Saturday, September 20, 2014

क्या हिंदी संचार माध्यमों द्वारा प्रयुक्त हिंदी में अंग्रेजी की मिलावट जायज़ है?

कुछ साल पहले तक कार्यालयी जीवन में हिंदी दिवस राजभाषा पखवाड़े के तहत कुछ पुरस्कार अर्जित करने का बस एक अच्छा अवसर हुआ करता था।  पर हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए राजभाषा पखवाड़ा मनाना मुझे अब बेतुका सा लगने लगा है। राजभाषा के नाम पर कार्यालयों में जो भाषा परोसी जाती है उससे अन्य आंचलिक भाषाओं को बोलने वालों के मन में उसके प्रति प्यार कैसे पनपेगा ये मेरी समझ के बाहर है। पर सरकारी क़ायदे कानून हैं वो तो चलेंगे ही उससे हिंदी का भला हो ना हो किसको फर्क पड़ता है। दरअसल भाषा का अस्तित्व उसकी ताकत उसे बोलने वाले तय करते हैं और जब तक ये प्रेम जनता में बरक़रार है तब तक इसका कोई बाल भी बाँका नहीं कर सकता। पिछले हफ्ते हिंदी दिवस पर हिंदी से जुड़े मसलों पर समाचार चैनल ABP News पर एक घंटे की परिचर्चा हुई जिसमें प्रसिद्ध गीतकार प्रसून जोशी नीलेश मिश्र, कवि कुमार विश्वास और पत्रकार पंकज पचौरी ने हिस्सा लिया। चर्चा में तमाम विषय उठाए गए पर जो मुद्दा मेरे दिल के सबसे करीब रहा वो था संचार माध्यमों द्वारा हिंदी वाक्यों में अंग्रेजी के शब्दों का धड़ल्ले से उपयोग।

इस विषय पर मेरी राय प्रसून जी से मिलती जुलती है जिन्होंने कहा कि पारंपरिक भाषा में वैसे शब्द जिनकी उत्पत्ति दूसरे देशों में हुई है उन्हैं वैसे ही स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं है। मिसाल के तौर पर ट्रेन, टेलीफोन, सिनेमा, क्रिकेट आदि शब्द हिंदी में ऐसे घुलमिल गए हैं कि उन्हें हिंदी शब्दकोश में अंगीकार करना ही श्रेयस्कर होगा पर इसका मतलब ये भी नहीं कि दूरभाष और चलचित्र का उपयोग ही बंद कर दिया जाए। नीलेश मिश्र ने ये तो कहा कि जहाँ तक सरल शब्द उपलब्ध हों वहाँ अंग्रेजी के शब्द की मिलावट बुरी भी नहीं है। उनके संपादित समाचार पत्र का नाम गाँव कनेक्शन है और रेडियो पर कहानी सुनाते समय उन्हें अवसाद जैसे शब्दों के लिए उन्हें डिप्रेशन कहना ज्यादा अच्छा लगता है। 

दरअसल दिक्कत ये है कि इन सरल और कठिन शब्दों की परिभाषा कौन तय करेगा? किसी भी भाषा में अगर आप कोई शब्द इस्तेमाल नहीं करेंगे तो वो देर सबेर अप्रचलित हो ही जाएगा। इसका मतलब तो ये हुआ कि हम धीरे धीरे इन शब्दों को मार कर पूरी भाषा का ही गला घोंट दें?  ऊपर नवभारत टाइम्स की सुर्खियाँ देखिए बार्डर पर आमने सामने। एशियन गेम्स आज से। 

मतलब सीमा और एशियाई खेल कहना इस अख़बार के लिए दुरुह हो गया। राजस्थान पत्रिका का युवा पृष्ठ कह रहा है - थीम बेस्ड होगा पेंटिंग कम्पटीशन। अब अगर ऐसे शीर्षक आते रहे तो चित्रकला और प्रतियोगिता जैसे सामान्य शब्दों को भी नीलेश मिश्र सरीखे लोग कठिन शब्दों की श्रेणी में ले आएँगे। नीलेश जी से मेरा सीधा सवाल ये है कि क्या अंग्रेजी के समाचार पत्र अपनी भाषा के कठिन शब्दों का सरल हिंदी शब्द में अनुवाद कर कभी अपने शीर्षक लिखेंगे? क्या TOI कभी लिखेगा   Armies in front of each other at SEEMA ? क्या एक सामान्य अंग्रेजीभाषी को ऐसा पढ़ना अच्छा लगेगा?

हिंदी और आंचलिक भाषाएँ रोज़गार के अवसर तो अब प्रदान करती नहीं। दसवीं तक छात्र इन्हें पढ़ लेते हैं फिर तो इनका साबका अपनी भाषा से रेडिओ, टीवी व समाचार के माध्यमों से पड़ता है। अगर ये माध्यम भी भाषा की शुद्धता नहीं बरतेंगे तब तो किसी भी भाषा का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा। मुझे आज भी याद है कि पिताजी हिंदी के सही वाचन के लिए मुझे आकाशवाणी और बीबीसी की हिंदी सेवा नियमित सुनने की हिदायत देते थे। हर भाषा की एक गरिमा होती है। ये सही है समय के साथ भाषा में अन्य भाषाओं से शब्द जुड़ते चले जाते हैं पर इसका मतलब ये नहीं कि उनका इस तरह प्रयोग हो कि वे भाषा के कलेवर को ही बदल दें। ना ऐसी मिलावट मुझे अंग्रेजी के लिए बर्दाश्त होगी ना हिंदी के लिए।

कुमार विश्वास ने कहा कि उनकी कविता में शुद्ध हिंदी भी रहती है और सामान्य प्रचलित हिंदी भी। यानि वो भाषा को उसके हर रूप में प्रस्तुत करते हैं और उनका अनुभव है कि दोनों तरह की कविताओं को युवाओं से उतना ही प्रेम मिलता है। सच तो ये है कि हमें अच्छी हिंदी को इस तरह प्रचारित प्रसारित करना है कि वो पूरी जनता की आवाज़ बने ना कि उसे हिंग्लिश जैसा बाजारू बना दिया जाए कि जिसे पढ़ते भी शर्म आए।

हिंदों से जुड़े अन्य विषयों पर भी सार्थक चर्चा चली पर वातावरण को हल्का फुल्का बनाया प्रसून जोशी, कुमार विश्वास और नीलेश मिश्र की कविताओं ने। नीलेश मिश्र ने अपनी कविता में मिश्रित भाषा का प्रयोग किया है पर जो शब्द अंग्रेजी से उन्होंने लिए हैं वो कविता की रवानी को बढ़ाते हैं। मुझे तो प्रसून, नीलेश और कुमार विश्वास की अलग अलग अंदाज़ों में लिखी तीनों कविताएँ पसंद आयीं। आशा है आपको भी आएँगी..

 

प्रसून जोशी की कविता लक्ष्य

लक्ष्य ढूंढ़ते हैं वे जिनको वर्तमान से प्यार नहीं है
इस पल की गरिमा पर जिनका थोड़ा भी अधिकार नहीं है
इस क्षण की गोलाई देखो आसमान पर लुढ़क रही है,
नारंगी तरुणाई देखो दूर क्षितिज पर बिखर रही है.
पक्ष ढूँढते हैं वे जिनको जीवन ये स्वीकार नहीं हैं
लक्ष्य ढूँढते हैं वे जिनको वर्तमान से प्यार नहीं है

नाप-नाप के पीने वालों जीवन का अपमान न करना
पल-पल लेखा-जोखा वालों गणित पे यूँ अभिमान न करना
नपे-तुले वे ही हैं जिनकी बाहों में संसार नहीं है
लक्ष्य ढूँढते हैं वे जिनको वर्तमान से प्यार नहीं है

ज़िंदा डूबे-डूबे रहते मृत शरीर तैरा करते हैं
उथले-उथले छप-छप करते, गोताखोर सुखी रहते हैं
स्वप्न वही जो नींद उडा दे, वरना उसमे धार नहीं है
लक्ष्य ढूँढते हैं वे जिनको वर्तमान से प्यार नहीं है

कहाँ पहुँचने की जल्दी है नृत्य भरो इस खालीपन में
किसे दिखाना तुम ही हो बस गीत रचो इस घायल मन में
पी लो बरस रहा है अमृत ये सावन लाचार नहीं है
लक्ष्य ढूँढते हैं वे जिनको वर्तमान से प्यार नहीं है

कहीं तुम्हारी चिंताओं की गठरी पूँजी ना बन जाए
कहीं तुम्हारे माथे का बल शकल का हिस्सा न बन जाए
जिस मन में उत्सव होता है वहाँ कभी भी हार नहीं है
लक्ष्य ढूँढते हैं वे जिनको वर्तमान से प्यार नहीं है

नीलेश मिश्र की कविता 'बकवास परस्ती'

चल सर से सर टकराते है
चल सड़क पे नोट लुटाते हैं
चल मोटे स्केच पेन से एक दिन हम चाँद पे पेड़ बनाते हैं
जो हँसना भूल गए उनको गुदगुदी जरा कराते हैं
चल लड़की छेड़ने वालों पे आज सीटी जरा बजाते हैं
इन बिगड़े अमीरजादों से चल भीख जरा मँगवाते हैं
पानी में दूध मिलाया क्यूँ चल भैंस से पूछ के आते हैं
नुक्कड़ पर ठेले वाले से चल मुफ्त समोसे खाते हैं
चल गीत बेतुके लिखते है और गीत बेसुरे गाते हैं
क्या करना अक्ल के पंडों का हमें ज्ञान कहाँ हथकंडों का
चल बेअक्ली फैलाते हैं चल बातें सस्ती करते हैं
चल बकवास परस्ती करते हैं, चल बकवास परस्ती करते हैं
 

चल तारों का 'बिजनेस' करके सूरज से 'रिच' हो जाते  हैं
उस पैसे से मंगल ग्रह पे एक 'प्राइमरी' स्कूल चलाते हैं
चल रेल की पटरी पे लेटे हम ट्रेन की सीटी बजाते हैं
चल इनकम टैक्स के अफसर से क्यूँ है 'इनकम' कम कहते हैं
चल किसी गरीब के बच्चे की सपनों की लंगोटी बुनते हैं
मुस्कान जरा फेंक आते हैं जहाँ गम हमेशा रहते हैं
चल डाल 'सुगर फ्री' की गोली मीठा पान बनाते हैं
जो हमको समझे समझदार उसका चेकअप कराते हैं
चल
'बोरिंग-बोरिंग' लोगों से बेमतलब मस्ती करते हैं
चल बकवास परस्ती
करते हैं चल बकवास परस्ती करते हैं।

पुनःश्च : हिंदी के प्रमुख समाचार चैनल ABP News ने गत रविवार हिंदी दिवस के अवसर पर कई और कार्यक्रम किए जिनमें से एक का विषय था कि हिंदी माध्यम से पढ़ कर आपने क्या परेशानियाँ झेलीं और उनसे जूझते हुए कैसे अलग अलग क्षेत्रों में अपना मुकाम बनाया। इस श्रंखला में साथी ब्लॉगर प्रवीण पांडे के आलावा संतोष मिश्र, अमित मित्तल,निखिल सचान के साथ मुझे भी अपनी बात रखने का मौका मिला। ये मेरे लिए अपनी तरह का पहला अनुभव था। वैसे आधे घंटे से चली इस बातचीत को कैसे संपादक पाँच मिनट में उसके मूल तत्त्व को रखते हुए पेश करते हैं इस कला से मेरा पहली बार परिचय हुआ।


साक्षात्कार के दौरान दिए जा रहे कैप्शन में दो तथ्यात्मक त्रुटियाँ रहीं। एक तो ब्लागिंग की शुरुआत जो मैंने 2005 में की को 1995 दिखाया गया और दूसरी IIT Roorkee से किए गए MTech को BTech बताया गया। आधे घंटे की बातचीत को पाँच मिनट में संपादित करने की वज़ह से बहुत सारी बातें उन संदर्भों के बिना आयीं जिनको ध्यान में रखकर वो कही गयी थीं। मसलन स्कूल की बातों को पूरे परिपेक्ष्य में समझने के लिए आपको मेरी ये पोस्ट पढ़नी होगी। नौकरी के सिलसिले में ये बताना शायद मुनासिब हो कि सेल की सामूहिक चर्चा में हिंदी के प्रयोग के पहले अंग्रेजी में दिए साक्षात्कारों की बदौलत मेरा चयन ONGC और NTPC में हो चुका था।

Tuesday, September 09, 2014

एक नौकरानी की डॉयरी : क्या आपने पढ़ी है कभी उनके मन की बात ? Ek Naukarani ki Diary Krishna Baldev Vaid

हमारे देश, हमारे समाज में किसी व्यक्ति को आँकने का दृष्टिकोण हमेशा से बेहद संकुचित रहा है। छोटे कार्यों को करने वाले इस देश में हेय दृष्टि से देखे जाते है चाहे वो अपने निर्धारित कार्य में कितने कुशल क्यूँ ना हों। श्रम को सम्मान देना हमारी परंपरा में कब आया है? पर कनाडा और जापान जैसे विकसित देशों में मैंने देखा कि किस तरह लोग वेटरों, चालकों व सफाई कर्मचारियों से सम्मान से बातें करते हैं। उन्हें वाजिब वेतन देते हैं। इसीलिए वहाँ अच्छे घरों के बच्चे भी इन कार्यों को खुशी खुशी करते दिखाई देते हैं। 

क्या हम अपने बच्चों को किसी घर में सफाई या अन्य किसी काम में मदद में भेज सकते हैं? सोचने से भी दिल दहल जाता है ना ? इज़्जत नहीं चली जाएगी अपनी, पुरखों की नाक नहीं कटेगी क्या कि अपने बेटे बेटियों को नौकर नौकरानी बनाने को तैयार हो गए। समाज की ऐसी सोच के बीच जो मजबूरीवश इन कामों को अंजाम देते हैं उन्हें कैसा लगता होगा?



वयोवृद्ध कथाकार कृष्ण बलदेव वैद्य ने अपने उपन्यास 'एक नौकरानी की डॉयरी' में समाज के इसी उपेक्षित वर्ग के मन को एक युवा होती नौकरानी शन्नो की दृष्टि से टटोलने की कोशिश की है। राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित दो सौ तीस पृष्ठों वाला उपन्यास हमारे घर के कामों में हाथ बँटाने वाली महिलाओं और किशोरियों की रोजमर्रा की ज़िदगी और उनके कष्टों को ना केवल करीब से देखने की कोशिश करता है बल्कि साथ ही साथ हमारे पढ़े लिखे कुलीन समाज के मानसिक पूर्वाग्रहों की परत दर परत भी खोलता जाता है।

आज भी दो गृहणियाँ मिलती हैं तो उनकी बातें घूम फिर कर अपने यहाँ काम करने वालियों पर आ ही जाती हैं। हर मालकिन के पास नौकरानियों द्वारा पैदा किए दर्द भरे  किस्से हैं। पर नौकरानियाँ अपने मालिक मालकिन को किन नज़रों में देखती हैं ये भी आपने कभी सोचा है? कृष्ण बलदेव वैद्य पुस्तक के शुरुआती पन्नों में ही उनकी सोच को इन शब्दों में व्यक्त करते हैं..
"माँ कहती है मालिक लोग बहुत कमीने होते हैं। उनका कोई भरोसा नहीं उन्हें हम लोगों से कोई हमदर्दी नहीं, उनकी बातों में कभी मत आना।

आज डस्टिंग कर रही थी तो मोटी मेम ने फिर से टोकना शुरु कर दिया। बोली इतना ज़ोर कहाँ से आ जाता है तुम लोगों में, क्या खाती हो, सब तोड़ फोड़ डालोगी। .... मोटी बहुत बकती है। मन करता है मनमन की गालियाँ दूँ। मन ही मन देती रहती हूँ। मन करता है किसी दिन झाड़न उसके मुँह पर दे मारूँ। माँ कहती है, सब मालकिनें बकती हैं। कोई कम कोई ज्यादा। कोई मन ही मन, कोई मुँह से। माँ ठीक ही कहती है। उन्नीस बीस का फ़रक हो तो हो। सब परले दर्जे की शक्की और कंजूस। मालिक बकवास तो नहीं करते पर बेहयाई से बाज नहीं आते....           

मिसिज वर्मा मुझे अच्छी लगती है, उसकी बातें भी। मुझे वो सब लोग अच्छे लगते हैं जो मेरे साथ ठीक तरह से बातें करें। मुझे ये पता ना लगने दें कि मैं नौकरानी हूँ। मिसिज वर्मा में बस एक खराबी है उसे सफाई का वहम है। दस बार हाथ पैर धोने पड़ते थे, हर तीसरे दिन नाख़ून दिखाने पड़ते थे, हर रोज़ कपड़े बदलने पड़ते थे। इसलिए मैंने उसका घर छोड़ दिया था। बूढ़ियों को सफाई का वहम कुछ ज्यादा ही होता है। पढ़ी लिखी बूढ़ियों को भी।"

दरअसल इस किताब में कृष्ण बलदेव वैद्य ने शन्नो से उसकी डॉयरी में वो सब लिखवाया है जो आए दिन हम अपने घरों में देखते हैं। काम कराने वालों की प्राथमिकता होती है कि वो हर रोज़ समय पर आएँ, काम पर ध्यान दें , सफाई से काम करें, जबान ना लड़ाएँ और चुपचाप अपना काम कर चली जाएँ। पर कितनों को इस बात की फिक्र होती है कि वो घर से पिट कर आयी हैं,  तबियत नासाज़ है, मालिकों की वहशियाना नज़रों से परेशान है या आज उनका काम करने का मन ही नहीं है। सबसे बड़ी बात ये कि उनके अंदर भी एक आत्मसम्मान की भावना है जिसे हम जानते तो हैं पर उसे तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ते।
"छोटी थी तो दूसरों के दिए लत्थड़ कपड़े पहन लेती थी, पहन कर खुश होती थी। जब से बड़ी हुई हूँ । मैंने जूठा खाना और पहनना छोड़ दिया है। मैं नख़रे नहीं करती। बस मुझे अब दूसरों के लत्थड़ पहनने में शर्म आने लगी है। अच्छा नहीं लगता। लगता है जैसे किसी के उतारे हुए नाख़ूनों को चबाना पड़ रहा हो और ये कहना कि उनका स्वाद बहुत अच्छा है। 

मैं आजकल खूब मज़े में नहाती हूँ। पानी तो ज्यादा नहीं लगाती, देर बहुत लगाती हूँ। नहाने से पहले अच्छी तरह से सफाई करती हूँ। कपड़े उतार कर। बीच बीच में शीशा देखती रहती हूँ। बीजी के तौलिए बढ़िया हैं। साबुन भी. तेल भी शैम्पू भी। शैम्पू की झाग सारे बदन पर मल लेती हूँ। बहुत मजा आता है. दो तीन दिनों में ही एड़ियाँ साफ हो गयी हैं। खूब करीम लगाती हूँ उन पर। और ये सब करते हुए डर जाती हूँ यह सोच कर कि कहीं कोई भूल तो नहीं हो रही मुझसे, कहीं कोई चोरी तो नहीं कर रही मैं।"

मैं पूरे विश्वास से कह सकता हूँ कि आज भी अस्सी प्रतिशत भारतीय इसी विचारधारा को हृदय में आत्मसात किए है कि नौकरानी है तो नौकरानी की तरह रहे ज्यादा नखरे ना दिखाए। मध्यम और उच्च मध्यम वर्गीय घरों में काम करते करते उनमें भी उसी जीवन स्तर, मनोरंजन के उन्हीं साधनों का उपभोग करने की इच्छा जागी है। नकल करने की ये प्रवृति घातक तो है पर उससे निज़ात पाना इतना आसान भी नहीं। कभी इन चीजों की आवश्यकता पर वो चोरी करने से भी नहीं हिचकती। ये बिल्कुल गलत प्रवृति है है पर छोटे छोटे शहरों और कस्बों में इनको जो पगार दी जाती है वो क्या उनके सम्मानपूर्वक जीवन जीने के लायक है? उपन्यास में शन्नो भी मासिक के दौरान बाथरूम में पड़ा  विस्पर का एक पैड चुरा लेती है आप कहेंगे ऐसी दिक्कत होने से वो माँग भी सकती थी? कितने लोग देंगे?

शन्नो को काम करने में सबसे ज्यादा सुकून मिलता है अख़बार वाले साब  के यहाँ क्यूँकि वहाँ उसे कभी डाँट नहीं मिलती, वो जो बनाती है साहब खा लेता है और उसके काम में कोई टोकाटाकी भी नहीं करता। मिसेज वर्मा वहीं उसे पढ़ने लिखने पर भी ज़ोर देती हैं। सफाई तो करवाती हैं पर वहाँ की वस्तुओं के इस्तेमाल करने की उसे आज़ादी है। शन्नो सोचती है कि अख़बार वाले साब और मिसिज वर्मा एक साथ क्यूँ नहीं रहते ? पर जब उसकी सोच सच हो जाती है और उन्हें उन लोगों के साथ रहना पड़ता है तो क्या शन्नो की ज़िदगी बदलती है? ये जानने के लिए तो आपको ये किताब पढ़नी पड़ेगी।

कृष्ण बलदेव वैद्य की इस पुस्तक के ज्यादा पन्ने शन्नो की सोच से रँगे हैं जिसे हर रात अपनी खोली में वो कॉपी के पन्नों पर भरती है। शन्नों के मन में आने वाले ख़यालात उसे अपने अन्तरमन का आईना दिखाते हैं और पाठक को समाज के दोगले चेहरे का। समाज के उस वर्ग से जिससे हम सभी रोज़ निबटते हैं की सोच  को जानने और समझने की जरूरत है और ये किताब इसमें हमारी मदद करती है।

इस चिट्ठे पर आप इन पुस्तकों के बारे में भी पढ़ सकते हैं 
पीली छतरी वाली लड़की**, उर्दू की आख़िरी किताब     भाग :1    भाग :2 ***1/2, गुनाहों का देवता ****, कसप ****, गोरा ***, महाभोज ***,मधुशाला ****, मुझे चाँद चाहिए  ***, मित्रो मरजानी ***, घर अकेला हो गया, भाग १ , भाग २ ***             वैसे पुस्तक चर्चा में शामिल किताबों की
 पूरी सूची यहाँ है

Sunday, August 31, 2014

जब कोई प्यार से बुलाएगा.. तुमको एक शख़्स याद आएगा Jab koyi pyar se bulayega... Mehdi Hassan

पिछले दो हफ्तों से मेरे शहर का मौसम बड़ा खुशगवार है। दिन में हल्की फुल्की बारिश और फिर रात में खुले आसमान के नीचे मंद मंद बहती प्यारी शीतल हवा। ऐसी ही इक रात में इंटरनेट की वादियों में भटकते भटकते ये गीत सुनाई दिया। गीत तो सरहद के उस पार का था जहाँ से चलती गोलियों ने पिछले कुछ हफ्तों से सीमा पर रहने वाले लोगों का जीवन हलकान कर दिया है। गीत में आवाज़ उस शख्स की थी जिसकी गायिकी ने दोनों देशों के आवाम को अपना मुरीद बनाया है। जी हाँ मैं मेहदी हसन की बात कर रहा हूँ। सोचता हूँ कि अगर इन दोनों देशों की हुकूमत मेहदी हसन व गुलज़ार सरीखे कलाकारों के हाथ होती तो गोलियों का ये धुआँ गीत संगीत की स्वरलहरियों की धूप से क्षितिज में विलीन हो गया होता।


अमूमन मेहदी हसन का नाम ग़ज़ल सम्राट के रूप में लिया जाता रहा है पर अपने शुरुआती दिनों में गायिकी का ये बादशाह साइकिल और फिर कार व ट्रैक्टर का मेकेनिक हुआ करता था। पर आर्थिक बाधाओं से जूझते हुए भी कलावंत घराने के इस चिराग ने रियाज़ का दामन नहीं छोड़ा। रेडियो में ठुमरियाँ गायीं । उससे कुछ शोहरत मिली तो शायरी से मोहब्बत की वज़ह से ग़ज़लें भी गाना शुरु किया। साठ के दशक में इसी नाम के बल पर पाकिस्तानी फिल्मों के नग्मे गाने का मौका मिला। उनकी रुहानी आवाज़ को मकबूलियत इस हद तक मिली कि साठ से सत्तर के दशक की कोई भी फिल्म उनके गाए नग्मे के बिना अधूरी मानी जाती रही। 

मेहदी हसन के गाए जिस गीत की गिरफ्त में मैं आजकल हूँ उसे उन्होंने फिल्म ज़िंदगी कितनी हसीन है के लिए गाया था। गीत में अपनी महबूबा से दूर होते विकल प्रेमी की पीड़ा है। गीत की धुन तो सुरीली है ही पर मेहदी हसन की आवाज़ को इस अलग से सहज अंदाज़ में सुनने का आनंद ही कुछ और है। तो चलिए उसी आनंद को बाँटते हैं आप सब के साथ

जब कोई प्यार से बुलाएगा
तुमको एक शख़्स याद आएगा

लज़्ज़त-ए-ग़म से आशना होकर
अपने महबूब से जुदा हो कर
दिल कहीं जब सुकून न पाएगा
तुमको एक शख़्स याद आएगा


तेरे लब पे नाम होगा प्यार का
शम्मा देखकर जलेगा दिल तेरा
जब कोई सितारा टिमटिमाएगा
तुमको एक शख़्स याद आएगा


ज़िन्दग़ी के दर्द को सहोगे तुम
दिल का चैन ढूँढ़ते रहोगे तुम
ज़ख़्म-ए-दिल जब तुम्हें सताएगा
तुमको एक शख़्स याद आएगा।





पर गीत को सुनने के बाद उसकी मूल भावनाओं से भटकते हुए मुझे तुमको एक शख़्स याद आएगा वाली पंक्ति ने दूसरी जगह ले जा खींचा।  जीवन की पगडंडियों में चलते चलते जाने कितने ही लोगों से आपकी मुलाकात होती है। उनमें से कुछ के साथ गुजारे हुए लमहे चाहे वो कितने मुख्तसर क्यूँ ना हों हमेशा याद रह जाते हैं। रोज़ की आपाधापी में जब ये यादें अचानक से कौंध उठती हैं तो आँखों के सामने ऐसे ही किसी शख़्स का चेहरा उभर उठता है और मन मुस्कुरा उठता है। फिर तो घंटों उस एहसास की खुशबू हमें तरोताज़ा बनाए रखती है..

बहरहाल बात सरहद, मेहदी हसन और गुलज़ार से शुरु हुई थी तो उसे गुलज़ार की मेहदी हसन को समर्पित पंक्तियों से खत्म क्यूँ ना किया जाए..

आँखो को वीसा नहीं लगता
सपनों की सरहद नहीं होती
बंद आँखों से रोज़ चला जाता हूँ
सरहद पर मिलने मेहदी हसन से

अब तो मेहदी हसन साहब बहुत दूर चले गए हैं, सरहदों की सीमा से पर उनकी आवाज़ कायम है और रहेगी जब तक ये क़ायनात है।

Sunday, August 24, 2014

डाली मोगरे की : नीरज गोस्वामी Dali Mogre Ki by Neeraj Goswami

नीरज गोस्वामी की ग़ज़लों को पिछले कुछ सालों से पढ़ता आ रहा हूँ। कुछ महीनों पहले उनकी ग़ज़लों का संग्रह एक किताब की शक़्ल में प्रकाशित हुआ तो बड़ी खुशी हुई क्यूँकि बहुत दिनों से उनके संग्रह के बाजार में आने की उम्मीद थी। नीरज की लेखन शैली की जो दो विशिष्टताएँ मुझे सबसे अधिक आकर्षित करती आई हैं वो हैं उनके कथ्य की सहजता और उसके अंदर का प्रवाह।   

चौसठ वर्षीय नीरज जी पेशे से इंजीनियर हैं और फिलहाल इस्पात उद्योग से जुड़ी एक निजी कंपनी में वरिष्ठ पद पर आसीन हैं। पर इंटरनेट जगत में उन्हें एक तकनीकी विशेषज्ञ या प्रबंधक के तौर पर कम और एक ग़ज़लकार के रूप में ज्यादा जाना जाता है। इसकी वज़ह ढूँढने के लिए आपको सिर्फ उनके ब्लॉग का एक चक्कर लगाना होगा। नीरज ना केवल ग़ज़ल लिखते हैं बल्कि अपने पाठकों को ग़ज़ल के तमाम नामचीन और अनसुने लेखकों की शायरी से रूबरू भी कराते हैं।

मुझे उम्मीद थी कि अपनी किताब डाली मोगरे की भूमिका में वो पाठकों को तकनीकी क्षेत्र से जुड़ा होते हुए भी ग़ज़लों के प्रति पनपे अपने प्रेम के बारे में कुछ लिखेंगे पर लगता है कि इसके लिए मुझे उनकी दूसरी पुस्तक का इंतज़ार करना पड़ेगा। बहरहाल जो उनके ब्लॉग को नियमित पढ़ते हैं वे जानते हैं कि ग़ज़ल विधा के छात्र से बतौर शायर के रूप में अपनी पहचान बनाने के लिए वो प्राण शर्मा और पंकज सुबीर का हमेशा आभार व्यक्त करते रहे हैं। 

शिवना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित डाली मोगरे की में नीरज जी की लिखी सौ के लगभग ग़ज़लों का संग्रह है। आख़िर नीरज जी की शायरी किन बातों पर केंद्रित है? अपने एक शेर में नीरज इस बात का जवाब कुछ यूँ देते हैं ... कहीं बच्चों सी किलकारी..कहीं यादों की फुलवारी..मेरी ग़ज़लों में बस यही सामान होता है। अब इन यादों की फुलवारी में खिड़कियों से झाँकती वो आँखें भी हैं, चंद ख़्वाब और उनसे जुड़ी अधूरी चाहतें भी. और प्रेम का सच्चा अहसास भी।  संकलन से उनकी इन्ही भावनाओं को व्यक्त करते कुछ अशआर चुने हैं .मुलाहिज़ा फरमाएँ

जब तलक झाँकती आँख पीछे ना हो
क्या फ़रक़ बंद है या खुली खिड़कियाँ


ख़्वाब देखा है रात में तेरा
नींद में भी हुई कमाई है

चाहतें मेमने सी भोली हैं
पर ज़माना बड़ा कसाई है


वो जकड़ता नहीं है बंधन में
प्यार सच्चा रिहाई देता है


किसी का ख़ौफ दिल पर, आज तक तारी ना हो पाया
किया यूँ प्यार अपनों ने, लगा डरना जरूरी है


अब मान मुनौवल के बिना कौन सा प्रेम हुआ है, नीरज इस परिस्थिति को कुछ यूँ व्यक्त करते हैं

हो ख़फ़ा हमसे वो रोते जा रहे हैं
और हम रूमाल होते जा रहे हैं


पर इस किताब में इश्क़ की भावनाओं से जुड़े ये अशआर मुझे बेहद पसंद आए

जहाँ जाता हूँ मैं तुझको वहीं मौजूद पाता हूँ 
गर लिखना तुझे हो ख़त तेरा मैं क्या पता लिक्खूँ

गणित ये प्यार का यारों किसी के तो समझ आए
सिफ़र बचता अगर तुझको कभी ख़ुद से घटा लिक्खूँ


नीरज गोस्वामी की ग़ज़लें सिर्फ प्रेम से लबरेज़ नहीं पर उससे कहीं ज्यादा इनकी लेखनी का सरोकार आज के सामाजिक हालातों और घटते मानवीय मूल्यों से है।  उनकी इस चिंता को उनके तमाम शेर जगह जगह व्यक्त करते हैं। उनमें से कुछ की बानगी नीचे दे रहा हूँ

डाल दीं भूखे को जिसमें रोटियाँ
वो समझ पूजा की थाली हो गई

झूठ सीना तानकर चलता हुआ मिलता है अब
सच तो बेचारा है दुबका, काँपता डरता हुआ

साँप को बदनाम यूँ ही कर रहा है आदमी
काटने से आदमी के मर रहा है आदमी

इस पाप की परत को है उम्र भर चढ़ाया
अब चाहते हटाना गंगा में बस नहाकर

रोटियाँ देकर कहा ये शहर ने
गाँव की अब रुत सुहानी भूल जा
जिस्म की गलियों में उसको ढूँढ अब
इश्क़ वो कल का रुहानी, भूल जा

कब तक रखेंगे हम भला इनको सहेज कर
रिश्ते हमारे शाम के अखबार हो गए
हमने किये जो काम उन्हें फ़र्ज कह दिया
तुमने किये तो यार उपकार हो गए


जीवन की विसंगतियों को उनके रूपकों के माध्यम से देखना कभी मन को लाजवाब कर देता है

जिस शजर ने डालियाँ पर देखिए फल भर दिए
हर बशर ने आते जाते बस उसको पत्थर दिए


कुछ नहीं देती है ये दुनिया किसी को मुफ़्त में
नींद ली बदले में जिसको रेशमी बिस्तर दिए


तो कहीं प्रकृति के आचरण को सूक्ष्मता से अवलोकित कर वो आपको धनात्मक उर्जा से भर देते हैं।

अपनी बदहाली में भी मत मुस्कुराना छोड़िए
त्यागता ख़ुशबू नहीं है फूल भी मसला हुआ


नीरज गोस्वामी की सहज लेखन शैली हर उस पाठक को पसंद आएगी जो ग़ज़लों में रूचि तो रखता है पर उसमें प्रयुक्त उर्दू व फ़ारसी शब्दों की अनिभिज्ञता से अपने आपको उससे जोड़ पाने में अक्षम है। नीरज गोस्वामी ने अपनी ग़ज़लों में ऐसी भाषा का प्रयोग किया है जो उर्दू का ज्ञान ना रखने वालों को भी समझ आ सके। राजस्थान के जयपुर से ताल्लुक रखने वाले नीरज गोस्वामी  ने मुंबई के पास अपना कार्यक्षेत्र होने की वज़ह से अपने इस संकलन में कुछ मुंबइया जुबान की ग़ज़लें कही हैं जो भले ग़ज़ल पंडितों को कुछ खास आकृष्ट ना करे पर उनकी आम जनता तक ग़ज़ल के कलेवर को ले जाने की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।  चलते चलते मैं उनकी एक ग़ज़ल को सुनाना चाहूँगा जिसे पढ़कर मन एक जोश से भर उठता है.. वैसे इस ग़ज़ल का सबसे प्यारा शेर मुझे ये लगता है..

चमक है जुगनुओं में कम, मगर उधार की नहीं
तू चाँद आबदार (चमकदार) हो तो हो रहे, तो हो रहे

 

पुस्तक के बारे में
नाम : डाली मोगरे की,  लेखक : नीरज गोस्वामी
प्रकाशक : शिवना प्रकाशन, मूल्य : Rs.150  

पुनःश्च : एक शाम मेरे नाम के पाठकों के लिए खुशखबरी..
नीरज गोस्वामी जी ने सूचित किया है जो इस पुस्तक को पढ़ने में रुचि रखते हैं वो अपना पोस्टल अड्रेस उनके मोबाइल न 9860211911 पर एस एम एस करें या उन्हें neeraj1950@gmail.com पर मेल से भेज दें । पुस्तक उपहार स्वरुप आपके दिए अड्रेस पर भिजवा दी जाएगी।

Monday, August 18, 2014

रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है : गुलज़ार Raat Pahadon Par by Gulzar

पहाड़ों पर कौन नहीं जाता ? कभी मैदानों की भीषण गर्मी से निज़ात पाने, तो कभी बर्फ के गिरते फाहों के बीच अपने दिल को थोड़ी ठंडक पहुँचाने। या फिर निकल जाते हैं लोग यूँ ही बैठे ठाले प्रकृति के नैसर्गिक रूप का एक दो दिन ही सही.. स्वाद चख़ने। सारा दिन घूमते हैं। कभी जानी तो कभी अनजानी राहों पर। शाम आती है तो थोड़ी बाजार की तफ़रीह और थोड़ी पेट पूजा के बाद यूँ थक के चूर हो रात बिस्तर पे गिरते हैं कि पता ही नहीं चलता कब सुबह हो गई? इसलिए एक आम घुमक्कड़ कहाँ जान पाता है कि रात पहाड़ों की कैसी होती है? और गाहे बगाहे अगर ऐसा अवसर मिला भी तो क्या वो हम देख पाते हैं जो इस नज़्म में गुलज़ार साहब हमें दिखा रहे हैं?

अपनी कहूँ तो मुन्नार की वादी में गुजारी वो रात याद आती है जिसकी सुंदरता को व्यक्त करते हुए शब्दों ने भी साथ छोड़ दिया था। पर गुलज़ार तो जब चाहें जहाँ चाहें शब्दों का ऐसा तिलिस्म खड़ा करने में माहिर हैं जिसके जादू से प्रकृति के वो सारे देखे और महसूस किए गए रूप एकदम से आँखों के सामने आ जाते हैं। अंधकार मयी रात को प्रकाशित करते चंद्रमा और तारों, पास बहती नदी का कलरव, बालों को उड़ाती और पत्तों को फड़फड़ाती हवा का संगीत और कहीं दूर गिरते झरनों की चिंघाड़ से आप भी कहीं ना कहीं रूबरू अवश्य हुए होंगे। पर देखिए तो गुलज़ार ने इन सबको को कितनी खूबसूरती से पिरोया है एक लड़ी में इस नज़्म के माध्यम से

रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है
आस्मान बुझता ही नहीं
और दरिया रौशन रहता है
इतना ज़री का काम नज़र आता है फ़लक़ पे तारों का
जैसे रात में प्लेन से रौशन शहर दिखाई देते हैं


पास ही दरिया आँख पे काली पट्टी बाँध के
पेड़ों की झुरमुट में
कोड़ा जमाल शाही, "आई जुमेरात आई..पीछे देखे शामत आई
दौड़ दौड़ के खेलता है

कंघी रखके दाँतों में
आवाज़ किया करती है हवा
कुछ फटी फटी...झीनी झीनी
बालिग होते लड़कों की तरह !


इतना ऊँचा ऊँचा बोलते हैं दो झरने आपस में
जैसे एक देहात के दोस्त अचानक मिलकर वादी में
गाँव भर का पूछते हों..
नज़म भी आधी आँखें खोल के सोती है
रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है।



आज जबकि हम सभी गुलज़ार का 80 वाँ जन्मदिन मना रहे हैं यही गुजारिश है कि साहब ऐसे अनेकानेक लमहे यूँ ही अपने गीतों, नज़्मों और ग़ज़लों के माध्यम से इन सफ़हों पर परोसते रहें। पहाड़ भले बूढ़े हो जाएँ पर ये शायर कभी बूढ़ा ना हो। ( Gulzar's 80 th birthday )

 एक शाम मेरे नाम पर गुलज़ार की पसंदीदा नज़्में

Wednesday, August 06, 2014

मदन मोहन की सांगीतिक प्रासंगिकता : लग जा गले .. सनम पुरी Lag Ja Gale .... Sanam Puri

मदन मोहन से जुड़ी पिछली पोस्ट में बात खत्म हुई थी इस प्रश्न पर कि क्या आज की पीढ़ी भी मदन मोहन के संगीत को उतना ही पसंद करती है? इस बात का सीधा जवाब देना मुश्किल है। मेरा मानना है कि हिंदी फिल्मों में ग़ज़लों के प्रणेता समझे जाने वाले मदन मोहन अगर आज हमारे बीच होते तो उनके द्वारा रचा संगीत भी अभी के माहौल में ढला होता। आज उन दो प्रसंगों का जिक्र करना चाहूँगा जो मदन मोहन के संगीत की सार्वकालिकता की ओर इंगित करते हैं।

मदन मोहन के संगीत में आने वाले कल को पहचानने की क्षमता थी वर्ना क्या कोई ऐसा संगीतकार है जिसकी धुनों को उसके मरने के तीस साल बाद किसी फिल्म में उसी रूप में इस्तेमाल कर लिया गया हो। 2004 में प्रदर्शित फिल्म वीर ज़ारा का संगीत तो याद है ना आपको। यश चोपड़ा विभाजन से जुड़ी इस प्रेम कथा के संगीत के लिए नामी गिरामी संगीतकारों के साथ बैठकें की। पर फिल्म के मूड के साथ उन धुनों का तालमेल नहीं बैठ सका। अपनी परेशानी का जिक्र एक बार वो मदन मोहन के पुत्र संजीव कोहली से कर बैठे। संजीव ने उन्हें बताया कि उनके पास पिता की संगीतबद्ध कुछ अनसुनी धुनें पड़ी हैं। अगर वे सुनना चाहें तो बताएँ। चोपड़ा साहब ने हामी भरी और संजीव तीस धुनों की पोटली लेकर उनके पास हाज़िर हो गए।


जैसे जैसे वो पोटली खुलती गई चोपड़ा साहब को फिल्म की परिस्थितियों के हिसाब से गीत और कव्वाली की धुनें मिलती चली गयीं। फिल्म के संगीत को आम जनता ने किस तरह हाथों हाथ लपका ये आप सबसे छुपा नहीं है। ये उदाहरण इस बात को सिद्ध करता है कि वक़्त से आगे के संगीत को परखने और उसमें अपनी मेलोडी रचने की काबिलियत मदन मोहन साहब में थी।

अब एक हाल फिलहाल की बात लेते हैं। अपनी धुनों में मदन मोहन जो मधुरता रचते थे उसके लिए इंटरल्यूड्स और मुखड़े के पहले किया गया संगीत संयोजन कई बार बेमानी हो जाता था। लता जी का गाया फिल्म 'वो कौन थी' का बेहद लोकप्रिय गीत लग जा गले .. तो आप सबने सुना होगा। हाल ही में मैंने इसी गीत को सनम बैंड के सनम पुरी को गाते सुना। मेलोडी वही पर गीत के साथ सिर्फ गिटार और ताल वाद्य का संयोजन। सच मानिए बहुत दिनों बाद एक रिमिक्स गीत में गीत की आत्मा को बचा हुआ पाया मैंने। सनम की आवाज़ का कंपन और इंटरल्यूड्स में उनकी गुनगुनाहट गीत में छुपी विकलता को हृदय तक ले जाती है



वैसे सनम पुरी अगर आपके लिए नया नाम हो तो ये बता दूँ कि मसकत में रहने वाले सनम ने विधिवत संगीत की शिक्षा तो ली नहीं। संगीत के क्षेत्र में आए भी तो परिवार वालों के कहने से। पाँच साल पहले SQS Supastars नाम का बैंड बनाया जिसका नाम कुछ दिनों पहले बदल के सनम हो गया। सनम बताते हैं कि लता जी के गाए इस गीत से उनके बैंड के हर सदस्य की भावनाएँ जुड़ी हैं और इसीलिए उन्होंने अपने इस प्यारे गीत को आज के युवा वर्ग के सामने एक नए अंदाज़ में लाने का ख्याल आया। तो आइए सुनते हैं सनम बैंड के इस गीत को।


लग जा गले कि फिर ये हसीं रात हो न हो
शायद फिर इस जनम में मुलाक़ात हो न हो
लग जा गले  ...

हमको मिली हैं आज ये घड़ियाँ नसीब से
जी भर के देख लीजिये हमको क़रीब से
फिर आपके नसीब में ये बात हो न हो
शायद फिर इस जनम...लग जा गले..

पास आइये कि हम नहीं आएंगे बार-बार
बाहें गले में डाल के हम रो लें ज़ार-ज़ार
आँखों से फिर ये प्यार कि बरसात हो न हो
शायद फिर इस जनम...लग जा गले..


गीत में उनके भाई समर पुरी गिटार पर हैं, वेंकी ने बॉस गिटार सँभाला है जबकि केशव धनराज उनकी संगत कर रहे हैं पेरू से आए ताल वाद्य Cajon पर


जब लता जी रॉयल अलबर्ट हॉल में Wren Orchestra के साथ एक कार्यक्रम कर रही थीं तो कार्यक्रम में शामिल होने वाले गीतों के नोट्स लिख के भेजे गए। जो दो गीत उन्हें सबसे पसंद आए उनमें लग जा गले  भी था। आर्केस्ट्रा प्रमुख का कहना था कि वो धुनों की मेलोडी और उनके साथ किए नए तरह के संगीत संयोजन से चकित हैं। 

आशा है संगीतकार मदन मोहन से जुड़ी ये तीन कड़ियाँ आपको पसंद आयी होंगी। एक शाम मेरे नाम पर उनकी यादों का सफ़र आगे भी समय समय पर चलता रहेगा।

Thursday, July 31, 2014

यादें मदन मोहन की : सपनों में अगर मेरे, तुम आओ तो सो जाऊँ Remembering Madan Mohan : Sapnon Mein Agar Mere...

मदन मोहन के कार्यक्रम को सुनने के बाद से पिछले हफ्ते उनके गीतों में से कइयों को फिर से सुना और आज उन्हीं में से एक मोती को चुन कर आपके समक्ष लाया हूँ। पर इससे पहले कि उस गीत की चर्चा करूँ कुछ बातें उनके काम करने की शैली के बारे में करना चाहूँगा। मदन मोहन उन संगीतकारों में नहीं थे जो धुन पहले बना लेते हों। वो गीतों को सुनते थे, उनके भावों में डूबते थे और फिर एक ही गीत के लिए कई सारी मेलोडी बना कर सबसे पूछते थे कि उन्हें कौन सी पसंद आई? वैसे धुन चुनते समय आख़िरी निर्णय उन्हीं का होता था। सेना से आए थे तो समय के बड़े पाबंद थे। वादकों को देर से आने से वापस कर देते थे, गीत को अंतिम रूप देने से पहले लता हो या रफ़ी घंटों रियाज़ कराते थे। एक बार गुस्से में आकर शीशे की दीवार पर जोर से हाथ मारकर वादकों को इंगित कर बोले..बेशर्मों बेसुरा बजाते हो। सुर के प्रति वो बेहद संवेदनशील थे। रेडियो में दिये अपने एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा था
"मैं समझता हूँ कि हर फ़नकार का जज़्बाती होना बहुत जरूरी है क्यूँकि अगर उसमें इंसानियत का जज़्बा नहीं है तो वो सही फ़नकार नहीं हो सकता। सुर भगवान की देन है। उसको पेश करना, उसको सुनना, उसको अपनाना ये कुदरत की चीज है जिसे इंसान सीखता नहीं पर महसूस करता है।"

अक्सर कहा जाता है कि मदन मोहन और लता के बीच ग़ज़ब का तारतम्य था। लता जी ने जब भी बाहर अपने कान्सर्ट किये, उन्होंने मदन मोहन को हमेशा याद किया। लता जी ने मदन मोहन के बारे में दिए गए साक्षात्कार में कहा था
"मेरी उनसे पहली मुलाकात फिल्म शहीद के युगल गीत को रिकार्ड करते वक़्त 1947 में हुई थी. वो गीत भाई बहन के रिश्ते के बारे में था और वास्तव में तभी से वे मेरे मदन भैया बन गए। मैने हमेशा कहा है कि वो भारत के सबसे प्रतिभाशाली संगीतकारों में से एक थे और उनकी अपनी एक शैली थी। हांलाकि मैंने बाकी संगीतकारों के साथ ज्यादा काम किया पर मदन भैया के साथ गाए हुए गीतों को बेहद लोकप्रियता मिली।

लोग कहते हैं कि उनके गीतों में मैं कुछ विशिष्ट करती थी। मुझे पता नहीं कि ये कैसे होता था। अगर ये होता था तो शायद इस वज़ह से कि हमारे बीच की आपसी समझ, एक दूसरे के लिए लगाव और सम्मान था। वो मेरी गायिकी को अच्छी तरह समझते थे। वो हमेशा कहा करते थे  कि ये धुन तुम्हीं को ध्यान रख कर रची है और वो उसमें अक्सर मेरी आवाज़ के उतार चढ़ाव को ध्यान में रखकर कुछ जगहें छोड़ते थे। इसलिए उनके साथ काम करना व उनकी आशाओं पर खरा उतरना मेरे लिए हमेशा से चुनौतीपूर्ण होता था। रिकार्डिंग के बाद उनके चेहरे पर जो खुशी दिखती थी वो मुझे गहरा संतोष देती थी।"

आज लता और मदन मोहन की इस जोड़ी का जो गीत आपके सामने पेश कर रहा हूँ वो फिल्म दुल्हन एक रात की का है। इसे लिखा है एक बार फिर राजा मेहदी अली खाँ ने। मुखड़े के पहले सितार की बंदिश के बाद से लता की मधुर आवाज़ का सम्मोहनी जादू गीत के अंत और उसके बहुत देर बाद भी बरक़रार रहता है। इंटरल्यूड्स में पहले अंतरे के पहले सेक्सोफोन की आवाज़ चौंकाती है पर साथ ही सितार के साथ उस के अद्भुत समन्वय को सुन मदन मोहन की काबिलियत का एक उदाहरण सामने आ जाता है।

सपनों में अगर मेरे, तुम आओ तो सो जाऊँ
बाहों की मुझे माला पहनाओ, तो सो जाऊँ

सपनों में कभी साजन बैठो मेरे पास आ के
जब सीने पे सर रख दूँ, मैं प्यार में शरमा के
इक गीत मोहब्बत का तुम गाओ तो सो जाऊँ

बीती हुयी वो यादें, हँसती हुई आती हैं
लहरों की तरह दिल में आती, कभी जाती हैं
यादों की तरह तुम भी आ जाओ तो सो जाऊँ




मदन मोहन को जीते जी कभी वो सम्मान नहीं मिला जिसके वो हक़दार थे। नेशनल एवार्ड तो उन्हें मिला पर एक अदद फिल्मफेयर जैसे एवार्ड के लिए तरस गए। उनकी धुनें अपने समय से आगे की मानी गयीं। एक किस्सा जो इस संबंध में अक्सर बताया जाता है वो ये कि उनके बेटे संजीव कोहली को जब स्कूल के कार्यक्रम में स्टेज पर अपने पिता के सामने गाने का मौका मिला तो उसने पिता द्वारा रचित किसी गीत को गाने के बजाए बहारों फूल बरसाओ  गाना बेहतर समझा वो भी इस डर से कि शायद वहाँ बैठी आम जनता उसे पसंद ना करे। 

इन्हीं मदनमोहन की अंतिम यात्रा में अमिताभ, धर्मेंद्र, राजे्द्र कुमार व राजेश खन्ना जैसे कलाकारों ने कंधा लगाया। संजीव कहते हैं कि अगले दिन ये फोटो अख़बार में छपी और मैं रातों रात कॉलेज में इतना लोकप्रिय हो गया जितना कभी उनके जीते जी नहीं हुआ था। शायद यही दुनिया का दस्तूर है कि हम कई बार किसी के हुनर को वक़्त रखते नहीं परख पाते हैं।

मदन मोहन को हमारा साथ छोड़े लगभग चार दशक हो गए। उनके संगीतबद्ध गीतों को क्या हम भुला पाए हैं ? क्या उनके गीतों को आज की पीढ़ी भी पसंद करती है?  अगली प्रविष्टि में एक हाल ही में रिकार्ड किये गीत के माध्यम से इन प्रश्नों के उत्तर को ढूँढने का प्रयास करूँगा।

Saturday, July 26, 2014

मदन मोहन के संगीत में रची बसी वो शाम : आप को प्यार छुपाने की बुरी आदत है... Aap ko pyar chhupane ki buri aadat hai

पिछले हफ्ते की बात है। दफ़्तर के काम से रविवार की शाम पाँच बजे दिल्ली पहुँचा। पता चला पास ही मैक्स मुलर मार्ग पर स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में संगीतकार मदनमोहन की स्मृति में संगीत के कार्यक्रम का आयोजन हो रहा है। कार्यक्रम साढ़े छः बजे शुरु होना था पर दस मिनट की देरी से जब हम  पहुँचे तो वहाँ तिल धरने की जगह नहीं थी। श्रोताओं में ज्यादातर चालीस के ऊपर वाले ही बहुमत में थे पर पुराने गीतों की महफिल में ऐसा होना लाज़िमी था। कुछ मशहूर हस्तियाँ जैसे शोभना नारायण भी दर्शक दीर्घा में नज़र आयीं।


उद्घोषकों ने मदनमोहन के संगीतबद्ध गीतों के बीच बगदाद में जन्मे इस संगीतकार की ज़िंदगी के छुए अनछुए पहलुओं से हमारा परिचय कराया। मुंबई की आरंभिक पढ़ाई, देहरादून के बोर्डिंग स्कूल में रहना, पिता के आग्रह पर सेना में नौकरी करना, उनका कोपभाजन बनते हुए भी फिल्मी दुनिया में अपने बलबूते पर संगीतकार की हैसियत से पाँव जमाना, लता के साथ उनके अद्भुत तालमेल, फिल्मी ग़ज़लों को लयबद्ध करने में उनकी महारत, उनका साहबों वाला रोबीला व्यक्तित्व,  हुनर के हिसाब से उनको लोकप्रियता ना मिलने का ग़म और शराब में डूबी उनकी ज़िदगी के कुछ आख़िरी साल ..उन ढाई घंटों में उनका पूरा जीवन वृत आँखों के सामने घूम गया।

पर इन सबके बीच उनके कुछ मशहूर और कुछ कम बज़े गीतों को सुनने का अवसर भी मिला। ऐसे कार्यक्रमों में कितना भी चाहें आपके सारे पसंदीदा नग्मों की बारी तो नहीं आ पाती। फिर भी 'ना हम बेवफ़ा है ना तुम बेवफ़ा हो...', 'लग जा गले से हसीं रात हो ना हो...', 'तुम्हारी जुल्फों के साये में शाम कर दूँगा..', 'झुमका गिरा रे...' जैसे सदाबहार नग्मों को सुनने का अवसर मिला तो वहीं 'इक हसीं शाम को दिल मेरा खो गया...',  'तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है...', 'नैनों में बदरा छाए...', 'ज़रा सी आहट होती है....', 'कोई शिकवा भी नहीं कोई भी शिकायत भी नहीं...' जैसे गीतों को live सुन पाने की ख़्वाहिश..ख़्वाहिश ही रह गयी।

इन्हीं गीतों के बीच  एक युगल गीत भी पेश किया गया जिसे कई सालों बाद अचानक और सीधे आर्केस्ट्रा के साथ मंच से सुनने में काफी आनंद आया। एक हल्की सी छेड़छाड़ और चंचलता लिए इस गीत को 1965 में आई फिल्म "नीला आकाश" में मोहम्मद रफ़ी और आशा ताई ने गाया था। इस गीत को लिखा था राजा मेहदी अली खाँ ने। मदनमोहन और राजा साहब की संगत ने हिंदी फिल्म संगीत को कितने अनमोल मोती दिए वो तो आप सब जानते ही हैं। राजा साहब से जुड़े इस लेख में आपको पहले ही उनके बारे में विस्तार से बता चुका हूँ। उसी लेख में इस बात का भी जिक्र हुआ था कि किस तरह उन्होंने हिंदी फिल्मी गीतों में 'आप' शब्द का प्रचलन बढ़ाया। आज जिस गीत की बात मैं आपसे करने जा रहा हूँ वो भी इसी श्रेणी का गीत है।

देखिए तो इस खूबसूरती से राजा साहब ने गीत की पंक्तियाँ गढ़ी हैं कि हर अगली पंक्ति पिछली पंक्ति का माकूल जवाब सा लगती है।
आप को प्यार छुपाने की बुरी आदत है
आप को प्यार जताने की बुरी आदत है

आपने सीखा है क्या दिल के लगाने के सिवा,
आप को आता है क्या नाज दिखाने के सिवा,
और हमें नाज उठाने की बुरी आदत है

किसलिए आपने शरमा के झुका ली आँखें,
इसलिए आप से घबरा के बचा ली आँखें,
आपको तीर चलाने की बुरी आदत है

हो चुकी देर बस अब जाइएगा, जाइएगा,
बंदा परवर ज़रा थोड़ा-सा क़रीब आइएगा,
आपको पास न आने की बुरी आदत है


तो आइए सुनते हैं राग देस पर आधारित इस मधुर युगल गीत को

 


वैसे तो सर्वव्यापी धारणा रही है लड़कों में अपने प्यार का इज़हार करने का उतावलापन रहता है, वहीं लड़कियाँ शर्म ओ हया से बँधी उसे स्वीकार करने में झिझकती रही हैं। पर वक़्त के साथ क्या आप ऐसा महसूस नहीं  करते कि मामला इतना स्टीरियोटाइप भी नहीं रह गया है। पहल दोनों ओर से हो रही है। सोच रहा हूँ कि अगर आज गीतकार को ये परिस्थिति दी जाए तो वो क्या लिखेगा। है आपके पास कोई कोरी कल्पना ?

Wednesday, July 16, 2014

इक ख़लिश को हासिल-ए-उम्र-ए-रवाँ रहने दिया .. Ek khalish ko hasil-e-umr-e-rawan

कुछ शायर अपनी एक ग़ज़ल से ही लोगों के ज़हन में अपने नाम की परछाई छोड़ जाते हैं। सराहनपुर में जन्मे अदीब सहारनपुरी का नाम ऐसे ही शायरों में किया जा सकता है। आजादी के बाद अदीब पाकिस्तान के कराची में जा बसे थे। पचास और साठ के दशक में उनका शुमार पाकिस्तान के अग्रणी शायरों में किया जाता रहा। पर इस दौरान उनके द्वारा किए गए काम के बारे में पूर्ण जानकारी नहीं है। अदीब की जिस ग़ज़ल के बारे में मैं आज बात करने जा रहा हूँ उसे लोकप्रिय बनाने में उस्ताद मेहदी हसन और अमानत अली खाँ जैसे गायकों का महती योगदान रहा है। तो आइए देखें अदीब सहारनपुरी ने क्या कहना चाहा है इस ग़ज़ल में..

इक ख़लिश को हासिल-ए-उम्र-ए-रवाँ रहने दिया
जान कर हम ने उन्हें नामेहरबाँ रहने दिया

कितनी दीवारों के साये हाथ फैलाते रहे
इश्क़ ने लेकिन हमें बेख़्वानमाँ रहने दिया

इंसान कितनी भी आरज़ू करे पर उसे उसकी हर चाहत का प्रतिकार मिले ये कहाँ मुमकिन है ? इसलिए ग़ज़ल के मतले में अदीब कहते हैं कि

वो हम पर मेहरबान ना भी हुए तो क्या, दिल में उसके प्रेम की जो मीठी आँच जल रही है वही उनकी ज़िदगी का हासिल है। ये भी नहीं कि ज़िदगी अकेलेपन में गुजरी। कितने लोग तो आए जिन्होंने अपने मोहब्बत के साये में मेरे मन को सुकून पहुँचाने की कोशिश की पर ये उसके इश्क़ का ही असर था कि मेरे दिल की कोठरियाँ उजाड़ ही रहीं। वहाँ किसी और को बसाना मेरे लिए गवारा नहीं हुआ।

अपने अपने हौसले अपनी तलब की बात है
चुन लिया हमने उन्हें सारा ज़हाँ रहने दिया

ये भी क्या जीने में जीना है बग़ैर उन के "अदीब"
शम्मा गुल कर दी गई बाक़ी धुआँ रहने दिया

अदीब अगले शेर मे कहते हैं कि लोग मुझ पर हँसते हैं कि सारी दुनिया को छोड़कर मुझे ऐसे शख्स से दिल लगाने की क्या पड़ी थी जो मेरा कभी ना हो सका। वो क्या समझें मेरे हौसले को, मेरी पसंद को ..
पर मक़ते में शायर का हौसला पस्त होता दिखता है जब वो उदासी की चादर ओढ़ कहते हैं कि उसके बगैर जीना बुझी हुई शमा के धुएँ के साथ जीने जैसा है। आख़िर उसकी यादों के सहारे कोई कब तक जी सकता है?

यूँ तो मेहदी हसन साहब ने पूरी ग़ज़ल अपने चिरपरिचित शास्त्रीय अंदाज़ में गायी है पर मुझे इसे अमानत अली खाँ साहब साहब के सीधे पर दिल को छूने वाले अंदाज़ में सुनना ज्यादा रुचिकर रहा है।



खाँ साहब पटियाला घराने के मशहूर शास्त्रीय गायक थे। आप भले उनकी गायिकी से परिचित ना हों पर आपने उनके सबसे छोटे पुत्र शफ़कत अमानत अली खाँ के गाए हिंदी फिल्मी गीतो को जरूर सुना होगा। खाँ साहब ने पूरी ग़ज़ल तो नहीं गाई पर दो तीन अशआरों में ही वो ग़ज़ल के मूड को हमारे दिलों तक पहुँचा देते हैं। इस वर्जन में  एक नया शेर भी है

आरजू-ए- क़र्ब भी बख्शी दिलों को इश्क़ ने
फ़ासला भी मेरे उनके दर्मियाँ रहने दिया

बहरहाल आपके लिए ये ग़ज़ल अपने दोनों रूपों में ये रही। आपको किसी गायिकी ज्यादा मन के करीब लगी बताइएगा।

Amanat Ali Khan's Version



Mehdi Hasan's Version 


Monday, July 07, 2014

कुँवर नारायण की चंद कविताएँ मेरी आवाज़ में... Kunwar Narayan : Kamre Mein Dhoop

बतौर पाठक कुँवर नारायण की कविताओं के रचना संसार से मेरा कोई ज्यादा परिचय नहीं रहा है। गाहे बगाहे उनका नाम साहित्यप्रेमी मित्रों के मुँह से अक्सर सुना करता था। करीब पाँच साल पहले उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने पर उनके द्वारा लिखी कविताओं से रूबरू हुआ था। 


पर कुछ दिन पहले अंतरजाल पर जब उनकी कविता कमरे में धूप पढ़ी तो उनकी रचनाओं पर एक सरसरी नज़र डालने की इच्छा हुई। उनकी कविताओं से गुजरते हुए मन के तार कई बार ठिठके, हिले और झंकृत हुए। जो कुछ मन को अच्छा लगा उसे  आज आपके साथ अपनी आवाज़ में बाँट रहा हूँ।

 (1) कमरे में धूप
प्रकृति के मनसबदारों हवा, धूप, बादल, चाँदनी से तो सुबह से रात तक आपका सामना होता है। कभी सोचा है कि ये अगर हमसे अपना किरदार बदल लें तो क्या हो? वैसे जब कुँवर नारायण जैसे कवि हमारे बीच हों तो वो सोचने की आवश्यकता हमें नहीं बस पढ़िए और अभिभूत होइए कि किस सहजता से कवि ने प्रकृति के इन तत्वों का मानवीकरण कर दिया है।

हवा और दरवाजों में बहस होती रही,
दीवारें सुनती रहीं।
धूप चुपचाप एक कुरसी पर बैठी
किरणों के ऊन का स्वेटर बुनती रही।

सहसा किसी बात पर बिगड़ कर
हवा ने दरवाजे को तड़ से
एक थप्पड़ जड़ दिया !

खिड़कियाँ गरज उठीं,
अखबार उठ कर खड़ा हो गया,
किताबें मुँह बाये देखती रहीं,
पानी से भरी सुराही फर्श पर टूट पड़ी,
मेज के हाथ से कलम छूट पड़ी।

धूप उठी और बिना कुछ कहे
कमरे से बाहर चली गई।

शाम को लौटी तो देखा
एक कुहराम के बाद घर में खामोशी थी।
अँगड़ाई लेकर पलंग पर पड़ गई,
पड़े-पड़े कुछ सोचती रही,
सोचते-सोचते न जाने कब सो गई,
आँख खुली तो देखा सुबह हो गई।

 (2) घंटी
मृत्यु जीवन का अंतिम कटु सत्य है पर इस सत्य को स्वीकार कर पाना क्या हमारे लिए कभी सहज रहा है ?

फ़ोन की घंटी बजी
मैंने कहा- मैं नहीं हूँ
            और करवट बदल कर सो गया

दरवाज़े की घंटी बजी
मैंने कहा- मैं नहीं हूँ
            और करवट बदल कर सो गया

अलार्म की घंटी बजी
मैंने कहा- मैं नहीं हूँ
            और करवट बदल कर सो गया

एक दिन
मौत की घंटी बजी...
हड़बड़ा कर उठ बैठा-
मैं हूँ... मैं हूँ... मैं हूँ..
            मौत ने कहा-
            करवट बदल कर सो जाओ।


और चलते चलते कुँवर नारायण की ये पंक्तियाँ भी आपको सुपुर्द करना चाहता हूँ जो शायद कवि की ही नहीं जीवन के किसी ना किसी मुकाम पर हम सबकी तलाश का सबब रही है

....फिर भी
अपने लिए हमेशा खोजता रहता हूँ
किताबों की इतनी बड़ी दुनिया में
एक जीवन-संगिनी
थोडी अल्हड़-चुलबुली-सुंदर
आत्मीय किताब
जिसके सामने मैं भी खुल सकूँ
एक किताब की तरह पन्ना पन्ना
और वह मुझे भी
प्यार से मन लगा कर पढ़े...

कुँवर नारायण की इन कविताओं को अपनी आवाज़ देने की मेरी एक कोशिश ये रही..



कुँवर नारायण के व्यक्तित्व और कृतित्व से और परिचित होना चाहें तो विकीपीडिया का ये पृष्ठ आपकी मदद कर सकता है।

Sunday, June 29, 2014

बीती ना बिताई रैना, बिरहा की जाई रैना :जब पंचम ने पकड़ा शास्त्रीयता का दामन ( Beeti na Bitai Raina...)

27 जून यानि परसों पंचम का पचहत्तरवाँ जन्म दिन मनाया गया। पंचम के बारे में एक बात लगातार कही जाती रही है कि ‌उन्होंने नई आवाज़ और बीट्स से सबका परिचय कराया। पुराने साजों के अलग तरीके से इस्तेमाल के साथ साथ उन्होंने कई नए वाद्य यंत्रों का भी प्रचलन किया। दरअसल यही पंचम की शैली थी। अपने बाबा सचिन देवबर्मन से उन्होंने बहुत कुछ सीखा पर वो उनसे हमेशा कुछ अलग करना चाहते थे। 

पर राग और रागिनियों के बारे में पंचम की जानकारी बिल्कुल नहीं हो ऐसा भी नहीं था। बचपन में उन्होंने ब्रजेन विश्वास से तबला सीखा। सरोद सीखने के लिए उन्हें अली अकबर खान के पास भेजा गया। अली अकबर खान और पंडित रविशंकर के बीच की सरोद और सितार के बीच की लंबी जुगलबंदी को भी उन्हें लगातार सुनने का मौका मिला। यही वज़ह है कि पंचम ने जब भी राग आधारित गीतों की रचना की, अपने प्रशंसकों की नज़र में खरे उतरे।

पंचम और गुलज़ार का आपसी परिचय बंदिनी से शुरु हुआ जिसमें पंचम सचिन दा के सहायक का काम निभा रहे थे और गुलज़ार गीतकार का (वैसे तो फिल्म के अन्य गीत शैलेंद्र से लिखवाए गए थे पर मोरा गोरा अंग लई ले के लिए गुलज़ार को याद किया गया था)। पर बतौर निर्देशक गुलज़ार ने पंचम के साथ पहली बार सत्तर के दशक में फिल्म परिचय के लिए काम किया। इस फिल्म के सारे गीत काफी चर्चित हुए। पर उनमें एक गीत बाकियों से पंचम के लिए इन अर्थों में भिन्न था कि वो पहली बार शास्त्रीय राग आधारित किसी युगल गीत का संगीत निर्देशन कर रहे थे। ये गीत था बीते ना बिताई रैना...। 


कई बार गीत की धुन इतनी प्यारी होती है कि हम बिना उसका अर्थ समझे भी उसे गुनगुनाने लगते हैं। स्कूल के समय पहली बार सुने इस गीत को मैं कॉलेज के ज़माने तक चाँद की बिन दीवाली बिन दीवाली रतिया  :) समझकर गाता रहा। मुझे कुछ ऐसे लोग भी मिले जो इसे 'चाँद के बिन दीवानी बिन दीवानी रतिया..' समझते रहे। ख़ैर किसी संगीत मर्मज्ञ ने जब ये बताया कि गुलज़ार यहाँ चाँद की बिंदी वाली रतियों की बात कर रहे हैं तो गीत के प्रति मेरी आसक्ति और बढ़ी।

पंचम ने राग यमन और खमाज़ को मिला जुलाकर जो धुन तैयार की उसमें सितार और तबले को प्रमुखता से स्थान मिला। एक ओर पंचम की मधुर धुन थी तो दूसरी ओर गुलज़ार के बेमिसाल शब्द। क्या क्या उद्धृत करूँ? भींगे नयनों से रात को बुझाने की बात हो या फिर रात को चाँद की बिदी जैसा दिया गया विशेषण। पंचम दा ने स्वर कोकिला लता मंगेशकर के साथ इस गीत में भूपेंद्र की धीर गंभीर आवाज़ का प्रयोग किया जो फिल्म में संजीव कुमार पे खूब फबी। आज भी जब रात में नींद कोसों दूर होती है और मन अनमना सा रहता है तो इस गीत को गुनगुनाना बेहद सुकून पहुँचाता है। वैसे भी गुजरी ज़िदगी के बीते हुए लमहों और उन्हें खास बनाने वाले लोग अगर किसी गीत के माध्यम से याद आ जाएँ तो आँखों में उभर आए आँसुओं के कतरे ओस की बूँदों की तरह मन के ताप को हर ही लेते हैं। तो आइए सुनते हैं इस गीत को...


बीती ना बिताई रैना, बिरहा की जाई रैना
भीगी हुई अँखियों ने लाख बुझाई रैना

बीती हुयी बतियाँ कोई दोहराए
भूले हुए नामों से कोई तो बुलाये
चाँद की बिंदी वाली, बिंदी वाली रतिया
जागी हुयी अँखियों में रात ना आयी रैना

युग आते है, और युग जाए
छोटी छोटी यादों के पल नहीं जाए
झूठ से काली लागे, लागे काली रतिया
रूठी हुयी अँखियों ने, लाख मनाई रैना


जया जी ने एक बार अमीन सायनी को दिये साक्षात्कार में कहा था कि हम लोग इस गाने की शूटिंग करते समय इतने डूब गए थे कि ऐसा लग रहा था कि गाने के भाव हमारी असल ज़िंदगी में घटित हो रहे हैं। हालात ये थे कि मैं, संजीव कुमार और सेट पर मौज़ूद टेकनीशियन सब की आँखें भींगी हुई थी शूट के बाद।

इस गीत के लिए उस साल यानि 1972 का सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका का पुरस्कार लता मंगेशकर को मिला। पंचम भले ही कोई इस फिल्म या गीत के लिए पुरस्कार ना जीत पाएँ हों पर उन्होंने बतौर संगीतकार उन लोगों के मन में आदर का भाव जागृत कराया जो उन्हें सिर्फ पश्चिमी संगीत के भारतीयकरण करने में ही पारंगत मानते थे।

Monday, June 23, 2014

ऐसे तो न देखो, कि हमको नशा हो जाए..मज़रूह की यादों में सचिन दा Aise to na Dekho .. Majrooh remembers S D Burman

पिछली पोस्ट में तीन देवियाँ फिल्म के गीत के बारे में चर्चा करते वक़्त बात हुई थी मज़रूह साहब के बारे में। आज आपसे गुफ़्तगू होगी इसी फिल्म के एक और गीत के बारे में। पर रफ़ी साहब के गाए इस नाज़ुक से नग्मे का जिक्र करूँ, उससे पहले आपको ये बताना चाहूँगा कि मज़रूह साहब कैसे याद करते थे सचिन देव बर्मन साहब के साथ गुजरे उन सालों को।

आपको बता ही चुका हूँ मज़रूह कम्यूनिस्ट विचारधारा से काफी प्रभावित थे। सचिन दा से उनकी पहली मुलाकात वामपंथियों के एक सम्मेलन में कोलकाता में हुई थी। सचिन दा ने मज़रूह से पहले साहिर लुधयानवी के साथ कुछ फिल्मों में काम किया। फिर किसी बात पर उनकी साहिर से अनबन हो गई तो उन्होंने मज़रूह को फिल्म Paying Guest के गाने लिखने के लिए बुलाया। 

मज़रूह को परिस्थिति दी गयी कि एक वकील अपनी महबूबा के लिए गा रहा है। मज़रूह ने सोचा वकील है थोड़ा सौम्य होगा तो उसी मिजाज़ का गाना लिख कर दे दिया। निर्देशक उनके इस प्रयास से तनिक भी खुश नहीं हुए कहा पहले फिल्म देखिए फिर गाना लिखिए। मज़रूह ने फिल्म देखी और अपना सिर ठोक लिया। उन्होंने कहा कि आपने मुझसे वकील के लिए गाना लिखने को क्यूँ कहा? सीधे कहते कि एक लोफ़र के लिए गाना लिखना है जो इक लड़की के पीछे पड़ा है और तब मज़रूह ने लिखा माना जनाब ने पुकारा नहीं, क्या मेरा साथ भी गवारा नहीं जो बेहद लोकप्रिय हुआ।

बिमल दा की फिल्म में मज़रूह ने सचिन दा के लिए एक गाना लिखा जलते हैं जिसके लिए मेरी आँखों के दीये...। इस कालजयी गीत (जो मुझे बेहद प्रिय है) के बारे में मैंने पहले यहाँ भी लिखा था पर फिल्म में इस गीत को फिल्माने पर विवाद खड़ा हो गया। फिल्म की परिस्थिति के हिसाब से ये गीत नायक नायिका द्वारा टेलीफोन करते हुए फिल्माया जाना था पर विमल दा जैसे यथार्थवादी निर्देशक फिल्म के नाम पर इतनी सिनेमेटिक लिबर्टी लेने के लिए तैयार नहीं थे। मज़रूह बताते हैं आमतौर पर डरपोक समझे जाने वाले सचिन दा इस बार बहादुरी से अड़ गए और थोड़ी देर इधर उधर टहलने के बाद बिमल दा से बोले "अगर तुम इस फिल्म में मेरा गाना नहीं लेगा तो हम पिक्चर नहीं करेगा"। सचिन दा के इस रूप को देखने के बाद बिमल दा को उनकी बात माननी पड़ी और इतिहास गवाह है कि इस गीत ने कितनी वाहवाहियाँ बटोरीं।

सचिन दा के बारे में मशहूर था कि वो अपने यहाँ आने वालों को चाय नाश्ते के लिए ज़्यादा नहीं पूछते थे। इसी मद्देनज़र मज़रूह साहब ने एक किस्सा बयाँ किया था। वाक़या ये था कि
एक बार सचिन दा , उनका सहायक, साहिर और मज़रूह गाड़ी से चर्चगेट से कहीं जा रहे थे। रास्ते में सचिन दा ने एक केला निकाला और खाने लगे। फिर उन्होंने साहिर से पूछा "कोला लेगा"? साहिर और मज़रूह अचरज़ में पड़ गए कि कहाँ से सचिन दा का दरिया - ए  -रहमत जोश मारने लगा ? अभी दोनों इसी असमंजस में थे कि सचिन दा ने कहा ड्राइवर गाड़ी रोको और फिर साहिर की ओर मुख़ातिब होकर बोले जाओ ओ दिखता है... जा कर ले लो।

सचिन दा के बारे में मज़रूह की याद की पोटलियों से निकले कई किस्से और भी हैं पर वो फिर कभी। आइए अब बात की जाए तीन देवियों के इस बेहद प्यारे से नग्मे की।

 
सचिन दा इस बाद के हिमायती थे कि गीत में उतना ही संगीत दिया जाए जितनी जरूरत हो। कहीं बेख्याल हो कर कहीं छू लिया किसी ने में आप इसका नमूना देख ही चुके हैं पर जहाँ तक ऐसे तो ना देखो की बात है यहाँ सचिन दा की शुरुआती धुन और इंटरल्यूड्स गीत के मूड में और जान डाल देते हैं। राग ख़माज पर आधारित इस गीत को हिंदुस्तानी ज़ुबान की जिस रससिक्त चाशनी में घोला है मज़रूह ने कि बोलों को पढ़कर ही मन में एक ख़ुमार सा छाने लगता है। अब इसी अंतरे को लीजिए यूँ न हो आँखें रहें काजल घोलें..बढ़ के बेखुदी हँसीं गेसू खोलें..खुल के फिर ज़ुल्फ़ें सियाह काली बला हो जाए

अब आप ही बताइए काजल से सजी आँखों के बीच किसी की बेसाख्ता सी हँसी उनके बालों की लटों को लहरा दे तो आसमान में बदली छाए ना छाए दिल तो इन काली घटाओं के आगोश में भींग ही उठेगा ना। रफ़ी ने इसी चाहत को गीत के हर अंतरे में अपनी अदाएगी के द्वारा इस तरह उभारा मानो वो ख़ुद मदहोशी की हालत में गाना गा रहे हों। तो आइए आज की शाम जाम के तौर पर इस गीत का रसपान किया जाए


ऐसे तो न देखो, कि हमको नशा हो जाए
ख़ूबसूरत सी कोई हमसे ख़ता हो जाए

तुम हमें रोको फिर भी हम ना रुकें
तुम कहो काफ़िर फिर भी ऐसे झुकें
क़दम-ए-नाज़ पे इक सजदा अदा हो जाये

ऐसे तो न देखो....

यूँ न हो आँखें रहें काजल घोलें
बढ़ के बेखुदी हँसीं गेसू खोलें
खुल के फिर ज़ुल्फ़ें सियाह काली बला हो जाए

ऐसे तो न देखो.....

हम तो मस्ती में जाने क्या क्या कहें
लब-ए-नाज़ुक से ऐसा ना हो तुम्हें
बेक़रारी का गिला हम से सिवा हो जाये
ऐसे तो न देखो
.....

फिल्म तीन देवियाँ में ये गीत देव आनंद और नंदा पर फिल्माया गया था।

 

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