Monday, July 27, 2015

जुस्तजू जिसकी थी उसको तो न पाया हमने .. उमराव जान की वो भावपूर्ण ग़ज़ल Justuju jis ki thi usko to na paya humne..

पिछले हफ्ते आपसे ख़य्याम साहब और फिल्मी ग़ज़लों के उस छोटे परंतु स्वर्णिम दौर की बात हो रही थी जिसमें दो तीन सालों के बीच बाजार, उमराव जान और अर्थ जैसी फिल्में अपने अलहदा संगीत की वज़ह से जनमानस के हृदय में अमिट छाप छोड़ गयीं।

डिस्को संगीत और मार धाड़ वाली फिल्मों के उस दौर में जब मुजफ्फर अली ख़य्याम साहब के पास लखनऊ की मशहूर तवायफ़ उमराव जान की पटकथा सामने लाए तो उन्होंने इसे चुनौती की तरह लिया। मुजफ्फर अली ख़य्याम से पहले जयदेव को फिल्म के लिए बात कर चुके थे और संगीतकार जयदेव ने लता से फिल्म के गीत गवाने का निश्चय भी कर लिया था। पर होनी को तो कुछ और मंज़ूर था । पारिश्रमिक के लिए बात अटकी और फिल्म ख़य्याम की झोली में आ गिरी।


फिल्म की  कहानी के अनुरूप ग़ज़लों को लिखने के लिए एक ख़ालिस उर्दू  शायर की जरूरत थी। लिहाज़ा  उसके लिए शहरयार साहब चुन लिए गए। पर इन ग़ज़लों को गाने के लिए आशा जी को चुनना थोड़ा चौंकाने वाला जरूर था।  आशा जी उस दौर तक चुलबुले, शोख़ गीतों के लिए ही ज्यादा जानी जाती थीं। संज़ीदा गीतों को भी उन्होंने मिले मौकों में अच्छी तरह निभाया था पर ग़ज़ल के फ़न  में उनका कोई तजुर्बा नहीं था।

Khayyam with Asha Bhosle
ख़य्याम साहब से ये प्रश्न हमेशा से पूछा जाता रहा कि आख़िर उन्होंने लता जी की जगह आशा जी को क्यूँ चुना ? उनका कहना था कि उन्हें ये भय सता रहा था कि अगर उन्होंने इस फिल्म के लिए लता की आवाज़ का इस्तेमाल किया होता तो उनकी गायिकी की तुलना  पाकीज़ा में गाए उनके बेमिसाल मुज़रों से की जाने लगती जो वो नहीं चाहते थे । दूसरे उमराव जान के किरदार के लिए उन्हें आशा की आवाज़ ज्यादा मुफ़ीद लग रही थी। पर उनकी आवाज़ को तवायफ़ के किरदार की तरह प्रभावी बनाने के लिए उन्होंने उनके स्वाभाविक सुर से आधा सुर नीचे गवाया। आशा जी इस बदलाव से खुश तो नहीं थीं पर जब उन्होंने इसका नतीजा देखा तो वो समझ गयीं कि ख़य्याम की सोच बिल्कुल सही थी।

वैसे तो इस फिल्म में प्रयुक्त सभी ग़ज़लें मकबूल हुईं। पर जहाँ दिल चीज़ क्या है...,  ये क्या जगह है दोस्तों...., इन आँखो की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं.... का संगीत एक मुजरे के रूप में प्रस्तुत किया गया वहीं जुस्तज़ू जिसकी थी उसको तो ना पाया हमने.... का फिल्मांकन और संगीत एक खालिस ग़ज़ल का रखा गया। फिल्म देखते हुए तो मुझे इसके सारे नग्मे दिलअजीज़ लगते हैं पर कहानी के इतर दर्द में डूबी ये ग़ज़ल गाहे बगाहे ज़ेहन में आती रहती है।

अब  फिल्म की कहानी में इस ग़ज़ल की परिस्थिति को ज़रा याद कीजिए।  उमराव जान एक अच्छे घर से अगवा कर के कोठे पर बैठा दी गयीं। वहाँ नवाब साहब से मुलाकात हुई, प्रेम हुआ। नवाब नर्म दिल थे, मोहब्बत उन्हें भी थी पर अपनी माँ से बगावत करने की हिम्मत नहीं थी। शादी किसी और से कर ली और छोड़ दिया उमराव को उसके हाल पर तनहा। उमराव उन्हीं नवाब साहब के सामने इस ग़ज़ल के माध्यम से अपनी तनहा ज़िदगी की गिरहें खोलती हैं।

जुस्तजू जिसकी थी उसको तो न पाया हमने
इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हमने

तुझ को रुसवा न किया ख़ुद भी पशेमाँ न हुए
इश्क़ की रस्म को इस तरह निभाया हमने 

शहरयार साहब की यूँ तो पूरी ग़ज़ल ही कमाल की है पर इसके ये दो शेर मुझे खास पसंद हैं। एक में उमराव कहती हैं ना तो मैंने तुम्हारी बेवफाई पर सवाल उठाए ना ही ख़ुद पश्चाताप की अग्नि में जली। बस इसी क़ायदे से अपनी मोहब्बत निभाती रही।

कब मिली थी कहाँ बिछड़ी थी हमें याद नहीं
ज़िन्दगी तुझ को तो बस ख़्वाब में देखा हमने 

तेरे वज़ूद में मैंने अपनी ज़िंदगी की झलक देखी थी। अब तो ये भी याद नहीं कि वो झलक कब आँखों से ओझल हो गई। अब तो लगता है  कि तेरा, मेरी ज़िदगी में आना बस एक ख़्वाब बनकर ही रह गया।
 
ऐ 'अदा' और सुनाए भी तो क्या हाल अपना
उम्र का लम्बा सफ़र तय किया तनहा हमने

तो आइए सुनते हैं आशा जी को उनकी इस भावपूर्ण ग़ज़ल में


दरअसल फिल्म में शहरयार की शायरी का प्रयोग यूँ हुआ है कि कहानी उस में ख़ुद बा ख़ुद बयाँ हो जाती है। अब यहीं देखिए ना ग़ज़ल के पहले संवादों के बीच शहरयार की एक दूसरी ग़ज़ल के कुछ अशआर कितनी खूबसूरती से पिरोये गए हैं


तुझसे बिछुड़े है तो अब किससे मिलाती है हमें
जिन्दगी देखिये क्या रंग दिखाती है हमें 

गर्दिशे-वक़्त का कितना बड़ा अहसाँ है कि आज
ये ज़मी चाँद से बेहतर नज़र आती है हमें

वैसे क्या आपको पता है कि जुस्तज़ू जिसकी थी ..शहरयार पहले ही लिख चुके थे। पर इस फिल्म के लिए अपने मतले को वही रखते हुए उन्होंने अपनी ग़ज़ल में थोड़ा रद्दोबदल कर उसे वे  इस रूप में ले आए। वैसे भी मक़ते में उमराव जान का तख़ल्लुस ''अदा'' लाने के लिए बदलाव जरूरी था। बहरहाल इस फिल्म के संगीत ने आम और खास सब से वाहवाहियाँ बटोरी। ख़य्याम को सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक के लिए फिल्मफेयर और राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। आशा जी को सर्वश्रेष्ठ गायिका का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला और रही शहरयार की बात  तो वे इसके बाद जहाँ भी गए उनके साथ उमराव जान के गीतों के लेखक का तमगा साथ गया। अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था
"मैं AIIMS में जाता हूँ तो वहाँ मुझे लाइन नहीं लगानी पड़ती़। डॉक्टर भी कार्ड देखे बिना बड़ी खुशी से मुआयना कर देता है। ट्रेन या हवाई जहाज में रिजर्वेशन का मसला हो या कोई और उमराव जान के गानों ने मेरी बड़ी मदद की है। मेरे बच्चों से अक़्सर ये सवाल किया जाता है कि आप उसी शहरयार के बच्चे हैं जिसने उमराव जान के गाने लिखे हैं?"

Friday, July 17, 2015

बशर नवाज़ : करोगे याद तो हर बात याद आयेगी ! Bashar Nawaz .. Karoge yaad to har baat

अस्सी का दशक हिंदी फिल्मी गीतों के लिए कोई यादगार दशक नहीं रहा। पंचम, फिर लक्ष्मीकांत प्यारेलाल से हिंदी गीतों को संगीतबद्ध करने की कमान बप्पी दा तक पहुँची तो लोग यहाँ तक सोचने लगे कि क्या गीतों के साथ जुड़ी संवेदना और मधुरता कभी लौटेगी? पर इस दौर में फूहड़ फिल्मी गीतों द्वारा पैदा किया गया शून्य ग़ज़लों को आम जनों के करीब ले आया। ग़ज़लों को मिली इसी स्वीकार्यता ने संवेदनशील और लीक से हटकर फिल्में बनाने वाले निर्देशकों को अपनी फिल्मों में ग़ज़लों और नज़्मों के इस्तेमाल के लिए प्रेरित किया।

अस्सी के दशक की शुरुआत में तीन ऐसी फिल्में आयीं जो फिल्मी ग़ज़लों की सफलता के लिए मील का पत्थर साबित हुई। ये फिल्में थी अर्थ, बाजार और उमराव जान। उस ज़माने में शायद ही कोई संगीत प्रेमी होगा जिसके पास इन तीनों फिल्मों के कैसेट्स ना रहे हों। जहाँ अर्थ का संगीत ख़ुद ग़ज़ल सम्राट कहे जाने वाले जगजीत सिंह ने दिया था वहीं उमराव जान और बाजार के संगीतकार ख़य्याम थे। 

ख़य्याम साहब ने इन फिल्मों में नामाचीन शायरों जैसे मीर तकी मीर, मिर्जा शौक़ शहरयार और मखदूम मोहिउद्दीन की शायरी का इस्तेमाल किया। पर उनकी इस फेरहिस्त में एक अपेक्षाकृत गुमनाम शायर का नाम और भी था। जानते हैं कौन थे वो ? ये शायर थे बशरत नवाज़ खान जिन्हें दुनिया बशर नवाज़ के नाम से जानती है। सन 1935 में औरंगाबाद, महाराष्ट्र में जन्मे बशर नवाज़ ने पिछले हफ्ते अस्सी वर्ष की उम्र में इस दुनिया से विदाई ली।


बशर नवाज़ अपने समकालीनों की तरह युवावस्था में वामपंथी विचारधारा (जो कि वर्ग रहित समाज की परिकल्पना पर आधारित थी) से प्रभावित रहे। पिछले पाँच दशकों से वो उर्दू कविता को अपनी कलम से सींचते रहे। कविता के आलावा समालोचना, नाट्य लेखन जैसी विधाओं में भी हाथ आज़माया। दूरदर्शन के धारावाहिक अमीर खुसरो के लिए पटकथा लिखी और बाजार के आलावा लोरी और जाने वफ़ा जैसी फिल्मों के लिए गीत भी लिखे। पर हिंदी फिल्म संगीत में वो अपनी भागीदारी को बाजार फिल्म के गीत करोगे याद तो हर बात याद आयेगी ...से वो हमारे हृदय में हमेशा हमेशा के लिए अंकित कर गए।

ये तो हम सभी जानते हैं कि ज़िंदगी की पटकथा को तो ऊपर वाला रचता है। जाने कब कैसे किसी से मिलाता है। साथ बिताए पलों की खुशबू से दिल में अरमान जगने ही लगते हैं कि एक ही झटके में अलग भी कर देता है । फिर छोड़ देता है अकेला अपने आप से, अपने वज़ूद से जूझने के लिए। साथ होती हैं तो बस यादें जो उन गुजरे लमहों की कसक को रह रह कर ताज़ा करती रहती हैं।

फिल्म के किरदारों के बीच की कुछ ऐसी ही परिस्थितियों को नवाज़ साहब ने चाँद, बादल, बरसात और दीपक जैसे बिंबों में समेटा है। गीत में शीशे की तरह चमकते चाँद के बीच भटकते बादलों में बनते चेहरे की उनकी सोच हो या फिर जल जल कर पिघलती शम्मा से वियोग में डूबे दिल की तुलना..भूपेंद्र की आवाज़ में इन लफ्जों को सुन मन उदास फिर और उदास होता चला जाता है.. तो आज बशर नवाज़ साहब को याद करते हुए ये गाना फिर से सुन लीजिए.. 



करोगे याद तो हर बात याद आयेगी
गुजरते वक्त की, हर मौज़ ठहर जायेगी

ये चाँद बीते जमानों का आईना होगा
भटकते अब्र में चेहरा कोई बना होगा
उदास राह कोई दास्तां सुनाएगी

बरसता भीगता मौसम धुआँ धुआँ होगा
पिघलती शम्मो पे दिल का मेरे गुमाँ होगा
हथेलियों की हिना याद कुछ दिलायेगी

गली के मोड़ पे सूना सा कोई दरवाजा
तरसती आँखों से रस्ता किसी का देखेगा
निगाह दूर तलक जा के लौट आयेगी

बशर साहब की शायरी से ज्यादा रूबरू तो मैं नहीं हुआ हूँ। पर उनको जितना पढ़ पाया हूँ उसमें उनकी लिखी ये ग़ज़ल मुझे बहुत प्यारी लगती है। आज जब वो हमारे बीच नहीं है अपनी आवाज़ के माध्यम से उनके हुनर, उनकी शख़्सियत को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करना चाहता हूँ ..

बहुत था ख़ौफ जिस का फिर वही किस्सा निकल आया
मेरे दुख से किसी आवाज़ का रिश्ता निकल आया

वो सर से पाँव तक जैसे सुलगती शाम का मंज़र
ये किस जादू की बस्ती में दिल तन्हा निकल आया

जिन आँखों की उदासी में बयाबाँ1 साँस लेते हैं
उन्हीं की याद में नग़्मों का ये दरिया निकल आया

सुलगते दिल के आँगन में हुई ख़्वाबों की फिर बारिश
कहीं कोपल महक उट्ठी, कहीं पत्ता निकल आया

पिघल उठता है इक इक लफ़्ज़ जिन होठों की हिद्दत2 से
मैं उनकी आँच पी कर और सच्चा निकल आया

गुमाँ था जिंदगी बेसिमत ओ बेमंजिल बयाबाँ है
मगर इक नाम पर फूलों भरा रस्ता निकल आया

1. वीरानियाँ, 2. तीखापन
 

Tuesday, July 07, 2015

जब ग़ज़ले और नज़्में बनी किसी गीत की प्रेरणा : तू किसी रेल सी गुज़रती है .. Tu kisi Rail Si .. Masaan

हिंदी फिल्मों में गीतकार पुराने दिग्गज़ों की कालजयी कृतियों से प्रेरणा लेते रहे हैं और जब जब ऐसा हुआ है परिणाम ज्यादातर बेहतरीन ही रहे हैं। पिछले एक दशक के हिंदी फिल्म संगीत में ऐसे प्रयोगों से जुड़े दो बेमिसाल नग्मे तो तुरंत ही याद आ रहे हैं। 2007 में एक फिल्म आई थी खोया खोया चाँद और उस फिल्म में गीतकार स्वानंद ने  मज़ाज लखनवी की बहुचर्चित नज़्म आवारा से जी में आता है, मुर्दा सितारे नोच लूँ... का बड़ा प्यारा इस्तेमाल किया था। फिर वर्ष 2009 में प्रदर्शित फिल्म गुलाल में पीयूष मिश्रा ने फिल्म प्यासा में साहिर के लिखे गीत ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है.. को अपने लिखे गीत ओ री दुनिया... में उतना ही सटीक प्रयोग किया था। इसी कड़ी में कल जुड़ा है इसी महीने के अंत में प्रदर्शित होने वाली फिल्म मसान का ये प्यारा नग्मा जिसके बोल लिखे हैं नवोदित गीतकार वरुण ग्रोवर ने।


ये वही वरूण ग्रोवर हैं जिन्होंने कुछ ही महीने पहले फिल्म दम लगा के हैस्सा में अपने लिखे गीत ये मोह मोह के धागे... के माध्यम से हम सभी संगीतप्रेमियों के दिल में अपनी जगह बना ली थी। दरअसल इस तरह के गीतों को फिल्मों के माध्यम से आम जनता और खासकर आज की नई पीढ़ी तक पहुँचाने के कई फायदे हैं। एक तो जिस कवि या शायर की रचना का इस्तेमाल हुआ है उसके लेखन और कृतियों के प्रति लोगों की उत्सुकता बढ़ जाती है। दूसरी ओर गायक, गीतकार और संगीतकार ऐसे गीतों पर पूरी ईमानदारी से मेहनत करते हैं ताकि मूल रचना पर किसी तरह का धब्बा ना लगे। यानि दोनों ओर से श्रोताओं की चाँदी !

वरुण ने मसान के इस गीत के लिए हिंदी के सुप्रसिद्ध ग़ज़लकार दुष्यन्त कुमार की रचना का वो शेर इस गीत के लिए लिया है जिसे लोग अनोखे बिंबो के लिए हमेशा याद रखते हैं यानि तू किसी रेल सी गुज़रती है,..मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ

बनारस की गलियों में दो भोले भाले दिलों के बीच पनपते इस फेसबुकिये प्रेम को जब वरुण अपने शब्दों के तेल से छौंकते हैं तो उसकी झाँस से सच ये दिल रूपी पुल थरथरा उठता है। गीत के बोलों में छुपी शरारत खूबसूरत रूपकों के ज़रिए  उड़ा ले जाती है प्रेम के इस बुलबुले को उसकी स्वाभाविक नियति के लिए.

 

तू किसी रेल सी गुज़रती है,
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ


तू भले रत्ती भर ना सुनती है... 
मैं तेरा नाम बुदबुदाता हूँ..

किसी लंबे सफर की रातों में
तुझे अलाव सा जलाता हूँ


काठ के ताले हैं, आँख पे डाले हैं
उनमें इशारों की चाभियाँ लगा
रात जो बाकी है, शाम से ताकी है
नीयत में थोड़ी खराबियाँ लगा.. खराबियाँ लगा..

मैं हूँ पानी के बुलबुले जैसा
तुझे सोचूँ तो फूट जाता हूँ

तू किसी रेल सी गुज़रती है.....थरथराता हूँ


बतौर गायक स्वानंद की आवाज़ को मैं हजारों ख्वाहिशें ऐसी, परीणिता, खोया खोया चाँद जैसी फिल्मों में गाये उनके गीतों से पसंद करता आया हूँ। इस बार भी पार्श्व में गूँजती उनकी दमदार आवाज़ मन में गहरे पैठ कर जाती है। इंडियन ओशन ने भी गीत के बोलों को न्यूनतम संगीत संयोजन से दबने नहीं दिया है। तो आइए सुनते हैं नए कलाकारों श्वेता त्रिपाठी और विकी कौशल पर फिल्माए ये नग्मा..




गीत तो आपने सुन लिया पर दुष्यन्त कुमार की मूल ग़ज़ल का उल्लेख ना करूँ तो बात अधूरी ही रह जाएगी।  जानते हैं पूरी ग़ज़ल में कौन सा मिसरा मुझे सबसे ज्यादा पसंद है? ना ना पुल और रेल नहीं बल्कि ग़ज़ल का मतला एक जंगल है तेरी आँखों में..मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ.. :)। ना जाने इसे गुनगुनाने हुए मन इतना खुश खुश सा क्यूँ महसूस करता है। वैसे भी आँखों के समंदर में डूबना कौन नहीं पसंद करता पर यहाँ तो खुला समंदर नहीं पर गहराता जंगल है जिसके अंदर के अदृश्य पर घने राजों को जानने के लिए मन भटकने को तैयार बैठा है।

दुष्यन्त कुमार की इस ग़ज़ल को अपनी आवाज़ से सँवारा था पटियाला में जन्मी पार्श्व गायिका मीनू पुरुषोत्तम ने। फिल्म ताज महल से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाली मीनू ने बात एक रात की, ये रात फिर ना आएगी, दाग, हीर राँझा, दो बूँद पानी आंदोलन जैसी फिल्मों में गाने गाए। तो आइए उनकी आवाज़ में इस ग़जल को भी सुन लिया जाए..



एक जंगल है तेरी आँखों में
मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ

मैं तुझे भूलने की कोशिश में
आज कितने क़रीब पाता हूँ

तू किसी रेल सी गुज़रती है,
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ

हर तरफ एतराज़ होता है
मैं अगर रोशनी में आता हूँ

एक बाज़ू उखड़ गया जबसे
और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ

वैसे ''साये में धूप'' जो दुष्यंत जी की ग़ज़लों का संकलन है में कुछ और अशआर हैं, एक तो मतला

मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ
वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ

और दूसरा आखिरी शेर..
कौन ये फ़ासला निभाएगा
मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ

Sunday, June 28, 2015

नीला स्कार्फ ... Neela Scarf by Anu Singh Choudhary

स्कूल के ज़माने तक जो कहानियाँ पढ़ीं सो पढ़ी पर उसके बाद कॉलेज में गुजारे वक़्त से लेकर आज तक कहानियों से ज्यादा उपन्यास पढ़ने के प्रति मेरा रुझान रहा है। तो जो अब तक डेढ़ दो सौ किताबें पढ़ी हैं उनमें कहानी संग्रह का हिस्सा दहाई से कम ही रहा होगा। । कई कहानी संग्रह खरीद कर बस आलमारियों की शोभा बढ़ा रहे हैं। मेरी इस प्रवृति की वजह शायद ये है कि मुझे हर पात्र के चरित्र को अंदर तक समझने का हठ उपन्यास के विस्तार में ही मिल पाता है


इसीलिए पिछले दिसंबर में जब अनु सिंह चौधरी की किताब नीला स्कार्फ मुझे मिली तो आदतन दो कहानियों के बाद पढ़ने का सिलसिला रुक ही गया। फिर फरवरी के आख़िरी हफ्ते में अनु जी का एक साक्षात्कार देखा तो उनके पात्रों पर हुई चर्चा ने किताब की ओर फिर ध्यान आकृष्ट किया। राँची से कोयम्बटूर आने जाने में जो पाँच छः घंटे यात्रा में बीते वो पुस्तक को पूरा खत्म करने के लिए पर्याप्त निकले।

अनु  के लेखन से मैं उनके ब्लॉग मैं घुमंतू से पूर्व परिचित था। पर बतौर कहानीकार उन्हें जानने का मेरा ये पहला अनुभव है। इस संग्रह की कुल दर्जन भर कहानियों में लगभग तीन चौथाई कहानियों में मुख्य किरदार के रूप में एक नारी चरित्र है। अच्छी बात ये है कि इन चरित्रों में एकरूपता नहीं है। उनकी नायिकाएँ समाज के अलग अलग वर्गों और उम्र के हर पड़ावों से आती हैं। इसी वजह से कथानक का परिदृश्य  तेजी से बदलता जाता है और पाठकों को पुस्तक से बाँध कर रखता है।

जहाँ बिसेसर बो की प्रेमिका और देखवकी की बोलचाल में ठेठ बिहारी परिवेश की झलक मिलती है वहीं रूममेट, लिव इन और प्लीज़ डू नॉट डिस्टर्ब में आप अपने आप को शहरी हिंग्लिश में बात करते चरित्रों के बीच  घिरा पाते हैं। पर अनु की खूबी है उनकी भाषा पात्र के हिसाब से अपना लहजा बदलती रहती है। देखवेकी की सुशीला चाची के इन बिहारी बोलों को ही पढ़ लीजिए। किस तरह बेटी की शादी तय होने की भड़ास लड़के व उसके परिवार पर निकाल रही हैं..


व्यक्तिगत रूप से हिंदी कथ्य में अंग्रेजी के बेजा इस्तेमाल का मैं विरोधी रहा हूँ और इस किताब में कहीं कहीं ऐसे प्रयोग खटकते हैं जहाँ चरित्रों के हिसाब से भी अंग्रेजी के बजाए हिंदी का शब्द लिया जा सकता था।

तो आइए बात करते हैं इस किताब में सम्मिलित कहानियों की। रूममेट छोटे शहरों से संघर्ष कर महानगरीय जिंदगी में पहचान बनाने वाली लड़कियों की कहानी है जो अधपके रिश्तों और अरमानों को मूर्त रूप देने में एक दूसरे का संबल बनती हैं।  नीला स्कार्फ और लिव इन में लेखिका शादी के पहले और बाद के बनते बिगड़ते रिश्तों की पड़ताल करती नज़र आती हैं। पर जहाँ नीला स्कार्फ का स्वर धीर गंभीर है वहीं लिव इन में आज के डिजिटल प्रेम को वे हल्के फुल्के पर रोचक अंदाज़ में चित्रित कर जाती हैं। थोपे गए रिश्ते के अनुरूप अपने आपको ढालती और अपनी इच्छाओं को दमित कर गृहस्थी की गाड़ी खींचती स्त्री की आंतरिक व्यथा का मार्मिक चित्रण उनकी कहानी मुक्ति में दिखता है। शादी के बाद घर और बच्चों की जिम्मेवारेयों के बीच ख़ुद को घुटता महसूस करती महिलाओं को  मर्ज जिंदगी इलाज ज़िंदगी में वे अपना कृत्रिम रंगीन संसार रचने को प्रेरित करती हैं।

पर इस संग्रह की सारी कहानियों मे मुझे बिसेसर बो की प्रेमिका, कुछ यूँ होना उसका और मुक्ति खास पसंद आयी पर वहीं सिगरेट का आखिरी कश और प्लीज डू नॉट डिस्टर्ब इस कथा संग्रह की मुझे दो कमजोर कड़ियाँ लगीं।

दरअसल बिसेसर बो का किरदार इस कहानी संग्रह का सबसे सशक्त किरदार है। अनु बिसेसर बो उर्फ चंपाकली का परिचय अपनी पुस्तक में कुछ यूँ देती हैं..


पर बिसेसर बो भले ही जमींदारों के घर में काम कर कर हाड़ मांस जलाती हो पर आत्मसम्मान की भावना  उसमें कूट कूट कर भरी है  तभी तो बड़े मालिक की गलत नीयत का शिकार बनने से पहले वो उनको  ऐसा करारा जवाब देती है कि उनके नीचे की जमीन खिसक जाती है।


बिसेसर बो की ये निर्भयता उसे उन सभी कुलीन पढ़ी लिखी महिलाओं से आगे खड़ा कर देती है जो थोपे गए समझौतों के बीच अपनी ज़िंदगी को घसीट रही हैं। इसीलिए किताब पढ़ लेने के बाद भी वो याद रह जाती है। कुछ यूँ होना उसका पढ़कर लगता है कि बतौर शिक्षक हम किसी छात्र को उसके प्रकट व्यवहार से ही उद्दंड या अनुशासनहीन की श्रेणी में नहीं रख सकते। छात्रों से बेहतर परिणाम के लिए पढ़ाई के आलावा उनके सामाजिक पारिवारिक परिवेश से जुड़ी समस्याओं का निराकरण भी उतना ही जरूरी है।

पाठक इस संग्रह की हर एक कहानी से पूरी तरह जुड़े ना जुड़े पर उसमें कहीं कुछ बातों को अपने दिल से निकलता पाता है। दूसरों में अपने अक्स को प्यार करने की बात हो या यात्रा में अपनी पुरानी यादों के सबसे करीब होने की ऐसी कई छोटी छोटी मन को छू जाती हैं।

कुल मिलाकर ये एक ऐसा कहानी संग्रह है जिसे पढ़ना निश्चय ही आपको रुचिकर लगेगा। इस पुस्तक का प्रकाशन हिंद युग्म ने किया है। पहले संस्करण की सफलता के बाद पुस्तक का दूसरा संस्करण शीघ्र ही बाजार में आ रहा है।  चलते चलते इस कथा संग्रह की कहानी लिव इन के कुछ अंशों से आपको रूबरू कराऊँगा जो आपके दिल को अवश्य गुदगुदाएँगे और लेखिका की सहज सरस लेखन शैली की ओर भी आपका ध्यान आकृष्ट करेंगे।

Friday, June 19, 2015

मैं क्यों प्यार किया करता हूँ? : गोपाल दास नीरज Main kyun pyar kiya karta hoon Gopal Das Neeraj

आदमी को आदमी बनाने के लिए
जिंदगी में प्यार की कहानी चाहि
और कहने के लिए कहानी प्यार की
स्याही नहीं, आँखों वाला पानी चाहिए...


गोपाल दास नीरज की इन पंक्तियों से कौन नहीं वाकिफ़ होगा। बिल्कुल सही कहा नीरज ने अगर हममें प्रेम का भाव नहीं हो तो फिर हम इंसान ही नही है। सच मानिए ज़िदगी का जितना हिस्सा इस भाव में डूबा रहे हम उतने ही स्नेहिल, खुशमिजाज़ व उर्जावान हो जाते हैं।  ऐसे में आप अपने से ज्यादा दूसरों के बारे में सोचते हैं। स्वार्थ की परछाई आपको छू भी नहीं पाती। संसार में आपके वज़ूद को एक वजह मिल जाती है। ये स्थिति आपको अपनी परिपूर्णता का अहसास दिलाती है। ऐसी अवस्था में दुखों से घिरा होने के बावजूद आप उसके प्रभावों से मुक्त रहते हैं ।

दूसरी ओर ये भी सच है कि प्रेम में हों तो  पीड़ा भी होती है। पर ये वो पीड़ा है जो आपको अश्रुविगलित करते हुए भी आपके मन आँगन को धो डालती है। आप उस व्यथा से गुजर कर अपने मन को पहले से अधिक निर्मल पाते हैं। सो प्रेम में पड़िए और बार बार पड़िए चाहे वो 
प्रेम बच्चों, नाते रिश्तादारों, संगी साथियों, सहचरों या जरूरतमंदों से ही की क्यूँ ना हो। 

हो सकता है आपको अब भी मेरे तर्क कुछ खास जम नहीं रहें हों कोई बात नहीं मेरी नहीं मानते ना सही गोपाल दास नीरज की बात तो मानेंगे ना आप तो चलिए आज उनका ये प्यारा सा गीत ही सुनवा देता हूँ। आवाज़ जरूर मेरी है..




सर्वस देकर मौन रुदन का क्यों व्यापार किया करता हूँ?
भूल सकूँ जग की दुर्घातें उसकी स्मृति में खोकर ही
जीवन का कल्मष धो डालूँ अपने नयनों से रोकर ही
इसीलिए तो उर-अरमानों को मैं छार किया करता हूँ


मैं क्यों प्यार किया करता हूँ?


कहता जग पागल मुझको, पर पागलपन मेरा मधुप्याला
अश्रु-धार है मेरी मदिरा, उर-ज्वाला मेरी मधुशाला
इससे जग की मधुशाला का मैं परिहार किया करता हूँ


मैं क्यों प्यार किया करता हूँ?


कर ले जग मुझसे मन की पर, मैं अपनेपन में दीवाना
चिन्ता करता नहीं दु:खों की, मैं जलने वाला परवाना
अरे! इसी से सारपूर्ण-जीवन निस्सार किया करता हूँ


मैं क्यों प्यार किया करता हूँ?


उसके बन्धन में बँध कर ही दो क्षण जीवन का सुख पा लूँ
और न उच्छृंखल हो पाऊँ, मानस-सागर को मथ डालूँ
इसीलिए तो प्रणय-बन्धनों का सत्कार किया करता हूँ


 मैं क्यों प्यार किया करता हूँ?

 (उर : दिल,  सर्वस : सर्वस्व,  कल्मष : मैल,  परिहार  : त्यागने की क्रिया )

Tuesday, June 09, 2015

सफलता के सोपान पर जब थे अनजान : खई के पान.. से छू कर मेरे मन को तक का सफ़र ! Anjaan the lyricist...

साठ के दशक में गीतकार अनजान की संघर्ष गाथा को तो पिछली पोस्ट में बयाँ कर ही चुका हूँ आज आपसे बाते करूँगा उनके उत्कर्ष काल की यानि सत्तर के आखिर से लेकर अस्सी का दशक की। ये वो दौर था जब हम बचपन से किशोरावस्था की ओर प्रवेश कर रहे थे। लिहाज़ा अनजान के लिखे उन नग्मों को अपनी आँखों के सामने लोकप्रिय होते देखने का सौभाग्य मिला था मुझे। जैसा कि पिछली पोस्ट में मैंने आपको बताया कि संगीतकार कल्याण जी आनंद जी के साथ फिल्म बंधन के बनते वक़्त अनजान की जो मुलाकात हुई वो उन्हें 1978 में आई फिल्म डॉन के साथ सफलता की नई ऊँचाइयों पर ले गई।



डॉन  के गाने भी कल्याण जी आनंद जी इंदीवर से लिखवाने की सोच रहे थे। इंदीवर ने उसका एक गीत ये मेरा दिल.. लिखा भी पर फिर किसी बात से उनके बीच अनबन हो गई और बाकी गाने अनजान की झोली में आ गए। अनजान ने इस मौके को पूरी तरह भुनाया। जिसका मुझे था इंतजार..... से लेकर खई के पान बनारसवाला... तक हर गली मोहल्ले में अनजान के गीत बजने लगे। खई के पान... .के पीछे की भी एक मजेदार कहानी है जिसे उनके पुत्र समीर कई साक्षात्कारों में बता चुके हैं।

हुआ यूँ कि अनजान किशोर कुमार को गीत के बोल लिखवा रहे थे भंग का रंग जमा हो चकाचक...। किशोर दा ने ये पंक्ति सुनी और अपनी कलम रख दी और कहा कि अनजान तुम ये कहाँ कहाँ के शब्द ढूँढ के लाते हो.. मैंने तो सारी ज़िदगी ये "चकाचक" शब्द नहीं सुना।
किशोर दा की अगली आपत्ति गीत के मुखड़े को लेकर थी। कहने लगे अनजान, मैं खई के नहीं, खा के पान बनारसवाला ही गाऊँगा। पूरे गाने को सुनने के बाद किशोर दा ने कल्याण जी से कहा भाई ये बड़ा कठिन गाना है, ऊपर से इतने अटपटे से शब्द हैं मैं तो इसे एक एक बार ही गाऊँगा अगर सही रहा तो तुम्हारा नसीब नहीं हुआ तो किशोर कुमार भाग जाएगा
रिकार्डिंग के ठीक पहले किशोर दा ने पूछा कि आप लोग पान खाते खाते बात कैसे करते हैं? आनन फानन में पान के बीड़े और पीकदान मँगवाए गए। सबने पान खाए और उनकी बात करने के अंदाज़ को किशोर ने परखा और हू बहू गाने में उतार दिया। इतनी सब नौटंकी के बाद भी किशोर दा ने इस गीत के लिए जो बनारसी अदा दिखाई उसे कौन भूल सकता है?

खून पसीना और डॉन जैसी फिल्मों के गीत बजने बंद भी नहीं हुए थे कि अनजान के गीतों ने फिर एक बड़ा धमाका किया। फिल्म थी मुकद्दर का सिकंदर। मुझे अच्छी तरह याद है कि इस फिल्म को हॉल में देखने के बाद उसका हर एक गीत रोते हुए आते हें सब...., ज़िदगी तो बेवफ़ा है...., ओ साथी रे...., दिल तो है दिल ...., सलाम ए इश्क...., महीनों जुबान पर रहे थे ।  

अगले ही साल यानि 1979 में उनकी भोजपुरी फिल्म आई बलम परदेसिया । वो फिल्म इतनी हिट हुई थी कि दो रिक्शों में हमारा परिवार घर से पाँच छः किमी दूर पटना के अल्पना सिनेमा हाल में देखने गया था। फिल्म कैसी लगी थी उस वक्त याद नहीं पर जब ये गाना गोरकी पतरकी रे मारे गुलेलवा जियरा उड़ उड़ जाए ....पर्दे पर आया था तो भाई लोग कमीज खोल खोल कर पर्दे तक नाचते हुए पहुँच गए थे। 

संगीतकार बदलते रहे पर अनजान की सफलता का ये सिलसिला अस्सी के दशक में भी जारी  रहा। अनजान, किशोर कुमार और अमिताभ बच्चन की तिकड़ी ने अस्सी के दशक में लावारिस, शराबी, और नमकहलाल जैसी फिल्मों में खूब धमाल मचाया। अनजान के गीतों में गज़ब की विविधता थी यशोदा का नंदलाला... जैसी लोरी लिखने वाले अनजान बप्पी दा के लिए I am a Disco Dancer लिख गए। एक ओर पिपरा के पतवा ..लिखा तो वहीं गोरकी पतरकी... भी। मानो तो हूँ गंगा माता ना मानो तो बहता पानी... जैसे भावपूर्ण गीत  लिखे तो आज रपट जाएँ ....जैसे मस्ती भरे तराने भी। इस दौर में लिखे उनके दो गीतों को आज भी मन से याद करता हूँ। एक तो डिस्को बीट्स पर रचा और अलीशा चिनॉय का गाया मेरा दिल गाए जा  जूबी जूबी जूबी जूबी जो उन दिनों मोहल्ले  में होने वाली दुर्गा और सरस्वती पूजा की शान हुआ करता था और दूसरा वो जिसे फिल्म याराना के लिए उन्होंने राजेश रोशन के लिए रचा था.

कॉलेज के दिनों में मेरे मित्र वार्षिक संगीत संध्या पर पूरी आर्केस्टा के साथ ये गीत बजाते और हम घंटों इस गीत की धुन और शब्दों की ख़मारी में झूमते रहते। गीत तो आप पहचान ही गए होंगे चलिए आपको फिर से सुनवा भी देते हैं..


छूकर मेरे मन को किया तूने क्या इशारा
बदला ये मौसम लगे प्यारा जग सारा

तू जो कहे जीवनभर तेरे लिए मैं गाऊँ
गीत तेरे बोलों पे लिखता चला जाऊँ
मेरे गीतों में तुझे ढूंढ़े जग सारा

आजा तेरा आँचल ये प्यार से मैं भर दूँ
खुशियाँ जहाँ भर की तुझको नजर कर दूँ
तू ही मेरा जीवन तू ही जीने का सहारा

अनजान के इन सहज भोले शब्दों को गुनगुनाते हुए मन आज भी प्रेम की इस निर्मल हवा में झूम जाता है।

लंबे समय के संघर्ष के बाद मिली इस जबरदस्त सफलता के बाद भी अनजान को ज़िंदगी से दो मलाल रह गए थे। पहला तो तीन दशकों के संगीत सफ़र में एक बार भी फिल्मफेयर एवार्ड ना जीत पाने का ग़म और दूसरे बतौर साहित्यकार समाज को कुछ ना दे पाने की पीड़ा। पर भगवान की कृपा ये जरूर रही कि इस संसार को छोड़ने के पहले वो अपने पुत्र समीर को फिल्मफेयर पुरस्कार लेते हुए देख सके और बीमारी के बीच अपना कविता संग्रह 'गंगा तट का बंजारा' भी लिख पाए जिसका विमोचन खुद अमिताभ जी ने किया। अनजान के नाम से भले आप अनजान पर उनके रचे गीतों से आप और आने वाली पीढ़ियाँ अनजान रहेंगी इसकी कल्पना भी नामुमकिन है।

Sunday, May 31, 2015

आपके हसीन रुख पे आज नया नूर है..कितना जानते हैं आप गीतकार अनजान को ?

पिछले पन्द्रह बीस दिनों से मुल्क से बाहर सैर सपाटे पर गया हुआ था। इसीलिए इस ब्लॉग पर शांति छाई रही। जाने के पहले गीतकार अनजान के बारे में लिखने का मन था। जाने के पहले व्यस्तता इतनी रही कि उन पर शुरु किया गया आलेख पूरा ना कर सका।

बचपन में जब हम रेडियों सुनते थे और उद्घोषक गीतकार के रूप में अनजान का नाम बताते थे तो ऐसा लगता था मानो इस गीत के गीतकार का नाम उद्घोषक को भी पता नहीं है। बाद में ये खुलासा हुआ कि अनजान ख़ुद किसी गीतकार का नाम है। वैसे अनजान , अनजान के नाम से पैदा नहीं हुए थे। उनका वास्तविक नाम लालजी पांडे था और उनका जन्म बनारस में हुआ था। अनजान को शुरु से ही कविता पढ़ने औरलिखने  का शौक़ था।  बड़े बुजुर्ग कहा करते कि बनारस में रहे तो एक दिन हरिवंश राय 'बच्चन' जैसी काव्यात्मक ऊँचाइयों को छू पाओगे। ख़ैर ये तो हो ना सका पर बच्चन खानदान से उनका नाता बरसों बाद किसी और रूप मे जाकर जरूर जुड़ा।

पचास के दशक की बात है। उन दिनों ही गायक मुकेश बनारस के क्लार्क होटल में पधारे। होटल के मालिक ने उन्हें अनजान की कविताएँ सुनने का आग्रह किया। मुकेश ने सुना भी और कहा कि मुंबई आकर बतौर गीतकार भाग्य आजमाओ। ख़ैर बात आई गई हो गयी।

अनजान ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से बी कॉम की डिग्री ली थी। इरादा था कि बैंक में नौकरी करेंगे। युवावस्था में ही अनजान को दमे की बीमारी ने जकड़ लिया।। डॉक्टर ने कहा कि अगर अनजान बनारस जैसी सूखी जलवायु वाले इलाके में रहेंगे तो ये रोग बढ़ता ही जाएगा और ज़िदगी भी ख़तरे में पड़ सकती है। साथ ही ये सलाह भी दी कि  आपको किसी ऐसी जगह जाना होगा जहाँ पास में समुद्र तट हो। तब उन्हें गायक मुकेश की बात याद आई और वो अकेले ही रोज़ी रोटी की तलाश में मुंबई चले आए। मु्बई में मुकेश ने उनकी मुलाकात  प्रेमनाथ से करायी जो उस वक़्त Prisoner of Golconda (1956) बना रहे थे। अनजान को मिला ये पहला काम था पर दुर्भाग्यवश फिल्म भी फ्लॉप हुई और उसका संगीत भी। अनजान के लिए ये कठिन घड़ी थी। उनके बेटे समीर उन दिनों की बात करते हुए कहते हैं।

"उस दौर में हालत ये थी कि पिताजी ने कई बार किसी बड़ी इमारत में सीढ़ियों की नीचे वाली जगह में  रातें बिताईं। उनके पास तब दो जोड़ी कपड़े हुआ करते थे। वे कुएँ से पानी खींचते और वहीं नहाते। एक कपड़ा वहीं धुलता और दूसरा वे पहनते।"

अगले सात साल उनका गुजारा छोटी मोटी फिल्मों में काम और ट्यूशन कर चला। फिर 1963 में बनारस के निर्माता निर्देशक त्रिलोक जेटली प्रेमचंद के उपन्यास पर आधारित अपनी  फिल्म गोदान के लिए उत्तर प्रदेश की भाषा को समझने वाला गीतकार ढूँढ रहे थे और उन्होंने इसके लिए अनजान को चुना।  इस तरह अनजान को एक और बड़े कैनवास पर काम करने का मौका मिला। गोदान भी नहीं चली पर उसके गीतों पर लोगों का ध्यान जरूर गया।  भोजपुरी रंग में रँगा मोहम्मद रफ़ी का गाया वो मस्ती भरा नग्मा तो याद होगा ना आपको

पिपरा के पतवा सरीखे डोले रे मनवा कि हियरा में उठत हिलोल,
पूरवा के झोंकवा में आयो रे संदेसवा कि चल अब देसवा की ओर

अनजान का संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ था। उन्हें अपने अगले बड़े मौके के लिए छः सालों का और इंतज़ार करना पड़ा। जी पी सिप्पी की फिल्म बंधन (1969) के लिए उन्हें नरेंद्र बेदी कल्याण जी आनंद जी से मिलवाने ले गए। अनजान ने उस फिल्म के लिए बिन बदरा के बिजुरिया कैसे चमके जैसा लोकप्रिय गीत लिखा। ये गीत उनकी ज़िंदगी के लिए अहम पड़ाव था क्यूँकि इस गीत के माध्यम से वो उस संगीतकार जोड़ी से मिले जिन्होंने सत्तर के दशक में उनके कैरियर की दशा और दिशा तैयार कर दी।

पर आज मैं आपको अनजान का वो गीत सुनवाने जा रहा हूँ जो उन्होंने साठ के दशक में ओ पी नैयर साहब के लिए लिखा था। बहारे फिर भी आएँगी का ये गीत नैयर साहब के साथ अनजान का इकलौता गीत था। अनजान के लिए ये नग्मा एक चुनौती के रूप में था क्यूँकि उनकी पहचान तब तक ठेठ हिंदी और पुरवइया गीतों के गीतकार के रूप में बन रही थी। उस वक़्त के तमाम नामी गीतकार उर्दू जुबाँ पर अच्छा खासा दखल रखते थे सो इस गीत के लिए अनजान ने उसी अनुरूप अपना अंदाज़ बदला।

क्या रोमांटिक गीत लिखा था अनजान साहब ने. और उतनी ही खूबसूरत धुन बनाई ओ पी नैयर साहब ने। गीत के बोलों के बीच बजती बाँसुरी और इंटरल्यूड्स का पियानो और इन सबके बीच रफ़ी साहब की इत्ती प्यारी रससिक्त आवाज़ जिसमें नायिका को छेड़ती हुई एक चंचलता है और साथ ही प्रणय का छुपा छुपा सा आमंत्रण। ये गीत ऐसा है जिसे गुनगुनाने और सुनने से ही मन में एक ख़ुमार सा छा जाता है।

आपके हसीन रुख पे आज नया नूर है
मेरा दिल मचल गया तो मेरा क्या कुसूर है
आपकी निगाह ने कहा तो कुछ ज़ुरूर है
मेरा दिल मचल गया तो मेरा क्या कुसूर है

खुली लटों की छाँव में खिला-खिला ये रूप है
घटा से जैसे छन रही सुबह-सुबह की धूप है
जिधर नज़र मुड़ी उधर सुरूर ही सुरूर है
मेरा दिल मचल गया तो मेरा क्या कुसूर है

झुकी-झुकी निगाह में भी है बला की शोखियाँ
दबी-दबी हँसी में भी तड़प रही हैं बिजलियाँ
शबाब आपका नशे में खुद ही चूर-चूर है
मेरा दिल मचल गया तो मेरा क्या कुसूर है

जहाँ-जहाँ पड़े क़दम वहाँ फिजा बदल गई
कि जैसे सर-बसर बहार आप ही में ढल गई
किसी में ये कशिश कहाँ जो आप में हुज़ूर है
मेरा दिल मचल गया तो मेरा क्या कुसूर है



क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कोई ऐसा चेहरा सामने आ गया हो जिससे नज़रें हटाने का दिल ही नहीं करे और फिर बरबस ये गीत याद आ गया हो.. ख़ैर इसमें ना आपका कुसूर है ना ऐसे किसी चेहरे का, गलती तो सिर्फ उन्हें बनाने वाले सृष्टिकर्ता की है जो आँखों को ऐसा बेबस कर देते हैं कि वे उन्हें निहारते हुए  झपकने का नाम ही नहीं लेतीं :)।

अनजान के गीतों की यात्रा अभी खत्म नहीं हुई। इस आलेख की अगली कड़ी में आपसे साझा करूँगा संघर्ष के इन दिनों से शोहरत की बुलंदियों तक तय किया गया अनजान का सफ़र..

Saturday, May 02, 2015

यूँ मातमी से लिबास में कोई आह ओ फुगाँ है आज भी .. Yoon matami se libas mein...

कई साल पहले एक उर्दू फोरम में इस ग़ज़ल से पहला परिचय हुआ था। तब भी पता नहीं था कि ये ग़ज़ल किसने लिखी? आज भी नहीं है। पर जिसने भी लिखी है क्या खूब लिखी है।  गाहे बगाहे डॉयरी को खोलकर इसे पढ़ जरूर लेता हैँ। पन्नों पर बिखरे शब्द जहाँ दिल को गुदगुदाते हैं वहीं कुछ उदास भी कर जाते हैं। मोहब्बत के जज़्बे में पिरोये अहसास दिल को दाद देने पर मजबूर तो करते ही हैं पर साथ ही शायर का एकाकीपन कुछ अशआरों में एक चुभन सी पैदा करता है।


चूँकि ये ग़ज़ल सरहद पार के किसी शायर की रचना है तो देवनागरी में शायद ही आपने इसे पढ़ा होगा। आज यूँ ही मन हुआ इसे अपनी आवाज़ में रिकार्ड करने का। तो आइए सुनते हैं इस ग़ज़ल को




यूँ मातमी से लिबास में कोई आह ओ फुगाँ है आज भी
जैसे चश्म ए तर में ख़्वाब कोई परेशाँ है आज भी

चश्म ए तर : भीगी आँखें, आह ओ फुगाँ  :आांतरिक पीड़ा/ विलाप

मैं ज़िंदगी की रहगुज़र पे दरबदर हूँ इसलिए
कि मोहब्बतों के शहर में दिल बेमकाँ है आज भी


तेरी आरजू है बहुत मगर मेरी पहुँच नहीं है इस क़दर
मेरी ख़्वाहिशों के वास्ते तू आसमाँ है आज भी


मैं तौहीद के हर हिसाब से वैसे तो मुसलमान हूँ
पर तुझे पूजने की बात है तो दिल बेईमान है आज भी
 

तौहीद : नियम

तेरी अंजुमन, तेरा हर करम, तेरी चाहतें तो छिन गयीं
मगर दर्द जो मेरा नसीब बना वो मेहरबाँ है आज भी

तेरी अज़ीयतों का सवाल है तो मुझे कल भी ज़ब्त पे नाज़ था
तुझे कोसने की बात है तो दिल बेजुबाँ है आज भी

 

अज़ीयत  :यंत्रणा,  ज़ब्त  :अपनी भावनाओं को काबू में रखना

कभी दर्द हद से बढ़ा भी तो मैं तेरी हद से बढ़ा नहीं
मेरी साँस की तस्बीहों में इक तू ही रवाँ है आज भी
 

तस्बीह :प्रार्थना , रवाँ : चलता बहता हुआ

सौ बादलों के सिलसिले मेरी छत पे बरस कर चले गए
पर जला जला धुआँ धुआँ मेरा आशियाँ है आज भी

मुझे कल मिले थे कुछ गुलाब जो तेरे लिए ये कह गए
कि तेरे इंतज़ार में सोग़वार गुलशन का समा है आज भी
 

सोग़वार : ग़मज़दा

रिकार्डिंग मोबाइल पे की इसलिए उसकी गुणवत्ता उतनी अच्छी नहीं है, पर ये ग़ज़ल आपके दिल के करीब से गुजरी होगी ऐसी उम्मीद है।
 

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