हुआ करती थीं अब तो उनके नाम पर कुछ भी परोस दिया जाता है। आपकी बात गलत नहीं पर वक़्त बदलने के साथ संगीत में जो बदलाव है उसका कुछ असर तो पड़ेगा ही। पर चौथी पॉयदान की इस कव्वाली में कुछ तो बात ऐसी जरूर है जो पुराने दिनों की यादें ताज़ा कर देती है। 



इसे गाने वाले जावेद बशीर को संगीतकार प्रीतम ने खास पाकिस्तान से आयात किया है। चालीस वर्षीय जावेद का ताल्लुक कव्वालों के खानदान से रहा है। उस्ताद मुबारक अली खाँ से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लेने वाले जावेद पहली बार मेकाल हसन बैंड से जुड़ने की वज़ह से चर्चा में आए। शास्त्रीय संगीत, कव्वाली और रॉक इन तीनों विधाओं को अपनी गायिकी में पिरोने वाले जावेद ने पिया तू काहे रूठा रे (कहानी),  तेरा नाम जपदी फिरूँ  (कॉकटेल) , मेरा यार और रंगरेज़ (भाग मिल्खा भाग) से बॉलीवुड में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करायी है।

 जावेद बशीर और रजत अरोड़ा

Once upon a time in Mumbai दोबारा की इस कव्वाली को लिखा रजत अरोड़ा ने! रजत ने जयदीप साहनी और निरंजन अयंगार की तरह ही गीतकार बनने के पहले बतौर पटकथा लेखक अपने आप को स्थापित किया है। फिल्म दि डर्टी पिक्चर में उनके संवादों को आम जनता और समीक्षकों दोनों ने ही सराहा। ये अलग बात है कि जब 2001 में उन्होंने दिल्ली से मुंबई का रुख किया था तो उनके मन में गीतकार बनने का ही सपना था। 

अगर एक गीतकार पटकथा लेखक भी हो तो उसे गीत की परिस्थिति और चरित्र के अंदर उठ रहे मनोभावों का पूरा अंदाज़ा होता है। अब इस कव्वाली की परिस्थिति देखिए इस बार प्रेम में भाई यानि डॉन खुद पड़े हैं और प्रेम को भी वे हार जीत की बाजी के रूप में तौलते हैं इसीलिए रजत लिखते हैं इश्क़ की.. साज़िशें, इश्क़ की.. बाज़ियाँ.हारा मैं.. खेल के, दो दिलों.. का जुआ या फिर मुझे तू राज़ी लगती है, जीती हुई बाज़ी लगती है तबीयत ताज़ी लगती है, ये तूने क्या किया.

कव्वाली की शुरुआत में रजत इश्क़ को सहजता से इन अशआरों में ढालते हैं. जावेद बशीर की गहरी आवाज़ में वो और निखर जाते हैं.

इश्क़ वो बला है, इश्क़ वो बला है
जिसको छुआ इसने वो जला है
दिल से होता है शुरू, दिल से होता है शुरू
पर कम्बख़्त सर पे चढ़ा है
कभी खुद से कभी ख़ुदा से, कभी ज़माने से लड़ा है
इतना हुआ बदनाम फिर भी, हर ज़ुबाँ पे अड़ा है

और उसके आगे के अंतरों में शब्दों के साथ वो जिस सलाहियत से खेलते हुए प्रेम में घायल दिल का हाल बयाँ करते हैं कि उसे सुनते ही मन सुर में सुर मिलाने को करता है। कव्वाली पूरे रंग में आती है जब कोरस साथ में आता है। प्रीतम इंटरल्यूड्स में Once upon a time in Mumbai की Signature Tune का बखूबी इस्तेमाल करते हैं। और चूँकि ये कव्वाली है इसलिए साढ़े तीन मिनट बाद हारमोनियम भी अपने पूरे रंग में दिखता है।

इश्क़ की.. साज़िशें, इश्क़ की.. बाज़ियाँ
हारा मैं.. खेल के, दो दिलों.. का जुआ
क्यूँ तूने मेरी फ़ुर्सत की, क्यूँ दिल में इतनी हरकत की
इसक में इतनी बरक़त की, ये तूने क्या किया..
फिरूँ अब मारा मारा मैं, चाँद से बिछड़ा तारा मैं
दिल से इतना क्यूँ हारा मैं, ये तूने क्या किया..
सारी दुनिया से जीत के, मैं आया हूँ इधर
तेरे आगे ही मैं हारा, किया तूने क्या असर

मैं दिल का राज़ कहता हूँ, कि जब जब साँसें लेता हूँ
तेरा ही नाम लेता हूँ, ये तूने क्या किया
मेरी बाहों को तेरी साँसों की जो आदतें लगी हैं वैसी
जी लेता हूँ अब मैं थोड़ा और
मेरे दिल की रेत पे आँखों की जो पड़े परछाईं तेरी
पी लेता हूँ तब मैं थोड़ा और
जाने कौन है तू मेरी, मैं ना जानूँ ये मगर
जहाँ जाऊँ करूँ, मैं वहाँ तेरा ही ज़िक्र
मुझे तू राज़ी लगती है, जीती हुई बाज़ी लगती है
तबीयत ताज़ी लगती है, ये तूने क्या किया..

मैं दिल का राज़ कहता हूँ, कि जब जब साँसें लेता हूँ
तेरा ही नाम लेता हूँ, ये तूने क्या किया..

दिल करता है तेरी बातें सुनूँ, सौदे मैं अधूरे चुनूँ
मुफ़्त का हुआ यह फ़ायदा..
क्यूँ खुद को मैं बर्बाद करूँ, फ़ना होके तुझसे मिलूँ
इश्क़ का अजब है क़ायदा..
तेरी राहों से जो गुज़री है मेरी डगर
मैं भी आगे बढ़ गया हूँ, हो के थोड़ा बेफ़िक्र
कहो तो किससे मर्ज़ी लूँ, कहो तो किसको अर्ज़ी दूँ
हँसता अब थोड़ा फ़र्ज़ी हूँ
ये तूने क्या किया.. ये तूने क्या किया..

तो आइए आनंद लें इस गीत का...

Wednesday, February 26, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 पॉयदान संख्या 5 : कैसी तेरी खुदगर्जी तू धूप चुने या छाँव.. (Kabira...)

वार्षिक संगीतमाला की अगली पॉयदान का गीत जब भी सुनता हूँ तो कुछ सोचने के लिए मजबूर हो जाता हूँ। व्यक्ति आख़िर किसके लिये ये जीवन जीता है ? अपने सपनों को पूरा करने के लिए या परिवार तथा समाज द्वारा दिए गए दायित्वों का निर्वाह करने के लिए? 

आप कहेंगे कि इसमें मुश्किल क्या है? इन दोनों को साथ ले कर क्यूँ नहीं चला जा सकता ? मुश्किल है जनाब ! अपनी निजी महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने की राह में कई बार प्रेम आड़े आ जाता है तो कई बार पारिवारिक जिम्मेदारियों मुँह उठाए आगे चली आती हैं। फिर आपके मन को ये प्रश्न भी सालता है कि अगर अपने संगी साथियों को छोड़कर वो सब कुछ पा भी लिया तो क्या मन का सूखापन मिट पाएगा? क्या मुझे दुनिया एक सफल इंसान के रूप में आकेंगी या मैं एक खुदगर्ज इंसान माना जाऊँगा?
 

ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिसका कोई सीधा जवाब नहीं। फिल्म ये जवानी है दीवानी में सिनेमाई अंदाज़ में ही सही पर कुछ ऐसी ही उधेड़बुन की गिरफ्त में नायक भी अपने आप को पाता है। सारी दुनिया देखने का ख़्वाब और उन सपनों को पूरा करने का हुनर एक तरफ और दोस्तों, परिवार और माशूका का साथ दूसरी तरफ़। कोई भी रास्ता ऐसा नहीं जिसे आसानी से चुना या छोड़ा जा सके। अमिताभ भट्टाचार्य का लिखा ये गीत एक घुमक्कड़ मन के अंदर की इस बेचैनी को कुछ हद तक टटोलता जरूर है। हालांकि अमिताभ फिल्म की कहानी के अनुरूप अपनों का साथ नहीं छोड़ने की बात करते हैं पर अगर आपको The Alchemist  की कथा याद हो तो वहाँ अपने ख़्वाबों को पूरा करना ही आपकी नियति बताया जाता है।

बहरहाल अमिताभ सूफ़ियत की चादर ओढ़े इस गीत में टूटी चारपाई, ठंडी पुरवाई जैसे कुछ नए पर बेहतरीन रूपकों का प्रयोग करते हैं। तोची रैना और रेखा भारद्वाज की आवाज़ ऐसे गीतों के लिए ही जानी जाती है और उनकी गायिकी एक सुकून देने के साथ साथ गीत की भावनाओं में डूबने पर मज़बूर करती है। संगीतकार प्रीतम का संगीत मुख्यतः गिटार और ड्रम्स के ज़रिए पार्श्व से सहयोग देता नज़र आता है। 
 
 तो आइए सुनें इस गीत को

कैसी तेरी खुदगर्जी ना धूप चुने या छाँव
कैसी तेरी खुदगर्जी  किसी ठौर टिके ना पाँव
बन लिया अपना पैगंबर,तर लिया तू सात समंदर
फिर भी सूखा मन के अंदर क्यूँ रह गया

रे कबीरा मान जा रे फकीरा मान जा
आजा तुझको पुकारे तेरी परछाइयाँ
रे कबीरा मान जा रे फकीरा मान जा
कैसा तू है निर्मोही कैसा हरजाइया
 टूटी चारपाई वही,ठंडी पुरवाई रस्ता देखे
दूधों की मलाई वही, मिट्टी की सुराही रस्ता देखे

कैसी तेरी खुदगर्जी लब नमक रमे ना मिसरी
कैसी तेरी खुदगर्जी तुझे प्रीत पुरानी बिसरी
मस्त मौला मस्त कलंदर तू हवा का एक बवंडर
बुझ के यूँ अंदर ही अंदर क्यूँ रह गया..


वार्षिक संगीतमाला 2013 पॉयदान संख्या 6 :जिसको ढूँढे बाहर बाहर वो बैठा है भीतर छुपके (Piya Milenge)

वार्षिक संगीतमाला की अगली सीढ़ी पर है एक बार फिर ए आर रहमान और इरशाद क़ामिल की जोड़ी, फिल्म रांझणा के नग्मे के साथ। तुम तक की तरह प्रेम का रंग यहाँ भी है पर फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ बात ईश्वरीय प्रेम की हो रही है। रहमान ज़रा सी भी गुंजाइश रहने पर अपनी संगीतबद्ध हर फिल्म में एक सूफ़ी गीत जरूर डालते हैं। फिल्म जोधा अकबर का गीत ख़्वाजा मेरे ख़्वाजा और रॉकस्टार का नग्मा कुन फाया कुन इसकी दो बेहतरीन मिसालें हैं। 

इरशाद क़ामिल ने इस गीत के लिए कबीर की पंक्तियों घूँघट के पट खोल रे तोहे पिया मिलेंगे से प्रेरणा ली। कबीर की इस कृति को 1950 में फिल्म जोगन में गीता दत्त ने अपनी आवाज़ से सँवारा था। पर इरशाद ने इस Catch line के इर्द गिर्द जो गीत बुना उसे अगर सुखविंदर सिंह की बेमिसाल गायिकी के साथ शांति से सुनें और गुनें तो इसमें कोई शक़ नहीं कि आप ईश्वर को अपने और करीब पाएँगे।



सुखविंदर जैसे ही शानदार मुखड़े को गाते हुए अकल के परदे पीछे कर दे घूँघट के पट खोल रे तोहे पिया, पिया.. तोहे पिया मिलेंगे मिलेंगे …तक आते हैं मन गीत की लय को आत्मसात कर लेता है। रहमान ने गीत में सुखविंदर के साथ चेन्नई में अपने कॉलेज KM Music Conservatory (KMMC) में सूफी गायन से जुड़े छात्रों को भी गाने का मौका दिया है। दरअसल ये समूह पहले भी कव्वाल शौक़त अली के मार्गदर्शन में रहमन रचित कव्वालियों की प्रस्तुति देता आया है। इस गीत के अंतरों के बीच की सुरीली सरगम और समूह गान को खूबसूरती से निभा कर KMMC Sufi Ensemble इस गीत में और निखार ला दिया है।

यूँ तो इरशाद क़ामिल के बोल सहज पर दिल पे सीधे असर करने वाले हैं। पर इस गीत की शुरुआत में उन्होंने एक अप्रचलित शब्द तुपके तुपके का इस्तेमाल किया है। उन्होंने लिखा है तेरे अंदर एक समन्दर क्यूँ ढूँढे तुपके तुपके ! आप जानना चाह रहे होंगे कि इसका मतलब क्या है? यहाँ क़ामिल कहना चाह रहे हैं जब कि तू तो भगवन को पाने की प्यास में इधर उधर की छोटी मोटी बूँदे खोज़ता फिर रहा है, अरे मूरख तू क्या नहीं जानता कि तेरे अंदर तो पूरा समंदर बह रहा है। जरूरत है उसमें झाँकने की, उस तक पहुँचने की, उसके दिए संकेत समझने की।

तो आइए सुनें इस नग्मे को..


नि नि सा सा ...नि सा नि सा नि सा
जिसको ढूँढे बाहर बाहर वो बैठा है भीतर छुपके
तेरे अंदर एक समन्दर क्यूँ ढूँढे तुपके तुपके
अकल के परदे पीछे कर दे घूँघट के पट खोल रे
तोहे पिया, पिया.. तोहे पिया मिलेंगे मिलेंगे … 
सा सा सा... ....पा नि सा रे सा

पा के खोना खो के पाना होता आया रे
संग साथी सा है वो तो वो है साया रे
झाँका तूने ही ना बस जी से जी में रे
बोले सीने में वो तेरे धीमे धीमे रे
तोहे पिया मिलेंगे मिलेंगे … जिसको ढूँढे बाहर बाहर...

जो है देखा वो ही देखा तो क्या देखा है
देखो वो जो औरों ने ना कभी देखा है
नैनो से ना ऐसा कुछ देखा जाता है
नैना मींचो तो वोह सब दिख जाता है
तोहे पिया मिलेंगे मिलेंगे … 
उसी को पाना उसी को छूना
कहीं पे वो ना कहीं पे तू ना
जहां पे वो ना वहाँ पे सूना
यहाँ पे सूना...
तोहे पिया, पिया.. तोहे पिया मिलेंगे मिलेंगे …  

Sunday, February 16, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 पॉयदान संख्या 7 - सुन रहा है ना तू...कौन हैं अंकित तिवारी ? (Sun Raha hai na Tu. Ankit Tiwari)

वार्षिक संगीतमाला के प्रथम दस के सफ़र को आगे बढ़ाते हुए आज हमारे सामने हैं सातवीं पॉयदान का गीत जो इस साल चारों तरफ़ इतना बज चुका है कि अब ये गीत किसी परिचय का मुहताज़ नहीं रहा। हाँ ये जरूर है कि इस गीत की सफ़लता के पीछे जिस शख़्स का हाथ है उसके बारे में आप जरूर जानना चाहेंगे। जी हाँ मेरा इशारा है आशिक़ी 2 के गीत सुन रहा है तू के संगीत निर्देशक अंकित तिवारी की ओर।


कानपुर से ताल्लुक रखने वाले अंकित की पारिवारिक पृष्ठभूमि भक्ति संगीत से जुड़ी है। उनके माता पिता भक्ति संगीत के कार्यक्रमों जैसे 'जागरण' और 'माता की चौकी' को एक युगल जोड़ी (राजू सुमन एंड पार्टी ) के रूप में प्रस्तुत करते थे और छोटे से अंकित को भी अपने साथ  ले जाया करते थे। अंकित इसी माहौल में पले बढ़े। स्कूल के दिनों में उन्होंने अपने माता पिता को ये बता दिया था कि उन्हें आगे जाकर संगीत से जुड़ा ही कुछ करना है। पर मुंबई जाने के बाद पहली बड़ी सफलता मिलने में उन्हें छः सालों का लंबा इंतजार करना पड़ा। इसीलिए अंकित कहते हैं कि सफलता व प्रसिद्धि  तो कुछ दिनों की होती है पर उसके लिए व्यक्ति को हमेशा मेहनत करनी पड़ती है।




आशिक़ी 2 का ये गीत अंकित तिवारी की झोली में कैसे गिरा इस प्रश्न का जवाब अंकित कुछ यूँ देते हैं..
"लखनऊ में मेरे एक मित्र रहते है। उन्होंने ही महेश भट्ट से मेरे बारे में बताया। मुझे इस बात की खुशी है कि महेश भट्ट ने मुझे वापस फोन किया और कहा कि अपनी पाँच बेहतरीन संगीत रचना संगीत निर्देशक मोहित सूरी को सुना दो। मैंने वही किया। पियानों पर अपनी पाँचों धुनें तैयार कर ले गया। सबसे पहले मैंने 'सुन रहा है ना तू 'ही सुनाई। ये आशिक़ी के प्रदर्शित होने के एक साल पहले की बात है। उन्होंने मेरे पाँचों गीत सुने और कहा सभी अच्छे हें पर इसमें वो कौन सा फिल्म में इस्तेमाल करेंगे वे ये अभी नहीं बता सकते। पर किसी दूसरे को इन धुनों को देने के पहले तुम मुझे फोन जरूर कर लेना।"

जब ये धुन आशिक़ी 2 के लिए चुनी गई तो अंकित ने गाकर भी इसको सुनाया। महेश भट्ट और मोहित सूरी को उनकी आवाज़ भी जँच गई और इस तरह बतौर गायक भी उन्होंने इस गीत के लिए अपना योगदान दिया। पर अंकित के लिए गायिकी से ज्यादा महत्त्वपूर्ण संगीत निर्देशन है और आगे वो उसी पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं।

आशिक़ी 2 के इस गीत को लिखा है गीतकार संदीप नाथ ने। आपको याद होगा कि संदीप नाथ द्वारा फिल्म 'साहब बीवी और गैंगस्टर' के लिए लिखा गीत रात मुझे ये कह के चिढ़ाए तारों से भरी मैं और तू अकेली हाय  वार्षिक संगीतमाला 2011 के प्रथम दस गीतों में अपनी जगह बन चुका है। इसी फिल्म के दौरान अंकित तिवारी को उनके साथ बतौर पहली हिंदी फिल्म में काम करने का मौका मिला था। संदीप ने गीत की शब्द रचना युवाओं को ध्यान में रखकर सहज ही रखी है। मुझे इस गीत की सबसे अच्छी पंक्तियाँ दिल को ठिकाने दे, नए बहाने दे ...ख़्वाबों की बारिशों को, मौसम के पैमाने दे लगती हैं।


आशिक़ी 2 के इस गीत के दो वर्जन हैं। अंकित तिवारी ने अपने वर्सन को फिल्म की परिस्थिति के हिसाब से संगीत संयोजन ऐसा रखा है जैसे मंच पर कोई रॉक शो चल रहा है। इसलिए गीत के इंटरल्यूड्स में इलेक्ट्रानिक गिटार और ड्रम्स और जिटार (जो नीलाद्रि कुमार द्वारा ईजाद किया सितार का परिवर्तित रूप है) का प्रचुरता से उपयोग हुआ है। गीत के अंत में श्रोताओं के कोरस को भी इसीलिए डाला गया है। इसमें कोई शक़ नहीं कि अंकित अपनी संगीत रचना से सुनने वालों के मन को द्रवित करते हैं पर कहीं कहीं मुखर संगीत संयोजन के बीच उनकी आवाज़ दब सी जाती है।



अपने करम की कर अदाएँ, यारा ...यारा ...यारा ...
मुझको इरादे दे ..कसमें दे, वादे दे
मेरी दुआओं के इशारों को सहारे दे
दिल को ठिकाने दे, नए बहाने दे
ख़्वाबों की बारिशों को , मौसम के पैमाने दे

अपने करम की कर अदाएँ,  कर दे इधर भी तू निगाहें

सुन रहा है ना .. रो रहा हूँ मैं
सुन रहा है ना तू , क्यूँ रो रहा हूँ मैं

मंजिलें रुसवा हैं, खोया है रास्ता
आए ले जाए , इतनी सी इल्तिज़ा
ये मेरी ज़मानत है, तू मेरी अमानत है हाँ ...
अपने करम की कर अदाएँ, कर दे इधर भी तू निगाहें
सुन रहा है ना तू ....

वक़्त भी ठहरा है, कैसे क्यूँ ये हुआ
काश तू ऐसे आए, जैसे कोई दुआ
तू रूह की राहत है, तू मेरी इबादत है
अपने करम की कर अदाएँ,  कर दे इधर भी तू निगाहें
सुन रहा है ना तू ...




इस गीत की सबसे बड़ी खूबी इसकी मधुरता है जो श्रेया घोषाल के गाए वर्जन में ज्यादा उभर कर आती है। गीत के दूसरे वर्जन की तुलना में यहाँ संगीत संयोजन ज्यादा मुखर नहीं है। अगर आप गीत को ध्यान से सुनेंगे तो पाएँगे गीत के साथ और इंटरल्यूड्स में बजती बाँसुरी को घाटम और सरोद का सुरीला साथ मिला है। अंकित जानते हैं कि ये उनके सफ़र की शुरुआत भर है । इस गीत की सफलता के बाद उनकी आने वाली फिल्मों से अपेक्षाएँ बढ़ गयी हैं। आशा है भविष्य में वे हमारी अपेक्षाओं पर ख़रा उतरेंगे।
 

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