Sunday, August 24, 2014

डाली मोगरे की : नीरज गोस्वामी Dali Mogre Ki by Neeraj Goswami

नीरज गोस्वामी की ग़ज़लों को पिछले कुछ सालों से पढ़ता आ रहा हूँ। कुछ महीनों पहले उनकी ग़ज़लों का संग्रह एक किताब की शक़्ल में प्रकाशित हुआ तो बड़ी खुशी हुई क्यूँकि बहुत दिनों से उनके संग्रह के बाजार में आने की उम्मीद थी। नीरज की लेखन शैली की जो दो विशिष्टताएँ मुझे सबसे अधिक आकर्षित करती आई हैं वो हैं उनके कथ्य की सहजता और उसके अंदर का प्रवाह।   

चौसठ वर्षीय नीरज जी पेशे से इंजीनियर हैं और फिलहाल इस्पात उद्योग से जुड़ी एक निजी कंपनी में वरिष्ठ पद पर आसीन हैं। पर इंटरनेट जगत में उन्हें एक तकनीकी विशेषज्ञ या प्रबंधक के तौर पर कम और एक ग़ज़लकार के रूप में ज्यादा जाना जाता है। इसकी वज़ह ढूँढने के लिए आपको सिर्फ उनके ब्लॉग का एक चक्कर लगाना होगा। नीरज ना केवल ग़ज़ल लिखते हैं बल्कि अपने पाठकों को ग़ज़ल के तमाम नामचीन और अनसुने लेखकों की शायरी से रूबरू भी कराते हैं।

मुझे उम्मीद थी कि अपनी किताब डाली मोगरे की भूमिका में वो पाठकों को तकनीकी क्षेत्र से जुड़ा होते हुए भी ग़ज़लों के प्रति पनपे अपने प्रेम के बारे में कुछ लिखेंगे पर लगता है कि इसके लिए मुझे उनकी दूसरी पुस्तक का इंतज़ार करना पड़ेगा। बहरहाल जो उनके ब्लॉग को नियमित पढ़ते हैं वे जानते हैं कि ग़ज़ल विधा के छात्र से बतौर शायर के रूप में अपनी पहचान बनाने के लिए वो प्राण शर्मा और पंकज सुबीर का हमेशा आभार व्यक्त करते रहे हैं। 

शिवना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित डाली मोगरे की में नीरज जी की लिखी सौ के लगभग ग़ज़लों का संग्रह है। आख़िर नीरज जी की शायरी किन बातों पर केंद्रित है? अपने एक शेर में नीरज इस बात का जवाब कुछ यूँ देते हैं ... कहीं बच्चों सी किलकारी..कहीं यादों की फुलवारी..मेरी ग़ज़लों में बस यही सामान होता है। अब इन यादों की फुलवारी में खिड़कियों से झाँकती वो आँखें भी हैं, चंद ख़्वाब और उनसे जुड़ी अधूरी चाहतें भी. और प्रेम का सच्चा अहसास भी।  संकलन से उनकी इन्ही भावनाओं को व्यक्त करते कुछ अशआर चुने हैं .मुलाहिज़ा फरमाएँ

जब तलक झाँकती आँख पीछे ना हो
क्या फ़रक़ बंद है या खुली खिड़कियाँ


ख़्वाब देखा है रात में तेरा
नींद में भी हुई कमाई है

चाहतें मेमने सी भोली हैं
पर ज़माना बड़ा कसाई है


वो जकड़ता नहीं है बंधन में
प्यार सच्चा रिहाई देता है


किसी का ख़ौफ दिल पर, आज तक तारी ना हो पाया
किया यूँ प्यार अपनों ने, लगा डरना जरूरी है


अब मान मुनौवल के बिना कौन सा प्रेम हुआ है, नीरज इस परिस्थिति को कुछ यूँ व्यक्त करते हैं

हो ख़फ़ा हमसे वो रोते जा रहे हैं
और हम रूमाल होते जा रहे हैं


पर इस किताब में इश्क़ की भावनाओं से जुड़े ये अशआर मुझे बेहद पसंद आए

जहाँ जाता हूँ मैं तुझको वहीं मौजूद पाता हूँ 
गर लिखना तुझे हो ख़त तेरा मैं क्या पता लिक्खूँ

गणित ये प्यार का यारों किसी के तो समझ आए
सिफ़र बचता अगर तुझको कभी ख़ुद से घटा लिक्खूँ


नीरज गोस्वामी की ग़ज़लें सिर्फ प्रेम से लबरेज़ नहीं पर उससे कहीं ज्यादा इनकी लेखनी का सरोकार आज के सामाजिक हालातों और घटते मानवीय मूल्यों से है।  उनकी इस चिंता को उनके तमाम शेर जगह जगह व्यक्त करते हैं। उनमें से कुछ की बानगी नीचे दे रहा हूँ

डाल दीं भूखे को जिसमें रोटियाँ
वो समझ पूजा की थाली हो गई

झूठ सीना तानकर चलता हुआ मिलता है अब
सच तो बेचारा है दुबका, काँपता डरता हुआ

साँप को बदनाम यूँ ही कर रहा है आदमी
काटने से आदमी के मर रहा है आदमी

इस पाप की परत को है उम्र भर चढ़ाया
अब चाहते हटाना गंगा में बस नहाकर

रोटियाँ देकर कहा ये शहर ने
गाँव की अब रुत सुहानी भूल जा
जिस्म की गलियों में उसको ढूँढ अब
इश्क़ वो कल का रुहानी, भूल जा

कब तक रखेंगे हम भला इनको सहेज कर
रिश्ते हमारे शाम के अखबार हो गए
हमने किये जो काम उन्हें फ़र्ज कह दिया
तुमने किये तो यार उपकार हो गए


जीवन की विसंगतियों को उनके रूपकों के माध्यम से देखना कभी मन को लाजवाब कर देता है

जिस शजर ने डालियाँ पर देखिए फल भर दिए
हर बशर ने आते जाते बस उसको पत्थर दिए


कुछ नहीं देती है ये दुनिया किसी को मुफ़्त में
नींद ली बदले में जिसको रेशमी बिस्तर दिए


तो कहीं प्रकृति के आचरण को सूक्ष्मता से अवलोकित कर वो आपको धनात्मक उर्जा से भर देते हैं।

अपनी बदहाली में भी मत मुस्कुराना छोड़िए
त्यागता ख़ुशबू नहीं है फूल भी मसला हुआ


नीरज गोस्वामी की सहज लेखन शैली हर उस पाठक को पसंद आएगी जो ग़ज़लों में रूचि तो रखता है पर उसमें प्रयुक्त उर्दू व फ़ारसी शब्दों की अनिभिज्ञता से अपने आपको उससे जोड़ पाने में अक्षम है। नीरज गोस्वामी ने अपनी ग़ज़लों में ऐसी भाषा का प्रयोग किया है जो उर्दू का ज्ञान ना रखने वालों को भी समझ आ सके। राजस्थान के जयपुर से ताल्लुक रखने वाले नीरज गोस्वामी  ने मुंबई के पास अपना कार्यक्षेत्र होने की वज़ह से अपने इस संकलन में कुछ मुंबइया जुबान की ग़ज़लें कही हैं जो भले ग़ज़ल पंडितों को कुछ खास आकृष्ट ना करे पर उनकी आम जनता तक ग़ज़ल के कलेवर को ले जाने की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।  चलते चलते मैं उनकी एक ग़ज़ल को सुनाना चाहूँगा जिसे पढ़कर मन एक जोश से भर उठता है.. वैसे इस ग़ज़ल का सबसे प्यारा शेर मुझे ये लगता है..

चमक है जुगनुओं में कम, मगर उधार की नहीं
तू चाँद आबदार (चमकदार) हो तो हो रहे, तो हो रहे

 

पुस्तक के बारे में
नाम : डाली मोगरे की,  लेखक : नीरज गोस्वामी
प्रकाशक : शिवना प्रकाशन, मूल्य : Rs.150  

पुनःश्च : एक शाम मेरे नाम के पाठकों के लिए खुशखबरी..
नीरज गोस्वामी जी ने सूचित किया है जो इस पुस्तक को पढ़ने में रुचि रखते हैं वो अपना पोस्टल अड्रेस उनके मोबाइल न 9860211911 पर एस एम एस करें या उन्हें neeraj1950@gmail.com पर मेल से भेज दें । पुस्तक उपहार स्वरुप आपके दिए अड्रेस पर भिजवा दी जाएगी।

Monday, August 18, 2014

रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है : गुलज़ार Raat Pahadon Par by Gulzar

पहाड़ों पर कौन नहीं जाता ? कभी मैदानों की भीषण गर्मी से निज़ात पाने, तो कभी बर्फ के गिरते फाहों के बीच अपने दिल को थोड़ी ठंडक पहुँचाने। या फिर निकल जाते हैं लोग यूँ ही बैठे ठाले प्रकृति के नैसर्गिक रूप का एक दो दिन ही सही.. स्वाद चख़ने। सारा दिन घूमते हैं। कभी जानी तो कभी अनजानी राहों पर। शाम आती है तो थोड़ी बाजार की तफ़रीह और थोड़ी पेट पूजा के बाद यूँ थक के चूर हो रात बिस्तर पे गिरते हैं कि पता ही नहीं चलता कब सुबह हो गई? इसलिए एक आम घुमक्कड़ कहाँ जान पाता है कि रात पहाड़ों की कैसी होती है? और गाहे बगाहे अगर ऐसा अवसर मिला भी तो क्या वो हम देख पाते हैं जो इस नज़्म में गुलज़ार साहब हमें दिखा रहे हैं?

अपनी कहूँ तो मुन्नार की वादी में गुजारी वो रात याद आती है जिसकी सुंदरता को व्यक्त करते हुए शब्दों ने भी साथ छोड़ दिया था। पर गुलज़ार तो जब चाहें जहाँ चाहें शब्दों का ऐसा तिलिस्म खड़ा करने में माहिर हैं जिसके जादू से प्रकृति के वो सारे देखे और महसूस किए गए रूप एकदम से आँखों के सामने आ जाते हैं। अंधकार मयी रात को प्रकाशित करते चंद्रमा और तारों, पास बहती नदी का कलरव, बालों को उड़ाती और पत्तों को फड़फड़ाती हवा का संगीत और कहीं दूर गिरते झरनों की चिंघाड़ से आप भी कहीं ना कहीं रूबरू अवश्य हुए होंगे। पर देखिए तो गुलज़ार ने इन सबको को कितनी खूबसूरती से पिरोया है एक लड़ी में इस नज़्म के माध्यम से

रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है
आस्मान बुझता ही नहीं
और दरिया रौशन रहता है
इतना ज़री का काम नज़र आता है फ़लक़ पे तारों का
जैसे रात में प्लेन से रौशन शहर दिखाई देते हैं


पास ही दरिया आँख पे काली पट्टी बाँध के
पेड़ों की झुरमुट में
कोड़ा जमाल शाही, "आई जुमेरात आई..पीछे देखे शामत आई
दौड़ दौड़ के खेलता है

कंघी रखके दाँतों में
आवाज़ किया करती है हवा
कुछ फटी फटी...झीनी झीनी
बालिग होते लड़कों की तरह !


इतना ऊँचा ऊँचा बोलते हैं दो झरने आपस में
जैसे एक देहात के दोस्त अचानक मिलकर वादी में
गाँव भर का पूछते हों..
नज़म भी आधी आँखें खोल के सोती है
रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है।



आज जबकि हम सभी गुलज़ार का 80 वाँ जन्मदिन मना रहे हैं यही गुजारिश है कि साहब ऐसे अनेकानेक लमहे यूँ ही अपने गीतों, नज़्मों और ग़ज़लों के माध्यम से इन सफ़हों पर परोसते रहें। पहाड़ भले बूढ़े हो जाएँ पर ये शायर कभी बूढ़ा ना हो। ( Gulzar's 80 th birthday )

 एक शाम मेरे नाम पर गुलज़ार की पसंदीदा नज़्में

Wednesday, August 06, 2014

मदन मोहन की सांगीतिक प्रासंगिकता : लग जा गले .. सनम पुरी Lag Ja Gale .... Sanam Puri

मदन मोहन से जुड़ी पिछली पोस्ट में बात खत्म हुई थी इस प्रश्न पर कि क्या आज की पीढ़ी भी मदन मोहन के संगीत को उतना ही पसंद करती है? इस बात का सीधा जवाब देना मुश्किल है। मेरा मानना है कि हिंदी फिल्मों में ग़ज़लों के प्रणेता समझे जाने वाले मदन मोहन अगर आज हमारे बीच होते तो उनके द्वारा रचा संगीत भी अभी के माहौल में ढला होता। आज उन दो प्रसंगों का जिक्र करना चाहूँगा जो मदन मोहन के संगीत की सार्वकालिकता की ओर इंगित करते हैं।

मदन मोहन के संगीत में आने वाले कल को पहचानने की क्षमता थी वर्ना क्या कोई ऐसा संगीतकार है जिसकी धुनों को उसके मरने के तीस साल बाद किसी फिल्म में उसी रूप में इस्तेमाल कर लिया गया हो। 2004 में प्रदर्शित फिल्म वीर ज़ारा का संगीत तो याद है ना आपको। यश चोपड़ा विभाजन से जुड़ी इस प्रेम कथा के संगीत के लिए नामी गिरामी संगीतकारों के साथ बैठकें की। पर फिल्म के मूड के साथ उन धुनों का तालमेल नहीं बैठ सका। अपनी परेशानी का जिक्र एक बार वो मदन मोहन के पुत्र संजीव कोहली से कर बैठे। संजीव ने उन्हें बताया कि उनके पास पिता की संगीतबद्ध कुछ अनसुनी धुनें पड़ी हैं। अगर वे सुनना चाहें तो बताएँ। चोपड़ा साहब ने हामी भरी और संजीव तीस धुनों की पोटली लेकर उनके पास हाज़िर हो गए।


जैसे जैसे वो पोटली खुलती गई चोपड़ा साहब को फिल्म की परिस्थितियों के हिसाब से गीत और कव्वाली की धुनें मिलती चली गयीं। फिल्म के संगीत को आम जनता ने किस तरह हाथों हाथ लपका ये आप सबसे छुपा नहीं है। ये उदाहरण इस बात को सिद्ध करता है कि वक़्त से आगे के संगीत को परखने और उसमें अपनी मेलोडी रचने की काबिलियत मदन मोहन साहब में थी।

अब एक हाल फिलहाल की बात लेते हैं। अपनी धुनों में मदन मोहन जो मधुरता रचते थे उसके लिए इंटरल्यूड्स और मुखड़े के पहले किया गया संगीत संयोजन कई बार बेमानी हो जाता था। लता जी का गाया फिल्म 'वो कौन थी' का बेहद लोकप्रिय गीत लग जा गले .. तो आप सबने सुना होगा। हाल ही में मैंने इसी गीत को सनम बैंड के सनम पुरी को गाते सुना। मेलोडी वही पर गीत के साथ सिर्फ गिटार और ताल वाद्य का संयोजन। सच मानिए बहुत दिनों बाद एक रिमिक्स गीत में गीत की आत्मा को बचा हुआ पाया मैंने। सनम की आवाज़ का कंपन और इंटरल्यूड्स में उनकी गुनगुनाहट गीत में छुपी विकलता को हृदय तक ले जाती है



वैसे सनम पुरी अगर आपके लिए नया नाम हो तो ये बता दूँ कि मसकत में रहने वाले सनम ने विधिवत संगीत की शिक्षा तो ली नहीं। संगीत के क्षेत्र में आए भी तो परिवार वालों के कहने से। पाँच साल पहले SQS Supastars नाम का बैंड बनाया जिसका नाम कुछ दिनों पहले बदल के सनम हो गया। सनम बताते हैं कि लता जी के गाए इस गीत से उनके बैंड के हर सदस्य की भावनाएँ जुड़ी हैं और इसीलिए उन्होंने अपने इस प्यारे गीत को आज के युवा वर्ग के सामने एक नए अंदाज़ में लाने का ख्याल आया। तो आइए सुनते हैं सनम बैंड के इस गीत को।


लग जा गले कि फिर ये हसीं रात हो न हो
शायद फिर इस जनम में मुलाक़ात हो न हो
लग जा गले  ...

हमको मिली हैं आज ये घड़ियाँ नसीब से
जी भर के देख लीजिये हमको क़रीब से
फिर आपके नसीब में ये बात हो न हो
शायद फिर इस जनम...लग जा गले..

पास आइये कि हम नहीं आएंगे बार-बार
बाहें गले में डाल के हम रो लें ज़ार-ज़ार
आँखों से फिर ये प्यार कि बरसात हो न हो
शायद फिर इस जनम...लग जा गले..


गीत में उनके भाई समर पुरी गिटार पर हैं, वेंकी ने बॉस गिटार सँभाला है जबकि केशव धनराज उनकी संगत कर रहे हैं पेरू से आए ताल वाद्य Cajon पर


जब लता जी रॉयल अलबर्ट हॉल में Wren Orchestra के साथ एक कार्यक्रम कर रही थीं तो कार्यक्रम में शामिल होने वाले गीतों के नोट्स लिख के भेजे गए। जो दो गीत उन्हें सबसे पसंद आए उनमें लग जा गले  भी था। आर्केस्ट्रा प्रमुख का कहना था कि वो धुनों की मेलोडी और उनके साथ किए नए तरह के संगीत संयोजन से चकित हैं। 

आशा है संगीतकार मदन मोहन से जुड़ी ये तीन कड़ियाँ आपको पसंद आयी होंगी। एक शाम मेरे नाम पर उनकी यादों का सफ़र आगे भी समय समय पर चलता रहेगा।

Thursday, July 31, 2014

यादें मदन मोहन की : सपनों में अगर मेरे, तुम आओ तो सो जाऊँ Remembering Madan Mohan : Sapnon Mein Agar Mere...

मदन मोहन के कार्यक्रम को सुनने के बाद से पिछले हफ्ते उनके गीतों में से कइयों को फिर से सुना और आज उन्हीं में से एक मोती को चुन कर आपके समक्ष लाया हूँ। पर इससे पहले कि उस गीत की चर्चा करूँ कुछ बातें उनके काम करने की शैली के बारे में करना चाहूँगा। मदन मोहन उन संगीतकारों में नहीं थे जो धुन पहले बना लेते हों। वो गीतों को सुनते थे, उनके भावों में डूबते थे और फिर एक ही गीत के लिए कई सारी मेलोडी बना कर सबसे पूछते थे कि उन्हें कौन सी पसंद आई? वैसे धुन चुनते समय आख़िरी निर्णय उन्हीं का होता था। सेना से आए थे तो समय के बड़े पाबंद थे। वादकों को देर से आने से वापस कर देते थे, गीत को अंतिम रूप देने से पहले लता हो या रफ़ी घंटों रियाज़ कराते थे। एक बार गुस्से में आकर शीशे की दीवार पर जोर से हाथ मारकर वादकों को इंगित कर बोले..बेशर्मों बेसुरा बजाते हो। सुर के प्रति वो बेहद संवेदनशील थे। रेडियो में दिये अपने एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा था
"मैं समझता हूँ कि हर फ़नकार का जज़्बाती होना बहुत जरूरी है क्यूँकि अगर उसमें इंसानियत का जज़्बा नहीं है तो वो सही फ़नकार नहीं हो सकता। सुर भगवान की देन है। उसको पेश करना, उसको सुनना, उसको अपनाना ये कुदरत की चीज है जिसे इंसान सीखता नहीं पर महसूस करता है।"

अक्सर कहा जाता है कि मदन मोहन और लता के बीच ग़ज़ब का तारतम्य था। लता जी ने जब भी बाहर अपने कान्सर्ट किये, उन्होंने मदन मोहन को हमेशा याद किया। लता जी ने मदन मोहन के बारे में दिए गए साक्षात्कार में कहा था
"मेरी उनसे पहली मुलाकात फिल्म शहीद के युगल गीत को रिकार्ड करते वक़्त 1947 में हुई थी. वो गीत भाई बहन के रिश्ते के बारे में था और वास्तव में तभी से वे मेरे मदन भैया बन गए। मैने हमेशा कहा है कि वो भारत के सबसे प्रतिभाशाली संगीतकारों में से एक थे और उनकी अपनी एक शैली थी। हांलाकि मैंने बाकी संगीतकारों के साथ ज्यादा काम किया पर मदन भैया के साथ गाए हुए गीतों को बेहद लोकप्रियता मिली।

लोग कहते हैं कि उनके गीतों में मैं कुछ विशिष्ट करती थी। मुझे पता नहीं कि ये कैसे होता था। अगर ये होता था तो शायद इस वज़ह से कि हमारे बीच की आपसी समझ, एक दूसरे के लिए लगाव और सम्मान था। वो मेरी गायिकी को अच्छी तरह समझते थे। वो हमेशा कहा करते थे  कि ये धुन तुम्हीं को ध्यान रख कर रची है और वो उसमें अक्सर मेरी आवाज़ के उतार चढ़ाव को ध्यान में रखकर कुछ जगहें छोड़ते थे। इसलिए उनके साथ काम करना व उनकी आशाओं पर खरा उतरना मेरे लिए हमेशा से चुनौतीपूर्ण होता था। रिकार्डिंग के बाद उनके चेहरे पर जो खुशी दिखती थी वो मुझे गहरा संतोष देती थी।"

आज लता और मदन मोहन की इस जोड़ी का जो गीत आपके सामने पेश कर रहा हूँ वो फिल्म दुल्हन एक रात की का है। इसे लिखा है एक बार फिर राजा मेहदी अली खाँ ने। मुखड़े के पहले सितार की बंदिश के बाद से लता की मधुर आवाज़ का सम्मोहनी जादू गीत के अंत और उसके बहुत देर बाद भी बरक़रार रहता है। इंटरल्यूड्स में पहले अंतरे के पहले सेक्सोफोन की आवाज़ चौंकाती है पर साथ ही सितार के साथ उस के अद्भुत समन्वय को सुन मदन मोहन की काबिलियत का एक उदाहरण सामने आ जाता है।

सपनों में अगर मेरे, तुम आओ तो सो जाऊँ
बाहों की मुझे माला पहनाओ, तो सो जाऊँ

सपनों में कभी साजन बैठो मेरे पास आ के
जब सीने पे सर रख दूँ, मैं प्यार में शरमा के
इक गीत मोहब्बत का तुम गाओ तो सो जाऊँ

बीती हुयी वो यादें, हँसती हुई आती हैं
लहरों की तरह दिल में आती, कभी जाती हैं
यादों की तरह तुम भी आ जाओ तो सो जाऊँ




मदन मोहन को जीते जी कभी वो सम्मान नहीं मिला जिसके वो हक़दार थे। नेशनल एवार्ड तो उन्हें मिला पर एक अदद फिल्मफेयर जैसे एवार्ड के लिए तरस गए। उनकी धुनें अपने समय से आगे की मानी गयीं। एक किस्सा जो इस संबंध में अक्सर बताया जाता है वो ये कि उनके बेटे संजीव कोहली को जब स्कूल के कार्यक्रम में स्टेज पर अपने पिता के सामने गाने का मौका मिला तो उसने पिता द्वारा रचित किसी गीत को गाने के बजाए बहारों फूल बरसाओ  गाना बेहतर समझा वो भी इस डर से कि शायद वहाँ बैठी आम जनता उसे पसंद ना करे। 

इन्हीं मदनमोहन की अंतिम यात्रा में अमिताभ, धर्मेंद्र, राजे्द्र कुमार व राजेश खन्ना जैसे कलाकारों ने कंधा लगाया। संजीव कहते हैं कि अगले दिन ये फोटो अख़बार में छपी और मैं रातों रात कॉलेज में इतना लोकप्रिय हो गया जितना कभी उनके जीते जी नहीं हुआ था। शायद यही दुनिया का दस्तूर है कि हम कई बार किसी के हुनर को वक़्त रखते नहीं परख पाते हैं।

मदन मोहन को हमारा साथ छोड़े लगभग चार दशक हो गए। उनके संगीतबद्ध गीतों को क्या हम भुला पाए हैं ? क्या उनके गीतों को आज की पीढ़ी भी पसंद करती है?  अगली प्रविष्टि में एक हाल ही में रिकार्ड किये गीत के माध्यम से इन प्रश्नों के उत्तर को ढूँढने का प्रयास करूँगा।

Saturday, July 26, 2014

मदन मोहन के संगीत में रची बसी वो शाम : आप को प्यार छुपाने की बुरी आदत है... Aap ko pyar chhupane ki buri aadat hai

पिछले हफ्ते की बात है। दफ़्तर के काम से रविवार की शाम पाँच बजे दिल्ली पहुँचा। पता चला पास ही मैक्स मुलर मार्ग पर स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में संगीतकार मदनमोहन की स्मृति में संगीत के कार्यक्रम का आयोजन हो रहा है। कार्यक्रम साढ़े छः बजे शुरु होना था पर दस मिनट की देरी से जब हम  पहुँचे तो वहाँ तिल धरने की जगह नहीं थी। श्रोताओं में ज्यादातर चालीस के ऊपर वाले ही बहुमत में थे पर पुराने गीतों की महफिल में ऐसा होना लाज़िमी था। कुछ मशहूर हस्तियाँ जैसे शोभना नारायण भी दर्शक दीर्घा में नज़र आयीं।


उद्घोषकों ने मदनमोहन के संगीतबद्ध गीतों के बीच बगदाद में जन्मे इस संगीतकार की ज़िंदगी के छुए अनछुए पहलुओं से हमारा परिचय कराया। मुंबई की आरंभिक पढ़ाई, देहरादून के बोर्डिंग स्कूल में रहना, पिता के आग्रह पर सेना में नौकरी करना, उनका कोपभाजन बनते हुए भी फिल्मी दुनिया में अपने बलबूते पर संगीतकार की हैसियत से पाँव जमाना, लता के साथ उनके अद्भुत तालमेल, फिल्मी ग़ज़लों को लयबद्ध करने में उनकी महारत, उनका साहबों वाला रोबीला व्यक्तित्व,  हुनर के हिसाब से उनको लोकप्रियता ना मिलने का ग़म और शराब में डूबी उनकी ज़िदगी के कुछ आख़िरी साल ..उन ढाई घंटों में उनका पूरा जीवन वृत आँखों के सामने घूम गया।

पर इन सबके बीच उनके कुछ मशहूर और कुछ कम बज़े गीतों को सुनने का अवसर भी मिला। ऐसे कार्यक्रमों में कितना भी चाहें आपके सारे पसंदीदा नग्मों की बारी तो नहीं आ पाती। फिर भी 'ना हम बेवफ़ा है ना तुम बेवफ़ा हो...', 'लग जा गले से हसीं रात हो ना हो...', 'तुम्हारी जुल्फों के साये में शाम कर दूँगा..', 'झुमका गिरा रे...' जैसे सदाबहार नग्मों को सुनने का अवसर मिला तो वहीं 'इक हसीं शाम को दिल मेरा खो गया...',  'तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है...', 'नैनों में बदरा छाए...', 'ज़रा सी आहट होती है....', 'कोई शिकवा भी नहीं कोई भी शिकायत भी नहीं...' जैसे गीतों को live सुन पाने की ख़्वाहिश..ख़्वाहिश ही रह गयी।

इन्हीं गीतों के बीच  एक युगल गीत भी पेश किया गया जिसे कई सालों बाद अचानक और सीधे आर्केस्ट्रा के साथ मंच से सुनने में काफी आनंद आया। एक हल्की सी छेड़छाड़ और चंचलता लिए इस गीत को 1965 में आई फिल्म "नीला आकाश" में मोहम्मद रफ़ी और आशा ताई ने गाया था। इस गीत को लिखा था राजा मेहदी अली खाँ ने। मदनमोहन और राजा साहब की संगत ने हिंदी फिल्म संगीत को कितने अनमोल मोती दिए वो तो आप सब जानते ही हैं। राजा साहब से जुड़े इस लेख में आपको पहले ही उनके बारे में विस्तार से बता चुका हूँ। उसी लेख में इस बात का भी जिक्र हुआ था कि किस तरह उन्होंने हिंदी फिल्मी गीतों में 'आप' शब्द का प्रचलन बढ़ाया। आज जिस गीत की बात मैं आपसे करने जा रहा हूँ वो भी इसी श्रेणी का गीत है।

देखिए तो इस खूबसूरती से राजा साहब ने गीत की पंक्तियाँ गढ़ी हैं कि हर अगली पंक्ति पिछली पंक्ति का माकूल जवाब सा लगती है।
आप को प्यार छुपाने की बुरी आदत है
आप को प्यार जताने की बुरी आदत है

आपने सीखा है क्या दिल के लगाने के सिवा,
आप को आता है क्या नाज दिखाने के सिवा,
और हमें नाज उठाने की बुरी आदत है

किसलिए आपने शरमा के झुका ली आँखें,
इसलिए आप से घबरा के बचा ली आँखें,
आपको तीर चलाने की बुरी आदत है

हो चुकी देर बस अब जाइएगा, जाइएगा,
बंदा परवर ज़रा थोड़ा-सा क़रीब आइएगा,
आपको पास न आने की बुरी आदत है


तो आइए सुनते हैं राग देस पर आधारित इस मधुर युगल गीत को

 


वैसे तो सर्वव्यापी धारणा रही है लड़कों में अपने प्यार का इज़हार करने का उतावलापन रहता है, वहीं लड़कियाँ शर्म ओ हया से बँधी उसे स्वीकार करने में झिझकती रही हैं। पर वक़्त के साथ क्या आप ऐसा महसूस नहीं  करते कि मामला इतना स्टीरियोटाइप भी नहीं रह गया है। पहल दोनों ओर से हो रही है। सोच रहा हूँ कि अगर आज गीतकार को ये परिस्थिति दी जाए तो वो क्या लिखेगा। है आपके पास कोई कोरी कल्पना ?

Wednesday, July 16, 2014

इक ख़लिश को हासिल-ए-उम्र-ए-रवाँ रहने दिया .. Ek khalish ko hasil-e-umr-e-rawan

कुछ शायर अपनी एक ग़ज़ल से ही लोगों के ज़हन में अपने नाम की परछाई छोड़ जाते हैं। सराहनपुर में जन्मे अदीब सहारनपुरी का नाम ऐसे ही शायरों में किया जा सकता है। आजादी के बाद अदीब पाकिस्तान के कराची में जा बसे थे। पचास और साठ के दशक में उनका शुमार पाकिस्तान के अग्रणी शायरों में किया जाता रहा। पर इस दौरान उनके द्वारा किए गए काम के बारे में पूर्ण जानकारी नहीं है। अदीब की जिस ग़ज़ल के बारे में मैं आज बात करने जा रहा हूँ उसे लोकप्रिय बनाने में उस्ताद मेहदी हसन और अमानत अली खाँ जैसे गायकों का महती योगदान रहा है। तो आइए देखें अदीब सहारनपुरी ने क्या कहना चाहा है इस ग़ज़ल में..

इक ख़लिश को हासिल-ए-उम्र-ए-रवाँ रहने दिया
जान कर हम ने उन्हें नामेहरबाँ रहने दिया

कितनी दीवारों के साये हाथ फैलाते रहे
इश्क़ ने लेकिन हमें बेख़्वानमाँ रहने दिया

इंसान कितनी भी आरज़ू करे पर उसे उसकी हर चाहत का प्रतिकार मिले ये कहाँ मुमकिन है ? इसलिए ग़ज़ल के मतले में अदीब कहते हैं कि

वो हम पर मेहरबान ना भी हुए तो क्या, दिल में उसके प्रेम की जो मीठी आँच जल रही है वही उनकी ज़िदगी का हासिल है। ये भी नहीं कि ज़िदगी अकेलेपन में गुजरी। कितने लोग तो आए जिन्होंने अपने मोहब्बत के साये में मेरे मन को सुकून पहुँचाने की कोशिश की पर ये उसके इश्क़ का ही असर था कि मेरे दिल की कोठरियाँ उजाड़ ही रहीं। वहाँ किसी और को बसाना मेरे लिए गवारा नहीं हुआ।

अपने अपने हौसले अपनी तलब की बात है
चुन लिया हमने उन्हें सारा ज़हाँ रहने दिया

ये भी क्या जीने में जीना है बग़ैर उन के "अदीब"
शम्मा गुल कर दी गई बाक़ी धुआँ रहने दिया

अदीब अगले शेर मे कहते हैं कि लोग मुझ पर हँसते हैं कि सारी दुनिया को छोड़कर मुझे ऐसे शख्स से दिल लगाने की क्या पड़ी थी जो मेरा कभी ना हो सका। वो क्या समझें मेरे हौसले को, मेरी पसंद को ..
पर मक़ते में शायर का हौसला पस्त होता दिखता है जब वो उदासी की चादर ओढ़ कहते हैं कि उसके बगैर जीना बुझी हुई शमा के धुएँ के साथ जीने जैसा है। आख़िर उसकी यादों के सहारे कोई कब तक जी सकता है?

यूँ तो मेहदी हसन साहब ने पूरी ग़ज़ल अपने चिरपरिचित शास्त्रीय अंदाज़ में गायी है पर मुझे इसे अमानत अली खाँ साहब साहब के सीधे पर दिल को छूने वाले अंदाज़ में सुनना ज्यादा रुचिकर रहा है।



खाँ साहब पटियाला घराने के मशहूर शास्त्रीय गायक थे। आप भले उनकी गायिकी से परिचित ना हों पर आपने उनके सबसे छोटे पुत्र शफ़कत अमानत अली खाँ के गाए हिंदी फिल्मी गीतो को जरूर सुना होगा। खाँ साहब ने पूरी ग़ज़ल तो नहीं गाई पर दो तीन अशआरों में ही वो ग़ज़ल के मूड को हमारे दिलों तक पहुँचा देते हैं। इस वर्जन में  एक नया शेर भी है

आरजू-ए- क़र्ब भी बख्शी दिलों को इश्क़ ने
फ़ासला भी मेरे उनके दर्मियाँ रहने दिया

बहरहाल आपके लिए ये ग़ज़ल अपने दोनों रूपों में ये रही। आपको किसी गायिकी ज्यादा मन के करीब लगी बताइएगा।

Amanat Ali Khan's Version



Mehdi Hasan's Version 


Monday, July 07, 2014

कुँवर नारायण की चंद कविताएँ मेरी आवाज़ में... Kunwar Narayan : Kamre Mein Dhoop

बतौर पाठक कुँवर नारायण की कविताओं के रचना संसार से मेरा कोई ज्यादा परिचय नहीं रहा है। गाहे बगाहे उनका नाम साहित्यप्रेमी मित्रों के मुँह से अक्सर सुना करता था। करीब पाँच साल पहले उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने पर उनके द्वारा लिखी कविताओं से रूबरू हुआ था। 


पर कुछ दिन पहले अंतरजाल पर जब उनकी कविता कमरे में धूप पढ़ी तो उनकी रचनाओं पर एक सरसरी नज़र डालने की इच्छा हुई। उनकी कविताओं से गुजरते हुए मन के तार कई बार ठिठके, हिले और झंकृत हुए। जो कुछ मन को अच्छा लगा उसे  आज आपके साथ अपनी आवाज़ में बाँट रहा हूँ।

 (1) कमरे में धूप
प्रकृति के मनसबदारों हवा, धूप, बादल, चाँदनी से तो सुबह से रात तक आपका सामना होता है। कभी सोचा है कि ये अगर हमसे अपना किरदार बदल लें तो क्या हो? वैसे जब कुँवर नारायण जैसे कवि हमारे बीच हों तो वो सोचने की आवश्यकता हमें नहीं बस पढ़िए और अभिभूत होइए कि किस सहजता से कवि ने प्रकृति के इन तत्वों का मानवीकरण कर दिया है।

हवा और दरवाजों में बहस होती रही,
दीवारें सुनती रहीं।
धूप चुपचाप एक कुरसी पर बैठी
किरणों के ऊन का स्वेटर बुनती रही।

सहसा किसी बात पर बिगड़ कर
हवा ने दरवाजे को तड़ से
एक थप्पड़ जड़ दिया !

खिड़कियाँ गरज उठीं,
अखबार उठ कर खड़ा हो गया,
किताबें मुँह बाये देखती रहीं,
पानी से भरी सुराही फर्श पर टूट पड़ी,
मेज के हाथ से कलम छूट पड़ी।

धूप उठी और बिना कुछ कहे
कमरे से बाहर चली गई।

शाम को लौटी तो देखा
एक कुहराम के बाद घर में खामोशी थी।
अँगड़ाई लेकर पलंग पर पड़ गई,
पड़े-पड़े कुछ सोचती रही,
सोचते-सोचते न जाने कब सो गई,
आँख खुली तो देखा सुबह हो गई।

 (2) घंटी
मृत्यु जीवन का अंतिम कटु सत्य है पर इस सत्य को स्वीकार कर पाना क्या हमारे लिए कभी सहज रहा है ?

फ़ोन की घंटी बजी
मैंने कहा- मैं नहीं हूँ
            और करवट बदल कर सो गया

दरवाज़े की घंटी बजी
मैंने कहा- मैं नहीं हूँ
            और करवट बदल कर सो गया

अलार्म की घंटी बजी
मैंने कहा- मैं नहीं हूँ
            और करवट बदल कर सो गया

एक दिन
मौत की घंटी बजी...
हड़बड़ा कर उठ बैठा-
मैं हूँ... मैं हूँ... मैं हूँ..
            मौत ने कहा-
            करवट बदल कर सो जाओ।


और चलते चलते कुँवर नारायण की ये पंक्तियाँ भी आपको सुपुर्द करना चाहता हूँ जो शायद कवि की ही नहीं जीवन के किसी ना किसी मुकाम पर हम सबकी तलाश का सबब रही है

....फिर भी
अपने लिए हमेशा खोजता रहता हूँ
किताबों की इतनी बड़ी दुनिया में
एक जीवन-संगिनी
थोडी अल्हड़-चुलबुली-सुंदर
आत्मीय किताब
जिसके सामने मैं भी खुल सकूँ
एक किताब की तरह पन्ना पन्ना
और वह मुझे भी
प्यार से मन लगा कर पढ़े...

कुँवर नारायण की इन कविताओं को अपनी आवाज़ देने की मेरी एक कोशिश ये रही..



कुँवर नारायण के व्यक्तित्व और कृतित्व से और परिचित होना चाहें तो विकीपीडिया का ये पृष्ठ आपकी मदद कर सकता है।

Sunday, June 29, 2014

बीती ना बिताई रैना, बिरहा की जाई रैना :जब पंचम ने पकड़ा शास्त्रीयता का दामन ( Beeti na Bitai Raina...)

27 जून यानि परसों पंचम का पचहत्तरवाँ जन्म दिन मनाया गया। पंचम के बारे में एक बात लगातार कही जाती रही है कि ‌उन्होंने नई आवाज़ और बीट्स से सबका परिचय कराया। पुराने साजों के अलग तरीके से इस्तेमाल के साथ साथ उन्होंने कई नए वाद्य यंत्रों का भी प्रचलन किया। दरअसल यही पंचम की शैली थी। अपने बाबा सचिन देवबर्मन से उन्होंने बहुत कुछ सीखा पर वो उनसे हमेशा कुछ अलग करना चाहते थे। 

पर राग और रागिनियों के बारे में पंचम की जानकारी बिल्कुल नहीं हो ऐसा भी नहीं था। बचपन में उन्होंने ब्रजेन विश्वास से तबला सीखा। सरोद सीखने के लिए उन्हें अली अकबर खान के पास भेजा गया। अली अकबर खान और पंडित रविशंकर के बीच की सरोद और सितार के बीच की लंबी जुगलबंदी को भी उन्हें लगातार सुनने का मौका मिला। यही वज़ह है कि पंचम ने जब भी राग आधारित गीतों की रचना की, अपने प्रशंसकों की नज़र में खरे उतरे।

पंचम और गुलज़ार का आपसी परिचय बंदिनी से शुरु हुआ जिसमें पंचम सचिन दा के सहायक का काम निभा रहे थे और गुलज़ार गीतकार का (वैसे तो फिल्म के अन्य गीत शैलेंद्र से लिखवाए गए थे पर मोरा गोरा अंग लई ले के लिए गुलज़ार को याद किया गया था)। पर बतौर निर्देशक गुलज़ार ने पंचम के साथ पहली बार सत्तर के दशक में फिल्म परिचय के लिए काम किया। इस फिल्म के सारे गीत काफी चर्चित हुए। पर उनमें एक गीत बाकियों से पंचम के लिए इन अर्थों में भिन्न था कि वो पहली बार शास्त्रीय राग आधारित किसी युगल गीत का संगीत निर्देशन कर रहे थे। ये गीत था बीते ना बिताई रैना...। 


कई बार गीत की धुन इतनी प्यारी होती है कि हम बिना उसका अर्थ समझे भी उसे गुनगुनाने लगते हैं। स्कूल के समय पहली बार सुने इस गीत को मैं कॉलेज के ज़माने तक चाँद की बिन दीवाली बिन दीवाली रतिया  :) समझकर गाता रहा। मुझे कुछ ऐसे लोग भी मिले जो इसे 'चाँद के बिन दीवानी बिन दीवानी रतिया..' समझते रहे। ख़ैर किसी संगीत मर्मज्ञ ने जब ये बताया कि गुलज़ार यहाँ चाँद की बिंदी वाली रतियों की बात कर रहे हैं तो गीत के प्रति मेरी आसक्ति और बढ़ी।

पंचम ने राग यमन और खमाज़ को मिला जुलाकर जो धुन तैयार की उसमें सितार और तबले को प्रमुखता से स्थान मिला। एक ओर पंचम की मधुर धुन थी तो दूसरी ओर गुलज़ार के बेमिसाल शब्द। क्या क्या उद्धृत करूँ? भींगे नयनों से रात को बुझाने की बात हो या फिर रात को चाँद की बिदी जैसा दिया गया विशेषण। पंचम दा ने स्वर कोकिला लता मंगेशकर के साथ इस गीत में भूपेंद्र की धीर गंभीर आवाज़ का प्रयोग किया जो फिल्म में संजीव कुमार पे खूब फबी। आज भी जब रात में नींद कोसों दूर होती है और मन अनमना सा रहता है तो इस गीत को गुनगुनाना बेहद सुकून पहुँचाता है। वैसे भी गुजरी ज़िदगी के बीते हुए लमहों और उन्हें खास बनाने वाले लोग अगर किसी गीत के माध्यम से याद आ जाएँ तो आँखों में उभर आए आँसुओं के कतरे ओस की बूँदों की तरह मन के ताप को हर ही लेते हैं। तो आइए सुनते हैं इस गीत को...


बीती ना बिताई रैना, बिरहा की जाई रैना
भीगी हुई अँखियों ने लाख बुझाई रैना

बीती हुयी बतियाँ कोई दोहराए
भूले हुए नामों से कोई तो बुलाये
चाँद की बिंदी वाली, बिंदी वाली रतिया
जागी हुयी अँखियों में रात ना आयी रैना

युग आते है, और युग जाए
छोटी छोटी यादों के पल नहीं जाए
झूठ से काली लागे, लागे काली रतिया
रूठी हुयी अँखियों ने, लाख मनाई रैना


इस गीत के लिए उस साल यानि 1972 का सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका का पुरस्कार लता मंगेशकर को मिला। पंचम भले ही कोई इस फिल्म या गीत के लिए पुरस्कार ना जीत पाएँ हों पर उन्होंने बतौर संगीतकार उन लोगों के मन में आदर का भाव जागृत कराया जो उन्हें सिर्फ पश्चिमी संगीत के भारतीयकरण करने में ही पारंगत मानते थे।

Monday, June 23, 2014

ऐसे तो न देखो, कि हमको नशा हो जाए..मज़रूह की यादों में सचिन दा Aise to na Dekho .. Majrooh remembers S D Burman

पिछली पोस्ट में तीन देवियाँ फिल्म के गीत के बारे में चर्चा करते वक़्त बात हुई थी मज़रूह साहब के बारे में। आज आपसे गुफ़्तगू होगी इसी फिल्म के एक और गीत के बारे में। पर रफ़ी साहब के गाए इस नाज़ुक से नग्मे का जिक्र करूँ, उससे पहले आपको ये बताना चाहूँगा कि मज़रूह साहब कैसे याद करते थे सचिन देव बर्मन साहब के साथ गुजरे उन सालों को।

आपको बता ही चुका हूँ मज़रूह कम्यूनिस्ट विचारधारा से काफी प्रभावित थे। सचिन दा से उनकी पहली मुलाकात वामपंथियों के एक सम्मेलन में कोलकाता में हुई थी। सचिन दा ने मज़रूह से पहले साहिर लुधयानवी के साथ कुछ फिल्मों में काम किया। फिर किसी बात पर उनकी साहिर से अनबन हो गई तो उन्होंने मज़रूह को फिल्म Paying Guest के गाने लिखने के लिए बुलाया। 

मज़रूह को परिस्थिति दी गयी कि एक वकील अपनी महबूबा के लिए गा रहा है। मज़रूह ने सोचा वकील है थोड़ा सौम्य होगा तो उसी मिजाज़ का गाना लिख कर दे दिया। निर्देशक उनके इस प्रयास से तनिक भी खुश नहीं हुए कहा पहले फिल्म देखिए फिर गाना लिखिए। मज़रूह ने फिल्म देखी और अपना सिर ठोक लिया। उन्होंने कहा कि आपने मुझसे वकील के लिए गाना लिखने को क्यूँ कहा? सीधे कहते कि एक लोफ़र के लिए गाना लिखना है जो इक लड़की के पीछे पड़ा है और तब मज़रूह ने लिखा माना जनाब ने पुकारा नहीं, क्या मेरा साथ भी गवारा नहीं जो बेहद लोकप्रिय हुआ।

बिमल दा की फिल्म में मज़रूह ने सचिन दा के लिए एक गाना लिखा जलते हैं जिसके लिए मेरी आँखों के दीये...। इस कालजयी गीत (जो मुझे बेहद प्रिय है) के बारे में मैंने पहले यहाँ भी लिखा था पर फिल्म में इस गीत को फिल्माने पर विवाद खड़ा हो गया। फिल्म की परिस्थिति के हिसाब से ये गीत नायक नायिका द्वारा टेलीफोन करते हुए फिल्माया जाना था पर विमल दा जैसे यथार्थवादी निर्देशक फिल्म के नाम पर इतनी सिनेमेटिक लिबर्टी लेने के लिए तैयार नहीं थे। मज़रूह बताते हैं आमतौर पर डरपोक समझे जाने वाले सचिन दा इस बार बहादुरी से अड़ गए और थोड़ी देर इधर उधर टहलने के बाद बिमल दा से बोले "अगर तुम इस फिल्म में मेरा गाना नहीं लेगा तो हम पिक्चर नहीं करेगा"। सचिन दा के इस रूप को देखने के बाद बिमल दा को उनकी बात माननी पड़ी और इतिहास गवाह है कि इस गीत ने कितनी वाहवाहियाँ बटोरीं।

सचिन दा के बारे में मशहूर था कि वो अपने यहाँ आने वालों को चाय नाश्ते के लिए ज़्यादा नहीं पूछते थे। इसी मद्देनज़र मज़रूह साहब ने एक किस्सा बयाँ किया था। वाक़या ये था कि
एक बार सचिन दा , उनका सहायक, साहिर और मज़रूह गाड़ी से चर्चगेट से कहीं जा रहे थे। रास्ते में सचिन दा ने एक केला निकाला और खाने लगे। फिर उन्होंने साहिर से पूछा "कोला लेगा"? साहिर और मज़रूह अचरज़ में पड़ गए कि कहाँ से सचिन दा का दरिया - ए  -रहमत जोश मारने लगा ? अभी दोनों इसी असमंजस में थे कि सचिन दा ने कहा ड्राइवर गाड़ी रोको और फिर साहिर की ओर मुख़ातिब होकर बोले जाओ ओ दिखता है... जा कर ले लो।

सचिन दा के बारे में मज़रूह की याद की पोटलियों से निकले कई किस्से और भी हैं पर वो फिर कभी। आइए अब बात की जाए तीन देवियों के इस बेहद प्यारे से नग्मे की।

 
सचिन दा इस बाद के हिमायती थे कि गीत में उतना ही संगीत दिया जाए जितनी जरूरत हो। कहीं बेख्याल हो कर कहीं छू लिया किसी ने में आप इसका नमूना देख ही चुके हैं पर जहाँ तक ऐसे तो ना देखो की बात है यहाँ सचिन दा की शुरुआती धुन और इंटरल्यूड्स गीत के मूड में और जान डाल देते हैं। राग ख़माज पर आधारित इस गीत को हिंदुस्तानी ज़ुबान की जिस रससिक्त चाशनी में घोला है मज़रूह ने कि बोलों को पढ़कर ही मन में एक ख़ुमार सा छाने लगता है। अब इसी अंतरे को लीजिए यूँ न हो आँखें रहें काजल घोलें..बढ़ के बेखुदी हँसीं गेसू खोलें..खुल के फिर ज़ुल्फ़ें सियाह काली बला हो जाए

अब आप ही बताइए काजल से सजी आँखों के बीच किसी की बेसाख्ता सी हँसी उनके बालों की लटों को लहरा दे तो आसमान में बदली छाए ना छाए दिल तो इन काली घटाओं के आगोश में भींग ही उठेगा ना। रफ़ी ने इसी चाहत को गीत के हर अंतरे में अपनी अदाएगी के द्वारा इस तरह उभारा मानो वो ख़ुद मदहोशी की हालत में गाना गा रहे हों। तो आइए आज की शाम जाम के तौर पर इस गीत का रसपान किया जाए


ऐसे तो न देखो, कि हमको नशा हो जाए
ख़ूबसूरत सी कोई हमसे ख़ता हो जाए

तुम हमें रोको फिर भी हम ना रुकें
तुम कहो काफ़िर फिर भी ऐसे झुकें
क़दम-ए-नाज़ पे इक सजदा अदा हो जाये

ऐसे तो न देखो....

यूँ न हो आँखें रहें काजल घोलें
बढ़ के बेखुदी हँसीं गेसू खोलें
खुल के फिर ज़ुल्फ़ें सियाह काली बला हो जाए

ऐसे तो न देखो.....

हम तो मस्ती में जाने क्या क्या कहें
लब-ए-नाज़ुक से ऐसा ना हो तुम्हें
बेक़रारी का गिला हम से सिवा हो जाये
ऐसे तो न देखो
.....

फिल्म तीन देवियाँ में ये गीत देव आनंद और नंदा पर फिल्माया गया था।

Saturday, June 14, 2014

कहीं बेख़याल होकर, यूँ ही छू लिया किसी ने... जब मज़रूह की ग़ज़ल परवान चढ़ी रफ़ी की आवाज़ में (Mazrooh, Rafi in Teen Deviyan)

पिछले हफ्ते गुजरे सालों के सुपरस्टार देवानंद पर फिल्माए गानों को देख रहा था। साठ के दशक में किशोर को देव आनंद की आवाज़ का पर्याय माना जाने लगा था , पर अगर गौर किया जाए तो इसी दौरान मोहम्मद रफ़ी को भी पर्दे पर देव आनंद की आवाज बनने के मौके मिले जिन्हें उन्होंने खूबसूरती से निभाया भी। ऐसी ही एक फिल्म थी 1965 में प्रदर्शित हुई 'तीन देवियाँ' जिसके संगीतकार थे सचिन देव बर्मन और गीतकार मजरूह सुलतानपुरी। फिल्म तो निहायत औसत दर्जे की थी पर इसका संगीत इतना मशहूर हुआ कि फिल्म को हिट करा गया।


मज़रूह साहब कमाल के गीतकार थे। अब आप ही बताइए कि जिस शख़्स ने 1946 में 'शाहजहाँ' के गीतों को लिख कर शोहरत पाई हो और जो उसके पाँच दशकों के बाद भी 'क़यामत से क़यामत तक' और 'जो जीता वही सिंकदर' जैसी फिल्मों के गीतों को लिखकर युवा दिलों पर राज करता रहा ऐसी उपलब्धि उनसे पहले किस गीतकार के हाथ लगी थी? यही वज़ह थी कि किसी गीतकार को अगर फिल्म जगत का सबसे बड़ा 'दादा साहब फालके पुरस्कार' सबसे पहले मिला तो वो मज़रूह साहब ही थे।

पर वास्तव में मज़रूह साहब को अंत तक इस बात का मुगालता रहा कि पुरस्कार मिला भी तो गीतकार की हैसियत से जबकि उनका सपना हमेशा अपने समकालीन फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की तरह एक प्रतिष्ठित ग़ज़लकार बनने का ही था। चालीस के दशक में वो मुंबई एक मुशायरे में शिरक़त करने ही आए थे और उनकी ग़ज़लों से प्रभावित हो कर एक निर्माता नेजब उन्हें गीतकार बनने का मौका दिया तो उन्होंने उसे ये कहते हुए ठुकरा दिया था कि ये इज़्ज़त की नौकरी नहीं है। पर जिगर मुरादाबादी के ये समझाने पर कि बतौर जीविका चलाने के लिए तुम ये काम करो, बाकी ग़ज़लें लिखते रहो....वो मान गए। पचास के दशक के बाद से ये धारदार कम्युनिस्ट अपनी विचारधारा को कार्यान्वित ना होते देख उसमें सक्रिय भागीदारी से तो विमुख हो ही गया था, साथ ही वक़्त के साथ ग़ज़लों से भी दूर होता चला गया।

गीतकार के रूप में इतनी सफलता हाथ लगी कि उन्हें अपने हुनर पर और समय देने का अवसर ही नहीं मिला। पर जब जब फिल्मों में ग़ज़ल लिखने का उन्हें मौका मिला उन्होंने अपना कौशल दिखाने में कोताही नहीं की। अब तीन देवियाँ फिल्म के इस गीत को लें क्या मतला (प्रारंभिक शेर) लिखा था मज़रूह ने

कहीं बेख़याल होकर, यूँ ही छू लिया किसी ने
कई ख्वाब देख डाले, यहाँ मेरी बेखुदी ने

मैं तो कहता हूँ बस इसी शेर को गुनगुनाते हुए घंटों निकालें जा सकते हैं। कितनी आम सी बात को इस करीने से पकड़ा मज़रूह साहब ने कि तन मन गुदगुदा उठे। वैसे बाकी के मिसरे भी अच्छे भले हैं और रफ़ी की आवाज़ का साथ पाकर और फड़क उठे हैं।

वैसे मज़रूह अगर सामने होते तो एक बात जरूर पूछता उनसे जब गाना देव आनंद गा रहे थे तो फिर चौथे मिसरे में 'किया बेक़रार हँसकर, मुझे एक आदमी ने' कैसे कह गए? कोई स्त्रीसूचक शब्द जैसे महज़बीं/दिलनशीं और मुनासिब होता। शायद शेर के बहर यानि मीटर की बंदिशों को तोड़ना उन्हें गवारा ना लगा हो।

कहीं बेख़याल होकर, यूँ ही छू लिया किसी ने
कई ख्वाब देख डाले, यहाँ मेरी बेखुदी ने , कहीं बेख़याल होकर

मेरे दिल मैं कौन है तू, कि हुआ जहाँ अँधेरा
वहीं सौ दिये जलाये, तेरे रुख़1 की चाँदनी ने
 
कभी उस परी का कूचा, कभी इस हसीं की महफ़िल
मुझे दरबदर फिराया, मेरे दिल की सादगी ने

है भला सा नाम उसका, मैं अभी से क्या बताऊं
किया बेक़रार हँसकर, मुझे एक आदमी ने

अरे मुझपे नाज़ वालों, ये नयाज़मन्दियाँ2 क्यों
है यही करम तुम्हारा, तो मुझे ना दोगे जीने

कई ख्वाब.....कहीं बेख़याल होकर

1. चेहरा, 2.अहसान


सचिन देव बर्मन के साथ इसी फिल्म में मजरूह ने एक और प्यारा गीत लिखा था जो मुझे इससे भी प्यारा लगता है। पर अभी मैं आपको इस गीत की ख़ुमारी से जगाना नहीं चाहता तो उस गीत की बातें अगली प्रविष्टि में।

Sunday, June 08, 2014

सीखो ना नैनों की भाषा पिया. Seekho Na Nainon Ki Bhasha Piya

करीब तीन हफ्तों के लंबे अंतराल के बाद इस ब्लॉग पर लौट रहा हूँ। क्या करूँ घर की एक शादी, फिर कनाडा का अनायास दौरा और वापस लौटकर कार्यालय की व्यस्तताओं ने यहाँ चाह कर भी आने की मोहलत नहीं दी। पर कभी कभी इन व्यस्तताओं के बीच भी कुछ मधुर सुनने को मिल जाता है। अब इसी गीत की बात लीजिए। इसे पिछले हफ्ते अपने कार्यालयी दौरों के बीच एक शाम मित्रों के साथ गाने गुनगुनाने की बैठक में पहली बार सुना और तबसे ही इसकी गिरफ्त में हूँ। तो सोचा आप तक इसे पहुँचा कर इस गिरफ़्त से आज़ादी ले लूँ। 

इस गीत को गाया है हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के साथ हिंदी पॉप में भी अपना दखल देने वाली शुभा मुद्गल जी ने। शुभा जी की आवाज़ जहाँ एक ओर पारंपरिक ठुमरी, ख़याल और दादरा की याद दिला देती है वहीं अली मोरे अँगना, अब के सावन, प्यार के गीत सुना जा रे जैसे गैर फिल्मी गीतों की भी, जो दस पन्द्रह साल पहले बेहद लोकप्रिय हुए थे और आज भी लोगों के दिलो दिमाग से गए नहीं हैं। 1999 में उनका एक एलबम आया था 'अब के सावन' जिसे संगीतबद्ध किया था शान्तनु मोइत्रा ने । इस एलबम का एक गीत था 'सीखो ना नैनों की भाषा पिया..' जिसे लिखा था प्रसून जोशी ने।


काव्यात्मक गीतों की रचना में आज प्रसून जोशी अग्रणी गीतकारों में माने जाते हैं। ये गीत इस बात को साबित करता है कि उनका ये हुनर उनके शुरुआती दिनों से उनके साथ रहा है।  रूपा पब्लिकेशन द्वारा पिछले साल अपनी प्रकाशित पुस्तक Sunshine Lanes में इस गीत की चर्चा करते हुए उन्होंने लिखा है..
"मैंने इस गीत पर दिल्ली में काम करना शुरु किया क्यूँकि उस वक़्त वही मेरा ठिकाना था। पर जब 'अब के सावन' एलबम के गीतों की रिकार्डिंग शुरु हुई तो मुझे रिकार्डिंग टीम के साथ मुंबई जाना पड़ा। वहीं जुहू के शांत होटल के एक कमरे में ये गीत अपनी आख़िरी शक़्ल ले सका। ठुमरियाँ लिखना मुझे हमेशा से प्रिय रहा है। ये गीत भले ठुमरी की परिभाषा में पूरी तरह ख़रा नहीं उतरता पर फिर भी उसकी सुगंध को गीत की अदाएगी के साथ आप महसूस कर सकते हैं।
किसी भी प्रेमी की सबसे बड़ी हसरत उसे समझे जाने की होती है। सिर्फ शब्दों के ज़रिए नहीं पर उन छोटी छोटी बातों से जो उसकी भावनाओं और भाव भंगिमाओं में रह रह कर प्रकट होती हैं। मैंने इस गीत में इसी भाव को और गहराई से परखने की कोशिश की। वैसे तो ये गीत नारी मनोभावों को ज़रा ज्यादा छूता है पर ऐसा भी नहीं है कि पुरुषों में अपने आप को समझे जाने की चाहत नहीं होती।"
प्रसून की बातें तो आपने पढ़ लीं। ज़रा देखिए उन्होंने इस गीत में लिखा क्या है..

सीखो ना नैनों की भाषा पिया
कह रही तुमसे ये खामोशियाँ
सीखो ना
लब तो ना खोलूँगी मैं समझो दिल की बोली
सीखो ना नैनों की भाषा पिया...

सुनना सीखो तुम हवा को
सनन सन सनन सन कहती है क्या
पढ़ना सीखो.. सल..वटों को
माथे पे ये बलखा के लिखती हैं क्या

आहटों की है अपनी जुबाँ
इनमें भी है इक दास्तान
जाओ जाओ जाओ जाओ जाओ पिया

सीखो ना नैनों की भाषा...

ठहरे पानी जैसा लमहा
छेड़ो ना इसे हिल जाएँगी गहराइयाँ
थमती साँसों के शहर में
देखो तो ज़रा बोलती हैं क्या परछाइयाँ

कहने को अब बाकी है क्या
आँखों ने सब कह तो दिया
हाँ जाओ जाओ जाओ जाओ जाओ पिया

इसीलिए हुज़ूर अगली बार जब अपने प्रियतम के साथ हों तो बहती हवा की सनसनाहट में ये देखना ना भूलिए कि वो उन्हें गुदगुदा रही है या उकता रही है। अगर वो एकटक आपकी आँखों में आँखें डाले बैठे हों तो कुछ बोल कर प्रेम में डूबे उन गहरे जज़्बातों को हल्का ना कीजिए।बल्कि उनके साथ उनमें और डूबिए। वो लमहा तो गुजर जाएगा पर उसकी कसक, उसकी मुलायमियत आप वर्षों महसूस कर सकेंगे।

बहरहाल मैंने जिस दिन ये गीत सुना उस दिन ना तो फिज़ाओं में हवाएँ थीं और ना तो आकाश की गोद में उमड़ती घटाएँ। थी तो बस ढलती शाम में एक प्यारी सी आवाज़ जो गीत के बोलों के उतार चढ़ावों , उसकी भावनाओं को भली भांति प्रतिध्वनित करती हुई गर्मी की उस उष्णता को शीतलता में बदल रही थी। शायद यही कारण था कि शाखों से झूलते पत्ते भी बिना हिले डुले एकाग्रचित्त होकर इस गीत का आनंद ले रहे थे। 

इस गीत को सुनने के बाद मैंने तुरंत घर आकर शुभा मुद्गल की आवाज़ में इस गीत को सुना। पर अपने प्रिय संगीतकार शान्तनु मोइत्रा के संगीत संयोजन ने मुझे बेहद निराश किया। इस गीत को एक ठहराव और सुकून वाले न्यूनतम संगीत संयोजन की जरूरत थी जिसका मज़ा शान्तनु ने गीत के साथ चलती ताल वाद्यों की गहरी बीट्स से थोड़ा तो जरूर खराब कर दिया। अगर ऐसा नहीं होता तो शुभा जी की गायिकी और निखर कर  सामने आती।

नेट पर मैंने इस गीत को बिना संगीत के सुनना चाहा और मुझे कई अच्छी रिकार्डिंग्स हाथ लगी। उनमें से एक थी निकिता दाहरवाल की सो वही आपको पहले सुना रहा हूँ। इसी गीत को युवा गायिका और फिलहाल इंग्लैंड में अपनी शिक्षा पूरी कर रही निकिता दहरवाल ने भी पूरे मनोयोग से गाया है। निकिता की आवाज़ की तुलना शुभा जी की खुले गले वाली गहरी आवाज़ से तो नहीं की जा सकती पर उसने गीत की भावनाओं को सहजता से अपनी आवाज़ में पकड़ने की कोशिश जरूर की है।



और अब सुनिए इसे शुभा मुद्गल की आवाज़ में..





वैसे लोचनों की इस भाषा को पढ़ने में आपका अनुभव कैसा रहा है? क्या ऐसा तो नहीं कि आपने समझ कर भी उसे नज़रअंदाज़ कर दिया हो या फिर उनमें निहित भावनाओं को जरूरत से ज्यादा आँका हो ?

Thursday, May 15, 2014

दानेह पे दानेह दानना.... एक मस्ती भरा बलूची लोकगीत ! Daanah pe Daanah by Akhtar Chanal Zahri

लोकगीतों और लोकगायकों की सबसे बड़ी खासियत होती है कि उनके गाने का लहज़ा और रिदम कुछ इस तरह का होता है कि बिना भाषाई ज्ञान रखते हुए भी आप उस संगीत रचना से बँध कर रह जाते हैं। आज एक ऐसे ही गीत से आपको रूबरू करा रहा हूँ जिसकी भाषा बलूची है। इसे गाया है बलूची लोकगायक अख़्तर चानल ज़ाहरी  ने। बलूची रेडियो स्टेशन से पहली बार चार दशकों पहले अपनी प्रतिभा का परिचय देने वाले 60 वर्षीय ज़ाहरी पूरे विश्व में बलूची लोकसंगीत के लिए जाना हुआ नाम हैं। अपनी मिट्टी के संगीत के बारे में ज़ाहरी कहते हैं
"जिस जगह से मैं आता हूँ वहाँ बच्चे सिर्फ दो बातें जानते हैं गाना और रोना। संगीत से हमारा राब्ता बचपन से ही हो जाता है। बचपन में एक गड़ेरिए के रूप में अपनी भेड़ों को चराते हुए मैं जो नग्मे गुनगुनाता था वो मुझे आज तक याद हैं। मुझे तो ये लगता है कि हर जानवर, खेत खलिहान, फूल और यहाँ तक कि घास का एक क़तरा भी संगीत की धनात्मक उर्जा को महसूस कर सकता है।"
आज जिस बलूची गीत की बात मैं करने जा रहा हूँ उसे ज़ाहरी के साथ गाया था पाकिस्तानी गायिका कोमल रिज़वी ने।  बहुमुखी प्रतिभा वाली 33 वर्षीय कोमल गायिकी के आलावा गीतकार और टीवी होस्ट के रूप में भी पाकिस्तान में एक चर्चित नाम हैं। जिस तरह बलूचिस्तान के दक्षिणी इलाके के साथ सिंध की सीमाएँ सटती हुई चलती हैं उसी को देखते हुए कोक स्टूडियो की इस प्रस्तुति में बलूची गीत का सिंध के सबसे लोकप्रिय लोकगीत ओ यार मेरी..दमादम मस्त कलंदर के साथ फ्यूज़न किया है। फ्यूजन तो अपनी जगह है पर इस गीत का असली आनंद ज़ाहरी और कोमल रिज़वी द्वारा गाए बलूची हिस्से को सुन कर आता है।


गीत की भाषा ब्राह्वी है जो प्राचीन बलूचिस्तान की प्रमुख स्थानीय भाषा थी। ज़ाहिरी इस गीत के बारे में बताते हैं कि क्वेटा में जब वो एक दर्जी की दुकान में बैठे थे तो उन्होंने एक फकीर को दानेह पे दानेह दानना गाते सुना। इसी मुखड़े से उन्होंने बलूचिस्तान से जुड़े अपने इस गीत को विकसित किया। गीत के मुखड़े दानेह पे दानेह दानना का अर्थ है कि संसार के अथाह दानों में से एक दाना मेरा भी है। ज़ाहरी  के इस गीत में एक गड़ेरिया अपने बच्चों को बलूचिस्तान की नदियों, शहरों व प्राचीन गौरवमयी इतिहास और दंत कथाओं से परिचय कराता है। गीत के बीच बीच में जानवरों को हाँकने के लिए प्रचलित बोलियों का इस्तेमाल किया गया है ताकि लगता रहे कि ये एक चरवाहे का गीत है।


पर इस गीत का लोकगीत की सबसे मजबूत पक्ष इसकी रिदम और ज़ाहरी की जोरदार आवाज़ है जिसका प्रयोग वो अपने मुल्क की तारीफ़ करते हुए इस मस्ती से करते हैं कि मन झूम उठता है। कोमल ज़ाहरी के साथ वही मस्ती अपनी गायिकी में भी ले आती हैं। गीत के दूसरा हिस्सा मुझे उतना प्रभावित नहीं करता क्यूँकि दमादम मस्त कलंदर को इतनी बार सुन चुका हूँ कि उसे यहाँ सुनने में कुछ खास नयापन नहीं लगता।

इसलिए अगर आप सिर्फ बलूची हिस्से को सुनना चाहें तो नीचे की आडियो लिंक पर क्लिक करें।
 

मेरी पसंदीदा किताबें...

सुवर्णलता
Freedom at Midnight
Aapka Bunti
Madhushala
कसप Kasap
Great Expectations
उर्दू की आख़िरी किताब
Shatranj Ke Khiladi
Bakul Katha
Raag Darbari
English, August: An Indian Story
Five Point Someone: What Not to Do at IIT
Mitro Marjani
Jharokhe
Mailaa Aanchal
Mrs Craddock
Mahabhoj
मुझे चाँद चाहिए Mujhe Chand Chahiye
Lolita
The Pakistani Bride: A Novel


Manish Kumar's favorite books »

स्पष्टीकरण

इस चिट्ठे का उद्देश्य अच्छे संगीत और साहित्य एवम्र उनसे जुड़े कुछ पहलुओं को अपने नज़रिए से विश्लेषित कर संगीत प्रेमी पाठकों तक पहुँचाना और लोकप्रिय बनाना है। इसी हेतु चिट्ठे पर संगीत और चित्रों का प्रयोग हुआ है। अगर इस अव्यवसायिक चिट्ठे पर प्रकाशित चित्र, संगीत या अन्य किसी सामग्री से कॉपीराइट का उल्लंघन होता है तो कृपया सूचित करें। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी।

एक शाम मेरे नाम Copyright © 2009 Designed by Bie