Sunday, February 07, 2016

वार्षिक संगीतमाला 2015 पॉयदान # 8 : तू जो मिला.. लो हो गया मैं क़ाबिल Tu Jo Mila ...

अब जबकि सिर्फ आठ सीढ़ियाँ बाकी है शिखर तक पहुँचने के लिए आइए आपको मिलवाते हैं एक ऐसे गीत से जो फिल्म से अलग सुना जाए तो एक रोमांटिक नग्मा लग सकता है पर वास्तव में गीत ये दिखलाता है कि कैसे प्यारी सी बच्ची एक इंसान को ज़िन्दगी के सही मायने सिखला देती है । गीतकार व संगीतकारों का काम तब और कठिन हो जाता है जब उनके रचित गीत फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाते हैं। संगीतकार प्रीतम, गीतकार क़ौसर मुनीर व गायक केके की दाद देनी होगी कि उन्होंने ऐसा करते हुए भी बजरंगी भाईजान के इस गीत की मेलोडी को बनाए रखा है ताकि जिन्होंने इस फिल्म को नहीं देखा वो भी इसकी मधुरता से अछूते ना रह पाएँ।


  

संगीतकार प्रीतम ने बड़ी प्यारी धुन रची इस गीत के लिए। गिटार की टुनटुनाहट और  वॉयलिन के दिल को सहलाते सुरों से वो हमें गीत के मुखड़े तक लाते हैं। धीरे धीरे गीत के टेम्पो को उठाते हैं और फिर तू धड़कन मैं दिल के बाद स्ट्रिंग्स का वो टुकड़ा पेश करते हैं कि दिल खुशी से झूमने लगता है। अंतरे के बाद भी गिटार पर उनकी कलाकारी कमाल की है और चित्त को प्रसन्न कर देती है। आश्चर्य की बात है कि उन्होंने इस गीत को तीन बेहतरीन गायकों जावेद अली, पापोन व केके से अलग अलग गवाया। पापोन और जावेद ने अलग अलग अंदाज़ में इस गीत को निभाया है पर इस प्रकृति के गीतों में केके की दमदार आवाज़ बिल्कुल फिट बैठती है। 

संगीत से जुड़े मलयाली परिवार से ताल्लुक रखने वाले और दिल्ली में पले बढ़े केके यानि कृष्ण कुमार कुन्नथ पिछले दो दशकों से फिल्म उद्योग में बतौर पार्श्व गायक जमे हुए हैं। साढ़े तीन हजार जिंगल गाने के बाद बॉलीवुड में अवसर पाने वाले केके को जब ये गीत गाने का प्रस्ताव मिला तो वे आस्ट्रेलिया में छुट्टियाँ मना रहे थे। छुट्टियों के बीच ही उन्होंने आस्ट्रेलिया में इस गीत की रिकार्डिंग की। प्रीतम को केके की आवाज़ पर इतना भरोसा था कि उन्होंने रिकार्डिंग का निर्देशन भी केके के जिम्मे छोड़ दिया। केके ने अपने को इस गीत में खुद ही निर्देशित किया यानि गाना गाया, सुना और फिर उसमें ख़ुद ही सुधार करते हुए अंतिम रिकार्डिंग प्रीतम के पास भेजी जिसे हम सबने फिल्म में सुना। 

कौसर मुनीर और केके
इस गीत के बोल लिखे क़ौसर मुनीर ने जिनसे आपका परिचय मैं वार्षिक संगीतमालाओं में फलक़ तक चल साथ मेरे, मैं परेशां परेशां और सुनो ना  संगमरमर जैसे गीतों से पहले भी करा चुका हूँ। तो क्या लिखा उन्होंने इस गीत में?

खाते पीते सोते जागते व अपनी जीविका के लिए काम करते करते हम अपनी सारी ज़िंदगी बिता देते हैं। मौके तो सबको मिलते हैं पर वक़्त रहते हम उन्हें लेने को तैयार नहीं होते । डरते हैं समाज से, अनजान के भय से, बिना जाने कि हम विपरीत परिस्थितियों में भी क्या करने की कूवत रखते हैं। अपने व्यक्तित्व को किन ऊँचाइयों पर ले जा सकते हैं।  

ऐसा ही तो हुआ इस फिल्म के नायक  के साथ। उन्हें एक परिस्थिति मिली और शुरुआती हिचकिचाहट के बाद जब वो उससे लड़ने को तैयार हुए तभी अपने अंदर छुपे असली इंसान को ढूँढ पाए। रोज़गार की तलाश में भटकते एक आम से इंसान को दूर देश से भटक कर आई बच्ची क्या मिली उसके जीने का मक़सद ही बदल गया।   क़ौसर मुनीर को यही व्यक्त करना था अपने गीत में और उन्होंने  इसे बखूबी किया भी। मिसाल के तौर पर देखिए फिल्म में बच्ची का मज़हब कुछ और है और हमारे नायक का कुछ और  पर उसे लगता है कि उसके घर तक पहुँचाना ही ऊपरवाले की सच्ची इबादत है सो क़ौसर उसकी मनोभावना को इन शब्दों में दर्शाती हैं आबोदाना मेरा, हाथ तेरे है ना ढूँढ़ते तेरा ख़ुदा मुझको रब मिला या फिर राह हूँ मैं तेरी, रूह है तू मेरी.. ढूँढते तेरे निशाँ मिल गयी खुदी।

तो आइए सुनते हैं ये प्यारा नग्मा...


  

आशियाना मेरा साथ तेरे है ना
ढूँढते तेरी गली मुझको घर मिला


आबोदाना मेरा, हाथ तेरे है ना
ढूँढ़ते तेरा ख़ुदा मुझको रब मिला
तू जो मिला.. लो हो गया मैं क़ाबिल
तू जो मिला.. तो हो गया सब हासिल हाँ ..


मुश्क़िल सही.. आसां हुई मंज़िल
क्यूंकि तू धड़कन, मैं दिल..

रूठ जाना तेरा, मान जाना मेरा
ढूँढते तेरी हँसी , मिल गयी ख़ुशी
राह हूँ मैं तेरी, रूह है तू मेरी
ढूँढते तेरे निशाँ
मिल गयी खुदी
तू जो मिला लो हो गया मैं क़ाबिल ...मैं दिल..



वार्षिक संगीतमाला 2015 में अब तक

Friday, February 05, 2016

वार्षिक संगीतमाला 2015 पॉयदान # 9 : अब तोहे जाने ना दूँगी Ab Tohe Jane Na Doongi

वार्षिक संगीतमाला की नवीं पॉयदान का गीत वैसे है तो इस साल की संगीतमय व शानदार फिल्म बाजीराव मस्तानी से, पर इसे सुनकर ये मत कहिएगा कि इसे तो हमने फिल्म में देखा ही नहीं। दरअसल आजकल गाने तो स्क्रिप्ट के साथ बनते जाते हैं पर कई दफ़े फिल्म की ज्यादा लंबाई की वज़ह से इन पर कैंचियाँ भी चल जाती है। नवीं पॉयदान की  ये मीठी सी कशिश लिए हुयी शास्त्रीय बंदिश इसी कैंची का शिकार होकर फिल्म में अपनी जगह नहीं बना पायी । 

पिछले साल की प्रदर्शित फिल्मों में मुझे बाजीराम मस्तानी का एलबम अव्वल लगा। शास्त्रीयता, रोमांस, नृत्य सभी रसों का मेल था इस एलबम में। इसके कई गीत इस संगीतमाला मैं हैं तो कई को मुझे छोड़ना पड़ा। बहरहाल इस फिल्म का पहला गीत जो मैंने चुना है वो आधारित  है राग भूपाली या राग भूप पर। कर्नाटक संगीत में इस राग को राग मोहन के नाम से जाना जाता है। सरगम के सिर्फ पाँच स्वरों का इस्तेमाल करने वाले इस राग पर दिल हुम हुम करे, नील गगन की छाँव में, पंख होते तो उड़ आती रे मैं जहाँ रहूँ जैसे तमाम  कालजयी गीत बन चुके हैं।


आश्चर्य ही की बात है कि फिल्म निर्देशक के आलावा संगीत निर्देशन का भार सँभालने वाले संजय लीला भंसाली ने इस शास्त्रीय गीत के लिए दो नई आवाज़ों  पायल देव व श्रेयस पुराणिक को चुना और दोनों ने इस गीत के माध्यम से उनके विश्वास पर खरा उतरने की पूरी कोशिश की। 

पायल देव व  श्रेयस पुराणिक
खासकर पायल देव जिन्होंने अब तक बॉलीवुड में इक्का दुक्का गाने ही गाए थे ने तो उस लिहाज़ से कमाल ही कर दिया। सात आठ साल पहले मुंबई में कदम रखने वाली पायल का संगीत का सफ़र एड जिंगल्स से ही शुरु हुआ था। संगीतकारों के लिए भी गाती रहीं और उनके कुछ नग्में रुपहले पर्दे तक भी पहुँचे पर किसी ने उन्हें वो सम्मान नहीं दिलाया जितना उन्हें इस गीत को गाकर मिला।  अपने साक्षात्कारों में इस गीत के बारे में बातें करती वो फूली नहीं समाती। वे कहती हैं

"मुझे संजय सर के आफिस से एक दिन कॉल आई कि सर आपसे किसी गीत के सिलसिले में मिलना चाहते हैं। शायद उन्होंने मेरी आवाज़ पहले कहीं सुनी थी। पहले तो मुझे अपने भाग्य पर विश्वास ही नहीं हुआ। मैं वहाँ गई पर संजय सर के सामने मैं बहुत नर्वस हो गई। पहली बार गाया तो संजय सर ने समझाया कि गीत में जरूरत  से ज्यादा  हरक़तें नहीं लेनी हैं फिर उन्होंने जैसा उसे संगीतबद्ध किया था वो मुझे सुनाया। उन्हें  मेरी आवाज़ पसंद तो आई पर  उन्होंने कहा कि पूरे गीत को आराम से वापस जाकर रिकार्ड कर के भेज दो। फिर एक दिन मुझे फोन आया कि आपकी रिकार्डिग संजय सर को पसंद आ गई है। तब तक मुझे ये भी पता नहीं था कि मेरा ये गीत किस फिल्म के लिए रिकार्ड हुआ है। वो तो जब अलबेला सजन के लिए संजय सर ने मुझे फिर बुलाया तो मुझे लगा कि वो गीत भी बाजीराव मस्तानी के लिए होगा।"

तो देखा आपने की नए कलाकार  इतने नर्वस हो जाते हैं बड़े नामों के सामने कि किस फिल्म के लिए गा रहे हैं ये पूछने की भी हिम्मत नहीं जुटा पाते। पायल का इस गीत में साथ दिया नागपुर के श्रेयस पुराणिक ने। सुरेश वाडकर की छत्रछाया में संगीत सीखने  वाले श्रेयस की ये छोटी पर असरदार शुरुआत है। 

अब इस गीत के बारे में क्या कहें।  पियानों के नोट्स से शुरु होता हुआ ये गीत मुखड़े के बाद शहनाई के मधुर टुकड़े से मन को रससिक्त कर देता है। गीत चाहत के उस रूप को व्यक्त करता है जब प्रेमी बड़े अधिकार के साथ तन मन से अपने साथी को अंगीकार कर लेना चाहता है। तभी तो गीतकार ए एम तुराज़ प्रेम बरसाने, होठों पर होठ धरने व संग सो जाने की बात करते हैं। पर इस गीत में जिस तरह पायल जाने ना दूँगी और अब तोहे जाने ना दूँगी को निभाती हैं कि गीत सुनने के बाद भी उसका मीठा ज़ायका घंटों दिमाग में रहता  है तो आइए रात्रि के इस पहर में इस गीत के लिए बने इस गीत में थोड़ा डूबें इसके बोलों के साथ.. 


अब तोहे जाने ना दूँगी
अब तोहे जाने ना दूँगी
सौतन सी ये रैन है आई
सौतन सी ये रैन है आई
अब तोहे जाने ना दूँगी
प्रेम बरसाओ संग सो जाओ
जाने न दूँगी
अब तोहे जाने ना दूँगी

कुछ भी न बोलूँ ऐसा कर जाओ
होंठों पे मेरे होंठ धर जाओ

सुख वाली रूत जाने ना दूँगी
प्रेम बरसाओ संग सो जाओ
जाने न दूँगी
अब तोहे जाने न दूँगी

एक है मन्नत, एक है दुआ
दोनों ने इश्क की रूह को है छुआ
दायें से पढ़ या बाएँ से पढ़
फर्श से अर्श तक इश्क़ है लिखा

ना जाने ना जाने ना
ना जाने ना दूँगी
अब तोहे जाने न दूँगी
अब तोहे जाने न दूँगी
  

वार्षिक संगीतमाला 2015 में अब तक

15. घुटता है दम दम Dum Ghutta Hai
14.  चम्पई रंग यार आ जाए  Champai Rang Yaar Aa Jaye...
13. दहलीज़ पे मेरे दिल की जो रखे हैं तूने क़दम  Jeena Jeena 
12. हाँ.. हँसी बन गए, हाँ.. नमी बन गए  Hansi
11. तू है कि नहीं..  Tu Hai Ki Nahin... 
10. क्या अर्थ है इन जलते दीयों का? Jalte Diye
 9.  अब तोहे जाने ना दूँगी  Ab Tohe Jane Na Doongi

Thursday, February 04, 2016

वार्षिक संगीतमाला 2015 पॉयदान #10 क्या अर्थ है इन जलते दीयों का? Jalte Diye

वार्षिक संगीतमाला में वक्त आ गया है साल के मेरे पसंदीदा प्रथम दस गीतों से रूबरू होने का। आठ फिल्मों से लिये इन नग्मों में से कुछ में शास्त्रीयता की बहार है, तो कही शब्दों की खूबसूरत बयार। कहीं गायिकी ऐसी जो गीत के बोलों और संगीत को एक अलग धरातल पर ही ले जाए या कोई धुन ऐसी जो मन से गुम होने का नाम ही ना ले। 

प्रथम दस गीतों की पहली सीढ़ी यानि दसवीं पॉयदान पर नग्मा वो जिसकी धुन बनाई हीमेश रेशमिया ने, बोल लिखे इरशाद क़ामिल ने और अपनी आवाज़ें दी विनीत सिंह, अन्वेशा, हर्षदीप कौर व शादाब साबरी। इतने गायकों के योगदान से आपको भ्रम हो सकता है कि ये एक समूह गीत हो पर वास्तव में ये युगल गीत है जिसके अंतरों में कोरस का अच्छा इस्तेमाल हुआ है। अगर ये गीत प्रथम दस में अपना स्थान बना पाया है तो उसकी वज़ह है एक अच्छी धुन के साथ इन चारों गायकों की मधुर गायिकी ! खुशी होती है ये देखकर कि इनमें से तीन कलाकार विनीत सिंह, अन्वेषा व हर्षदीप रियालटी शो में अच्छा करने के बाद इस मुकाम तक पहुँचे हैं। हीमेश ने इन्हें जो मौका दिया है इसके लिए वो भी बधाई के उतने ही हक़दार हैं।


गीत शुरु होता है ग़ज़ल के माहौल से। हर्षदीप को पूरे गीत में दो पंक्तियाँ ही गाने को मिली हैं पर उन सहज बोलों को मन की भावनाओं के जोर से उन्होंने इतना प्रभावी बनाया कि बस मूड बन जाता है।

आज अगर मिलन की रात होती
जाने क्या बात होती, तो क्या बात होती


हीमेश गीत की ताल यानि टेम्पो को अचानक ही बदल देते हैं धिन धिन धिन तक तक तक तक धिन धिन धा धा ताल से जो हीमेश के अनुसार कम प्रयुक्त होने वाला ताल है। हर्षदीप जहाँ से गीत को छोड़ती हैं अन्वेशा  वही से उसे पकड़ लेती हैं। जहाँ अन्वेशा श्रेया का छोटा अवतार लगती हैं वहीं विनीत को जिसने पहले गाते ना सुना हो उसे तो यही संशय हो जाए कि अरे कहीं सोनू निगम तो नहीं गा रहा इस गाने को। गीत के बोल कैसे अस्तित्व में आए उसकी भी एक अलग दास्तान है। जहाँ शूटिंग चल रही थी वहीं बगल के घर में बिजली गुल थी। एक स्त्री बड़े मनोयोग से दीये में खाना बना रही थी मानो दीये की रोशनी उसे मन में उजाला फैला रही हो। निर्देशक सूरज बड़जात्या ने मन में आए इसी विचार को इरशाद कामिल से गीत की शक़्ल में ढालने की जिम्मेदारी दी।

गीतकार इरशाद कामिल गीत के बारे में कहते हैं

"यहाँ दीयों की बात नहीं हो रही। वो तो बस एक रूपक है। दीये में आग होती है पर वो ख़ुद आग नहीं है। वो तो प्रतीक है एक तरह के उत्सव का, रोशनी का, गर्माहट का। मुझे तो इस प्रतीक का इस्तेमाल बस एक नए व नाज़ुक तरीके से इस तरह करना था कि जो फिल्म के चरित्र दिल में महसूस कर रहे हें वो शब्दों में व्यक्त हो जाए।"

इसीलिए मुखड़े में उन्होंने लिखा सुनते हैं जब प्यार हो तो दीये जल उठते हैं..। पर चरित्रों को मनोदशा आख़िर यहाँ है क्या? अब देखिए पिछली पॉयदान पर रॉय के गीत में नायक इस असमंजस में था कि नायिका उसे भी उतना चाहती है या नहीं। पर यहाँ मामला कुछ उल्टा है। नायिका तो यहाँ दिलो जान से अपने प्रेम का इज़हार कर रही है पर नायक इस उधेड़बुन  मे है कि वो उसे पसंद तो करता है पर उससे प्यार तो शायद ही करता है। इसलिए तो क़ामिल साहब उससे  कहलवा रहे हैं मेरा नहीं है वो दीया जो जल रहा है मेरे लिए... । 

ख़ैर ये फिल्म तो मैंने नहीं देखी पर इस गाने की मधुरता व गायिकी की वज़ह से इसे बार बार सुनने का मन जरूर करता है। तो आइए एक बार फिर सुनते हैं आपके साथ...

  

आज अगर मिलन की रात होती
जाने क्या बात होती, तो क्या बात होती

सुनते हैं जब प्यार हो तो
दीये जल उठते हैं
तन में, मन में और नयन में
दीये जल उठते हैं
आजा पिया आजा, आजा पिया आजा हो
आजा पिया आजा, तेरे ही तेरे लिए जलते
दीये
बितानी तेरे साए में साए में
जिंदगानी बिताई तेरे साए में साए में

कभी कभी, कभी कभी ऐसे दीयों से
लग है जाती आग भी
धुले धुले से आंचलों पे
लग है जाते दाग भी
हैं वीरानों में बदलते
देखे मन के बाग़ भी

सपनों में श्रृंगार हो तो
दीये जल उठते हैं
ख्वाहिशों के और शर्म के
दीये जल उठते हैं

आजा पिया आजा... ... तेरे साए में साए में

मेरा नहीं, मेरा नहीं है वो दीया जो
जल रहा है मेरे लिए
मेरी तरफ क्यूँ ये उजाले आए हैं
इनको रोकिये
यूँ बेगानी रौशनी में, कब तलक कोई जिए

साँसों में झंकार हो तो, दीये जल उठते हैं
झाँझरों में कंगनों में, दीये जल उठते हैं
आजा पिया, हम्म जलते दिए...
साए में, साए तेरे.. साए में, साए तेरे
साए में, साए तेरे.. साए में, साए तेरे 


   

वार्षिक संगीतमाला 2015 में अब तक

15. घुटता है दम दम Dum Ghutta Hai
14.  चम्पई रंग यार आ जाए  Champai Rang Yaar Aa Jaye...
13. दहलीज़ पे मेरे दिल की जो रखे हैं तूने क़दम  Jeena Jeena 
12. हाँ.. हँसी बन गए, हाँ.. नमी बन गए  Hansi
11. तू है कि नहीं..  Tu Hai Ki Nahin... 
10. क्या अर्थ है इन जलते दीयों का? Jalte Diye
 9.  अब तोहे जाने ना दूँगी  Ab Tohe Jane Na Doongi

Monday, February 01, 2016

वार्षिक संगीतमाला 2015 पॉयदान # 11 : तू है कि नहीं.. Tu Hai Ki Nahin...

वार्षिक संगीतमाला की ग्यारहवीं पॉयदान पर गाना वो जो पिछले साल संगीत चैनलों पर खूब बजा और युवाओं में खासा लोकप्रिय हुआ। हाल फिलहाल में सीटी का वाद्य यंत्र जैसा इतना अच्छा प्रयोग शायद ही किसी गाने में हुआ हो। जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ फिल्म रॉय के गीत तू है कि नहीं.. की। इस फिल्म को बॉक्स आफिस पर जो भी सफलता मिली उसमें इसके गीत संगीत का बहुत बड़ा हाथ था। संगीतकार अंकित तिवारी के लिए इस गीत का संगीत रचना एक बहुत बड़ी चुनौती थी क्यूँकि इस गाने को रणबीर कपूर जैसा बड़ा अदाकार निभा रहा था। वो कहते हैं कि



"मुंबई के फिल्म उद्योग में कदम रखने से पहले मेरा एक सपना था कि मेरे संगीतबद्ध गीत बड़े स्टार पर फिल्माए जाएँ। फिल्म रॉय में मेरा ये सपना पूरा हो गया। "

पर अंकित तिवारी के खूबसूरत संगीत संयोजन के साथ जिस शख़्स ने इस गीत को इन ऊँचाइयों पर पहुँचाने का अहम किरदार निभाया है उसका नाम है अभेंद्र कुमार उपाध्याय। बिहार के रोहतास जिले से निम्न मध्यम वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाले अभेंद्र का बॉलीवुड का सफ़र आसान नहीं रहा। फिल्मों से उनका नाता टेलीविजन के माध्यम से हुआ जो उनके घर पन्द्रह साल पहले आया। कविता लिखने की ललक उनमें तब पड़ी जब पहली बार प्रेम के गिरफ़त में आए। आज भी वो अपने गीतों की रूमानियत का श्रेय अपने पहले प्यार को देते हैं जिसमें लगे घावों ने रिसकर उनकी लेखनी को स्याही दी और आज तक दे रही है। अभेंद्र उन्नीस साल की उम्र में मुंबई आ गए। उन्हें तब लगता था कि मुंबई की मायानगरी जैसी फिल्मों में दिखती है इतनी ही प्रेम और सहृदयता से भरपूर होगी.। दस साल की लंबी जद्दोज़हद के बाद उन्हें साज़िद वाजिद की फिल्म पेयिंग गेस्ट में एक गीत लिखने का मौका मिला।

पर अभेन्द्र के भाग्य का सितारा तब खुला जब वे आशिकी टू की सफलता के बाद अंकित तिवारी से मिले। पिछले साल उन्होंने अंकित के सानिध्य में सिंघम रिटर्न, एलोन, खामोशियाँ व रॉय जैसी फिल्मों में काम किया। रॉय के इस गीत में परिस्थिति ये है कि नायक तो मोहब्बत भी गुमसुम है क्यूँकि उसे इस बात पर अभी भी पूरी तरह भरोसा नहीं है कि उसका प्रिय भी उसके बारे में कुछ वैसी ही भावनाएँ रखता है या नहीं।

दरअसल ऐसा तो हम सभी के साथ होता है। नहीं क्या ? हम उस शख्स के बारे में सोते जागते उठते बैठते इतना सोचते हैं कि वो हमारे अक़्स का ही एक हिस्सा हो जाता है। इसीलिए तो अभेन्द्र कहते हैं हर साँस से पूछ के बता दे ..इनके फासलों में, तू है कि नहीं। अभेन्द्र की अंतरों की शब्द रचना बड़ी प्यारी है। अब इन पंक्तियों को ही देखें दौड़ते हैं ख्वाब जिनपे रास्ता वो तू लगे, नींद से जो आँख का है वास्ता वो तू लगे....  या फिर धूप तेरी ना पड़े तो धुंधला सा मैं लगूँ.. आ के साँसे दे मुझे तू, ताकि ज़िंदा मैं रहूँ ...इन्हें गुनगुनाते उन्हें दाद देने को जी चाहता है।

गीत मैं कुछ उतना नहीं जमता तो वो है अंकित तिवारी का उच्चारण। हर साँस से पूछ के बता दे को वो ऐसे गाते हैं जैसे हर साँस से पूँछ के बता दे बताइए अर्थ का अनर्थ नहीं हो गया पर उनका बेहतरीन संगीत संयोजन खासकर मुखड़े के पहले और अंतरों के बीच बजती सीटी इस गलती को नज़रअंदाज करने के लिए बाध्य करती है। तो आइए सुनते हैं ये गीत..



मुझसे ही आज मुझको मिला दे
देखूँ आदतों में, तू है कि नहीं
हर साँस से पूछ के बता दे
इनके फासलों में, तू है कि नहीं
मैं आस-पास तेरे और मेरे पास
तू है कि नहीं.. तू है कि नहीं..
तू है कि नहीं.. तू है कि नहीं..

दौड़ते हैं ख्वाब जिनपे रास्ता वो तू लगे
नींद से जो आँख का है वास्ता वो तू लगे
तू बदलता वक़्त कोई खुशनुमा सा पल मेरा
तू वो लम्हा जो ना ठहरे आने वाला कल मेरा
मैं आस पास तेरे और मेरे पास
तू है कि नहीं..तू है कि नहीं.. 
तू है कि नहीं.. तू है कि नहीं..

इन लबों पे जो हँसी है इनकी तू ही है वज़ह
बिन तेरे मैं कुछ नहीं हूँ मेरा होना बेवजह
धूप तेरी ना पड़े तो धुंधला सा मैं लगूँ
आ के साँसे दे मुझे तू, ताकि ज़िंदा मैं रहूँ
मैं आस पास तेरे और मेरे पास
तू है कि नहीं..तू है कि नहीं.. 
तू है कि नहीं.. तू है कि नहीं..

वैसे अगर आपकी भी हालत ऐसी हो रही हो तो  इतना गाने गुनगुनाने से तो बेहतर है कि सीधे सीधे जाकर उनसे ख़ुद ही पूछ लें मैं आस-पास तेरे और मेरे पास तू है कि नहीं..

वार्षिक संगीतमाला 2015 में अब तक

Saturday, January 30, 2016

वार्षिक संगीतमाला 2015 पॉयदान # 12 : हाँ.. हँसी बन गए, हाँ.. नमी बन गए Hansi Ban Gaye

बड़ा विचित्र युग है संगीत का ये। नेट की इस खुली दुनिया ने हमें पिछले कई सालों में  नए व हुनरमंद संगीतकार, गायक व गीतकारों को दिया है। कुछ दशक पहले  अपनी आवाज़ और संगीत को सही हाथों तक पहुँचने में ही बरसों एड़ियाँ घिसनी पड़ती थी। आज उस फासले को बहुत हद तक कम कर दिया है तकनीक ने। पर इस वज़ह से प्रतिस्पर्धा भी बढ़ गई है। पहले पूरी फिल्म में एक संगीतकार, एक गीतकार और ज़्यादा से ज़्यादा दो से तीन गायक रहते थे। आजकल निर्माता निर्देशक संगीत जगत रूपी ताश की गड्डी के हर इक्के को अपने पास रखना चाहते हैं। जाने कौन सा इक्का हाथ बना ले और कौन सा कट जाए? 

ऐसा ही एक बैनर है भट्ट खानदान की विशेष फिल्मस का। अनेक संगीतकारों की टीम के साथ काम करने वाले इस बैनर को ये श्रेय जाता है कि नए कलाकारों को आज़माने में इसने कभी कोताही नहीं बरती। अंकित तिवारी से लेकर अरिजित सिंह जैसे कलाकारों को सही मौका दे सफलता के शिखर तक पहुँचाने में इनका जबरदस्त हाथ रहा है। अब इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने हमारी अधूरी कहानी फिल्म के एक गीत के लिए मौका दिया अमि मिश्रा को जिनका संगीतबद्ध गीत वार्षिक संगीतमाला की बारहवीं पॉयदान की शोभा बढ़ा रहा है।


इंदौर से ताल्लुक रखने वाले अमि मिश्रा की सांगीतिक पृष्ठभूमि को टटोलने के लिए आपको उनकी कॉलेज की ज़िंदगी में झाँकना होगा। अमि ने अपने दोस्तों के साथ कॉलेज में एक बैंड बनाया व रियालटी शो में भाग लेने की कोशिश करते रहे। पर एक बार MBA की डिग्री हाथ आ गई तो अपने सहपाठियों की तरह ही कार्पोरेट जगत के भँवर में खिंचते चले गए।

पर दिल तो उनका संगीत में मन रमाने को कह रहा था सो उसकी आवाज़ सुनते हुए मोटी आमदनी वाली नौकरी को छोड़ रेस्ट्राँ में गाने बजाने लगे। उन्होंने अपने इस निर्णय से अपने मध्यमवर्गीय माता पिता को भी नाराज कर दिया पर संगीत से उनका जुड़ाव बढ़ता ही गया। अगला पड़ाव मुंबई का था। महीनों इधर उधर हाथ आज़माने के बाद मुकेश भट्ट से जब उनकी मिलने की कोशिश बेकार गई तो उन्होंने इंदौर वापस लौटने का मन बना लिया। पर इससे पहले कि वे वापस इंदौर आते विशेष फिल्म द्वारा उनका रचा गीत हँसी स्वीकार कर लिया गया। तब तो उन्हें ये भी नहीं  पता था कि ये गीत किस फिल्म के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।

हमारी अधूरी कहानी में अमि ने ख़ुद भी इस गीत को अपनी आवाज़ दी है पर जब अमि की मधुर धुन का श्रेया की दिलकश आवाज़ का साथ मिलता है तो बस गीत में चार चाँद लगा जाते हैं। अमि का कहना है कि चूंकि ये गीत विद्या बालन पर फिल्माया जाना था तो मुझे एक परिपक्व आवाज़ की तलाश थी जो श्रेया पर जाकर खत्म हुई।  

वैसे अमि मिश्रा के साथ हिंदी फिल्मों में इस गीत से अपने कैरियर की शुरुआत की है कुणाल वर्मा ने भी। अभी हाल फिलहाल में राजस्थान एन्थम और रैपरिया बालम की वज़ह से चर्चा में आने वाले कुणाल जयपुर में रहते हैं। इस साल उनके गीतों को आप कई नई फिल्मों में सुन पाएँगे। बहरहाल कुणाल की ये पंक्ति हाँ.. हँसी बन गए, हाँ.. नमी बन गए तुम मेरे आसमां, मेरी ज़मीन बन गए.. लोगों के दिल में बस गई।

सही कह  रहे हैं कुणाल, अगर किसी की बेसाख्ता सी खिलखिलाहट आपके तन मन को प्रसन्न कर दे या फिर किसी की रंच मात्र की उदासी आपके दिल को विकल कर दे तो  प्रेम तो हुआ समझिए। तो आइए सुनते हैं ये प्यारा सा नग्मा

मैं जान ये वार दूँ , हर जीत भी हार दूँ
क़ीमत हो कोई तुझे ,बेइंतेहा प्यार दूँ 
सारी हदें मेरी, अब मैंने तोड़ दी
देकर मुझे पता, आवारगी बन गए
हाँ.. हँसी बन गए, हाँ.. नमी बन गए
तुम मेरे आसमां, मेरी ज़मीन बन गए.. ओ..

क्या खूब रब ने किया, बिन माँगे इतना दिया
वरना है मिलता कहाँ, हम काफ़िरों को ख़ुदा
हसरतें अब मेरी, तुमसे हैं जा मिली
तुम दुआ अब मेरी, आखिरी बन गए
हाँ.. हँसी बन गए, हाँ.. नमी बन गए... 

वार्षिक संगीतमाला 2015 में अब तक

Wednesday, January 27, 2016

वार्षिक संगीतमाला 2015 पॉयदान # 13 : दहलीज़ पे मेरे दिल की जो रखे हैं तूने क़दम Jeena Jeena

कभी कभी संगीत का कोई छोटा सा टुकड़ा संगीतकार के तरकश से चलता है और श्रोता के  दिल में ऍसे बस जाता है कि उस टुकड़े को कितनी बार सुनते हुए भी उसे दिल से निकालने की इच्छा नहीं होती। अगर मैं कहूँ कि वार्षिक संगीतमाला की तेरहवीं पॉयदान पर फिल्म बदलापुर के गीत के यहाँ होने की एक बड़ी वज़ह संगीतकार सचिन जिगर का मुखड़े के बाद  बाँसुरी से बजाया गया मधुर टुकड़ा है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी । 

पूरे गीत में गिटार और बाँसुरी का प्रमुखता से इस्तेमाल हुआ है। बाँसुरी की जिस धुन का मैंने उल्लेख किया है वो आपको गीत के पहले मिनट के बाद बीस सेकेंड के लिए और फिर 2.26 पर सुनने को मिलती है। इसे बजाया है वादक शिरीष मल्होत्रा ने।

बदलापुर के इस गीत को गाने की जिम्मेदारी सौंपी गई आतिफ़ असलम को जो कुछ सालों तक बॉलीवुड में अपना डंका बजवाने के बाद इधर हिंदी फिल्मों में कम नज़र आ रहे थे।  जिगर का अपने इस चुनाव के बारे में कहना था

"दरअसल इस गीत में गायक की प्रवीणता से ज्यादा उसकी गीत की भावनाओं के प्रति ईमानदारी की आवश्यकता थी और आतिफ़ असलम ने इस गीत को बिल्कुल अपने दिल से गाया है। गीत की शुरुआत और अंतरे के पहले जब वो गुनगुनाते हैं तो ऐसा लगता है कि कोई आपके  में बैठा इस गीत को गा रहा है।"

ये गीत ज्यादा लंबा नहीं है और इसमें बस एक अंतरा ही  है। पर इतने छोटे गीत को लिखने के लिए दो लोगों को श्रेय दिया गया है। एक तो निर्माता दीपक विजन को  व दूसरे गीतकार प्रिया सरैया को। दीपक विजन इसकी वज़ह ये बताते हैं कि सारे गीत खूब सारी बतकही, हँसी मजाक व सुझावों के आदान प्रदान के बाद  बने।  वाकई गीत प्रेम में  समर्पण की  भावना को सहज व्यक्त करता हुआ दिल को छू जाता है। पर मुझे लगता है कि इतनी अच्छी धुन को इससे ज्यादा बेहतर शब्दों और कम से कम एक और अंतरे का साथ मिलना चाहिए था। तो आइए सुनते हैं बदलापुर फिल्म का ये गीत

दहलीज़ पे मेरे दिल की
जो रखे हैं तूने क़दम
तेरे नाम पे मेरी ज़िन्दगी
लिख दी मेरे हमदम
हाँ सीखा मैंने जीना जीना कैसे जीना
हाँ सीखा मैंने जीना मेरे हमदम
ना सीखा कभी जीना जीना कैसे जीना
ना सीखा जीना तेरे बिना हमदम

सच्ची सी हैं ये तारीफें, दिल से जो मैंने करी हैं
जो तू मिला तो सजी हैं दुनिया मेरी हमदम
हो आसमां मिला ज़मीं को मेरी
आधे-आधे पूरे हैं हम
तेरे नाम पे मेरी ज़िन्दगी...

वार्षिक संगीतमाला 2015 में अब तक

Monday, January 25, 2016

वार्षिक संगीतमाला 2015 पॉयदान # 14 : चम्पई रंग यार आ जाए Champai Rang Yaar Aa Jaye...

वार्षिक संगीतमाला की अगली पॉयदान पर जो गीत या यूँ कहो कि जो ग़ज़ल है वो ज्यादा उम्मीद है कि आपने नहीं सुनी होगी। अब सुनेंगे भी तो कैसे पिछले साल अगस्त में जानिसार सिनेमा के पर्दे पर कब आई और कब चली गई पता ही नहीं चला। एक ज़माना होता था जब मुजफ्फर अली की फिल्मों का लोग बड़ी बेसब्री से इंतज़ार करते थे। एक तो उनके गंभीर कथानक के लिए लिए व दूसरे उनके बेमिसाल संगीत के लिए। गमन और उमराव जान का दिलकश संगीत आज भी लोगों के दिलो दिमाग में उसी तरह बसा हुआ है। 

उमराव जान के बाद आगमन, ख़िजां व जूनी जैसी फिल्में उन्होंने बनाई जरूर पर इनमें से ज्यादातर प्रदर्शित नहीं हो पायीं। इसलिए दो दशकों के बाद उनका जांनिसार के साथ   फिल्म निर्माण में उतरना संगीतप्रेमियों के लिए अच्छी ख़बर जरूर था। फिल्म तो ख़ैर ज्यादा सराही नहीं गई पर इसका संगीत आज के दौर में एक अलग सी महक लिए हुए जरूर था।


1877 के समय अवध के एक राजकुमार और उनके ही दरबार में क्रांतिकारी विचार रखने वाली नृत्यांगना के बीच बढ़ते प्रेम को दिखाने के लिए मुजफ्फर अली ने वाज़िद अली शाह की इस ग़ज़ल को चुना। संगीत रचने की जिम्मेदारी पाकिस्तान के सूफी गायकव शास्त्रीय संगीत के मर्मज्ञ शफ़क़त अली खाँ को सौंपी।  शफ़क़त उम्र से तो मात्र 44 साल के हैं पर शास्त्रीय संगीत की ख्याल परंपरा के उज्ज्वल स्तंभ माने जाते हैं। 

तो  आइए देखें वाज़िद अली शाह ने इस ग़ज़ल में कहना क्या चाहा है। 



ग़ज़ल के मतले में वाज़िद अली शाह महबूब से दूर रहते हुए अपने जज़्बातों को शब्द देते हुए कहते हें कि काश चम्पा सदृश उस गौर वर्णी की चेहरे की रंगत सामने आ जाती। ये हवा ज़रा उसकी खुशबुओं को हमारे पास ले आती।

चम्पई रंग यार आ जाए
चम्पई रंग यार आ जाए
निख़ते खुश गवार आ जाए
निख़ते खुश गवार आ जाए
चम्पई रंग यार आ जाए

अब उनके हुस्न की क्या तारीफ़ करें हम!  वो तो शीशे को एक नज़र देख क्या लें.. आइना उनके प्रतिबिंब के घमंड से ही इतराने लगे

वो हसीं देख ले जो आइना
वो हसीं देख ले जो आइना
आइने पर गुबार आ जाए
आइने पर गुबार आ जाए
चम्पई रंग ....

तुम्हारे  बिना मेरी ज़िंदगी उस खाली शीशे की तरह है जो बिना जाम के बेरंग सा दिखता है इसीलिए मेरी साकी इस गिलास को जाम से खाली होने मत दो..

खाली शीशे को क्या करूँ साकी
खाली शीशे को क्या करूँ साकी
जाम भी बार बार आ जाए
जाम भी बार बार आ जाए
चम्पई रंग....

वाज़िद अली शाह अख़्तर के उपनाम से ग़ज़लें कहा करते थे। सो मक़ते में वो कहते हैं कि उनकी प्रेयसी की आँखों की रवानी कुछ ऐसी है जिसे देख के दिल में नशे सी ख़ुमारी आ जाती है।

उनकी आँखों को देख कर अख्तर
उनकी आँखों को देख कर अख्तर
नशा बे-इख्तियार आ जाए
नशा बे-इख्तियार आ जाए
चम्पई रंग ....



इस गीत को संगीतकार शफक़त अली खाँ के साथ श्रेया घोषाल ने गाया है। श्रेया घोषाल रूमानी गीतों को तो अपनी मिश्री जैसी आवाज़ का रस घोलती ही रहती हैं पर एक ग़ज़ल को जिस ठहराव की आवश्यकता होती है उसको भी समझते हुए उन्होंने इसे अपनी आवाज़ में ढाला है। शफक़त इस ग़ज़ल में श्रेया की अपेक्षा थोड़े फीके रहे हैं पर उनका संगीत संयोजन वाज़िद अली शाह के रूमानियत भरे बोलों के साथ दिल में सुकून जरूर पहुँचाता है।

वार्षिक संगीतमाला 2015 में अब तक


Saturday, January 23, 2016

वार्षिक संगीतमाला 2015 पॉयदान # 15 : घुटता हैं दम दम.. दम दम घुटता है Dum Ghutta hai

वार्षिक संगीतमाला के तीन हफ्तों से सफ़र में अब बारी है पिछले साल के मेरे सबसे प्रिय पन्द्रह गीतों की और पन्द्रहवीं पॉयदान पर जो गीत है ना जनाब उसमें प्रेम, विरह, खुशी जैसे भाव नहीं बल्कि एक तरह की पीड़ा और  दबी  सी घुटन है जो सीने से बाहर आने के लिए छटपटा रही है पर कुछ लोगों का डर ने उसे बाहर आने से रोक रखा है। पर इससे पहले कि मैं आपको इस गीत के बारे में बताऊँ आपसे एक रोचक तथ्य को बाँट लेता हूँ। जानते हैं काम मिलने के बाद संगीतकार व गीतकार ने सोचा हुआ था कि इस फिल्म के लिए वो कोई मस्त सा आइटम नंबर लिखेंगे। पर उनके मंसूबों पर पानी तब फिरा जब फिल्म के निर्देशक निशिकांत कामत ने उनसे आकर ये कहा कि मैं आपसे फिल्म सदमा के गीत ऐ ज़िंदगी गले लगा ले.. जैसा गीत बनवाना चाहता हूँ। 


ये फिल्म थी दृश्यम और संगीतकार गीतकार की जोड़ी थी विशाल भारद्वाज और गुलज़ार की। विशाल इस फर्माइश को सुनकर चौंक जरूर गए पर मन ही मन खुश भी हुए ये सोचकर कि आज के दौर में ऐसे गीतों की माँग कौन करता है? विशाल फिल्म के निर्माता कुमार मंगत पाठक के बारे में कहते हैं कि ओंकारा के समय से ही मैंने जान लिया था कि अगर कुमार जी से पीछा छुड़ाना हो तो उन्हें एक अच्छा गीत बना के देना ही होगा। यानि निर्माता निर्देशक चाहें तो गीत की प्रकृति व गुणवत्ता पर अच्छा नियंत्रण रख सकते हैं।

बकौल विशाल भारद्वाज ये गीत बहुत चक्करों के बाद अपने अंतिम स्वरूप में आया। दम घुटता है का मुखड़ा भी बाद में जोड़ा गया। पहले सोचा गया था कि ये गीत राहत फतेह अली खाँ की आवाज़ में रिकार्ड किया जाएगा। फिर विशाल को लगा कि गीत एक स्त्री स्वर से और प्रभावी बन पाएगा। तो रिकार्डिंग से रात तीन बजे लौटकर उन्होंने अपनी पत्नी व गायिका रेखा भारद्वाज जी से कहा कि क्या कल कुछ नई कोशिश कर सकती हो? रिकार्डिंग के लिए तुम्हें भी साढ़े दस बजे जाना पड़ेगा। अक्सर विशाल को रेखा उठाया करती हें पर उस दिन विशाल ने रेखा जी को साढ़े नौ बजे उठाते हुए कहा कि आधे घंटे थोड़ा रियाज़ कर लो फिर चलते हैं। ग्यारह बजे तक बाद रेखा विशाल के साथ स्टूडियो में थीं। पहले की गीत रचना को बदलते हुए विशाल ने रेखा जी के हिस्से उसी वक़्त रचे और फिर दोपहर तक राहत की आवाज़ के साथ मिक्सिंग कर गीत अपना अंतिम आकार ले पाया।

एक व्यक्ति की अचानक हुए हादसे में हत्या का बोझ लिए एक परिवार के मासूम सदस्यों की आंतरिक बेचैनी को व्यक्त करने का जिम्मा दिया गया था गुलज़ार को और शब्दों के जादूगर गुलज़ार ने मुखड़े में लिखा

पल पल का मरना
पल पल का जीना
जीना हैं कम कम
घुटता हैं दम दम दम दम दम दम दम दम दम दम घुटता है


उजड़े होठों , सहमी जुबां, उखड़ती सांसें, रगों में दौड़ती गर्मी जो जलकर राख और धुएँ में तब्दील हो जाना चाहती हो और अंदर से डर इतना कि इंसान अपनी ही परछाई से भी घबराने लगे। कितना सटीक चित्रण है ऐसे हालात में फँसे किसी इंसान का। गुलज़ार ने इन बिंबों से ये जतला दिया कि एक अच्छे गीतकार को व्यक्ति के अंदर चल रही कशमकश का, उसके मनोविज्ञान का पारखी होना कितना जरूरी है नहीं तो व्यक्ति के अंदर की घुटन की आँच को शब्दों में वो कैसे उतार पाएगा? 

तो आइए एक बार फिर से सुनें ये बेहतरीन नग्मा..


दुखता हैं दिल दुखता हैं
घुटता हैं दम दम घुटता हैं
डर हैं अन्दर छुपता हैं
घुटता हैं दम दम दम दम दम दम दम दम दम दम घुटता है

पल पल का मरना
पल पल का जीना
जीना हैं कम कम
घुटता हैं दम दम घुटता हैं
घुटता हैं दम दम ....

मेरे उजड़े उजड़े से होंठो में
बड़ी सहमी सहमी रहती हैं ज़बान
मेरे हाथों पैरों मे खून नहीं
मेरे तन बदन में बहता हैं धुआँ
सीने के अन्दर आँसू जमा हैं
पलके हैं नम नम
घुटता हैं दम दम...


क्यूँ बार बार लगता हैं मुझे
कोई दूर छुप के तकता हैं मुझे
कोई आस पास आया तो नहीं
मेरे साथ मेरा साया तो नहीं
चलती हैं लेकिन नब्ज़ भी थोड़ी
साँस भी कम कम
घुटता हैं दम दम घुटता हैं
घुटता हैं दम दम घुटता हैं


साँस भी कुछ कुछ रुकता हैं
घुटता हैं दम दम घुटता हैं
पल पल क्यूँ दम घुटता हैं
घुटता हैं दम दम ...

रेखा जी की आवाज़ के साथ राहत की आवाज़ का मिश्रण तो काबिलेतारीफ़ है ही गीत के इंटरल्यूड्स में ढाई मिनट बाद गिटार के साथ घटम का संगीत संयोजन मन को सोह लेता है। वैसे अंत में राहत का साँस भी कुछ कुछ रुकती की जगह रुकता है कहना कुछ खलता है।

फिल्म के किरदारों की मनोस्थिति को बयाँ करता ये गीत फिल्म का एक अहम हिस्सा रहा और इसी वज़ह से फिल्म के प्रोमो में इसका खूब इस्तेमाल किया गया। 

वार्षिक संगीतमाला 2015 में अब तक

25. सपना है निज़ाम का अपने तुर्रम खान का Turram Khan
24. मूँछ बनानी हो कि मूँछ कटानी हो पतली गली आना Patli Gali Aana
23. हीर तो बड़ी सैड है Heer to Badi Sad Hai
22. तू जो है तो मैं हूँ Tu jo Hai Toh Main hoon
21. सूरज डूबा है यारों Suraj Dooba Hai Yaaron
20. रंग दे मुझे तू गेरुआ Rang De Mujhe Tu Gerua
19. अफ़गान जलेबी, माशूक फ़रेबी  Afghan Jalebi
18. दिल की मान के सीना तान के इश्क़ करेंगे Ishq Karenge
17. ओ साथी मेरे हाथों में तेरे O Sathi Mere
16. इश्क़ सच्चा वही जिसको मिलती नहीं मंजिलें Humari Adhoori Kahani
15. घुटता है दम दम Dum Ghutta Hai

Thursday, January 21, 2016

वार्षिक संगीतमाला 2015 पॉयदान # 16 : इश्क़ सच्चा वही..जिसको मिलती नहीं मंज़िलें मंज़िलें Humari Adhoori Kahani ..

पियानो के दिल पर चोट से करते नोट्स..वायलिन की उदास करती धुन और फिर अरिजीत की दर्द की चाशनी में डूबती उतरती आवाज़ के साथ जो गीत आज मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ वो है फिल्म हमारी अधूरी कहानी का।

ज़िदगी ज्यूँ ज्यूँ आगे बढ़ती है हमारे रिश्तों की पोटली भी भारी होने लगती है। कई रिश्तों को हम ताउम्र ढोते रहते हैं तो कईयों को चाहे अनचाहे अपने से अलग कर देते हैं। अपने इर्द गिर्द की परिस्थितियाँ हमारे रिश्तों के दायरों को तय करती हैं। ज़ाहिर है इश्क़ के जिस मुकाम की तलाश में हम भटकते हैं वो इन दायरों की तंग गलियों में फँस कर कई बार मंज़िल से दूर ही रह जाता है। कभी विकलता से छटपटाता हुआ तो कभी हालात से समझौता करता हुआ। पर भले ही कहानियाँ दम तोड़ देती हैं इश्क़ वहीं का वहीं रहता है दिल के किसी कोने में सुलगता हुआ।

फिल्म हमारी अधूरी कहानी का ये शीर्षक गीत मन में कुछ ऐसी ही भावनाओं का संचार करता है। इस गीत को लिखा है रश्मि सिंह ने। रश्मि के लिखे गीतों को पहली बार मैंने पिछले साल फिल्म सिटीलाइट्स में सुना था और उनका लिखा नग्मा सोने दो ख़्वाब बोने दो... पिछले साल की संगीतमाला में शामिल भी हुआ था। इसी फिल्म के एक अन्य गीत मुस्कुराने की वज़ह के लिए उन्हें पिछले साल फिल्मफेयर ने सर्वश्रेष्ठ गीतकार के पुरस्कार से नवाज़ भी था।

रश्मि आजकल अपने जोड़ीदार पटकथालेखक व गीतकार विराग मिश्रा के साथ रश्मि विराग के नाम से साझा गीत रच रही हैं। शीर्षक गीत होने की वज़ह से गीतकार द्वय के सामने हर अंतरे को हमारी अधूरी कहानी से इस तरह ख़त्म करने की चुनौती थी कि वो सार्थक भी लगे और गीत की लय भी बनी रहे और उन्होंने गीत में बखूबी ये कर भी दिखाया है।  गीत में एक पंक्ति आती है कि इश्क़ सच्चा वही..जिसको मिलती नहीं मंज़िलें मंज़िलें.. आशावादी इससे सहमत तो नहीं होंगे पर शायद लेखिका ने कहना ये चाहा हो कि दूरियाँ इश्क़ की पवित्रता उसकी प्रगाढ़ता को बनाए रखती हैं।

संगीतकार जीत गाँगुली मुकेश भट्ट मोहित सूरी की फिल्मों  के हाल फिलहाल के अनिवार्य अंग रहे हैं। फिल्म के अपने इकलौते गीत में पियानो, बाँसुरी के साथ उन्होंने वॉयलिन का प्रमुखता से इस्तेमाल किया है पर इस गीत को चार चाँद लगाया है अरिजीत सिंह ने अपनी आवाज़ से। गीत के बोलो के अंदर के भावों को जिस ईमानदारी से उन्होंने पकड़ा है वो दिल को छू जाता है। तो आइए याद करें अपनी अधूरी कहानियों को और सुनें ये संवेदनशील नग्मा..

 

पास आए..
दूरियाँ फिर भी कम ना हुई
एक अधूरी सी हमारी कहानी रही
आसमान को ज़मीन ये ज़रूरी नहीं ...जा मिले.. जा मिले..
इश्क़ सच्चा वही..जिसको मिलती नहीं मंज़िलें मंज़िलें


रंग थे, नूर था जब करीब तू था, इक जन्नत सा था, ये जहान
वक़्त की रेत पे कुछ मेरे नाम सा, लिख के छोड़ गया तू कहाँ
हमारी अधूरी कहानी....

खुश्बुओं से तेरी यूँ ही टकरा गए
चलते चलते देखो ना हम कहाँ आ गए

जन्नतें गर यहीं, तू दिखे क्यूँ नहीं, चाँद सूरज सभी है यहाँ
इंतज़ार तेरा सदियों से कर रहा, प्यासी बैठी है कब से यहाँ
हमारी अधूरी कहानी

प्यास का ये सफर खत्म हो जायेगा
कुछ अधूरा सा जो था पूरा हो जायेगा

झुक गया आसमान, मिल गए दो जहान, हर तरफ है मिलन का समाँ
डोलियां हैं सजी, खुशबुएँ हर कहीं, पढ़ने आया ख़ुदा ख़ुद यहाँ
हमारी अधूरी कहानी... 


वार्षिक संगीतमाला 2015 में अब तक

25. सपना है निज़ाम का अपने तुर्रम खान का Turram Khan
24. मूँछ बनानी हो कि मूँछ कटानी हो पतली गली आना Patli Gali Aana
23. हीर तो बड़ी सैड है Heer to Badi Sad Hai
22. तू जो है तो मैं हूँ Tu jo Hai Toh Main hoon
21. सूरज डूबा है यारों Suraj Dooba Hai Yaaron
20. रंग दे मुझे तू गेरुआ Rang De Mujhe Tu Gerua
19. अफ़गान जलेबी, माशूक फ़रेबी  Afghan Jalebi
18. दिल की मान के सीनाा तान के इश्क़ करेंगे Ishq Karenge
17. ओ साथी मेरे हाथों में तेरे O Sathi Mere
16. इश्क़ सच्चा वही जिसको मिलती नहीं मंजिलें Humari Adhoori Kahani
15. घुटता है दम दम Dum Ghutta Hai

Wednesday, January 20, 2016

वार्षिक संगीतमाला 2015 पॉयदान # 17 : ओ साथी मेरे.. हाथों में तेरे.. O Sathi Mere..

वर्षिक संगीतमाला का सफ़र अब मुड़ रहा हैं थिरकते, मुस्कुराते गीतों से अपेक्षाकृत गंभीर और रूमानी गीतों की तरफ़ और इस कड़ी की पहली पेशकश है सत्रहवीं पॉयदान पर बैठा तनु वेड्स मनु रिटर्न का ये नग्मा। संगीतकार क्रस्ना सोलो व गीतकार राजशेखर की जोड़ी इससे पहले 2011 में वार्षिक संगीतमाला के सरताज गीत यानि शीर्ष पर रहने का तमगा हासिल कर चुकी है। ज़ाहिर है जब इस फिल्म का सीक्वेल आया तो इस जोड़ी के मेरे जैसे प्रशंसक को थोड़ी निराशा जरूर हुई।

पिछली फिल्म में शर्मा जी के प्यार का भोलापन पहली फिल्म में राजशेखर से कितने दफ़े दिल ने कहा, दिल की सुनी कितने दफ़े और रंगरेज़ जैसे गीत लिखा गया था। पर सीक्वेल में चरित्र बदले परिवेश बदला उसमें गीतकार संगीतकार के लिए पटकथा ने कुछ ज्यादा गंभीर व प्यारा करने लायक छोड़ा ही ना था। लिहाजा गीत संगीत फिल्म की परिस्थितियों के अनुरूप लिखे गए जो देखते समय तो ठीक ही ठाक लगे पर कानों में कोई खास मीठी तासीर नहीं छोड़ पाए। फिल्म देखने के बाद जब इस एलबम के गीतों को फिर से सुना तो एक गीत ऐसा मिला जिसे मैं फिल्म की कहानी से जोड़ ही नहीं पाया क्यूँकि शायद इसका फिल्म में चित्रांकन तो किया ही नहीं गया था। अब जब नायिका के तेवर ऐसे हों कि शर्मा जी हम बेवफ़ा क्या हुए आप तो बदचलन हो गए तो फिर शर्मा जी क्या खाकर बोल पाते कि ओ साथी मेरे.. हाथों में तेरे.. हाथों की अब गिरह दी ऐसे की टूटे ये कभी ना..


बहरहाल गीत की परिस्थिति फिल्म में भले ना बन पाई हो राजशेखर के लिखे बेहतरीन बोलों और सोनू निगम की गायिकी ने इस गीत का दाखिला संगीतमाला में करा ही दिया। बिहार के मधेपुरा के एक किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले हुनरमंद राजशेखर के मुंबई पहुँचने की कहानी तो आपको यहाँ मैं पहले ही बता चुका हूँ। पिछले साल बिहार के चुनावों में बिहार में बहार हो, नीतीशे कुमार हो का उनका गीत खासा लोकप्रिय हुआ। बचपन में माँ पापा से नज़रे बचाकर पन्द्रह  सोलह घंटे रेडियो सुनने वाले इस बालक के लिखे गाने लोग उसी रेडियो पर बड़े चाव से सुन रहे हैं।

ज़िदगी का खट्टा मीठा सफ़र अपने प्रियतम के साथ गुजारने की उम्मीद रखते इस गीत की सबसे प्यारी पंक्तियाँ मुझे वो लगती हैं जब राजशेखर कहते हैं..

हम जो बिखरे कभी
तुमसे जो हम उधड़े कहीं
बुन लेना फिर से हर धागा
हम तो अधूरे यहाँ
तुम भी मगर पूरे कहाँ
करले अधूरेपन को हम आधा

सच अपने प्रिय से ऐसी ही उम्मीद तो दिल में सँजोए रखते हैं ना हम !

संगीतकार क्रस्ना सोलो का नाम अगर आपको अटपटा लगे तो ये बता दूँ कि वो ये उनका ख़ुद का रचा नाम है ताकि जब वो अपने विश्वस्तरीय संगीतज्ञ बनने का सपना पूरा कर लें तो लोगों को उनके नाम से ख़ुद को जोड़ने में दिक्कत ना हो। वैसे माता पिता ने उनका नाम अमितव सरकार रखा था। क्रस्ना ने इस गीत की जो धुन रची है वो सामान्य गीतों से थोड़ी हट के है और इसीलिए उसे मन तक उतरने में वक़्त लगता है। मुखड़े के बाद का संगीत संयोजन गीत के बोलों जितना प्रभावी नहीं है। रही गायिकी की बात तो कठिन गीतों को चुनौती के रूप में स्वीकार करना सोनू निगम की फितरत रही है। इस गीत में बदलते टेम्पो को जिस खूबसूरती से उन्होंने निभाया है वो काबिले तारीफ़ है। तो आइए सुनें ये गीत..

 

ओ साथी मेरे.. हाथों में तेरे..
हाथों की अब गिरह दी ऐसे
की टूटे ये कभी ना..

चल ना कहीं सपनों के गाँव रे
छूटे ना फिर भी धरती से पाँव रे
आग और पानी से फिर लिख दें वो वादे सारे
साथ ही में रोए हँसे, संग धूप छाँव रे
ओ साथी मेरे..

हम जो बिखरे कभी
तुमसे जो हम उधड़े कहीं
बुन लेना फिर से हर धागा
हम तो अधूरे यहाँ
तुम भी मगर पूरे कहाँ
कर ले अधूरेपन को हम आधा
जो भी हमारा हो मीठा हो या खारा हो
आओ ना कर ले हम सब साझा
ओ साथी मेरे.. हाथों में तेरे ..

 गहरे अँधेरे या उजले सवेरे हों
ये सारे तो हैं तुम से ही
आँख में तेरी मेरी उतरे इक साथ ही
दिन हो पतझड़ के रातें या फूलों की
कितना भी हम रूठे पर बात करें साथी
मौसम मौसम यूँ ही साथ चलेंगे हम
लम्बी इन राहों में या फूँक के फाहों से
रखेंगे पाँव पे तेरे मरहम

आओ मिले हम इस तरह
आए ना कभी विरह
हम से मैं ना हो रिहा
हमदम तुम ही हो
हरदम तुम ही हो
अब है यही दुआ
साथी रे उम्र के सलवट भी साथ तहेंगे हम
गोद में ले के सर से चाँदी चुनेंगे हम
मरना मत साथी पर साथ जियेंगे हम
ओ साथी मेरे..  

वार्षिक संगीतमाला 2015 में अब तक

25. सपना है निज़ाम का अपने तुर्रम खान का Turram Khan
24. मूँछ बनानी हो कि मूँछ कटानी हो पतली गली आना Patli Gali Aana
23. हीर तो बड़ी सैड है Heer to Badi Sad Hai
22. तू जो है तो मैं हूँ Tu jo Hai Toh Main hoon
21. सूरज डूबा है यारों Suraj Dooba Hai Yaaron
20. रंग दे मुझे तू गेरुआ Rang De Mujhe Tu Gerua
19. अफ़गान जलेबी, माशूक फ़रेबी  Afghan Jalebi
18. दिल की मान के सीनाा तान के इश्क़ करेंगे Ishq Karenge
17. ओ साथी मेरे हाथों में तेरे O Sathi Mere
16. इश्क़ सच्चा वही जिसको मिलती नहीं मंजिलें Humari Adhoori Kahani
15. घुटता है दम दम Dum Ghutta Hai

Saturday, January 16, 2016

वार्षिक संगीतमाला 2015 पॉयदान # 18 : दिल की मान के, सीना तान के इश्क़ करेंगे, इश्क़ करेंगे Ishq karenge

कुछ संगीतकार, गीतकार व गायक ऐसे होते हैं जिनकी हर नई प्रस्तुति का हम सभी को बड़ी बेसब्री से इंतज़ार होता है। गुलज़ार, स्वानंद किरकिरे, प्रसून जोशी जिस फिल्म में हों उनसे ये उम्मीद हमेशा रहती है कि उनके शब्द जाल से कोई काव्यात्मक सा नग्मा निकलेगा । अमित त्रिवेदी, सचिन जिगर, प्रीतम के कुछ नए से संगीत संयोजन व रहमान, विशाल शेखर और एम एम करीम सरीखे संगीतकारों से कुछ मधुर गीतों की अपेक्षा तो रहती ही है। अगर गायिकी की बात करूँ तो सोनू निगम, राहत फतेह अली खाँ, अरिजित सिंह व श्रेया घोषाल भी ऐसी आशा जगाते हैं। पर इन गायकों के साथ एक और नाम है एक शख़्स का जिनकी आवाज़ का जादू ऐसा है कि उनके गीतों का इंतज़ार मुझे हमेशा होता है। ये आवाज़ है सोना महापात्रा की। 

सोना हिंदी फिल्मों में ज्यादातर अपने पति संगीतकार राम संपत की फिल्मों में ही गाती दिखाई पड़ती हैं। सत्यमेव जयते में उनके गाए गीतों को तो खासी लोकप्रियता मिली ही, पिछली संगीतमालाओं में उनके गाए गीत मन तेरा जो रोग है, अम्बरसरियानैना नूँ पता भी काफी सराहे गए। पिछले साल MTV के  कोक स्टूडियो में भी उन्होंने धमाल मचाया। पर इतना सब होते हुए भी मुझे हमेशा लगता है उनमें जितना हुनर है उस हिसाब से उनके और गाने हम संगीतप्रेमियों को सुनने को मिलने चाहिए।

इस साल उनका गाया जो गीत इस संगीतमाला में दाखिल हुआ है वो एक समूह गीत है। ये गीत है फिल्म बंगिस्तान का । अब जिस फिल्म का नाम इतना अटपटा हो उसके गीतों में हास्य की झलक तो मिलेगी ना। बंगिस्तान फिल्म का ये गीत लोगों को इश्क़ करने को बढ़ावा देता है और वो भी एक अलग और अनूठे अंदाज़ में।


इस गीत को लिखा है नवोदित गीतकार और मेरठ के बाशिंदे पुनीत कृष्ण ने। पुनीत को बचपन से ही कविता लिखने का शौक़ था। पहली नौकरी मुंबई में मिली तो अंदर ही अंदर फिल्म इंडस्ट्री में काम का सपना और तेजी से पैर फैलाने लगा। पहली बार तबादला होने पर पुनीत ने नौकरी ही छोड़ दी और दूसरों को नौकरी लगाने के लिए एक फर्म खोल ली। साथ ही वे फिल्म उद्योग के लोगों से भी मेल जोल बढ़ाते रहे। अपने दोस्तों के साथ मिलकर उन्होंने बंगिस्तान की कहानी लिखी जो निर्माता फरहान अख़्तर को पसंद आ गई। पटकथा के बहाने उन्हें गीत लिखने का भी मौका मिला और अब उसका नतीज़ा अब आपके सामने है। गीत में प्रयुक्त उनके दो भाव गीत को सुनने के बाद भी  याद रह जाते हैं। एक तो  तब जब वो रूमानी अंदाज़ में वो इश्क की चाशनी से दिल के कुओं से  भरने की बात करते हैं और  दूसरी ओर अपनी उन का हाथ पकड़ने से लाइफ के बैकग्राउंड स्कोर मे, सेंटी वायलिन बजने की बात होठों पर एक मुस्कुराहट छोड़ जाती है।

इस गीत में सोना मोहापात्रा का साथ दिया है अभिषेक नैलवाल और शादाब फरीदी की तिकड़ी ने। गीत को जिस जोश खरोश की जरूरत थी वो अपनी उर्जा से इस तिकड़ी ने उसमें भर दी है। राम संपत ने गीत का अंदाज़ कव्वालियों वाला रखा है। मुखड़े और इंटल्यूड्स में राम हारमोनियम का खूबसूरत प्रयोग करते हैं खासकर तीसरे मिनट के बाद आने वाले टुकड़े में। तो आप भी थोड़ा इश्क़ कर लीजिए ना इस गीत से..




चढ़ के ऊँची दीवारों पे, हम ऍलान करेंगे
दिल की सुनने वालो से ही, हम पहचान करेंगे
और नहीं कुछ पढना हमको, हम तो हीर पढेंगे
इश्क चाशनी से हम, अपने दिल के कुएँ भरेंगे
अरे और नहीं कुछ पढना हमको, हम तो हीर पढेंगे
इश्क चाशनी से हम, अपने दिल के कुएँ भरेंगे
जब भी उसका हम हौले से, हाथ ज़रा पकड़ेंगे
लाइफ के बैकग्राउंड स्कोर मे, सेंटी वायलिन बजा करेंगे
दिल की मान के, सीना तान के इश्क़ करेंगे, इश्क़ करेंगे
अरे दिल की मान के, सीना तान के इश्क़ करेंगे, इश्क़ करेंगे
हो इश्क़ करेंगे, इश्क़ करेंगे इश्क़ करेंगे

ख्वाब आँखों से यूँ छलके, हो साथी बन के दो पल के
हाँ तू भी देख ले यारा, हाँ मेरे साथ मे चलके
हो ऐसा आएगा एक दिन, हर कोई गायेगा एक दिन
जो तुझसे रूठ के बैठा, वो दर पे आएगा एक दिन
जिन गलियों से वो गुजरेगा, दिल अपना रख देंगे
रेड कार्पेट पे फ्लैश बल्बस ले, उसकी राह तकेंगे
दिल की मान के सीना तान के इश्क़ करेंगे....

तू राँझा हैं, तू मजनूँ हैं, जिधर देखू हाँ बस तू हैं
तू मिले तो झूम के नाचूँ, ख़ुशी का आलम हरसू हैं
ये तेरे हाथो की नरमी, ये तेरे बातो की नरमी
गले तेरे जो लग जाऊँ, तो मई और जून की गर्मी
हर जाड़ो मे हम थोड़ी सी, धूप ज़रा सेकेंगे
हैप्पी सा दि एंड होगा, सनसेट संग देखेंगे
दिल की मान के सीना तान के इश्क़ करेंगे....

ना तेरा हैं, ना मेरा हैं, ये जग तो रैन बसेरा हैं
ये काली रात जो जाए, तो फिर उजला सवेरा हैं
ये तेरे हाथ में प्यारे, कि बंधन तोड़ दे सारे
कि तू आज़ाद हो जाए, वो तेरे चाँद और तारे
सच कहते हैं हम तो, जब भी कोशिश ज़रा करेंगे
स्लो मोशन मे विद इमोशन, लाखो फूल झडेंगे
हम बन्दे हैं बंगिस्तान के, इश्क करेंगे, इश्क करेंगे
अरे दिल की मान के सीना तान के इश्क़ करेंगे....

वार्षिक संगीतमाला 2015 में अब तक

25. सपना है निज़ाम का अपने तुर्रम खान का Turram Khan
24. मूँछ बनानी हो कि मूँछ कटानी हो पतली गली आना Patli Gali Aana
23. हीर तो बड़ी सैड है Heer to Badi Sad Hai
22. तू जो है तो मैं हूँ Tu jo Hai Toh Main hoon
21. सूरज डूबा है यारों Suraj Dooba Hai Yaaron
20. रंग दे मुझे तू गेरुआ Rang De Mujhe Tu Gerua
19. अफ़गान जलेबी, माशूक फ़रेबी  Afghan Jalebi
18. दिल की मान के सीनाा तान के इश्क़ करेंगे Ishq Karenge
17. ओ साथी मेरे हाथों में तेरे O Sathi Mere
16. इश्क़ सच्चा वही जिसको मिलती नहीं मंजिलें Humari Adhoori Kahani
15. घुटता है दम दम Dum Ghutta Hai

Friday, January 15, 2016

वार्षिक संगीतमाला 2015 पॉयदान # 19 : अफ़गान जलेबी, माशूक फ़रेबी .. Afghan Jalebi

वार्षिक संगीतमाला के दो हफ्तों के सफ़र को पार कर हम जा पहुँचे है इस गीतमाला की उन्नीस वीं सीढ़ी पर। यहाँ जो गीत बैठा है वो मेरा इस साल का चहेता डॉन्स नंबर है। जब भी ये गीत सुनता है मन झूमने को कर उठता है। ये गीत है फिल्म फैंटम का और इसके संगीतकार हैं प्रीतम। 

आजकल जो गाने थिरकने के लिए बनाए जाते हैं उसमें ध्यान बटोरने के अक़्सर भोंडे शब्दों का इस्तेमाल जनता जनार्दन में सस्ती लोकप्रियता हासिल करने में होता रहा है। मेरा मानना है कि नृत्य प्रधान गीत भी अच्छे शब्दों के साथ उतना ही प्रभावी हो सकता है। बंटी और बबली का गीत कजरारे कजरारे तेरे काले काले रैना जो एक ऐसा ही गीत था । अफ़गान जलेबी में भी शब्दों का चयन साफ सुथरा है और इसका जानदार संगीत संयोजन इस गीत को संगीतमाला में स्थान दिलाने में कामयाब रहा है।

गीत तालियों की थाप से शुरु होता है और फिर अपनी लय को पकड़ लेता है जिससे श्रोता एक बार बँधता है तो फिर बँधता ही चला जाता है। अमिताभ भट्टाचार्य ने फिल्म के माहौल के हिसाब से गीत में उर्दू के शब्दों का इस्तेमाल किया है। प्रीतम ने इस गीत को कई गायकों से थोड़ी बहुत फेर बदल के साथ गवाया है। पर जो वर्सन में आपको सुनाने जा रहा हूँ वो पाकिस्तान के गायक सैयद असरार शाह ने गाया है। प्रीतम ने असरार  की आवाज़ कोक स्टूडियो पर सुनी और इस गीत के लिए उन्हें चुन लिया। असरार कहते हैं कि इस गीत को गाना उन्होंने इसलिए स्वीकार किया क्यूँकि इसमें नायिका की खूबसूरती को एक तरीके से उभारा गया है और अल्लाह की बनाई किसी चीज़ की तारीफ़ करना ख़ुदा की ही इबादत करना है।

अमिताभ भट्टाचार्य का ये गीत रोमांटिक से ज्यादा नटखट गीतों में गिना जाएगा जिसके सहज बोलों में हल्का सा हास्य का पुट भी है। इसलिए एक ओर तो गीत में बंदूक दिखा दिखा के प्यार करने वाली नायिका की उलाहना करते हैं तो दूसरी ओर अपनी दाल नहीं गलने पर ख़्वाज़ा जी से शिकायत लगाने की भी बात करते हैं। तो आइए सुनते हैं ये मज़ेदार नग्मा

 


मक़तूल ज़िगर1 या बाबा, क़ातिल है नज़र या बाबा
इक माहजबीं2 या बाबा, इक नूरे ए नबी या बाबा
रब की रुबाई3 या बाबा, या है तबाही या बाबा
गर्दन सुराही या बाबा, बोली इलाही या बाबा
अफ़गान जलेबी, माशूक फ़रेबी
घायल है तेरा दीवाना, भाई वाह,  भाई वाह

1 वो हृदय जो छलनी हो 2. चंद्रमा के समान मुख वाली यानि बेहद सुंदर 3. भगवान की कविता

बन्दूक दिखा के क्या प्यार करेगी
चेहरा भी कभी दिखाना भाई वाह
भाई वाह भाई वाह भाई

ओ.. देख दराज़ी 4, ओ बंदा नमाज़ी
खेल के बाज़ी वल्लाह खामख्वाह
अब ठहरा ना किसी काम का वल्लाह वल्लाह
मीर का कोई वल्लाह, शेर सुना के वल्लाह
घूँट लगा के वल्लाह जाम का..मैं रहा खान महज़ नाम का

4 शारीरिक बनावट

ओये लख्त ए जिगर5 या बाबा
ओये नूर ए नज़र6 या बाबा
एक तीर है तू या बाबा, मैं चाक ज़िगर या बाबा
बन्दों से नहीं तो, अल्लाह से डरेगी
वादा तो कभी निभाना भाई वाह
भाई वाह भाई वाह भाई
बन्दूक दिखा दिखा के क्या प्यार करेगी...
चेहरा भी कभी दिखाना भाई वाह, भाई वाह

5. दिल का टुकड़ा 6 आँख की रोशनी

ख्वाज़ाजी की पास तेरी चुगली करूँगा
मैं तेरी चुगली करुँगा, हाँ तेरी चुगली करूँगा
अगूँठी में क़ैद तेरी उँगली करूँगा,
मैं तेरी चुगली करुँगा, हाँ तेरी चुगली करूँगा

गुले गुलज़ार  या बाबा, मेरे सरकार या बाबा
बड़े मंसूब या बाबा, तेरे रुखसार7 या बाबा
हाय शमशीर8 निगाहें, चाबुक सी अदाएँ
नाचीज़ पे ना चलाना भाई वाह भाई वाह
 

7..गाल 8. तलवार

बन्दूक दिखा दिखा के क्या प्यार करेगी
चेहरा भी कभी दिखाना भाई वाह, भाई वाह
 

वार्षिक संगीतमाला 2015 में अब तक

25. सपना है निज़ाम का अपने तुर्रम खान का Turram Khan
24. मूँछ बनानी हो कि मूँछ कटानी हो पतली गली आना Patli Gali Aana
23. हीर तो बड़ी सैड है Heer to Badi Sad Hai
22. तू जो है तो मैं हूँ Tu jo Hai Toh Main hoon
21. सूरज डूबा है यारों Suraj Dooba Hai Yaaron
20. रंग दे मुझे तू गेरुआ Rang De Mujhe Tu Gerua
19. अफ़गान जलेबी, माशूक फ़रेबी  Afghan Jalebi
18. दिल की मान के सीनाा तान के इश्क़ करेंगे Ishq Karenge
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16. इश्क़ सच्चा वही जिसको मिलती नहीं मंजिलें Humari Adhoori Kahani
15. घुटता है दम दम Dum Ghutta Hai
 

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