Saturday, July 26, 2014

मदन मोहन के संगीत में रची बसी वो शाम : आप को प्यार छुपाने की बुरी आदत है... Aap ko pyar chhupane ki buri aadat hai

पिछले हफ्ते की बात है। दफ़्तर के काम से रविवार की शाम पाँच बजे दिल्ली पहुँचा। पता चला पास ही मैक्स मुलर मार्ग पर स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में संगीतकार मदनमोहन की स्मृति में संगीत के कार्यक्रम का आयोजन हो रहा है। कार्यक्रम साढ़े छः बजे शुरु होना था पर दस मिनट की देरी से जब हम  पहुँचे तो वहाँ तिल धरने की जगह नहीं थी। श्रोताओं में ज्यादातर चालीस के ऊपर वाले ही बहुमत में थे पर पुराने गीतों की महफिल में ऐसा होना लाज़िमी था। कुछ मशहूर हस्तियाँ जैसे शोभना नारायण भी दर्शक दीर्घा में नज़र आयीं।


उद्घोषकों ने मदनमोहन के संगीतबद्ध गीतों के बीच बगदाद में जन्मे इस संगीतकार की ज़िंदगी के छुए अनछुए पहलुओं से हमारा परिचय कराया। मुंबई की आरंभिक पढ़ाई, देहरादून के बोर्डिंग स्कूल में रहना, पिता के आग्रह पर सेना में नौकरी करना, उनका कोपभाजन बनते हुए भी फिल्मी दुनिया में अपने बलबूते पर संगीतकार की हैसियत से पाँव जमाना, लता के साथ उनके अद्भुत तालमेल, फिल्मी ग़ज़लों को लयबद्ध करने में उनकी महारत, उनका साहबों वाला रोबीला व्यक्तित्व,  हुनर के हिसाब से उनको लोकप्रियता ना मिलने का ग़म और शराब में डूबी उनकी ज़िदगी के कुछ आख़िरी साल ..उन ढाई घंटों में उनका पूरा जीवन वृत आँखों के सामने घूम गया।

पर इन सबके बीच उनके कुछ मशहूर और कुछ कम बज़े गीतों को सुनने का अवसर भी मिला। ऐसे कार्यक्रमों में कितना भी चाहें आपके सारे पसंदीदा नग्मों की बारी तो नहीं आ पाती। फिर भी 'ना हम बेवफ़ा है ना तुम बेवफ़ा हो...', 'लग जा गले से हसीं रात हो ना हो...', 'तुम्हारी जुल्फों के साये में शाम कर दूँगा..', 'झुमका गिरा रे...' जैसे सदाबहार नग्मों को सुनने का अवसर मिला तो वहीं 'इक हसीं शाम को दिल मेरा खो गया...',  'तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है...', 'नैनों में बदरा छाए...', 'ज़रा सी आहट होती है....', 'कोई शिकवा भी नहीं कोई भी शिकायत भी नहीं...' जैसे गीतों को live सुन पाने की ख़्वाहिश..ख़्वाहिश ही रह गयी।

इन्हीं गीतों के बीच  एक युगल गीत भी पेश किया गया जिसे कई सालों बाद अचानक और सीधे आर्केस्ट्रा के साथ मंच से सुनने में काफी आनंद आया। एक हल्की सी छेड़छाड़ और चंचलता लिए इस गीत को 1965 में आई फिल्म "नीला आकाश" में मोहम्मद रफ़ी और आशा ताई ने गाया था। इस गीत को लिखा था राजा मेहदी अली खाँ ने। मदनमोहन और राजा साहब की संगत ने हिंदी फिल्म संगीत को कितने अनमोल मोती दिए वो तो आप सब जानते ही हैं। राजा साहब से जुड़े इस लेख में आपको पहले ही उनके बारे में विस्तार से बता चुका हूँ। उसी लेख में इस बात का भी जिक्र हुआ था कि किस तरह उन्होंने हिंदी फिल्मी गीतों में 'आप' शब्द का प्रचलन बढ़ाया। आज जिस गीत की बात मैं आपसे करने जा रहा हूँ वो भी इसी श्रेणी का गीत है।

देखिए तो इस खूबसूरती से राजा साहब ने गीत की पंक्तियाँ गढ़ी हैं कि हर अगली पंक्ति पिछली पंक्ति का माकूल जवाब सा लगती है।
आप को प्यार छुपाने की बुरी आदत है
आप को प्यार जताने की बुरी आदत है

आपने सीखा है क्या दिल के लगाने के सिवा,
आप को आता है क्या नाज दिखाने के सिवा,
और हमें नाज उठाने की बुरी आदत है

किसलिए आपने शरमा के झुका ली आँखें,
इसलिए आप से घबरा के बचा ली आँखें,
आपको तीर चलाने की बुरी आदत है

हो चुकी देर बस अब जाइएगा, जाइएगा,
बंदा परवर ज़रा थोड़ा-सा क़रीब आइएगा,
आपको पास न आने की बुरी आदत है


तो आइए सुनते हैं राग देस पर आधारित इस मधुर युगल गीत को

 


वैसे तो सर्वव्यापी धारणा रही है लड़कों में अपने प्यार का इज़हार करने का उतावलापन रहता है, वहीं लड़कियाँ शर्म ओ हया से बँधी उसे स्वीकार करने में झिझकती रही हैं। पर वक़्त के साथ क्या आप ऐसा महसूस नहीं  करते कि मामला इतना स्टीरियोटाइप भी नहीं रह गया है। पहल दोनों ओर से हो रही है। सोच रहा हूँ कि अगर आज गीतकार को ये परिस्थिति दी जाए तो वो क्या लिखेगा। है आपके पास कोई कोरी कल्पना ?

Wednesday, July 16, 2014

इक ख़लिश को हासिल-ए-उम्र-ए-रवाँ रहने दिया .. Ek khalish ko hasil-e-umr-e-rawan

कुछ शायर अपनी एक ग़ज़ल से ही लोगों के ज़हन में अपने नाम की परछाई छोड़ जाते हैं। सराहनपुर में जन्मे अदीब सहारनपुरी का नाम ऐसे ही शायरों में किया जा सकता है। आजादी के बाद अदीब पाकिस्तान के कराची में जा बसे थे। पचास और साठ के दशक में उनका शुमार पाकिस्तान के अग्रणी शायरों में किया जाता रहा। पर इस दौरान उनके द्वारा किए गए काम के बारे में पूर्ण जानकारी नहीं है। अदीब की जिस ग़ज़ल के बारे में मैं आज बात करने जा रहा हूँ उसे लोकप्रिय बनाने में उस्ताद मेहदी हसन और अमानत अली खाँ जैसे गायकों का महती योगदान रहा है। तो आइए देखें अदीब सहारनपुरी ने क्या कहना चाहा है इस ग़ज़ल में..

इक ख़लिश को हासिल-ए-उम्र-ए-रवाँ रहने दिया
जान कर हम ने उन्हें नामेहरबाँ रहने दिया

कितनी दीवारों के साये हाथ फैलाते रहे
इश्क़ ने लेकिन हमें बेख़्वानमाँ रहने दिया

इंसान कितनी भी आरज़ू करे पर उसे उसकी हर चाहत का प्रतिकार मिले ये कहाँ मुमकिन है ? इसलिए ग़ज़ल के मतले में अदीब कहते हैं कि

वो हम पर मेहरबान ना भी हुए तो क्या, दिल में उसके प्रेम की जो मीठी आँच जल रही है वही उनकी ज़िदगी का हासिल है। ये भी नहीं कि ज़िदगी अकेलेपन में गुजरी। कितने लोग तो आए जिन्होंने अपने मोहब्बत के साये में मेरे मन को सुकून पहुँचाने की कोशिश की पर ये उसके इश्क़ का ही असर था कि मेरे दिल की कोठरियाँ उजाड़ ही रहीं। वहाँ किसी और को बसाना मेरे लिए गवारा नहीं हुआ।

अपने अपने हौसले अपनी तलब की बात है
चुन लिया हमने उन्हें सारा ज़हाँ रहने दिया

ये भी क्या जीने में जीना है बग़ैर उन के "अदीब"
शम्मा गुल कर दी गई बाक़ी धुआँ रहने दिया

अदीब अगले शेर मे कहते हैं कि लोग मुझ पर हँसते हैं कि सारी दुनिया को छोड़कर मुझे ऐसे शख्स से दिल लगाने की क्या पड़ी थी जो मेरा कभी ना हो सका। वो क्या समझें मेरे हौसले को, मेरी पसंद को ..
पर मक़ते में शायर का हौसला पस्त होता दिखता है जब वो उदासी की चादर ओढ़ कहते हैं कि उसके बगैर जीना बुझी हुई शमा के धुएँ के साथ जीने जैसा है। आख़िर उसकी यादों के सहारे कोई कब तक जी सकता है?

यूँ तो मेहदी हसन साहब ने पूरी ग़ज़ल अपने चिरपरिचित शास्त्रीय अंदाज़ में गायी है पर मुझे इसे अमानत अली खाँ साहब साहब के सीधे पर दिल को छूने वाले अंदाज़ में सुनना ज्यादा रुचिकर रहा है।



खाँ साहब पटियाला घराने के मशहूर शास्त्रीय गायक थे। आप भले उनकी गायिकी से परिचित ना हों पर आपने उनके सबसे छोटे पुत्र शफ़कत अमानत अली खाँ के गाए हिंदी फिल्मी गीतो को जरूर सुना होगा। खाँ साहब ने पूरी ग़ज़ल तो नहीं गाई पर दो तीन अशआरों में ही वो ग़ज़ल के मूड को हमारे दिलों तक पहुँचा देते हैं। इस वर्जन में  एक नया शेर भी है

आरजू-ए- क़र्ब भी बख्शी दिलों को इश्क़ ने
फ़ासला भी मेरे उनके दर्मियाँ रहने दिया

बहरहाल आपके लिए ये ग़ज़ल अपने दोनों रूपों में ये रही। आपको किसी गायिकी ज्यादा मन के करीब लगी बताइएगा।

Amanat Ali Khan's Version



Mehdi Hasan's Version 


Monday, July 07, 2014

कुँवर नारायण की चंद कविताएँ मेरी आवाज़ में... Kunwar Narayan : Kamre Mein Dhoop

बतौर पाठक कुँवर नारायण की कविताओं के रचना संसार से मेरा कोई ज्यादा परिचय नहीं रहा है। गाहे बगाहे उनका नाम साहित्यप्रेमी मित्रों के मुँह से अक्सर सुना करता था। करीब पाँच साल पहले उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने पर उनके द्वारा लिखी कविताओं से रूबरू हुआ था। 


पर कुछ दिन पहले अंतरजाल पर जब उनकी कविता कमरे में धूप पढ़ी तो उनकी रचनाओं पर एक सरसरी नज़र डालने की इच्छा हुई। उनकी कविताओं से गुजरते हुए मन के तार कई बार ठिठके, हिले और झंकृत हुए। जो कुछ मन को अच्छा लगा उसे  आज आपके साथ अपनी आवाज़ में बाँट रहा हूँ।

 (1) कमरे में धूप
प्रकृति के मनसबदारों हवा, धूप, बादल, चाँदनी से तो सुबह से रात तक आपका सामना होता है। कभी सोचा है कि ये अगर हमसे अपना किरदार बदल लें तो क्या हो? वैसे जब कुँवर नारायण जैसे कवि हमारे बीच हों तो वो सोचने की आवश्यकता हमें नहीं बस पढ़िए और अभिभूत होइए कि किस सहजता से कवि ने प्रकृति के इन तत्वों का मानवीकरण कर दिया है।

हवा और दरवाजों में बहस होती रही,
दीवारें सुनती रहीं।
धूप चुपचाप एक कुरसी पर बैठी
किरणों के ऊन का स्वेटर बुनती रही।

सहसा किसी बात पर बिगड़ कर
हवा ने दरवाजे को तड़ से
एक थप्पड़ जड़ दिया !

खिड़कियाँ गरज उठीं,
अखबार उठ कर खड़ा हो गया,
किताबें मुँह बाये देखती रहीं,
पानी से भरी सुराही फर्श पर टूट पड़ी,
मेज के हाथ से कलम छूट पड़ी।

धूप उठी और बिना कुछ कहे
कमरे से बाहर चली गई।

शाम को लौटी तो देखा
एक कुहराम के बाद घर में खामोशी थी।
अँगड़ाई लेकर पलंग पर पड़ गई,
पड़े-पड़े कुछ सोचती रही,
सोचते-सोचते न जाने कब सो गई,
आँख खुली तो देखा सुबह हो गई।

 (2) घंटी
मृत्यु जीवन का अंतिम कटु सत्य है पर इस सत्य को स्वीकार कर पाना क्या हमारे लिए कभी सहज रहा है ?

फ़ोन की घंटी बजी
मैंने कहा- मैं नहीं हूँ
            और करवट बदल कर सो गया

दरवाज़े की घंटी बजी
मैंने कहा- मैं नहीं हूँ
            और करवट बदल कर सो गया

अलार्म की घंटी बजी
मैंने कहा- मैं नहीं हूँ
            और करवट बदल कर सो गया

एक दिन
मौत की घंटी बजी...
हड़बड़ा कर उठ बैठा-
मैं हूँ... मैं हूँ... मैं हूँ..
            मौत ने कहा-
            करवट बदल कर सो जाओ।


और चलते चलते कुँवर नारायण की ये पंक्तियाँ भी आपको सुपुर्द करना चाहता हूँ जो शायद कवि की ही नहीं जीवन के किसी ना किसी मुकाम पर हम सबकी तलाश का सबब रही है

....फिर भी
अपने लिए हमेशा खोजता रहता हूँ
किताबों की इतनी बड़ी दुनिया में
एक जीवन-संगिनी
थोडी अल्हड़-चुलबुली-सुंदर
आत्मीय किताब
जिसके सामने मैं भी खुल सकूँ
एक किताब की तरह पन्ना पन्ना
और वह मुझे भी
प्यार से मन लगा कर पढ़े...

कुँवर नारायण की इन कविताओं को अपनी आवाज़ देने की मेरी एक कोशिश ये रही..



कुँवर नारायण के व्यक्तित्व और कृतित्व से और परिचित होना चाहें तो विकीपीडिया का ये पृष्ठ आपकी मदद कर सकता है।

Sunday, June 29, 2014

बीती ना बिताई रैना, बिरहा की जाई रैना :जब पंचम ने पकड़ा शास्त्रीयता का दामन ( Beeti na Bitai Raina...)

27 जून यानि परसों पंचम का पचहत्तरवाँ जन्म दिन मनाया गया। पंचम के बारे में एक बात लगातार कही जाती रही है कि ‌उन्होंने नई आवाज़ और बीट्स से सबका परिचय कराया। पुराने साजों के अलग तरीके से इस्तेमाल के साथ साथ उन्होंने कई नए वाद्य यंत्रों का भी प्रचलन किया। दरअसल यही पंचम की शैली थी। अपने बाबा सचिन देवबर्मन से उन्होंने बहुत कुछ सीखा पर वो उनसे हमेशा कुछ अलग करना चाहते थे। 

पर राग और रागिनियों के बारे में पंचम की जानकारी बिल्कुल नहीं हो ऐसा भी नहीं था। बचपन में उन्होंने ब्रजेन विश्वास से तबला सीखा। सरोद सीखने के लिए उन्हें अली अकबर खान के पास भेजा गया। अली अकबर खान और पंडित रविशंकर के बीच की सरोद और सितार के बीच की लंबी जुगलबंदी को भी उन्हें लगातार सुनने का मौका मिला। यही वज़ह है कि पंचम ने जब भी राग आधारित गीतों की रचना की, अपने प्रशंसकों की नज़र में खरे उतरे।

पंचम और गुलज़ार का आपसी परिचय बंदिनी से शुरु हुआ जिसमें पंचम सचिन दा के सहायक का काम निभा रहे थे और गुलज़ार गीतकार का (वैसे तो फिल्म के अन्य गीत शैलेंद्र से लिखवाए गए थे पर मोरा गोरा अंग लई ले के लिए गुलज़ार को याद किया गया था)। पर बतौर निर्देशक गुलज़ार ने पंचम के साथ पहली बार सत्तर के दशक में फिल्म परिचय के लिए काम किया। इस फिल्म के सारे गीत काफी चर्चित हुए। पर उनमें एक गीत बाकियों से पंचम के लिए इन अर्थों में भिन्न था कि वो पहली बार शास्त्रीय राग आधारित किसी युगल गीत का संगीत निर्देशन कर रहे थे। ये गीत था बीते ना बिताई रैना...। 


कई बार गीत की धुन इतनी प्यारी होती है कि हम बिना उसका अर्थ समझे भी उसे गुनगुनाने लगते हैं। स्कूल के समय पहली बार सुने इस गीत को मैं कॉलेज के ज़माने तक चाँद की बिन दीवाली बिन दीवाली रतिया  :) समझकर गाता रहा। मुझे कुछ ऐसे लोग भी मिले जो इसे 'चाँद के बिन दीवानी बिन दीवानी रतिया..' समझते रहे। ख़ैर किसी संगीत मर्मज्ञ ने जब ये बताया कि गुलज़ार यहाँ चाँद की बिंदी वाली रतियों की बात कर रहे हैं तो गीत के प्रति मेरी आसक्ति और बढ़ी।

पंचम ने राग यमन और खमाज़ को मिला जुलाकर जो धुन तैयार की उसमें सितार और तबले को प्रमुखता से स्थान मिला। एक ओर पंचम की मधुर धुन थी तो दूसरी ओर गुलज़ार के बेमिसाल शब्द। क्या क्या उद्धृत करूँ? भींगे नयनों से रात को बुझाने की बात हो या फिर रात को चाँद की बिदी जैसा दिया गया विशेषण। पंचम दा ने स्वर कोकिला लता मंगेशकर के साथ इस गीत में भूपेंद्र की धीर गंभीर आवाज़ का प्रयोग किया जो फिल्म में संजीव कुमार पे खूब फबी। आज भी जब रात में नींद कोसों दूर होती है और मन अनमना सा रहता है तो इस गीत को गुनगुनाना बेहद सुकून पहुँचाता है। वैसे भी गुजरी ज़िदगी के बीते हुए लमहों और उन्हें खास बनाने वाले लोग अगर किसी गीत के माध्यम से याद आ जाएँ तो आँखों में उभर आए आँसुओं के कतरे ओस की बूँदों की तरह मन के ताप को हर ही लेते हैं। तो आइए सुनते हैं इस गीत को...


बीती ना बिताई रैना, बिरहा की जाई रैना
भीगी हुई अँखियों ने लाख बुझाई रैना

बीती हुयी बतियाँ कोई दोहराए
भूले हुए नामों से कोई तो बुलाये
चाँद की बिंदी वाली, बिंदी वाली रतिया
जागी हुयी अँखियों में रात ना आयी रैना

युग आते है, और युग जाए
छोटी छोटी यादों के पल नहीं जाए
झूठ से काली लागे, लागे काली रतिया
रूठी हुयी अँखियों ने, लाख मनाई रैना


इस गीत के लिए उस साल यानि 1972 का सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका का पुरस्कार लता मंगेशकर को मिला। पंचम भले ही कोई इस फिल्म या गीत के लिए पुरस्कार ना जीत पाएँ हों पर उन्होंने बतौर संगीतकार उन लोगों के मन में आदर का भाव जागृत कराया जो उन्हें सिर्फ पश्चिमी संगीत के भारतीयकरण करने में ही पारंगत मानते थे।

Monday, June 23, 2014

ऐसे तो न देखो, कि हमको नशा हो जाए..मज़रूह की यादों में सचिन दा Aise to na Dekho .. Majrooh remembers S D Burman

पिछली पोस्ट में तीन देवियाँ फिल्म के गीत के बारे में चर्चा करते वक़्त बात हुई थी मज़रूह साहब के बारे में। आज आपसे गुफ़्तगू होगी इसी फिल्म के एक और गीत के बारे में। पर रफ़ी साहब के गाए इस नाज़ुक से नग्मे का जिक्र करूँ, उससे पहले आपको ये बताना चाहूँगा कि मज़रूह साहब कैसे याद करते थे सचिन देव बर्मन साहब के साथ गुजरे उन सालों को।

आपको बता ही चुका हूँ मज़रूह कम्यूनिस्ट विचारधारा से काफी प्रभावित थे। सचिन दा से उनकी पहली मुलाकात वामपंथियों के एक सम्मेलन में कोलकाता में हुई थी। सचिन दा ने मज़रूह से पहले साहिर लुधयानवी के साथ कुछ फिल्मों में काम किया। फिर किसी बात पर उनकी साहिर से अनबन हो गई तो उन्होंने मज़रूह को फिल्म Paying Guest के गाने लिखने के लिए बुलाया। 

मज़रूह को परिस्थिति दी गयी कि एक वकील अपनी महबूबा के लिए गा रहा है। मज़रूह ने सोचा वकील है थोड़ा सौम्य होगा तो उसी मिजाज़ का गाना लिख कर दे दिया। निर्देशक उनके इस प्रयास से तनिक भी खुश नहीं हुए कहा पहले फिल्म देखिए फिर गाना लिखिए। मज़रूह ने फिल्म देखी और अपना सिर ठोक लिया। उन्होंने कहा कि आपने मुझसे वकील के लिए गाना लिखने को क्यूँ कहा? सीधे कहते कि एक लोफ़र के लिए गाना लिखना है जो इक लड़की के पीछे पड़ा है और तब मज़रूह ने लिखा माना जनाब ने पुकारा नहीं, क्या मेरा साथ भी गवारा नहीं जो बेहद लोकप्रिय हुआ।

बिमल दा की फिल्म में मज़रूह ने सचिन दा के लिए एक गाना लिखा जलते हैं जिसके लिए मेरी आँखों के दीये...। इस कालजयी गीत (जो मुझे बेहद प्रिय है) के बारे में मैंने पहले यहाँ भी लिखा था पर फिल्म में इस गीत को फिल्माने पर विवाद खड़ा हो गया। फिल्म की परिस्थिति के हिसाब से ये गीत नायक नायिका द्वारा टेलीफोन करते हुए फिल्माया जाना था पर विमल दा जैसे यथार्थवादी निर्देशक फिल्म के नाम पर इतनी सिनेमेटिक लिबर्टी लेने के लिए तैयार नहीं थे। मज़रूह बताते हैं आमतौर पर डरपोक समझे जाने वाले सचिन दा इस बार बहादुरी से अड़ गए और थोड़ी देर इधर उधर टहलने के बाद बिमल दा से बोले "अगर तुम इस फिल्म में मेरा गाना नहीं लेगा तो हम पिक्चर नहीं करेगा"। सचिन दा के इस रूप को देखने के बाद बिमल दा को उनकी बात माननी पड़ी और इतिहास गवाह है कि इस गीत ने कितनी वाहवाहियाँ बटोरीं।

सचिन दा के बारे में मशहूर था कि वो अपने यहाँ आने वालों को चाय नाश्ते के लिए ज़्यादा नहीं पूछते थे। इसी मद्देनज़र मज़रूह साहब ने एक किस्सा बयाँ किया था। वाक़या ये था कि
एक बार सचिन दा , उनका सहायक, साहिर और मज़रूह गाड़ी से चर्चगेट से कहीं जा रहे थे। रास्ते में सचिन दा ने एक केला निकाला और खाने लगे। फिर उन्होंने साहिर से पूछा "कोला लेगा"? साहिर और मज़रूह अचरज़ में पड़ गए कि कहाँ से सचिन दा का दरिया - ए  -रहमत जोश मारने लगा ? अभी दोनों इसी असमंजस में थे कि सचिन दा ने कहा ड्राइवर गाड़ी रोको और फिर साहिर की ओर मुख़ातिब होकर बोले जाओ ओ दिखता है... जा कर ले लो।

सचिन दा के बारे में मज़रूह की याद की पोटलियों से निकले कई किस्से और भी हैं पर वो फिर कभी। आइए अब बात की जाए तीन देवियों के इस बेहद प्यारे से नग्मे की।

 
सचिन दा इस बाद के हिमायती थे कि गीत में उतना ही संगीत दिया जाए जितनी जरूरत हो। कहीं बेख्याल हो कर कहीं छू लिया किसी ने में आप इसका नमूना देख ही चुके हैं पर जहाँ तक ऐसे तो ना देखो की बात है यहाँ सचिन दा की शुरुआती धुन और इंटरल्यूड्स गीत के मूड में और जान डाल देते हैं। राग ख़माज पर आधारित इस गीत को हिंदुस्तानी ज़ुबान की जिस रससिक्त चाशनी में घोला है मज़रूह ने कि बोलों को पढ़कर ही मन में एक ख़ुमार सा छाने लगता है। अब इसी अंतरे को लीजिए यूँ न हो आँखें रहें काजल घोलें..बढ़ के बेखुदी हँसीं गेसू खोलें..खुल के फिर ज़ुल्फ़ें सियाह काली बला हो जाए

अब आप ही बताइए काजल से सजी आँखों के बीच किसी की बेसाख्ता सी हँसी उनके बालों की लटों को लहरा दे तो आसमान में बदली छाए ना छाए दिल तो इन काली घटाओं के आगोश में भींग ही उठेगा ना। रफ़ी ने इसी चाहत को गीत के हर अंतरे में अपनी अदाएगी के द्वारा इस तरह उभारा मानो वो ख़ुद मदहोशी की हालत में गाना गा रहे हों। तो आइए आज की शाम जाम के तौर पर इस गीत का रसपान किया जाए


ऐसे तो न देखो, कि हमको नशा हो जाए
ख़ूबसूरत सी कोई हमसे ख़ता हो जाए

तुम हमें रोको फिर भी हम ना रुकें
तुम कहो काफ़िर फिर भी ऐसे झुकें
क़दम-ए-नाज़ पे इक सजदा अदा हो जाये

ऐसे तो न देखो....

यूँ न हो आँखें रहें काजल घोलें
बढ़ के बेखुदी हँसीं गेसू खोलें
खुल के फिर ज़ुल्फ़ें सियाह काली बला हो जाए

ऐसे तो न देखो.....

हम तो मस्ती में जाने क्या क्या कहें
लब-ए-नाज़ुक से ऐसा ना हो तुम्हें
बेक़रारी का गिला हम से सिवा हो जाये
ऐसे तो न देखो
.....

फिल्म तीन देवियाँ में ये गीत देव आनंद और नंदा पर फिल्माया गया था।

Saturday, June 14, 2014

कहीं बेख़याल होकर, यूँ ही छू लिया किसी ने... जब मज़रूह की ग़ज़ल परवान चढ़ी रफ़ी की आवाज़ में (Mazrooh, Rafi in Teen Deviyan)

पिछले हफ्ते गुजरे सालों के सुपरस्टार देवानंद पर फिल्माए गानों को देख रहा था। साठ के दशक में किशोर को देव आनंद की आवाज़ का पर्याय माना जाने लगा था , पर अगर गौर किया जाए तो इसी दौरान मोहम्मद रफ़ी को भी पर्दे पर देव आनंद की आवाज बनने के मौके मिले जिन्हें उन्होंने खूबसूरती से निभाया भी। ऐसी ही एक फिल्म थी 1965 में प्रदर्शित हुई 'तीन देवियाँ' जिसके संगीतकार थे सचिन देव बर्मन और गीतकार मजरूह सुलतानपुरी। फिल्म तो निहायत औसत दर्जे की थी पर इसका संगीत इतना मशहूर हुआ कि फिल्म को हिट करा गया।


मज़रूह साहब कमाल के गीतकार थे। अब आप ही बताइए कि जिस शख़्स ने 1946 में 'शाहजहाँ' के गीतों को लिख कर शोहरत पाई हो और जो उसके पाँच दशकों के बाद भी 'क़यामत से क़यामत तक' और 'जो जीता वही सिंकदर' जैसी फिल्मों के गीतों को लिखकर युवा दिलों पर राज करता रहा ऐसी उपलब्धि उनसे पहले किस गीतकार के हाथ लगी थी? यही वज़ह थी कि किसी गीतकार को अगर फिल्म जगत का सबसे बड़ा 'दादा साहब फालके पुरस्कार' सबसे पहले मिला तो वो मज़रूह साहब ही थे।

पर वास्तव में मज़रूह साहब को अंत तक इस बात का मुगालता रहा कि पुरस्कार मिला भी तो गीतकार की हैसियत से जबकि उनका सपना हमेशा अपने समकालीन फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की तरह एक प्रतिष्ठित ग़ज़लकार बनने का ही था। चालीस के दशक में वो मुंबई एक मुशायरे में शिरक़त करने ही आए थे और उनकी ग़ज़लों से प्रभावित हो कर एक निर्माता नेजब उन्हें गीतकार बनने का मौका दिया तो उन्होंने उसे ये कहते हुए ठुकरा दिया था कि ये इज़्ज़त की नौकरी नहीं है। पर जिगर मुरादाबादी के ये समझाने पर कि बतौर जीविका चलाने के लिए तुम ये काम करो, बाकी ग़ज़लें लिखते रहो....वो मान गए। पचास के दशक के बाद से ये धारदार कम्युनिस्ट अपनी विचारधारा को कार्यान्वित ना होते देख उसमें सक्रिय भागीदारी से तो विमुख हो ही गया था, साथ ही वक़्त के साथ ग़ज़लों से भी दूर होता चला गया।

गीतकार के रूप में इतनी सफलता हाथ लगी कि उन्हें अपने हुनर पर और समय देने का अवसर ही नहीं मिला। पर जब जब फिल्मों में ग़ज़ल लिखने का उन्हें मौका मिला उन्होंने अपना कौशल दिखाने में कोताही नहीं की। अब तीन देवियाँ फिल्म के इस गीत को लें क्या मतला (प्रारंभिक शेर) लिखा था मज़रूह ने

कहीं बेख़याल होकर, यूँ ही छू लिया किसी ने
कई ख्वाब देख डाले, यहाँ मेरी बेखुदी ने

मैं तो कहता हूँ बस इसी शेर को गुनगुनाते हुए घंटों निकालें जा सकते हैं। कितनी आम सी बात को इस करीने से पकड़ा मज़रूह साहब ने कि तन मन गुदगुदा उठे। वैसे बाकी के मिसरे भी अच्छे भले हैं और रफ़ी की आवाज़ का साथ पाकर और फड़क उठे हैं।

वैसे मज़रूह अगर सामने होते तो एक बात जरूर पूछता उनसे जब गाना देव आनंद गा रहे थे तो फिर चौथे मिसरे में 'किया बेक़रार हँसकर, मुझे एक आदमी ने' कैसे कह गए? कोई स्त्रीसूचक शब्द जैसे महज़बीं/दिलनशीं और मुनासिब होता। शायद शेर के बहर यानि मीटर की बंदिशों को तोड़ना उन्हें गवारा ना लगा हो।

कहीं बेख़याल होकर, यूँ ही छू लिया किसी ने
कई ख्वाब देख डाले, यहाँ मेरी बेखुदी ने , कहीं बेख़याल होकर

मेरे दिल मैं कौन है तू, कि हुआ जहाँ अँधेरा
वहीं सौ दिये जलाये, तेरे रुख़1 की चाँदनी ने
 
कभी उस परी का कूचा, कभी इस हसीं की महफ़िल
मुझे दरबदर फिराया, मेरे दिल की सादगी ने

है भला सा नाम उसका, मैं अभी से क्या बताऊं
किया बेक़रार हँसकर, मुझे एक आदमी ने

अरे मुझपे नाज़ वालों, ये नयाज़मन्दियाँ2 क्यों
है यही करम तुम्हारा, तो मुझे ना दोगे जीने

कई ख्वाब.....कहीं बेख़याल होकर

1. चेहरा, 2.अहसान


सचिन देव बर्मन के साथ इसी फिल्म में मजरूह ने एक और प्यारा गीत लिखा था जो मुझे इससे भी प्यारा लगता है। पर अभी मैं आपको इस गीत की ख़ुमारी से जगाना नहीं चाहता तो उस गीत की बातें अगली प्रविष्टि में।

Sunday, June 08, 2014

सीखो ना नैनों की भाषा पिया. Seekho Na Nainon Ki Bhasha Piya

करीब तीन हफ्तों के लंबे अंतराल के बाद इस ब्लॉग पर लौट रहा हूँ। क्या करूँ घर की एक शादी, फिर कनाडा का अनायास दौरा और वापस लौटकर कार्यालय की व्यस्तताओं ने यहाँ चाह कर भी आने की मोहलत नहीं दी। पर कभी कभी इन व्यस्तताओं के बीच भी कुछ मधुर सुनने को मिल जाता है। अब इसी गीत की बात लीजिए। इसे पिछले हफ्ते अपने कार्यालयी दौरों के बीच एक शाम मित्रों के साथ गाने गुनगुनाने की बैठक में पहली बार सुना और तबसे ही इसकी गिरफ्त में हूँ। तो सोचा आप तक इसे पहुँचा कर इस गिरफ़्त से आज़ादी ले लूँ। 

इस गीत को गाया है हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के साथ हिंदी पॉप में भी अपना दखल देने वाली शुभा मुद्गल जी ने। शुभा जी की आवाज़ जहाँ एक ओर पारंपरिक ठुमरी, ख़याल और दादरा की याद दिला देती है वहीं अली मोरे अँगना, अब के सावन, प्यार के गीत सुना जा रे जैसे गैर फिल्मी गीतों की भी, जो दस पन्द्रह साल पहले बेहद लोकप्रिय हुए थे और आज भी लोगों के दिलो दिमाग से गए नहीं हैं। 1999 में उनका एक एलबम आया था 'अब के सावन' जिसे संगीतबद्ध किया था शान्तनु मोइत्रा ने । इस एलबम का एक गीत था 'सीखो ना नैनों की भाषा पिया..' जिसे लिखा था प्रसून जोशी ने।


काव्यात्मक गीतों की रचना में आज प्रसून जोशी अग्रणी गीतकारों में माने जाते हैं। ये गीत इस बात को साबित करता है कि उनका ये हुनर उनके शुरुआती दिनों से उनके साथ रहा है।  रूपा पब्लिकेशन द्वारा पिछले साल अपनी प्रकाशित पुस्तक Sunshine Lanes में इस गीत की चर्चा करते हुए उन्होंने लिखा है..
"मैंने इस गीत पर दिल्ली में काम करना शुरु किया क्यूँकि उस वक़्त वही मेरा ठिकाना था। पर जब 'अब के सावन' एलबम के गीतों की रिकार्डिंग शुरु हुई तो मुझे रिकार्डिंग टीम के साथ मुंबई जाना पड़ा। वहीं जुहू के शांत होटल के एक कमरे में ये गीत अपनी आख़िरी शक़्ल ले सका। ठुमरियाँ लिखना मुझे हमेशा से प्रिय रहा है। ये गीत भले ठुमरी की परिभाषा में पूरी तरह ख़रा नहीं उतरता पर फिर भी उसकी सुगंध को गीत की अदाएगी के साथ आप महसूस कर सकते हैं।
किसी भी प्रेमी की सबसे बड़ी हसरत उसे समझे जाने की होती है। सिर्फ शब्दों के ज़रिए नहीं पर उन छोटी छोटी बातों से जो उसकी भावनाओं और भाव भंगिमाओं में रह रह कर प्रकट होती हैं। मैंने इस गीत में इसी भाव को और गहराई से परखने की कोशिश की। वैसे तो ये गीत नारी मनोभावों को ज़रा ज्यादा छूता है पर ऐसा भी नहीं है कि पुरुषों में अपने आप को समझे जाने की चाहत नहीं होती।"
प्रसून की बातें तो आपने पढ़ लीं। ज़रा देखिए उन्होंने इस गीत में लिखा क्या है..

सीखो ना नैनों की भाषा पिया
कह रही तुमसे ये खामोशियाँ
सीखो ना
लब तो ना खोलूँगी मैं समझो दिल की बोली
सीखो ना नैनों की भाषा पिया...

सुनना सीखो तुम हवा को
सनन सन सनन सन कहती है क्या
पढ़ना सीखो.. सल..वटों को
माथे पे ये बलखा के लिखती हैं क्या

आहटों की है अपनी जुबाँ
इनमें भी है इक दास्तान
जाओ जाओ जाओ जाओ जाओ पिया

सीखो ना नैनों की भाषा...

ठहरे पानी जैसा लमहा
छेड़ो ना इसे हिल जाएँगी गहराइयाँ
थमती साँसों के शहर में
देखो तो ज़रा बोलती हैं क्या परछाइयाँ

कहने को अब बाकी है क्या
आँखों ने सब कह तो दिया
हाँ जाओ जाओ जाओ जाओ जाओ पिया

इसीलिए हुज़ूर अगली बार जब अपने प्रियतम के साथ हों तो बहती हवा की सनसनाहट में ये देखना ना भूलिए कि वो उन्हें गुदगुदा रही है या उकता रही है। अगर वो एकटक आपकी आँखों में आँखें डाले बैठे हों तो कुछ बोल कर प्रेम में डूबे उन गहरे जज़्बातों को हल्का ना कीजिए।बल्कि उनके साथ उनमें और डूबिए। वो लमहा तो गुजर जाएगा पर उसकी कसक, उसकी मुलायमियत आप वर्षों महसूस कर सकेंगे।

बहरहाल मैंने जिस दिन ये गीत सुना उस दिन ना तो फिज़ाओं में हवाएँ थीं और ना तो आकाश की गोद में उमड़ती घटाएँ। थी तो बस ढलती शाम में एक प्यारी सी आवाज़ जो गीत के बोलों के उतार चढ़ावों , उसकी भावनाओं को भली भांति प्रतिध्वनित करती हुई गर्मी की उस उष्णता को शीतलता में बदल रही थी। शायद यही कारण था कि शाखों से झूलते पत्ते भी बिना हिले डुले एकाग्रचित्त होकर इस गीत का आनंद ले रहे थे। 

इस गीत को सुनने के बाद मैंने तुरंत घर आकर शुभा मुद्गल की आवाज़ में इस गीत को सुना। पर अपने प्रिय संगीतकार शान्तनु मोइत्रा के संगीत संयोजन ने मुझे बेहद निराश किया। इस गीत को एक ठहराव और सुकून वाले न्यूनतम संगीत संयोजन की जरूरत थी जिसका मज़ा शान्तनु ने गीत के साथ चलती ताल वाद्यों की गहरी बीट्स से थोड़ा तो जरूर खराब कर दिया। अगर ऐसा नहीं होता तो शुभा जी की गायिकी और निखर कर  सामने आती।

नेट पर मैंने इस गीत को बिना संगीत के सुनना चाहा और मुझे कई अच्छी रिकार्डिंग्स हाथ लगी। उनमें से एक थी निकिता दाहरवाल की सो वही आपको पहले सुना रहा हूँ। इसी गीत को युवा गायिका और फिलहाल इंग्लैंड में अपनी शिक्षा पूरी कर रही निकिता दहरवाल ने भी पूरे मनोयोग से गाया है। निकिता की आवाज़ की तुलना शुभा जी की खुले गले वाली गहरी आवाज़ से तो नहीं की जा सकती पर उसने गीत की भावनाओं को सहजता से अपनी आवाज़ में पकड़ने की कोशिश जरूर की है।



और अब सुनिए इसे शुभा मुद्गल की आवाज़ में..





वैसे लोचनों की इस भाषा को पढ़ने में आपका अनुभव कैसा रहा है? क्या ऐसा तो नहीं कि आपने समझ कर भी उसे नज़रअंदाज़ कर दिया हो या फिर उनमें निहित भावनाओं को जरूरत से ज्यादा आँका हो ?

Thursday, May 15, 2014

दानेह पे दानेह दानना.... एक मस्ती भरा बलूची लोकगीत ! Daanah pe Daanah by Akhtar Chanal Zahri

लोकगीतों और लोकगायकों की सबसे बड़ी खासियत होती है कि उनके गाने का लहज़ा और रिदम कुछ इस तरह का होता है कि बिना भाषाई ज्ञान रखते हुए भी आप उस संगीत रचना से बँध कर रह जाते हैं। आज एक ऐसे ही गीत से आपको रूबरू करा रहा हूँ जिसकी भाषा बलूची है। इसे गाया है बलूची लोकगायक अख़्तर चानल ज़ाहरी  ने। बलूची रेडियो स्टेशन से पहली बार चार दशकों पहले अपनी प्रतिभा का परिचय देने वाले 60 वर्षीय ज़ाहरी पूरे विश्व में बलूची लोकसंगीत के लिए जाना हुआ नाम हैं। अपनी मिट्टी के संगीत के बारे में ज़ाहरी कहते हैं
"जिस जगह से मैं आता हूँ वहाँ बच्चे सिर्फ दो बातें जानते हैं गाना और रोना। संगीत से हमारा राब्ता बचपन से ही हो जाता है। बचपन में एक गड़ेरिए के रूप में अपनी भेड़ों को चराते हुए मैं जो नग्मे गुनगुनाता था वो मुझे आज तक याद हैं। मुझे तो ये लगता है कि हर जानवर, खेत खलिहान, फूल और यहाँ तक कि घास का एक क़तरा भी संगीत की धनात्मक उर्जा को महसूस कर सकता है।"
आज जिस बलूची गीत की बात मैं करने जा रहा हूँ उसे ज़ाहरी के साथ गाया था पाकिस्तानी गायिका कोमल रिज़वी ने।  बहुमुखी प्रतिभा वाली 33 वर्षीय कोमल गायिकी के आलावा गीतकार और टीवी होस्ट के रूप में भी पाकिस्तान में एक चर्चित नाम हैं। जिस तरह बलूचिस्तान के दक्षिणी इलाके के साथ सिंध की सीमाएँ सटती हुई चलती हैं उसी को देखते हुए कोक स्टूडियो की इस प्रस्तुति में बलूची गीत का सिंध के सबसे लोकप्रिय लोकगीत ओ यार मेरी..दमादम मस्त कलंदर के साथ फ्यूज़न किया है। फ्यूजन तो अपनी जगह है पर इस गीत का असली आनंद ज़ाहरी और कोमल रिज़वी द्वारा गाए बलूची हिस्से को सुन कर आता है।


गीत की भाषा ब्राह्वी है जो प्राचीन बलूचिस्तान की प्रमुख स्थानीय भाषा थी। ज़ाहिरी इस गीत के बारे में बताते हैं कि क्वेटा में जब वो एक दर्जी की दुकान में बैठे थे तो उन्होंने एक फकीर को दानेह पे दानेह दानना गाते सुना। इसी मुखड़े से उन्होंने बलूचिस्तान से जुड़े अपने इस गीत को विकसित किया। गीत के मुखड़े दानेह पे दानेह दानना का अर्थ है कि संसार के अथाह दानों में से एक दाना मेरा भी है। ज़ाहरी  के इस गीत में एक गड़ेरिया अपने बच्चों को बलूचिस्तान की नदियों, शहरों व प्राचीन गौरवमयी इतिहास और दंत कथाओं से परिचय कराता है। गीत के बीच बीच में जानवरों को हाँकने के लिए प्रचलित बोलियों का इस्तेमाल किया गया है ताकि लगता रहे कि ये एक चरवाहे का गीत है।


पर इस गीत का लोकगीत की सबसे मजबूत पक्ष इसकी रिदम और ज़ाहरी की जोरदार आवाज़ है जिसका प्रयोग वो अपने मुल्क की तारीफ़ करते हुए इस मस्ती से करते हैं कि मन झूम उठता है। कोमल ज़ाहरी के साथ वही मस्ती अपनी गायिकी में भी ले आती हैं। गीत के दूसरा हिस्सा मुझे उतना प्रभावित नहीं करता क्यूँकि दमादम मस्त कलंदर को इतनी बार सुन चुका हूँ कि उसे यहाँ सुनने में कुछ खास नयापन नहीं लगता।

इसलिए अगर आप सिर्फ बलूची हिस्से को सुनना चाहें तो नीचे की आडियो लिंक पर क्लिक करें।

Thursday, May 08, 2014

आज की शब तो किसी तौर गुजर जाएगी परवीन शाकिर की नज़्म मेरी आवाज़ में! Aaj ki Shab by Parveen Shakir

क्या आप  मानते हैं कि प्रेम में अनिश्चितता ना रहे, असुरक्षा की भावना ना हो तो प्रेम, प्रेम नहीं रह जाता? आप सोच रहे होंगे कि अचानक ये प्रश्न कहाँ से मेरे दिमाग में चला आया? दरअसल हाल फिलहाल में एक फेसबुक मित्र ने इसी आशय का एक स्टेटस ज़ारी किया जिसने मुझे भी इस विषय पर सोचने पर मजबूर कर दिया।

इतना तो जरूर है कि दिल का ये पंक्षी जब पहले पहल किसी के लिए फड़फड़ाता है तो अपनी हर उड़ान भरने के पहले इस दुविधा से त्रस्त रहता है कि आख़िर इस बार अंजामे सफ़र क्या होगा ? पर ये बैचैनी तो तभी तक रहती है ना जब तक आप इज़हार ए मोहब्बत नहीं कर देते ? नहीं नहीं, अगर उन्होंने हाँ कर भी दिया तो फिर कभी मूड बदल भी तो सकता है। पर एक बार रिश्ते में स्थायित्व आया नहीं कि मन के अंदर पनपने वाला ये खूबसूरत तनाव ख़ुद बा ख़ुद लुप्त सा हो जाता है। शायद यही वज़ह हो कि हम अपने साथी के प्रति थोड़ा लापरवाह हो जाते हैं।

बहरहाल प्यार की इन्हीं दुविधाओं के बारे में सोचते हुए परवीन शाक़िर साहिबा की एक नज़्म की शुरुआती पंक्तियाँ 'आज की शब तो किसी तौर गुजर जाएगी' याद आ गयीं। फिर लगा क्यूँ ना पूरी नज़्म ही खँगाली जाए। मिल गयी तो मन इसे गुनगुनाने का हुआ।  सो आनन फानन में इसे रिकार्ड किया। कहीं कहीं volume अचानक से बढ़ गया है उसके लिए पहले ही ख़ेद व्यक्त कर रहा हूँ। वैसे मेरा ये प्रयास आपको कैसा लगा बताइएगा।

 

रात गहरी है मगर चाँद चमकता है अभी
मेरे माथे पे तेरा प्यार दमकता है अभी

मेरी साँसों में तेरा लम्स महकता है अभी
मेरे सीने में तेरा नाम धड़कता है अभी

ज़ीस्त करने को मेरे पास बहुत कुछ है अभी
तेरी आवाज़ का जादू है अभी मेरे लिए
तेरे मलबूस1 की खुशबू है अभी मेरे लिए
तेरी बातें तेरा पहलू है अभी मेरे लिए
सब से बढ़कर मेरी जाँ तू है अभी मेरे लिए
ज़ीस्त2 करने को मेरे पास बहुत कुछ है अभी
आज की शब3 तो किसी तौर गुजर जाएगी

आज के बाद मगर रंग -ए-वफ़ा क्या होगा
इश्क़ हैरान है कि सर शहर- ए -सबा4 क्या होगा
मेरे क़ातिल तेरा अंदाज़ ए ज़फा क्या होगा
आज की शब तो बहुत कुछ है मगर कल के लिए
एक अंदेशा ए बेनाम है और कुछ भी नहीं


देखना ये है कि कल तुझसे मुलाकात के बाद
रंग ए उम्मीद खिलेगा कि बिखर जाएगा
वक़्त परवाज़ करेगा कि ठहर जाएगा
जीत हो जाएगी या खेल बिगड़  जाएगा
ख़्वाब का शहर रहेगा कि उजड़ जाएगा....


1 पोशाक  2. जीवन में  3. रात,  4.सुबह चलने वाली हवा

परवीन शाकिर को बहुत दिनों बाद याद कर रहा हूँ इस ब्लॉग पर। अगर आप उनकी रचनाओं के मुरीद हैं तो उनकी लिखी चंद खूबसूरत ग़ज़लों और अशआरों से जुड़े इन लेखों को यहाँ पढ़ सकते हैं..

Tuesday, April 29, 2014

आमाय भाशाइली रे ..क्या था गंगा आए कहाँ से..का प्रेरणास्रोत ? Aamay Bhashaili Ray..Ganga Aaye Kahan Se

कुछ दिनों पहले कोक स्टूडियो के सीजन 6 के कुछ गीतों से गुजर रहा था तो अचानक ही  बाँग्ला शीर्षक वाले  इस नग्मे पर नज़र पड़ी। मन में उत्सुकता हुई कि कोक स्टूडियो में बांग्ला गीत कब से संगीतबद्ध होने लगे। आलमगीर की गाई पहली कुछ पंक्तियाँ कान में गयीं तो लगा कि अरे इससे मिलता जुलता कौन सा हिंदी गीत मैंने सुना है? ख़ैर दिमाग को ज़्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी और तुरंत फिल्म काबुलीवाला के लिए सलिल चौधरी द्वारा संगीतबद्ध और गुलज़ार द्वारा लिखा वो गीत याद आ गया  गंगा आए कहाँ से, गंगा जाए कहाँ रे..लहराए पानी में जैसे धूप छाँव रे....

जब इस ब्लॉग पर सचिन देव बर्मन के गाए गीतों की श्रंखला चली थी तो उसमें माँझी और भाटियाली  गीतों पर मैंने विस्तार से चर्चा की थी। बाँग्लादेश के लोक संगीत को कविता में ढालने वाले कवि जसिमुद्दीन की रचनाओं और धुनों से प्रेरित होकर सचिन दा ने बहुतेरे गीतों की रचना की। जब मैंने आमाय भाशाइली रे. सुना तो सलिल दा को भी उनसे प्रेरित पाया।  वैसे पाकिस्तान के पॉप संगीत के कर्णधारों में से एक आलमगीर ने कवि जसिमुद्दीन के लिखे जिस गीत को अपनी आवाज़ से सँवारा है उसे सलिल दा काबुलीवाले के प्रदर्शित होने से भी पहले बंगाली फिल्म में मन्ना डे से गवा चुके थे।


ख़ैर मन्ना डे तो मन्ना डे हैं ही पर पन्द्रह साल की आयु में अपना मुल्क बाँग्लादेश छोड़कर कराची में बसने वाले आलमगीर ने भी इस गीत को इतने दिल से गाया है कि मात्र दो मिनटों में ही वो इसमें प्राण से फूँकते नज़र आते हैं। इस गीत की लय ऐसी है कि अगर आपका बाँग्ला ज्ञान शून्य भी हो तो भी आप अपने आप को इसमें डूबता उतराता पाते हैं। कोक स्टूडिओ की इस प्रस्तुति में खास बात ये है कि इस लोकगीत में संगीत सर्बियन बैंड का है जो कि गीत के साथ ही बहता सा प्रतीत होता है।

तो आइए देखें इस लोकगीत में कवि जसिमुद्दीन हमसे क्या कह रहे हैं

आमाय भाशाइली रे आमाय डूबाइली रे
अकूल दोरियर बूझी कूल नाई रे


मैं भटकता जा रहा हूँ..मुझे कोई डुबाए जा रहा है इस अथाह जलराशि में जिसका ना तो कोई आदि है ना अंत

चाहे आँधी आए रे चाहे मेघा छाए रे
हमें तो उस पार ले के जाना माँझी रे

कूल नाई कीनर नाई, नाई को दोरियर पाड़ी
साबधाने चलइओ माँझी आमार भंग तोरी रे
अकूल दोरियर बूझी कूल नाइ रे


इस नदी की तो ना कोई सीमा है ना ही कोई किनारा नज़र आता है। माँझी मेरी इस टूटी नैया को सावधानी पूर्वक चलाना ताकि हम सकुशल अपने ठिकाने पहुँचें।

दरअसल कवि सांकेतिक रूप से ये कहना चाहते हैं कि ये जीवन संघर्ष से भरा है। लक्ष्य तक पहुँचने के लिए जोख़िमों का सामना निर्भय और एकाग्र चित्त होकर करना पड़ेगा वर्ना इस झंझावत में डूबना निश्चित ही है।

काबुलीवाला में  गुलज़ार ने  गंगा की इस प्रकृति को उभारा है कि उसमें चाहे जितनी भी भिन्न प्रकृति की चीज़ें मिलें वो बिना उनमें भेद किए हुए उन्हें एक ही रंग में समाहित किए हुए चलती है। गीत के अंतरों में आप देखेंगे कि किस तरह गंगा के इस गुण को गुलज़ार प्रकृति और संसार के अन्य रूपकों में ढूँढते हैं?

गंगा आए कहाँ से, गंगा जाए कहाँ रे
आए कहाँ से, जाए कहाँ रे
लहराए पानी में जैसे धूप छाँव रे

रात कारी दिन उजियारा मिल गए दोनों साए
साँझ ने देखो रंग रूप के कैसे भेद मिटाए रे
लहराए पानी में जैसे धूप छाँव रे, गंगा आए कहाँ से....

काँच कोई माटी कोई रंग बिरंगे प्याले
प्यास लगे तो एक बराबर जिस में पानी डाले रे
लहराए पानी में जैसे धूप छाँव रे, गंगा आए कहाँ से....

गंगा आए कहाँ से, गंगा जाए कहाँ रे
आए कहाँ से, जाए कहाँ रे
लहराए पानी में जैसे धूप छाँव रे

नाम कोई बोली कोई लाखों रूप और चहरे
खोल के देखो प्यार की आँखें सब तेरे सब मेरे रे
लहराए पानी में जैसे धूप छाँव रे, गंगा आए कहाँ से....

 

Saturday, April 19, 2014

'लिखना ज़रूरी है' : सोनरूपा विशाल ( Likhna Zaroori Hai... )

अपने आप को व्यक्त करने की इच्छा हम सबमें से बहुतों की होती है। कभी जब ये कसक ज़रा ज्यादा जोर मारती है तो हम काग़ज़ के पन्नों को रंगते हैं और फिर भूल जाते हैं। पहले तो अपना लिखा देखकर ये लगता है भला इसे पढ़ेगा कौन? फिर ये भी लगता है कि अगर किसी ने पढ़ लिया और एक सिरे से ख़ारिज़ कर दिया तो फिर इस तरह नकारे जाने का दर्द ना जाने कब तक मन को टीसता रहेगा। कुछ दिनों पहले  कैफ़ी आज़मी से जुड़ा संस्मरण बाँटते समय बताया था कि ये झिझक और बढ़ जाती है जब अपने ही घर में लिखने पढ़ने वाले इतना नाम कमा गए हों कि उनके सामने अपनी हर कृति बौनी लगे। इसी संकोच की वज़ह से बहुतेरे अपने को कम आँकते हुए उसे सबके सामने लाने की ज़हमत नहीं करते और कुछ क़ैफी जैसे होते हैं तो हर उस मौके, उस दबाव को ध्यान में रखते हुए अपने हुनर का इम्तिहान देने से ज़रा भी नहीं कतराते।

सोनरूपा विशाल के पहले ग़ज़लों और नज़्मों का संग्रह 'लिखना ज़रूरी है' को भी इसी परिपेक्ष्य में देखना जरूरी है। लेखिका की पहचान एक ख्याति प्राप्त गीतकार कवि उर्मिलेश की सुपुत्री और एक ग़ज़ल गायिका की रही है। लेखिका भी इस पुस्तक को पाठकों के सम्मुख रखने से पहले उन्हीं मनोभावनाओं से गुजरी हैं जिसका मैंने ऊपर जिक्र किया है इसीलिए पुस्तक की प्रस्तावना में उनकी ये झिझक साफ दिखाई देती है जब वो लिखती हैं..
मैं वाकई इतनी काबिलियत नहीं रखती कि ग़ज़ल और ग़ज़लकारों की विराट परंपरा की फेरहिस्त में अपनी छोटी सी लेखन यात्रा से ख़ुद को एक संग्रह के माध्यम से खड़ा कर सकूँ। बस इतना मान लीजिए कि ये ग़ज़लें मेरी एहसास की शिद्दत हैं, मेरे रंग, कुछ देखे समझे तमाशे, धुँध में से रौशनी देखने की हसरत, निजत्व की तलाश, आसपास का परिवेश, विसंगतियाँ, जज़्बात, शिकन, हरारतें हैं।
ये भी है कि जो अपने अंदर की आवाज़ को समझ पाते हैं उनकी लेखनी पर ज्यादा विराम नहीं लग सकता। सोनरूपा ने अपनी इस फ़ितरत को समझा और इसीलिए वो लिखती हैं

मेरे जज़्बात को स्याही का रंग मिलना जरूरी है
मुझे रहना हो गर ज़िंदा तो फिर लिखना जरूरी है

पिता मेरे मुकम्मल थे हर इक अंदाज़ में लेकिन
तो थोड़ा इल्म उनका भी मुझे मिलना जरूरी है

इस संकलन में सोनरूपा की लिखी सौ के करीब ग़ज़लें और नज़्मे हैं जिनमें एक चौथाई हिस्सा नज़्मों का है। उनकी भाषा में एक सहजता है। पर इसी सहजता से अपने अशआरों में वो जगह जगह मानवीय भावनाओं का आकलन करती चलती हैं। मिसाल के तौर पर छोटी बहर के इन अशआरों पर गौर फ़रमाएँ

जो हर पल हँसते रहते हैं
उनके दिल सुनसान समझिए

रोज चुभेंगे काँटे दिल में
फूलों से नुकसान समझिए

और उनकी इस सोच को आप या मैं शायद ही कोई नकार सके। ज़िदगी के ये अनुभव यूँ तो हम सबने जिये हैं पर जब वो इन शेरों की शक़्ल ले कर हमसे टकराते हैं तो उनका असर कुछ और होता है।

परेशाँ जब भी होते हैं. ख़ुदा के पास आते हैं
नहीं तो एक मूरत है ये कह के भूल जाते हैं

किसी सूरत भी अपना हाले दिल उनसे नहीं कहना
ये रो रोकर जो सुनते हैं, वही हँस हँस उड़ाते हैं

और उनके ये शेर तो खास दाद का हक़दार है

कई अंदाज़ रखते हैं कई किरदार जीते हैं
यही आदत उन्हें ख़ुद से मिलने नहीं देती

हम कुछ भी लिखते हैं तो उसे लिखते समय मन में कोई ना कोई रहता ही है पर फिर सारी चतुराई इस बात पर भी रहती है कि अपनी अभिव्यक्ति के चारों ओर शब्दों का वो जाल बुने कि अगला समझते हुए भी असमंजस में रहे। तब भी लिखने वाले की वही उम्मीद रहती है जो सोनरूपा की है..

मेरे अशआर तुम समझ लेना
अपना किरदार तुम समझ लेना

जिसने सोचा न हो नफ़ा नुकसान
वो खरीदार तुम समझ लेना

सोनरूपा की लेखनी में कहीं दार्शनिकता का पुट है

ये बच्चे ये मकाँ, ये मालो दौलत सब है मुट्ठी में
मगर मिट्टी ही आख़िर में मेरा तेरा ठिकाना है

जिनको दर सस्ती लगे एहसास की
उनकी कीमत भी गिरानी चाहिए
इक कलंदर ने हमें समझा दिया
ज़िंदगी कैसे बितानी चाहिए

सच्चाई तो कछुए जैसी चलती है
झूठे किस्से पानी जैसे बहते हैं

तो कहीं रूमानियत से भरे एहसास भी

हमसफ़र हमनवाँ सा लगता है
चाँद अब आशना सा लगता है
देखने में तो कोरा काग़ज़ है
और सब कुछ लिखा सा लगता है

उनकी एक ग़ज़ल तो बेज़ान सी लगने वाली खिड़कियों को समर्पित है। प्रेम, प्रतीक्षा, हिंसा और बाहरी दुनिया से एक सेतु के रूप में देखा है उन्होंने इन खिड़कियों को अपनी ग़ज़ल में। अपनी बात करूँ तो इन झरोखों की वज़ह से मेरे दिल के रोशनदान को कई बार उम्मीदों की धूप सेंकने का अवसर मिला है इस लिए ये शेर मुझे बेहद अपना सा लगता है जब लेखिका कहती हैं

गुनगुनाती मुस्कुराती खिड़कियाँ
इश्क़ का जादू जगाती खिड़कियाँ

और अगला शेर पढ़ते हुए दंगों के बीच अपने शहर का वो दिन याद आ जाता है

हर तरफ़ सड़कों पर वो कोहराम है
डर से जिसके सहम जाती खिड़कियाँ

ये तो हुई ग़ज़लों की बातें। इस किताब में सोनरूपा की दो दर्जन नज़्में भी शामिल हैं। अगर ईमानदारी से कहूँ तो उनकी लिखी नज़्मों में मुझे उनकी ग़ज़लों से ज्यादा प्रभावित किया। नज़्मों में लेखिका के व्यक्तित्व के दर्शन होते हैं। इन नज़्मों में वो अपने उन सभी रंगों में नज़र आती हैं जिसे उन्होंने अपने जीवन के विभिन्न पड़ावों पर जिया है। कुछ नज़्मों का खास जिक्र करना चाहूँगा। अपनी माँ के प्रति कृतज्ञता को वो प्यारे अंदाज़ में यूँ व्यक्त करती हैं।

बुहार देती हो तुम
हर दर्द मेरा
बिखरती हूँ मैं
जब भी
तुम्हारे आगे
पत्ते की तरह !


उनकी नज़्म 'आसानियाँ भी दुश्वारियाँ हैं..' में भौतिक सुख सुविधाओं के बीच पली बढ़ी एक स्त्री के मन का कचोट सामने आता है। ये प्रश्न लेखिका को सालता है कि जीवन के कष्टों को बिना ख़ुद झेले हुए क्या कोई उस वर्ग का दुख समझ सकता है। एक छोटी बच्ची के साथ हुए बलात्कार पर व्यथित हृदय से लिखी उनकी नज़्म 'तुम ....' मन को झकझोर जाती है। वहीं दूसरी तरफ़ 'अल्हड़ लड़की का चाँद' में चाँद के साथ किशोरी की गुफ्तगू को पढ़कर मन ठेठ रूमानियत के धागों में बँधा चला जाता है। आपको यकीन नहीं होता तो आप ख़ुद ही लेखिका की आवाज़ में इसे सुन कर देखिए....

खुल गई अंबर की गाँठ
छिटके तारे और
बादलों के नाजुक से फाहों के बीच से
उतरे तुम
रात के चमकीले शामियानों के सजीले चितचोर
रात की झिलमिल झील की पतवार
दुनिया भर की प्रेम कथाओं के कोहीनूर..ओ चाँद....




तो चलते चलते यहीं कहना चाहूँगा कि पहली कोशिश के रूप में ये पुस्तक नई संभावनाओं को जगाती है। अगर सोनरूपा इसी तरह अपने हुनर को माँजती रहें तो वो निश्चय ही इससे भी बेहतर कर सकने का सामर्थ्य रखती हैं। एक पाठक के रूप में मेरी तो उनसे यही उम्मीद रहेगी..

जब चलें तो खुशबुओं का साथ हो
क़ैद मुट्ठी में हवाएँ ना हो जाएँ

जिनकी मंजिल हो आसमाँ से परे
वो कलम फिक्रे ज़हाँ में ना खो
जाएँ

पुस्तक के बारे में
नाम :  लिखना जरूरी है
प्रकाशक : हिन्द युग्म प्रकाशन
पृष्ठ 96, मूल्य  Rs.200

Sunday, April 13, 2014

हज़ार शानदार सूर्यों वाला काबुल ! A Thousand Splendid Suns..

अस्सी के दशक की आख़िर और नब्बे के दशक में अफ़गानिस्तान, आकाशवाणी के सुबह और रात में आने वाले समाचारों में सुनाई जाने वाली अंतरराष्ट्रीय ख़बरों का अहम हिस्सा हुआ करता था। यही वो समय था जब मैं नजीबुल्लाह, अहमद शाह मसूद, गुलुबुद्दीन हिकमतयार और दोस्तम जैसे लड़ाकों के नाम से परिचित हुआ था। समाचार पत्रों और पत्र पत्रिकाओं में छपे लेखों की बदौलत दो दशकों के अंतराल में सोवियत संघ द्वारा नियंत्रित उदारवादी व्यवस्था से लेकर भरे मैदान में जनता के सामने तथाकथित अपराधियों को सज़ा देते तालिबानी लड़ाकों तक काबुल के बदलते रूप देखे। सोवियत शासन हो या मुज़ाहिदीन या फिर तालिबान किसी भी दौर में ये देश हिंसा और प्रतिहिंसा के दौर से मुक्त नहीं रहा। समझ नहीं आता था कि इस देश के लोग किस मिट्टी के बने हैं कि इतनी आपसी तबाही के बाद भी एक दूसरे को नेस्तानाबूद करने का जज़्बा जाता नहीं है?


यही वज़ह रही कि जब अफ़गान लेखक ख़ालिद होसैनी की किताब चार दिन पहले पढ़नी शुरु की तो ये आशा थी कि इस देश की व्यथा को और करीब से समझने का मौका मिलेगा। इसे कहने में मुझे कोई संशय नहीं कि ख़ालिद मेरी आशाओं पर पूरी तरह खरे उतरे। काबुल में जन्मे 49 वर्षीय होसैनी अपनी पहली किताब The Kite Runner से विख्यात हुए। 1980 में वो अमेरिका चले गए। लेखन और डॉक्टरी के आलावा वो विश्व में फैले अफ़गानी शरणार्थियों की मदद के लिए भी तत्पर रहते हैं।


सालों साल हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों में सामाजिक संरचना ही क्षत विक्षत हो जाती है और अगर ये समाज कट्टर इस्लामी अनुयायियों द्वारा संचालित हो तो सबसे बुरी दशा होती है महिलाओं और बच्चों की। ख़ालिद ने अपनी किताब में  इस सामाजिक प्रताड़ना को सहती और उससे सफलता पूर्वक जूझती दो महिलाओं की कथा कही है। यूँ तो कथा अफ़गानिस्तान के शहर हेरात से शुरु होती है पर उपन्यास का केंद्र काबुल ही है और इसीलिए लेखक ने पुस्तक का शीर्षक सत्रहवीं शताब्दी में साइब ए तबरीज़ी द्वारा लिखी कविता 'काबुल' से लिया है। साइब काबुल के बारे में लिखते हैं..

One could not count the moons that shimmer on her roofs,
Or the thousand splendid suns that hide behind her walls. 
(Translated by Josephine Davis)

साहित्य समीक्षकों का ऐसा मानना है कि यहाँ चाँद और सूरज की तुलना काबुल के नर नारियों से की गई है। जहाँ काबुल की छतों पर चमकते चाँद वहाँ के घरों के जाँबाज़ मुखिया हैं तो वहीं घर के परकोटों में रहने और उसे सँभालने वाली स्त्रियाँ हज़ारो चमकते सूर्य की भांति हैं जिनकी सुंदरता और ममत्व से अफ़गानी समाज जीवंत है। पर मुगलिया सल्तनत की हुकूमत वाला सत्रहवीं शताब्दी का वो काबुल तीन सौ सालों बाद भी क्या वैसा रह पाया? ख़ालिद इस प्रश्न का जवाब विगत चार दशकों के अफ़गानिस्तान के हालातों को बताते हुए पुस्तक के दो मुख्य महिला चरित्रों के माध्यम से देते हैं।

उपन्यास के ये दो चरित्र है मरियम और लैला । पहले बात मरियम की। मरियम का सबसे बड़ा दोष ये है कि वो एक हरामी है और इसीलिए रईस बाप के होते हुए भी अपनी माँ के साथ हेरात शहर से दूर एक छोटे से दबड़ेनुमा घर में रहती है। मर्दों के बारे में अपनी माँ के सदवचनों पर मरियम कभी विश्वास नहीं करती। उसकी माँ पुरुषों के बारे में उसे हमेशा कहा करती थी
"A man's heart is a wretched, wretched thing. It isn't like a mother's womb. It won't bleed. It won't stretch to make room for you.............. Learn this now and learn it well, my daughter: Like a compass needle that points north, a man's accusing finger always finds a woman."
वो उसे एक हारी हुई औरत की निराशा मानती। पर ज़िंदगी की राहों पर भटकते हुए उसे इनकी सत्यता का अनुभव हुआ। मरियम के हालात किसी भी विकासशील देश के निम्न मध्यम वर्गीय गरीब महिला जैसे ही हैं जो अपने घरों में अकारण पिटती हैं। जिनकी एकमात्र खासियत उनका शरीर है और जिसे जब चाहे भोगना एक पुरुष का अधिकार। शरीर से खेलते खेलते अगर उनकी कोख एक बेटे को जन्म दे दे तो सौभाग्य नहीं तो फिर किसी दूसरे शरीर से खेलने की पति को छूट। 

मरियम के विपरीत लैला एक मध्यमवर्गीय परिवार में अपने बुद्धिजीवी पिता की लाड़ली बेटी है। अपनी कुशाग्र बेटी के लिए पिता काबुल के बिगड़ते हालातों के बीच भी अच्छी ज़िंदगी की उम्मीद रखता है पर गृहयुद्ध में फँसे काबुल के चारों ओर की पहाड़ियों से चला एक रॉकेट इन सपनों पर तुषारापात करने के लिए काफी होता है। वक़्त की मार लैला को मरियम की सौत के रूप में ला खड़ा करती है। 

मरियम की लैला के प्रति नफ़रत किस तरह प्रेम में बदलती है ये तो मैं आपको नहीं बताऊँगा पर इतना जरूर कहूँगा कि ख़ालिद की लेखन शैली ऐसी है कि चार सौ पृष्ठों की इस किताब से आप बँध कर रह जाते हैं। लेखक जब प्रताड़ना के क्षणों को विस्तार देते हैं तो पाठक की रुह काँप उठती है। वहीं उन्होंने माँ और बच्चे के वातसल्य, अकेलेपन और अवसादग्रस्त ज़िदगी जीने को अभिशप्त पात्रों के मानसिक हालातों और दो प्रेमियों  के मन की भावनाओं का सजीव चित्रण किया है।

तालिबान के बारे में हम सबने सुना है पर महिलाओं के प्रति उनके नज़रिए को एक बार यहाँ फिर से दोहरा देना सही होगा। लड़कियाँ पढ़ नहीं सकती। सज नहीं सकती। घर के बाहर बिना किसी मर्द के नहीं जा सकती। अगर गई तो पीटी जाएँगी मर्दों से नज़रें नहीं मिला सकती। सबके सामने हँस नहीं सकती। काम नहीं कर सकती। बिना पूछे जवाब नहीं दे सकती। नाचना, चित्रकला और गाना, ताश, शतरंज और पतंगबाजी के लिए तो लड़कों को भी मनाही थी। पर ऐसा नहीं हैं कि अफ़गानिस्तान में ऐसी व्यवस्था सबसे पहले तालिबानी लाए। काबुल और कुछ अन्य शहरी इलाकों को छोड़ दें तो अफ़गानिस्तान का अधिकांश कबीलाई इलाका इसी तरह की पाबंदियों के बीच आज भी जी रहा है और अपने आप को बदलने की किसी भी कोशिश का पुरज़ोर विरोध करता है।

लेखक ने काबुल के हालातों को इस किताब में कई रूपकों से इंगित करने की कोशिश की है। उनमें से दो का जिक्र करना जरूरी होगा। वे हेमिंग्सवे के उपन्यास The Old Man and the Sea की बात करते हैं जिसमें एक वृद्ध मछुआरा बड़ी मुश्किल से एक बड़ी मछली का शिकार कर अपनी छोटी नाव से घसीटता हुआ एकदम किनारे तक पहुँचता ही है कि उसका शिकार कई शार्क द्वारा टुकड़े टुकड़े कर दिया जाता है। दरअसल लेखक ये बताना चाहते हैं कि काबुल की हालत उस शिकार की है जिसे जीतने के लिए सब उसे छिन्न भिन्न करने से नहीं हिचकिचाते।
 
अब ज़रा लेखक द्वारा प्रयुक्त एक दूसरे रोचक रूपक पर गौर करें। ये रूपक है फिल्म Titanic का। लेखक तालिबानी समय (2000) में आई फिल्म Titanic के काबुल में जबरदस्त लोकप्रियता का विवरण कुछ यूँ देते हैं।
That summer, Titanic fever gripped Kabul. People smuggled pirated copies of the film from Pakistan- sometimes in their underwear. After curfew, everyone locked their doors, turned out the lights, turned down the volume, and reaped tears for Jack and Rose and the passengers of the doomed ship. At the Kabul River, vendors moved into the parched riverbed. Soon, from the river's sunbaked hollows, it was possible to buy Titanic carpets, and Titanic cloth, from bolts arranged in wheelbarrows. There was Titanic deodorant, Titanic toothpaste, Titanic perfume, Titanic pakora, even Titanic burqas. A particularly persistent beggar began calling himself "Titanic Beggar.""Titanic City" was born.

Titanic की इस लोकप्रियता के कई कारण हो सकते हैं पर लेखक अपने गढ़े चरित्र लैला के माध्यम से कहते हैं कि निराशा और विध्वंस के इस माहौल में काबुल के लोग सोचते हैं कि फिल्म की नायिका की तरह उन्हें भी बचाने कोई जरूर आएगा। अफ़गानिस्तान से जुड़े कई अन्य उपन्यासों की तरह A Thousand Splendid Suns.. में भी रोज़ मरते लोगों और उनकी असहनीय पीड़ा का मार्मिक चित्रण है पर साथ ही किताब ये भी दिखाती है कि लोगों ने इतनी कठिनाइयों से जूझते हुए किस तरह जीवन में आगे बढ़ने की कोशिशें की हैं और इसमें प्रेम की भावना किस तरह सहायक सिद्ध हुई है। ख़ालिद के शब्दों में कहें तो 
"Love can move people to act in unexpected ways and move them to overcome the most daunting obstacles with startling heroism”
निश्चय ही ये पुस्तक पढ़ने योग्य है। आज भारत में कई ताकतें इस मुल्क को पीछे खींचने पर तुली हैं। ऐसे रास्ते किन भयावह परिस्थितियों की ओर ले जाते हैं ये इस किताब को पढ़कर कोई भी महसूस कर सकता है।

 

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