Sunday, August 30, 2015

ये जो उठता है दिल में रह रह कर. अब्र है या ग़ुबार है क्या है Ye Jo Qaul O Qaraar Hai Kya Hai : Firaq Gorakhpuri

विनोद सहगल याद आते हैं आपको ? जगजीत सिंह के दो मशहूर एलबमों से उनका जुड़ाव मुझे तो उनकी आवाज़ से दूर नहीं जाने देता। इंटर में था जब मिर्जा गालिब में उनके द्वारा गाई ग़ज़ल कोई दिनगर ज़िंदगानी और है.... सुनी थी। पर फिर नव्बे के दशक की शुरुआत में कहक़शाँ में उनकी आवाज़ जो गूँजी वो गूँज धीरे धीरे कहाँ विलुप्त हो गई पता ही नहीं चला। कुछ फिल्मों में मौके तो मिले पर माचिस का छोड़ आए हम वो गलियाँ के सामूहिक स्वर के आलावा शायद ही कोई गीत श्रोताओं तक ठीक से पहुँच सका। पर उनकी रुहानी आवाज़ रह रह कर यादों के गुलिस्ताँ से कानों तक यू ट्यूब के माध्यम से पहुँचती रही। आज आपको दूरदर्शन द्वारा उर्दू कवियों पर बनाया गए धारावाहिक कहक़शाँ की वो दिलकश ग़ज़ल सुनवाने जा रहा हूँ जो फिराक़ गोरखपुरी ने लिखी थी। पर इस पहले कि उस ग़ज़ल से आपका परिचय कराऊँ कुछ बातें इस गुमनाम से फ़नकार के बारे में.. 


अम्बाला में जन्मे विनोद सहगल का संगीत से विधिवत परिचय उनके पिता सोहन लाल सहगल के माध्यम से हुआ था। आशा छाबड़ा, आर एम कुलकर्णी व चमन लाल जिज्ञासु जैसे शिक्षकों का आशीर्वाद पाने वाले विनोद सहगल का सितारा पहली बार तब बुलंद हुआ जब नए ग़ज़ल गायकों को बढ़ावा दे रहे ग़ज़ल सम्राट जगजीत सिंह की नज़र उन पर पड़ी।


अस्सी के दशक में जगजीत के साथ विनोद सहगल को दो एलबमों में काम करने का मौका मिला। पहला तो “Brightest talents of 80’s” और फिर “Jagjit Singh presents Vinod Sehgal। पर अशोक खोसला, घनश्याम वासवानी और सुमिता चक्रवर्ती जैसे ग़ज़ल गायकों के साथ संगीत की दुनिया में क़दम रखने वाले विनोद तेजी से बदलते संगीत में अपना मुकाम नहीं पा सके जिसके वे हक़दार थे।

कहकशाँ में विनोद सहगल ने फिराक़ की लिखी कई ग़ज़लें गायी हैं पर आज आपसे जिक्र  ये जो क़ौल-ओ-क़रार है क्या है.. का करना चाहूँगा। फिराक़ गोरखपुरी की निजी ज़िंदगी के बारे में पहले भी विस्तार से लिख चुका हूँ। घरेलू ज़िदगी इतनी तकलीफ़देह (जिसके लिए वे ख़ुद काफी हद तक जिम्मेदार थे) होने के बावज़ूद उन्होंने शेर ओ शायरी में मोहब्बत से जुड़े वो रंग बिखेरे कि कहाँ दाद दें कहाँ छोड़े इसका फैसला करना उन्हें पढ़ने सुनने वालों के लिए मुश्किल ही रहा है। अब इस ग़ज़ल को ही देखिए एक बिखरे हुए हुए रिश्ते में उम्मीद की लौ तलाश रहे हैं फिराक़ साहब

ये जो क़ौल-ओ-क़रार है क्या है
शक़ है या ऐतबार है क्या है

ये जो उठता है दिल में रह रह कर
अब्र है या ग़ुबार है क्या है


तुम्हारा दिया हुआ वचन, हमारी वो कभी ना बिछड़ने की प्रतिज्ञा आख़िर क्या थी? उस क़रार को मैं शक़ की नज़रों से देखूँ या अभी भी तुम्हारा विश्वास करूँ। दिल का तो ये आलम है कि तुम्हारी यादों की रह रह कर एक हूक़ सी उठती है। क्या इन्हें अपने मन में अब भी तुम्हारे लिए मचलती भावनाओं की घटाएँ मानूँ या  मेरे अंदर तुम्हारी बेवफाई से उपजा हुआ रोष , जो दबते दबाते भी बीच बीच में प्रकट हो ही जाता है।

ज़ेर-ए-लब इक झलक तबस्सुम की
बर्क़ है या शरार है क्या है

कोई दिल का मक़ाम समझाओ
घर है या रहगुज़ार है क्या है


क्या कहूँ आज भी समझ नहीं पाता तुम्हारे होठों से छलकती उस मुस्कुराहट में ऐसा कौन सा नशा था जिसे देख कभी दिल पर बिजलियाँ सा गिरा करती थीं । आज तुम्हारे उसी तबस्सुम की याद से हृदय में एक चिंगारी सी जल उठती है। मैंने तो सोचा था कि मेरे दिल को तुम अपना आशियाना बना लोगी। पर अब लगता है कि  वो तो उस रास्ते की तरह था जहाँ तुम एक मुसाफ़िर बन कर आई और चली गयी।

ना खुला ये कि सामना तेरा
दीद है इंतज़ार है क्या है


देखो तो आज फिर तुम्हारा सामना हुआ। तुम्हारी इन तकती आँखों को पढ़ने की कोशिश में हूँ। क्या इसे मैं सिर्फ तुम्हारी एक झलक पाने का संयोग मानूँ या फिर दिल में तुम्हारे इंतज़ार की थोड़ी ही सही गुंजाइश छोड़ दूँ।

फिराक़ की भावनाओं की इस कशमकश को विनोद सहगल की आवाज़ में सुनना मन को ठहराव सा दे जाता है खासकर जिस अंदाज़ में क्या है.. को निभाते हैं। तो आइए जगजीत सिंह के रचे संगीत पर सुनें विनोद सहगल की गाई ये ग़ज़ल



एक शाम मेरे नाम पर जगजीत सिंह और कहकशाँ 

Wednesday, August 19, 2015

तू बिन बताए मुझे ले चल कहीं ... Tu bin bataye .. Rang De Basanti

रंग दे बसंती याद है ना आपको! नौ साल पहले आई इस फिल्म ने समूचे जनमानस विशेषकर युवाओं के मन को खासा उद्वेलित किया था। फिल्म के साथ साथ इसके गीत भी बेहद चर्चित हुए थे। शीर्षक गीत मोहे तू रंग दे बसंती तो लोकप्रिय हुआ ही था, साथ ही साथ रूबरू, खलबली, पाठशाला, लुका छिपी भी पसंद किए गए थे। ए आर रहमान द्वारा संगीत निर्देशित इस फिल्म में प्रसून जोशी का लिखा एक रूमानी नग्मा और भी था जिसे सुन कर मन में आज भी एक तरह का सुकून तारी हो जाता है। गीत के बोल थे तू बिन बताए मुझे ले चल कहीं... जहाँ तू मुस्कुराए मेरी मंज़िल वहीं... तो आज बात करते हैं इसी गीत के बारे में

पहली पहली बार किसी से प्रेम होता है तो ढेर सारी बैचैनियाँ साथ लाता है। एक ओर तो मन उस संभावित सहचर के साथ मीठे मीठे सपने भी बुन रहा होता है तो दूसरी ओर उसे अपनी अस्वीकृति का भय भी सताता है।

पर प्रसून जोशी का लिखा ये नग्मा प्रेम के प्रारंभिक चरण की इस उथल पुथल से आगे की बात कहता है जब प्रेम में स्थायित्व आ चुका होता है। रिश्ते की जड़ें इतनी मजबूत हो जाती हैं कि प्रेमी उससे निकलते नित नए पल्लवों व पुष्पों के सानिध्य से आनंदित होता रहता है। दरअसल प्रेम आपसी विश्वास और सम्मान का दूसरा नाम है और जब इनका साथ हो तो गलतफ़हमियों की कोई हवा उस पौधे को उखाड़ नहीं सकती।

प्रसून  जोशी ने इस गीत के बारे अपनी किताब Sunshine Lanes में लिखा है

"प्यार कैसे किसी व्यक्ति को पूर्णता प्रदान करता है..कैसे अपने परम प्रिय की शारीरिक अनुपस्थिति भी उसे उसके प्रभाव घेरे से मुक्त नहीं कर पाती..ये बात मुझे हमेशा से अचंभित करती रही है। अपने उस ख़ास की छाया, उसकी बोली, उसके स्पर्श के अहसास से हम कभी दूर नहीं हो पाते। सिर्फ उस इष्ट के ख्याल मात्र से मन की सूनी वादी एक दम से हरी भरी लगने लगती है। प्रेम के इस अवस्था में प्रश्नों के लिए कोई स्थान नहीं । जगह होती है तो सिर्फ समर्पण की,वो भी बिना सवालों के और मेरा ये गीत प्रेम के इसी पड़ाव के बीच से मुखरित होता है।"

रंग दे वसंती का ये गीत गाया है मधुश्री ने। मधुश्री ए आर रहमान की संगीतबद्ध फिल्मों में बतौर गायिका एक जाना पहचाना चेहरा रही हैं। बहुत कम लोगों को पता है कि कभी नीम नीम कभी शहद शहद  (युवा), हम हैं इस पल यहाँ ...(कृष्णा), इन लमहों के दामन में ....(जोधा अकबर) जैसे शानदार नग्मों को गाने वाली मधुश्री का वास्तविक नाम सुजाता भट्टाचार्य है। रवीन्द भारती विश्वविद्यालय से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लेने वाली मधुश्री ने हिंदी के आलावा तमिल, तेलगु, कन्नड़ और बांग्ला फिल्मों के गाने भी गाए हैं। 

इस गीत की अदाएगी के बारे में एक रोचक तथ्य ये है कि इसके मुखड़े में शास्त्रीय संगीत में प्रयुक्त होने वाले अलंकार मींड का इस्तेमाल हुआ है। आपने गौर किया होगा तू...बिन..बताए....मुझे...ले.. ..चल.कहीं में शब्दों के बीच एक सुर से दुसरे सुर तक जाने का जो सहज खिंचाव है जो गीत की श्रवणीयता को और मधुर बना देता है। फिल्म में ये गीत पार्श्व से आता है। नायक नायिका या उनके मित्रों को कुछ कहने की जरूरत नहीं होती। पीछे से आते बोल उन भावनाओं को मूर्त रूप दे देते हैं जो चरित्रों के मन में चल रही होती हैं।

इस गीत में मधुश्री का साथ दिया है गायक नरेश अय्यर ने। तो आइए सुनते  हैं ये प्यारा सा नग्मा

 

तू बिन बताए मुझे ले चल कहीं
जहाँ तू मुस्कुराए मेरी मंज़िल वहीं

मीठी लगी, चख के देखी अभी
मिशरी की डली, ज़िंदगी हो चली
जहाँ हैं तेरी बाहें मेरा साहिल वहीं
तू बिन बताए ........मेरी मंज़िल वहीं

मन की गली तू फुहारों सी आ
भीग जाए मेरे ख्वाबों का काफिला
जिसे तू गुनगुनाए मेरी धुन है वहीं
तू बिन बताए ........मेरी मंज़िल वहीं
बताए ........मेरी मंज़िल वहीं

Tuesday, August 11, 2015

अज़ब पागल सी लड़की ..सुनिए आतिफ़ सईद की दो मशहूर नज़्में मेरी आवाज़ में.. (Ajab Pagal Si Ladki Aatif Saeed )

मोहब्बत एक ऐसा अहसास है, जो कभी बासी नहीं होता। काव्य, साहित्य, संगीत, सिनेमा सब तो इसकी कहानी, न जाने कितनी बार कह चुके हैं, पर फिर भी इसके बारे में कहते रहना इंसान की फ़ितरत है। ये इंसान की काबिलियत का सबूत है कि हर बार वो इस भावना को शब्दों के नए नवेले जाल  में बुनकर एक से बढ़कर एक सुंदर अभिव्यक्ति की रचना करता है।अब आतिफ़ सईद की इस पागल लड़की की ही बात ले लीजिए ना। है तो ये उनकी पागल लड़की पर इस नज़्म को पढ़ते वक़्त वो पागल लड़की कितनी अपनी सी लगने लगती है उनके शब्दों में..


अज़ब पागल सी लड़की ... इस मुखड़े से दो लोकप्रिय नज्में हैं और इन्हें इन दोनों नज़्मों को आतिफ़ सईद साहब ने लिखा है..। आतिफ़ पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से ताल्लुक रखते हैं। अड़तीस साल के है और नौजवानों में उनकी  नज़्में बड़े प्यार से पढ़ी जाती हैं क्यूँकि ख़्वाब और मोहब्बत से उनका करीबी रिश्ता रहा है। अपनी जुबाँ में वो अपनी शायरी को इन लफ़्जों में बाँधते हैं

"मेरे ख्वाब मेरा क़ीमती अहसास और मेरे होने की अलामत हैं। मैं उन में साँस लेता हूँ और उन्हें अपने अंदर धड़कता महसूस करता हूँ। मेरे लिए ख़्वाब अच्छे या बुरे नहीं बस ख़्वाब हैं जिनकी मुट्ठी में दर्द की आहट, आस का जुगनू और कभी सिर्फ मोहब्बत है। कभी ये आने वाले अच्छे मौसम की नवेद (शुभ समाचार) सुनाते हैं और कभी गई रुतों के मंज़र दिल के कैनवस पर पेंट करते हैं। कभी आँसू बन कर पलकों पर नारसाई (विफलता, लक्ष्य तक ना पहुँचना ) के दुख काढ़ते हैं और कभी मुस्कान बन कर होठों पर खिल उठते हैं। तो कभी खामोशी बन कर सारे वज़ूद पर फैल जाते हैं और कभी इतना शोर करते हैं कि कुछ सुनाई नहीं देता।
मेरी शायरी मेरे ख़्वाब और मेरे अंदर के मौसमों की दास्तान हैं जिस्में वस्ल के मेहरबान मौसमों की बारिशें भी हैं और हिज्र रुत की चिलचिलाती धूप भी, सूखे पत्तों पर लिखे जज़्बे भी हैं और गुलाबी मौसम के महकते गीत भी..."

आतिफ़ की शायरी की तीन किताबें तुम्हें मौसम बुलाते हैं, मुझे तन्हा नहीं करना और तुम्हें खोने से डरता हूँ छप चुकी हैं पर उनका नाम अगर हुआ तो अजब पागल की लड़की से जुड़ी इन दो नज़्मों की वज़ह से। ये नज़्में उन्होंने 2007 के आस पास लिखीं। पहले अजब पागल की लड़की थी.....  लिखा। तो चलिए मैं भी पहले आपको सुनाता हूँ उनकी ये नज़्म जिसमें किस्सा बस इतना है कि प्रेम में अपना पराया कुछ नहीं रह जाता लेकिन जिस मुलायमियत से आतिफ़ ने अपनी बात कही है कि इसे पढ़ते वक़्त बस लगता है कि उसी अहसास में डूबते उतराते रहें..
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अज़ब पागल सी लड़की थी....
मुझे हर रोज़ कहती थी
बताओ कुछ नया लिख़ा
कभी उससे जो कहता था
कि मैंने नज़्म लिखी है
मग़र उन्वान देना है..
बहुत बेताब होती थी


वो कहती थी...
सुनो...
मैं इसे अच्छा सा इक उन्वान देती हूँ
वो मेरी नज़्म सुनती थी
और उसकी बोलती आँखें
किसी मिसरे, किसी तस्बीह पर यूँ मुस्कुराती थीं
मुझे लफ़्जों से किरणें फूटती महसूस होती थीं
वो फिर इस नज़्म को अच्छा सा उन्वान देती थी
और उसके आख़िरी मिसरे के नीचे
इक अदा-ए-बेनियाज़ी से
वो अपना नाम लिखती थी

मैं कहता था
सुनो....
ये नज़्म मेरी है
तो फिर तुमने अपने नाम से मनसूब कर ली है ?
मेरी ये बात सुनकर उसकी आँखें मुस्कुराती थीं

वो कहती थी
सुनो.....
सादा सा रिश्ता है
कि जैसे तुम मेरे हो
इस तरह ये नज़्म मेरी है

अज़ब पागल सी लड़की थी....


(उन्वान-शीर्षक, बेनियाज़ी-लापरवाही से, मिसरा - छंद का चरण)

पर आतिफ़ को असली मक़बूलियत  अजब पागल की लड़की है ...लिखने के बाद मिली। आतिफ़ बताते हैं कि इस नज़्म को लिखने के पहले उनके ज़ेहन में दो पंक्तियाँ ही थी मुझे तुम याद करते हो ?तुम्हें मैं याद आती हूँ ? आतिफ़ ने उस वक़्त के अपने हालातों को इन पंक्तियों से जोड़ा और ये  नज़्म तैयार हो गई। फिर उन्होंने इसे  अपने दोस्त को सुनवाया । उस मित्र ने उसे किसी अख़बार में दिया और वो वहाँ छप गई। धीरे धीरे नज़्म की लोकप्रियता बढ़ने लगी। पाकिस्तान के FM चैनलों पर ये पढ़ी जाने लगी। पर लोग अब तक इसके असली शायर से रूबरू नहीं हो पा रहे थे। इसका कारण था आतिफ़ की अपनी नज़्म पढ़ने में झिझक। ख़ैर वक़्त के साथ उन्होंने अपने आप को माइक के सामने पूरे विश्वास से बोलने के काबिल बनाया। ये नज़्म संवाद-प्रतिसंवाद की शैली में लिखी गई है, यानि पहले प्रेमिका के कभी ना ख़त्म होने वाले सवालों की फेरहिस्त है और फिर है, उसका जवाब...

इन दोनों नज़्म को पढ़ने में और उसे रिकार्ड करने में मुझे बहुत आनंद आया। कितनी सादगी के साथ अपने आपको अभिव्यक्त किया है उन्होंने.. उनके कथन में एक ईमानदारी है इसीलिए इसे पढ़ते वक़्त भावनाएँ खुद ब खुद दिल से निकल कर आती हैं। तो लीजिए सुनिए मेरी आवाज़ में उनकी इस नज़्म को..



अजब पागल सी लड़की है...
मुझे हर ख़त में लिखती है
मुझे तुम याद करते हो ?
तुम्हें मैं याद आती हूँ ?
मेरी बातें सताती हैं
मेरी नीदें जगाती हैं
मेरी आँखें रुलाती हैं....

दिसम्बर की सुनहरी धूप में, अब भी टहलते हो ?
किसी खामोश रस्ते से

कोई आवाज़ आती है?
ठहरती सर्द रातों में

तुम अब भी छत पे जाते हो ?
फ़लक के सब सितारों को

मेरी बातें सुनाते हो?

किताबों से तुम्हारे इश्क़ में कोई कमी आई?
वो मेरी याद की शिद्दत से आँखों में नमी आई?
अज़ब पागल सी लड़की है
मुझे हर ख़त में लिखती है...

जवाब उस को लिखता हूँ...मेरी मशरूफ़ियत देखो...
सुबह से शाम आफिस में
चराग़-ए-उम्र जलता हूँ
फिर उस के बाद दुनिया की..
कई मजबूरियाँ पांव में बेड़ी डाल रखती हैं
मुझे बेफ़िक्र चाहत से भरे सपने नहीं दिखते
टहलने, जागने, रोने की मोहलत ही नहीं मिलती
सितारों से मिले अर्सा हुआ.... नाराज़ हों शायद
किताबों से शग़फ़ मेरा अब वैसे ही क़ायम है
फ़र्क इतना पड़ा है अब उन्हें अर्से में पढ़ता हूँ

तुम्हें किस ने कहा पगली, तुम्हें मैं याद करता हूँ?
कि मैं ख़ुद को भुलाने की मुसलसल जुस्तजू में हूँ
तुम्हें ना याद आने की मुसलसल जुस्तजू में हूँ
मग़र ये जुस्तजू मेरी बहुत नाकाम रहती है
मेरे दिन रात में अब भी तुम्हारी शाम रहती है
मेरे लफ़्जों कि हर माला तुम्हारे नाम रहती है
पुरानी बात है जो लोग अक्सर गुनगुनाते हैं
उन्हें हम याद करते हैं जिन्हें हम भूल जाते हैं

अज़ब पागल सी लड़की हो
मेरी मशरूफ़ियत देखो...
तुम्हें दिल से भुलाऊँ तो तुम्हारी याद आए ना
तुम्हें दिल से भुलाने की मुझे फुर्सत नहीं मिलती
और इस मशरूफ़ जीवन में
तुम्हारे ख़त का इक जुमला
"तुम्हें मैं याद आती हूँ?"
मेरी चाहत की शिद्दत में कमी होने नहीं देता
बहुत रातें जगाता है, मुझे सोने नहीं देता
सो अगली बार अपने ख़त में ये जुमला नहीं लिखना


अजब पागल सी लड़की है
मुझे फिर भी ये लिखती है...मुझे तुम याद करते हो ?
तुम्हें मैं याद आती हूँ ?

(फ़लक-आकाश, शग़फ़-रिश्ता, मसरूफ- व्यस्त, मुसलसल-लगातार)


तो कैसी लगी आतिफ सईद की लिखी ये नज़्में ! अपने विचारों से जरूर अवगत कराइएगा।।

Saturday, August 01, 2015

निर्भय निर्गुण गुण रे गाऊँगा : कुमार गंधर्व और विदुषी वसुन्धरा कोमकली Nirbhay Nirgun ...

पिछले बुधवार शास्त्रीय संगीत के विख्यात गायक स्वर्गीय कुमार गंधर्व की पत्नी और जानी मानी गायिका वसुन्धरा कोमकली का देहांत हो गया। संगीत नाटक अकादमी द्वारा पुरस्कृत वसुन्धरा जी को अक्सर आम संगीतप्रेमी कुमार गंधर्व के साथ गाए उनके निर्गुण भजनों के लिए याद करते हैं। पर इससे पहले मैं आपको वो भजन सुनाऊँ,कुछ बातें शास्त्रीय संगीत की इस अमर जोड़ी के बारे में। 


वसुन्धरा जी मात्र बारह साल की थीं जब उनकी मुलाकात कुमार गंधर्व से कोलकाता में हुई। कुमार गंधर्व को उनका गायन पसंद आया और उन्होंने वसुन्धरा को मुंबई आकर सीखने का आमंत्रण दे दिया। पर द्वितीय विश्व युद्ध के शुरु हो जाने की वज़ह से वसुन्धरा 1946 में ही मुंबई जा सकीं। तब तक वो आकाशवाणी की नियमित कलाकार बन चुकी थीं। उधर गंधर्व साहब भी  इतने व्यस्त हो गए थे कि वसुंधरा को उन्होंने अपने बजाए प्रोफेसर देवधर से सीखने की सलाह दे डाली। वसुन्धरा दुखी तो हुईं पर उन्होंने देवधर जी से सीखना शुरु कर दिया। बाद में वो कुमार गंधर्व की भी शिष्या बनी। वसुंधरा जी से अक्सर गायिकी के प्रति कुमार गंधर्व की  अवधारणा के बारे में पूछा जाता रहा है। वो जवाब में कहा करती थीं..
"संगीत सिर्फ एक शिल्प नहीं बल्कि कला है। सिर्फ लगातार रियाज़ ही मत किया करो पर उसके बीच में अपने संगीत के बारे में भी सोचो।"
शायद इसी सोच ने ख्याल गायिकी में उन्हें देश के शीर्ष गायकों की कोटि में ला कर खड़ा कर दिया। 

कबीर के जिस निर्गुण भजन को आज आपसे बाँट रहा हूँ वो सबसे पहले छः साल पूर्व मैंने अपने मित्र के ज़रिए ब्लॉग पर ही सुना था। पहली बार इस भजन को सुनकर मन पूरी तरह कुमार गंधर्व और वसुन्धरा कोमकली की मधुर तान से वशीभूत हो गया था। कैसा तो तिलिस्म था इस युगल स्वर में कि शब्दों की तह में पहुँचे बिना ही मन भक्तिमय हो उठा था। पर बार बार सुनते हुए कबीर के गूढ़ से लगते बोलों को समझने की इच्छा भी बढ़ती गई। कबीर के चिंतन को समझने के लिए कई आलेख पढ़े और फिर इस भजन को दोबारा सुना तो लगा कि  संगीत की स्वरलहरी में डूबते हुए जो वैचारिक धरातल पहले अदृश्य सा हो गया था वो दिखने लगा है। तो आइए कोशिश करते हैं इस निर्गुण भजन में कबीर की सोच को टटोलने की

निर्भय निर्गुण गुण रे गाऊँगा
मूल-कमल दृढ़-आसन बाँधू जी
उल्‍टी पवन चढ़ाऊँगा, चढ़ाऊँगा..
निर्भय निर्गुण ....


मन-ममता को थिर कर लाऊँ जी
पांचों तत्त्व मिलाऊँगा जी, मिलाऊँगा
निर्भय निर्गुण ....

मनुष्य की आध्यात्मिक यात्रा का उद्देश्य दरअसल अपने अस्तित्व के कारण को तलाशना रहा है। इस तलाश का स्वाभाविक अंत तभी हो सकता है जब मनुष्य निडर हो अपने कर्मों और उसके फल के प्रति। यानि दूसरे शब्दों में कहें तो  निडरता पहली सीढ़ी है उस सत्य तक पहुँचने की। जैसा कि विदित है कि कबीर धर्म के बाहरी आडंबरों के घोर विरोधी थे और निर्गुण ईश्वर के उपासक।  कबीर इसी निडरता के साथ उस निराकार ईश्वर की आराधना कर रहे हैं। 

कबीर फिर कहते हैं कि इस यात्रा की शुरुआत से पहले अपनी उर्जा को एक सशक्त आधार देना होगा फैले कमल रूपी आसन में। जिस तरह कमल कीचड़ के ऊपर फलता फूलता है उसी तरह हमें अपने अंदर की ॠणात्मकता और भय को त्याग कर उसे सृजनशीलता में बदलना होगा। मूलाधार से अपनी उर्जा को ऊपर की ओर ले जाने का यही मार्ग दिखाया है कबीर ने। 

पर ये इतना आसान नहीं है। इस राह में बाधाएँ भी हैं। आख़िर इस उर्जा को बढ़ने से रोकता कौन है? इन्हें रोकती हैं हमारी इच्छाएँ और लगाव। एक बार इन बंधनों से मुक्त होकर अगर अपने को प्रकृति के पंचतत्त्वों में विलीन कर लूँ तो मुझे अपने होने का मूल कारण सहज ही दिख जाएगा।

इंगला-पिंगला सुखमन नाड़ी जी
त्रिवेणी पर हाँ नहाऊँगा,  नहाऊँगा
निर्भय निर्गुण ....

पाँच-पचीसों पकड़ मँगाऊँ जी
एक ही डोर लगाऊँगा, लगाऊँगा
निर्भय निर्गुण ....

इंगला नाड़ी वह नाड़ी है जो नाक की बाँयी तरफ से आरम्भ होकर आज्ञा चक्र होते हुये मूलाधार तक जाती है। पिंगला दाँयी तरफ होती है और इंगला की पूरक मानी जाती है। इंगला और पिंगला के मिलन के मध्य स्थल से सुषुम्ना नाड़ी निकलती है। अपने अंदर के सत्य तक पहुँचने के लिए मैं इन्हीं नाड़ियों को वश में करूँगा । मुझे विश्वास है कि नाड़ियों की इस त्रिवेणी के सहारे शरीर में बहती उर्जा को नियंत्रित कर जो उसमें डुबकी लगा लेगा वो समय और काल के बंधनों से मुक्त हो उस सत्य को पहचान लेगा। एक बार पंच तत्व और जीवन को अनुभव करने वाले पच्चीस तरीके नियंत्रण में आ गए तो उन्हें मैं अपनी अंतरआत्मा से एक ही डोर में जोड़ लूँगा।
शून्‍य-शिखर पर अनहद बाजे जी
राग छत्‍तीस सुनाऊँगा, सुनाऊँगा
निर्भय निर्गुण ....

कहत कबीरा सुनो भई साधो जी
जीत निशान घुराऊँगा, घुराऊँगा..
निर्भय निर्गुण ....


बस फिर तो वो शिखर आ ही जाएगा जहाँ से बाद में भी कुछ नहीं है और जिसके अंदर भी कुछ नहीं है। ये बिंदु है शून्यता का जहाँ मेरे में कोई "मैं" नहीं है। यहाँ आवाज़ें तो गूँजती है पर अंदर से! इन्हीं ध्वनियोंं से जो छत्तीस राग फूटेंगे उन्हें सुन कर मैं आनंद विभोर हो उठूँगा । ये क्षण स्वयम् पर जीत का होगा। 

तो आइए सुनते हैं इस भजन में कबीर की अध्यात्मिक वाणी कुमार गंधर्व और वसुन्धरा कोमकली के अद्भुत स्वर में..


मुझे यकीन है इसे सुन कर आप इसे बार बार सुनना चाहेंगे तब तक जब तक आपका चित्त भी भजन के सम्मोहन में ना आ जाए !

Monday, July 27, 2015

जुस्तजू जिसकी थी उसको तो न पाया हमने .. उमराव जान की वो भावपूर्ण ग़ज़ल Justuju jis ki thi usko to na paya humne..

पिछले हफ्ते आपसे ख़य्याम साहब और फिल्मी ग़ज़लों के उस छोटे परंतु स्वर्णिम दौर की बात हो रही थी जिसमें दो तीन सालों के बीच बाजार, उमराव जान और अर्थ जैसी फिल्में अपने अलहदा संगीत की वज़ह से जनमानस के हृदय में अमिट छाप छोड़ गयीं।

डिस्को संगीत और मार धाड़ वाली फिल्मों के उस दौर में जब मुजफ्फर अली ख़य्याम साहब के पास लखनऊ की मशहूर तवायफ़ उमराव जान की पटकथा सामने लाए तो उन्होंने इसे चुनौती की तरह लिया। मुजफ्फर अली ख़य्याम से पहले जयदेव को फिल्म के लिए बात कर चुके थे और संगीतकार जयदेव ने लता से फिल्म के गीत गवाने का निश्चय भी कर लिया था। पर होनी को तो कुछ और मंज़ूर था । पारिश्रमिक के लिए बात अटकी और फिल्म ख़य्याम की झोली में आ गिरी।


फिल्म की  कहानी के अनुरूप ग़ज़लों को लिखने के लिए एक ख़ालिस उर्दू  शायर की जरूरत थी। लिहाज़ा  उसके लिए शहरयार साहब चुन लिए गए। पर इन ग़ज़लों को गाने के लिए आशा जी को चुनना थोड़ा चौंकाने वाला जरूर था।  आशा जी उस दौर तक चुलबुले, शोख़ गीतों के लिए ही ज्यादा जानी जाती थीं। संज़ीदा गीतों को भी उन्होंने मिले मौकों में अच्छी तरह निभाया था पर ग़ज़ल के फ़न  में उनका कोई तजुर्बा नहीं था।

Khayyam with Asha Bhosle
ख़य्याम साहब से ये प्रश्न हमेशा से पूछा जाता रहा कि आख़िर उन्होंने लता जी की जगह आशा जी को क्यूँ चुना ? उनका कहना था कि उन्हें ये भय सता रहा था कि अगर उन्होंने इस फिल्म के लिए लता की आवाज़ का इस्तेमाल किया होता तो उनकी गायिकी की तुलना  पाकीज़ा में गाए उनके बेमिसाल मुज़रों से की जाने लगती जो वो नहीं चाहते थे । दूसरे उमराव जान के किरदार के लिए उन्हें आशा की आवाज़ ज्यादा मुफ़ीद लग रही थी। पर उनकी आवाज़ को तवायफ़ के किरदार की तरह प्रभावी बनाने के लिए उन्होंने उनके स्वाभाविक सुर से आधा सुर नीचे गवाया। आशा जी इस बदलाव से खुश तो नहीं थीं पर जब उन्होंने इसका नतीजा देखा तो वो समझ गयीं कि ख़य्याम की सोच बिल्कुल सही थी।

वैसे तो इस फिल्म में प्रयुक्त सभी ग़ज़लें मकबूल हुईं। पर जहाँ दिल चीज़ क्या है...,  ये क्या जगह है दोस्तों...., इन आँखो की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं.... का संगीत एक मुजरे के रूप में प्रस्तुत किया गया वहीं जुस्तज़ू जिसकी थी उसको तो ना पाया हमने.... का फिल्मांकन और संगीत एक खालिस ग़ज़ल का रखा गया। फिल्म देखते हुए तो मुझे इसके सारे नग्मे दिलअजीज़ लगते हैं पर कहानी के इतर दर्द में डूबी ये ग़ज़ल गाहे बगाहे ज़ेहन में आती रहती है।

अब  फिल्म की कहानी में इस ग़ज़ल की परिस्थिति को ज़रा याद कीजिए।  उमराव जान एक अच्छे घर से अगवा कर के कोठे पर बैठा दी गयीं। वहाँ नवाब साहब से मुलाकात हुई, प्रेम हुआ। नवाब नर्म दिल थे, मोहब्बत उन्हें भी थी पर अपनी माँ से बगावत करने की हिम्मत नहीं थी। शादी किसी और से कर ली और छोड़ दिया उमराव को उसके हाल पर तनहा। उमराव उन्हीं नवाब साहब के सामने इस ग़ज़ल के माध्यम से अपनी तनहा ज़िदगी की गिरहें खोलती हैं।

जुस्तजू जिसकी थी उसको तो न पाया हमने
इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हमने

तुझ को रुसवा न किया ख़ुद भी पशेमाँ न हुए
इश्क़ की रस्म को इस तरह निभाया हमने 

शहरयार साहब की यूँ तो पूरी ग़ज़ल ही कमाल की है पर इसके ये दो शेर मुझे खास पसंद हैं। एक में उमराव कहती हैं ना तो मैंने तुम्हारी बेवफाई पर सवाल उठाए ना ही ख़ुद पश्चाताप की अग्नि में जली। बस इसी क़ायदे से अपनी मोहब्बत निभाती रही।

कब मिली थी कहाँ बिछड़ी थी हमें याद नहीं
ज़िन्दगी तुझ को तो बस ख़्वाब में देखा हमने 

तेरे वज़ूद में मैंने अपनी ज़िंदगी की झलक देखी थी। अब तो ये भी याद नहीं कि वो झलक कब आँखों से ओझल हो गई। अब तो लगता है  कि तेरा, मेरी ज़िदगी में आना बस एक ख़्वाब बनकर ही रह गया।
 
ऐ 'अदा' और सुनाए भी तो क्या हाल अपना
उम्र का लम्बा सफ़र तय किया तनहा हमने

तो आइए सुनते हैं आशा जी को उनकी इस भावपूर्ण ग़ज़ल में


दरअसल फिल्म में शहरयार की शायरी का प्रयोग यूँ हुआ है कि कहानी उस में ख़ुद बा ख़ुद बयाँ हो जाती है। अब यहीं देखिए ना ग़ज़ल के पहले संवादों के बीच शहरयार की एक दूसरी ग़ज़ल के कुछ अशआर कितनी खूबसूरती से पिरोये गए हैं


तुझसे बिछुड़े है तो अब किससे मिलाती है हमें
जिन्दगी देखिये क्या रंग दिखाती है हमें 

गर्दिशे-वक़्त का कितना बड़ा अहसाँ है कि आज
ये ज़मी चाँद से बेहतर नज़र आती है हमें

वैसे क्या आपको पता है कि जुस्तज़ू जिसकी थी ..शहरयार पहले ही लिख चुके थे। पर इस फिल्म के लिए अपने मतले को वही रखते हुए उन्होंने अपनी ग़ज़ल में थोड़ा रद्दोबदल कर उसे वे  इस रूप में ले आए। वैसे भी मक़ते में उमराव जान का तख़ल्लुस ''अदा'' लाने के लिए बदलाव जरूरी था। बहरहाल इस फिल्म के संगीत ने आम और खास सब से वाहवाहियाँ बटोरी। ख़य्याम को सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक के लिए फिल्मफेयर और राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। आशा जी को सर्वश्रेष्ठ गायिका का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला और रही शहरयार की बात  तो वे इसके बाद जहाँ भी गए उनके साथ उमराव जान के गीतों के लेखक का तमगा साथ गया। अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था
"मैं AIIMS में जाता हूँ तो वहाँ मुझे लाइन नहीं लगानी पड़ती़। डॉक्टर भी कार्ड देखे बिना बड़ी खुशी से मुआयना कर देता है। ट्रेन या हवाई जहाज में रिजर्वेशन का मसला हो या कोई और उमराव जान के गानों ने मेरी बड़ी मदद की है। मेरे बच्चों से अक़्सर ये सवाल किया जाता है कि आप उसी शहरयार के बच्चे हैं जिसने उमराव जान के गाने लिखे हैं?"

Friday, July 17, 2015

बशर नवाज़ : करोगे याद तो हर बात याद आयेगी ! Bashar Nawaz .. Karoge yaad to har baat

अस्सी का दशक हिंदी फिल्मी गीतों के लिए कोई यादगार दशक नहीं रहा। पंचम, फिर लक्ष्मीकांत प्यारेलाल से हिंदी गीतों को संगीतबद्ध करने की कमान बप्पी दा तक पहुँची तो लोग यहाँ तक सोचने लगे कि क्या गीतों के साथ जुड़ी संवेदना और मधुरता कभी लौटेगी? पर इस दौर में फूहड़ फिल्मी गीतों द्वारा पैदा किया गया शून्य ग़ज़लों को आम जनों के करीब ले आया। ग़ज़लों को मिली इसी स्वीकार्यता ने संवेदनशील और लीक से हटकर फिल्में बनाने वाले निर्देशकों को अपनी फिल्मों में ग़ज़लों और नज़्मों के इस्तेमाल के लिए प्रेरित किया।

अस्सी के दशक की शुरुआत में तीन ऐसी फिल्में आयीं जो फिल्मी ग़ज़लों की सफलता के लिए मील का पत्थर साबित हुई। ये फिल्में थी अर्थ, बाजार और उमराव जान। उस ज़माने में शायद ही कोई संगीत प्रेमी होगा जिसके पास इन तीनों फिल्मों के कैसेट्स ना रहे हों। जहाँ अर्थ का संगीत ख़ुद ग़ज़ल सम्राट कहे जाने वाले जगजीत सिंह ने दिया था वहीं उमराव जान और बाजार के संगीतकार ख़य्याम थे। 

ख़य्याम साहब ने इन फिल्मों में नामाचीन शायरों जैसे मीर तकी मीर, मिर्जा शौक़ शहरयार और मखदूम मोहिउद्दीन की शायरी का इस्तेमाल किया। पर उनकी इस फेरहिस्त में एक अपेक्षाकृत गुमनाम शायर का नाम और भी था। जानते हैं कौन थे वो ? ये शायर थे बशरत नवाज़ खान जिन्हें दुनिया बशर नवाज़ के नाम से जानती है। सन 1935 में औरंगाबाद, महाराष्ट्र में जन्मे बशर नवाज़ ने पिछले हफ्ते अस्सी वर्ष की उम्र में इस दुनिया से विदाई ली।


बशर नवाज़ अपने समकालीनों की तरह युवावस्था में वामपंथी विचारधारा (जो कि वर्ग रहित समाज की परिकल्पना पर आधारित थी) से प्रभावित रहे। पिछले पाँच दशकों से वो उर्दू कविता को अपनी कलम से सींचते रहे। कविता के आलावा समालोचना, नाट्य लेखन जैसी विधाओं में भी हाथ आज़माया। दूरदर्शन के धारावाहिक अमीर खुसरो के लिए पटकथा लिखी और बाजार के आलावा लोरी और जाने वफ़ा जैसी फिल्मों के लिए गीत भी लिखे। पर हिंदी फिल्म संगीत में वो अपनी भागीदारी को बाजार फिल्म के गीत करोगे याद तो हर बात याद आयेगी ...से वो हमारे हृदय में हमेशा हमेशा के लिए अंकित कर गए।

ये तो हम सभी जानते हैं कि ज़िंदगी की पटकथा को तो ऊपर वाला रचता है। जाने कब कैसे किसी से मिलाता है। साथ बिताए पलों की खुशबू से दिल में अरमान जगने ही लगते हैं कि एक ही झटके में अलग भी कर देता है । फिर छोड़ देता है अकेला अपने आप से, अपने वज़ूद से जूझने के लिए। साथ होती हैं तो बस यादें जो उन गुजरे लमहों की कसक को रह रह कर ताज़ा करती रहती हैं।

फिल्म के किरदारों के बीच की कुछ ऐसी ही परिस्थितियों को नवाज़ साहब ने चाँद, बादल, बरसात और दीपक जैसे बिंबों में समेटा है। गीत में शीशे की तरह चमकते चाँद के बीच भटकते बादलों में बनते चेहरे की उनकी सोच हो या फिर जल जल कर पिघलती शम्मा से वियोग में डूबे दिल की तुलना..भूपेंद्र की आवाज़ में इन लफ्जों को सुन मन उदास फिर और उदास होता चला जाता है.. तो आज बशर नवाज़ साहब को याद करते हुए ये गाना फिर से सुन लीजिए.. 



करोगे याद तो हर बात याद आयेगी
गुजरते वक्त की, हर मौज़ ठहर जायेगी

ये चाँद बीते जमानों का आईना होगा
भटकते अब्र में चेहरा कोई बना होगा
उदास राह कोई दास्तां सुनाएगी

बरसता भीगता मौसम धुआँ धुआँ होगा
पिघलती शम्मो पे दिल का मेरे गुमाँ होगा
हथेलियों की हिना याद कुछ दिलायेगी

गली के मोड़ पे सूना सा कोई दरवाजा
तरसती आँखों से रस्ता किसी का देखेगा
निगाह दूर तलक जा के लौट आयेगी

बशर साहब की शायरी से ज्यादा रूबरू तो मैं नहीं हुआ हूँ। पर उनको जितना पढ़ पाया हूँ उसमें उनकी लिखी ये ग़ज़ल मुझे बहुत प्यारी लगती है। आज जब वो हमारे बीच नहीं है अपनी आवाज़ के माध्यम से उनके हुनर, उनकी शख़्सियत को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करना चाहता हूँ ..

बहुत था ख़ौफ जिस का फिर वही किस्सा निकल आया
मेरे दुख से किसी आवाज़ का रिश्ता निकल आया

वो सर से पाँव तक जैसे सुलगती शाम का मंज़र
ये किस जादू की बस्ती में दिल तन्हा निकल आया

जिन आँखों की उदासी में बयाबाँ1 साँस लेते हैं
उन्हीं की याद में नग़्मों का ये दरिया निकल आया

सुलगते दिल के आँगन में हुई ख़्वाबों की फिर बारिश
कहीं कोपल महक उट्ठी, कहीं पत्ता निकल आया

पिघल उठता है इक इक लफ़्ज़ जिन होठों की हिद्दत2 से
मैं उनकी आँच पी कर और सच्चा निकल आया

गुमाँ था जिंदगी बेसिमत ओ बेमंजिल बयाबाँ है
मगर इक नाम पर फूलों भरा रस्ता निकल आया

1. वीरानियाँ, 2. तीखापन
 

Tuesday, July 07, 2015

जब ग़ज़ले और नज़्में बनी किसी गीत की प्रेरणा : तू किसी रेल सी गुज़रती है .. Tu kisi Rail Si .. Masaan

हिंदी फिल्मों में गीतकार पुराने दिग्गज़ों की कालजयी कृतियों से प्रेरणा लेते रहे हैं और जब जब ऐसा हुआ है परिणाम ज्यादातर बेहतरीन ही रहे हैं। पिछले एक दशक के हिंदी फिल्म संगीत में ऐसे प्रयोगों से जुड़े दो बेमिसाल नग्मे तो तुरंत ही याद आ रहे हैं। 2007 में एक फिल्म आई थी खोया खोया चाँद और उस फिल्म में गीतकार स्वानंद ने  मज़ाज लखनवी की बहुचर्चित नज़्म आवारा से जी में आता है, मुर्दा सितारे नोच लूँ... का बड़ा प्यारा इस्तेमाल किया था। फिर वर्ष 2009 में प्रदर्शित फिल्म गुलाल में पीयूष मिश्रा ने फिल्म प्यासा में साहिर के लिखे गीत ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है.. को अपने लिखे गीत ओ री दुनिया... में उतना ही सटीक प्रयोग किया था। इसी कड़ी में कल जुड़ा है इसी महीने के अंत में प्रदर्शित होने वाली फिल्म मसान का ये प्यारा नग्मा जिसके बोल लिखे हैं नवोदित गीतकार वरुण ग्रोवर ने।


ये वही वरूण ग्रोवर हैं जिन्होंने कुछ ही महीने पहले फिल्म दम लगा के हैस्सा में अपने लिखे गीत ये मोह मोह के धागे... के माध्यम से हम सभी संगीतप्रेमियों के दिल में अपनी जगह बना ली थी। दरअसल इस तरह के गीतों को फिल्मों के माध्यम से आम जनता और खासकर आज की नई पीढ़ी तक पहुँचाने के कई फायदे हैं। एक तो जिस कवि या शायर की रचना का इस्तेमाल हुआ है उसके लेखन और कृतियों के प्रति लोगों की उत्सुकता बढ़ जाती है। दूसरी ओर गायक, गीतकार और संगीतकार ऐसे गीतों पर पूरी ईमानदारी से मेहनत करते हैं ताकि मूल रचना पर किसी तरह का धब्बा ना लगे। यानि दोनों ओर से श्रोताओं की चाँदी !

वरुण ने मसान के इस गीत के लिए हिंदी के सुप्रसिद्ध ग़ज़लकार दुष्यन्त कुमार की रचना का वो शेर इस गीत के लिए लिया है जिसे लोग अनोखे बिंबो के लिए हमेशा याद रखते हैं यानि तू किसी रेल सी गुज़रती है,..मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ

बनारस की गलियों में दो भोले भाले दिलों के बीच पनपते इस फेसबुकिये प्रेम को जब वरुण अपने शब्दों के तेल से छौंकते हैं तो उसकी झाँस से सच ये दिल रूपी पुल थरथरा उठता है। गीत के बोलों में छुपी शरारत खूबसूरत रूपकों के ज़रिए  उड़ा ले जाती है प्रेम के इस बुलबुले को उसकी स्वाभाविक नियति के लिए.

 

तू किसी रेल सी गुज़रती है,
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ


तू भले रत्ती भर ना सुनती है... 
मैं तेरा नाम बुदबुदाता हूँ..

किसी लंबे सफर की रातों में
तुझे अलाव सा जलाता हूँ


काठ के ताले हैं, आँख पे डाले हैं
उनमें इशारों की चाभियाँ लगा
रात जो बाकी है, शाम से ताकी है
नीयत में थोड़ी खराबियाँ लगा.. खराबियाँ लगा..

मैं हूँ पानी के बुलबुले जैसा
तुझे सोचूँ तो फूट जाता हूँ

तू किसी रेल सी गुज़रती है.....थरथराता हूँ


बतौर गायक स्वानंद की आवाज़ को मैं हजारों ख्वाहिशें ऐसी, परीणिता, खोया खोया चाँद जैसी फिल्मों में गाये उनके गीतों से पसंद करता आया हूँ। इस बार भी पार्श्व में गूँजती उनकी दमदार आवाज़ मन में गहरे पैठ कर जाती है। इंडियन ओशन ने भी गीत के बोलों को न्यूनतम संगीत संयोजन से दबने नहीं दिया है। तो आइए सुनते हैं नए कलाकारों श्वेता त्रिपाठी और विकी कौशल पर फिल्माए ये नग्मा..




गीत तो आपने सुन लिया पर दुष्यन्त कुमार की मूल ग़ज़ल का उल्लेख ना करूँ तो बात अधूरी ही रह जाएगी।  जानते हैं पूरी ग़ज़ल में कौन सा मिसरा मुझे सबसे ज्यादा पसंद है? ना ना पुल और रेल नहीं बल्कि ग़ज़ल का मतला एक जंगल है तेरी आँखों में..मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ.. :)। ना जाने इसे गुनगुनाने हुए मन इतना खुश खुश सा क्यूँ महसूस करता है। वैसे भी आँखों के समंदर में डूबना कौन नहीं पसंद करता पर यहाँ तो खुला समंदर नहीं पर गहराता जंगल है जिसके अंदर के अदृश्य पर घने राजों को जानने के लिए मन भटकने को तैयार बैठा है।

दुष्यन्त कुमार की इस ग़ज़ल को अपनी आवाज़ से सँवारा था पटियाला में जन्मी पार्श्व गायिका मीनू पुरुषोत्तम ने। फिल्म ताज महल से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाली मीनू ने बात एक रात की, ये रात फिर ना आएगी, दाग, हीर राँझा, दो बूँद पानी आंदोलन जैसी फिल्मों में गाने गाए। तो आइए उनकी आवाज़ में इस ग़जल को भी सुन लिया जाए..



एक जंगल है तेरी आँखों में
मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ

मैं तुझे भूलने की कोशिश में
आज कितने क़रीब पाता हूँ

तू किसी रेल सी गुज़रती है,
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ

हर तरफ एतराज़ होता है
मैं अगर रोशनी में आता हूँ

एक बाज़ू उखड़ गया जबसे
और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ

वैसे ''साये में धूप'' जो दुष्यंत जी की ग़ज़लों का संकलन है में कुछ और अशआर हैं, एक तो मतला

मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ
वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ

और दूसरा आखिरी शेर..
कौन ये फ़ासला निभाएगा
मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ

Sunday, June 28, 2015

नीला स्कार्फ ... Neela Scarf by Anu Singh Choudhary

स्कूल के ज़माने तक जो कहानियाँ पढ़ीं सो पढ़ी पर उसके बाद कॉलेज में गुजारे वक़्त से लेकर आज तक कहानियों से ज्यादा उपन्यास पढ़ने के प्रति मेरा रुझान रहा है। तो जो अब तक डेढ़ दो सौ किताबें पढ़ी हैं उनमें कहानी संग्रह का हिस्सा दहाई से कम ही रहा होगा। । कई कहानी संग्रह खरीद कर बस आलमारियों की शोभा बढ़ा रहे हैं। मेरी इस प्रवृति की वजह शायद ये है कि मुझे हर पात्र के चरित्र को अंदर तक समझने का हठ उपन्यास के विस्तार में ही मिल पाता है


इसीलिए पिछले दिसंबर में जब अनु सिंह चौधरी की किताब नीला स्कार्फ मुझे मिली तो आदतन दो कहानियों के बाद पढ़ने का सिलसिला रुक ही गया। फिर फरवरी के आख़िरी हफ्ते में अनु जी का एक साक्षात्कार देखा तो उनके पात्रों पर हुई चर्चा ने किताब की ओर फिर ध्यान आकृष्ट किया। राँची से कोयम्बटूर आने जाने में जो पाँच छः घंटे यात्रा में बीते वो पुस्तक को पूरा खत्म करने के लिए पर्याप्त निकले।

अनु  के लेखन से मैं उनके ब्लॉग मैं घुमंतू से पूर्व परिचित था। पर बतौर कहानीकार उन्हें जानने का मेरा ये पहला अनुभव है। इस संग्रह की कुल दर्जन भर कहानियों में लगभग तीन चौथाई कहानियों में मुख्य किरदार के रूप में एक नारी चरित्र है। अच्छी बात ये है कि इन चरित्रों में एकरूपता नहीं है। उनकी नायिकाएँ समाज के अलग अलग वर्गों और उम्र के हर पड़ावों से आती हैं। इसी वजह से कथानक का परिदृश्य  तेजी से बदलता जाता है और पाठकों को पुस्तक से बाँध कर रखता है।

जहाँ बिसेसर बो की प्रेमिका और देखवकी की बोलचाल में ठेठ बिहारी परिवेश की झलक मिलती है वहीं रूममेट, लिव इन और प्लीज़ डू नॉट डिस्टर्ब में आप अपने आप को शहरी हिंग्लिश में बात करते चरित्रों के बीच  घिरा पाते हैं। पर अनु की खूबी है उनकी भाषा पात्र के हिसाब से अपना लहजा बदलती रहती है। देखवेकी की सुशीला चाची के इन बिहारी बोलों को ही पढ़ लीजिए। किस तरह बेटी की शादी तय होने की भड़ास लड़के व उसके परिवार पर निकाल रही हैं..


व्यक्तिगत रूप से हिंदी कथ्य में अंग्रेजी के बेजा इस्तेमाल का मैं विरोधी रहा हूँ और इस किताब में कहीं कहीं ऐसे प्रयोग खटकते हैं जहाँ चरित्रों के हिसाब से भी अंग्रेजी के बजाए हिंदी का शब्द लिया जा सकता था।

तो आइए बात करते हैं इस किताब में सम्मिलित कहानियों की। रूममेट छोटे शहरों से संघर्ष कर महानगरीय जिंदगी में पहचान बनाने वाली लड़कियों की कहानी है जो अधपके रिश्तों और अरमानों को मूर्त रूप देने में एक दूसरे का संबल बनती हैं।  नीला स्कार्फ और लिव इन में लेखिका शादी के पहले और बाद के बनते बिगड़ते रिश्तों की पड़ताल करती नज़र आती हैं। पर जहाँ नीला स्कार्फ का स्वर धीर गंभीर है वहीं लिव इन में आज के डिजिटल प्रेम को वे हल्के फुल्के पर रोचक अंदाज़ में चित्रित कर जाती हैं। थोपे गए रिश्ते के अनुरूप अपने आपको ढालती और अपनी इच्छाओं को दमित कर गृहस्थी की गाड़ी खींचती स्त्री की आंतरिक व्यथा का मार्मिक चित्रण उनकी कहानी मुक्ति में दिखता है। शादी के बाद घर और बच्चों की जिम्मेवारेयों के बीच ख़ुद को घुटता महसूस करती महिलाओं को  मर्ज जिंदगी इलाज ज़िंदगी में वे अपना कृत्रिम रंगीन संसार रचने को प्रेरित करती हैं।

पर इस संग्रह की सारी कहानियों मे मुझे बिसेसर बो की प्रेमिका, कुछ यूँ होना उसका और मुक्ति खास पसंद आयी पर वहीं सिगरेट का आखिरी कश और प्लीज डू नॉट डिस्टर्ब इस कथा संग्रह की मुझे दो कमजोर कड़ियाँ लगीं।

दरअसल बिसेसर बो का किरदार इस कहानी संग्रह का सबसे सशक्त किरदार है। अनु बिसेसर बो उर्फ चंपाकली का परिचय अपनी पुस्तक में कुछ यूँ देती हैं..


पर बिसेसर बो भले ही जमींदारों के घर में काम कर कर हाड़ मांस जलाती हो पर आत्मसम्मान की भावना  उसमें कूट कूट कर भरी है  तभी तो बड़े मालिक की गलत नीयत का शिकार बनने से पहले वो उनको  ऐसा करारा जवाब देती है कि उनके नीचे की जमीन खिसक जाती है।


बिसेसर बो की ये निर्भयता उसे उन सभी कुलीन पढ़ी लिखी महिलाओं से आगे खड़ा कर देती है जो थोपे गए समझौतों के बीच अपनी ज़िंदगी को घसीट रही हैं। इसीलिए किताब पढ़ लेने के बाद भी वो याद रह जाती है। कुछ यूँ होना उसका पढ़कर लगता है कि बतौर शिक्षक हम किसी छात्र को उसके प्रकट व्यवहार से ही उद्दंड या अनुशासनहीन की श्रेणी में नहीं रख सकते। छात्रों से बेहतर परिणाम के लिए पढ़ाई के आलावा उनके सामाजिक पारिवारिक परिवेश से जुड़ी समस्याओं का निराकरण भी उतना ही जरूरी है।

पाठक इस संग्रह की हर एक कहानी से पूरी तरह जुड़े ना जुड़े पर उसमें कहीं कुछ बातों को अपने दिल से निकलता पाता है। दूसरों में अपने अक्स को प्यार करने की बात हो या यात्रा में अपनी पुरानी यादों के सबसे करीब होने की ऐसी कई छोटी छोटी मन को छू जाती हैं।

कुल मिलाकर ये एक ऐसा कहानी संग्रह है जिसे पढ़ना निश्चय ही आपको रुचिकर लगेगा। इस पुस्तक का प्रकाशन हिंद युग्म ने किया है। पहले संस्करण की सफलता के बाद पुस्तक का दूसरा संस्करण शीघ्र ही बाजार में आ रहा है।  चलते चलते इस कथा संग्रह की कहानी लिव इन के कुछ अंशों से आपको रूबरू कराऊँगा जो आपके दिल को अवश्य गुदगुदाएँगे और लेखिका की सहज सरस लेखन शैली की ओर भी आपका ध्यान आकृष्ट करेंगे।

 

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