Monday, May 07, 2012

फिर कहीं कोई फूल खिला, चाहत ना कहो उसको : क्या आप निराशावादी हैं?

आप आशावादी (optimist) हैं या निराशावादी (pessimist) ये तो मुझे नहीं पता पर बचपन में ये प्रश्न मुझे बड़ा परेशान करता था। अक्सर बड़े लोगों के साक्षात्कार पढ़ता तो ये जुमला बारहा दिख ही जाता था कि I am an eternal optimist। अपने दिल को टटोलता तो कभी भी इन पंक्तियो को वो पूरी तरह स्वीकार करने को इच्छुक नहीं होता।  होता भी कैसे? बचपन से ही उसे अपनी आशाओं को वास्तविकता के तराजू में तौलने की आदत जो हो गई थी। परीक्षा के बाद दोस्त लोग नंबर पूछते तो मैं मन में अंक देने में कंजूस आध्यापक की छवि बनाता और उस हिसाब से गणना कर अपने दोस्तों को अपना अनुमान बता देता। ज़ाहिर है उनके अनुमान मेरे से हमेशा ज्यादा होते पर जब परिणाम आते तो नतीजा उल्टा होता। इंटर में रहा हूँगा जब पहली बार मुझे देखकर एक कन्या ने बड़े प्यार से हाथ हिलाया। प्रचलित जुबान में कहूँ तो wave.. किया। पर जनाब उस का प्रत्युत्तर देने के बजाए मैंने ये देखा कि मेरी नीचे और ऊपर की मंजिल की बॉलकोनी पर कोई लड़का खड़ा तो नहीं है। ऐसे में आप ही बताइए मैं अपने आप को आशावादी कैसे कह सकता हूँ? पर मन ये मानने को तैयार नहीं था कि मैंने नैराश्य की चादर अपने ऊपर ओढ़ रखी है। दिन बीतते गए पर मुझे अपने व्यक्तित्व को परिभाषित करने के लिए उपयुक्त जवाब नहीं मिला और इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान कब ये प्रश्न मुझसे दूर हो गया मुझे पता ही नहीं चला।

और फिर एक दिन अखबार में छपी किसी के ये उक्ति नज़रों से गुजरी 

"Success or failure..I will  always be pleasantly surprised rather than bitterly disappointed."

और  मुझे लगा कि अपने बारे में ये ख्याल मुझे पहले क्यूँ नहीं आया। संयोग देखिए उस दिन के मात्र एक हफ्ते बाद ही बहुराष्ट्रीय कंपनी के एक कैंपस इंटरव्यू में ये सवाल मुझपे दागा गया Are you an optimist or pessimist ? मैंने भी छूटते ही ऊपर वाली पंक्ति दोहरा दी। अब मुझे क्या पता था कि मैनेजमेंट फिलॉसफी के तहत मेरा जवाब ठीक नहीं बैठेगा। मेरे जवाब के बाद कुछ देर शांति छाई रही फिर उन्होंने मुझे रफा दफ़ा कर दिया। पर इतने दशकों बाद भी मैं अपने फलसफ़े पर कायम हूँ। ख़्वाबों की दुनिया में उड़ने से मुझे कभी परहेज़ नहीं रहा पर पैर धरातल से उखड़े नहीं ये बात भी दिमाग में रही बहुत कुछ मेरी इस कविता की तरह।

वैसे इन सब बातों को आपसे साझा मैं क्यूँ कर रहा हूँ? उसकी वज़ह है आज का वो गीत जो मैं आपको सुनवाने जा रहा हूँ। इस गीत का मर्म भी वही है। जीवन में घट रही तमाम धनात्मक घटनाओं को उतना ही आँकें जिनके लायक वो हैं। नहीं तो अपने सपनों के टूटने की ठेस को शायद आप बर्दाश्त ना कर पाएँ।

ये गीत है फिल्म अनुभव का  जिसे लिखा था कपिल कुमार ने और धुन बनाई थी कनु रॉय ने। कपिल कुमार फिल्म उद्योग में एक अनजाना सा नाम हैं। कनु रॉय के साथ उन्होंने दो फिल्मों में काम किया है अनुभव और आविष्कार। पर इन कुछ गीतों में ही वो अपनी छाप छोड़ गए। यही हाल संगीतकार कनु रॉय का भी रहा। गिनी चुनी दस से भी कम फिल्मों में काम किया और जो किया भी वो सारे निर्देशक बासु भट्टाचार्य के बैनर तले। बाहर उनको काम ही नहीं मिल पाया। पर इन थोड़ी बहुत फिल्मों से भी अपनी जो पहचान उन्होंने बनाई वो आज भी संगीतप्रेमियों के दिल में क़ायम है।

अब इसी गीत को लें गीत के मुखड़े में मन्ना डे का स्वर उभरता है फिर कहीं और पीछे से कनु  की संयोजित वाइलिन और सितार की धुन आपके कानों में पड़ती है। इंटरल्यूड्स में भी यही सितार आपके मन को झंकृत करता है। कनु के संगीत की खासियत ही यही थी कि वे बेहद कम वाद्य यंत्रों में भी सुरीले गीतों को जन्म देते थे। पर  सबसे अद्भुत है मन्ना डे की गायिकी । बेहद  अनूठे अंदाज़ में उन्होंने गीतकार की भावनाओं को अपनी गायिकी से उभारा है।  मन्ना डे साहब हर अंतरे की आखिरी पंक्ति में बदलती लय में लहरों का लगा जो मेला..... या दिल उनसे बहल जाए तो.... गाते हैं तो बस मन एकाकार सा हो जाता है उन शब्दों के साथ। 

पिछले हफ्ते अपना 93 वाँ जन्मदिन मनाने वाला ये अनमोल गायक आज भी हमारे बीच है, यह हमारी खुशनसीबी है। मन्ना डे ने शास्त्रीय से लेकर हल्के फुल्के गीतों को जितने बेहतरीन तरीके से निभाया है वो ये साबित करता है उनके जैसा संपूर्ण पार्श्वगायक बिड़ले ही मिलता है।

फिर कहीं...
फिर कहीं  कोई फूल खिला, चाहत ना कहो उसको
फिर कहीं  कोई फूल खिला, चाहत ना कहो उसको
फिर कहीं कोई दीप जला, मंदिर ना कहो उसको
फिर कहीं ...

मन का समंदर प्यासा हुआ, क्यूँ... किसी से माँगें दुआ
मन का समंदर प्यासा हुआ, क्यूँ... किसी से माँगें दुआ
लहरों का लगा जो मेला.., तू..फ़ां ना कहो उसको
फिर कहीं  कोई फूल खिला, चाहत ना कहो उसको
फिर कहीं ...

देखें क्यूँ सब वो सपने, खुद ही सजाए जो हमने...
देखें क्यूँ सब वो सपने, खुद ही सजाए जो हमने...
दिल उनसे बहल जाए तो, राहत ना कहो उसको
फिर कहीं ...


फिल्म अनुभव में इस गीत को फिल्माया गया है मेरे चहेते अभिनेता संजीव कुमार और तनुजा पर..


पर  कनु रॉय और उनके संगीत का ये सफ़र अभी थमा नहीं है। इस श्रृंखला की अगली कड़ी में चर्चा करेंगे इस तिकड़ी के एक और बेमिसाल गीत की..

 कनु दा से जुड़ी इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ 

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14 comments:

दीपिका रानी on May 07, 2012 said...

बहुत बढ़िया... आपका चिंतन भी.. और कविता के भी भाव उत्तम, अच्छा है कि आपने शिल्प संवारने के चक्कर में भाव को जाने नहीं दिया है। आपकी कविता का कच्चापन ही उसका सौंदर्य है। गीत तो मधुर है ही, इसे तसल्ली से सुनेंगे।

expression on May 07, 2012 said...

सब कुछ सुंदर.........................
और ये बात भी कि मैं हद से ज्यादा आशावादी हूँ.............रेल की पटरी पर कोई मुझे रस्सी से बाँध कर पटक दे तब भी मुझे यकीं रहेगा कि किसी ना किसी वजह से ट्रेन रुकेगी ज़रूर..........

बहुत मज़ा है आशाएं पालने में.............

अनु

Bhoopesh Dhurandhar on May 07, 2012 said...

Hi Manishji,
Nice post, and Luckily i happened to watch this MOVIE ANUBHAV yesterday only.
The song is really gr8, and movie is class apart, loved the way BASUDA has woven the charecters and script.

***Punam*** on May 07, 2012 said...

'अनुभव' और 'आविष्कार'....आज भी इन दोनों फिल्मों के गीत और संगीत उतने ही refreshing लगते हैं....मुझे इनके गीतकार और संगीतकार के बारे में आज ही पता चला...कभी जानने की कोशिश भी न की ....क्यूंकि इनके नाम की तरफ कभी ध्यान भी न गया.....कपिल कुमार और कनु राय को बधाई....इतना सुंदर गीत और संगीत देने के लिए !!
मनीष ! आप हमेशा ही कुछ न कुछ नई जानकारी के साथ गीतों को हम तक लाते हैं.....शुक्रिया!
मन्ना दा की आवाज हमेशा ही तरोताजा लगती है...जाने क्या खासियत है।....ईश्वर उन्हें लंबी उम्र दे...!!

प्रवीण पाण्डेय on May 07, 2012 said...

मधुर और कोमल..

दीपक बाबा on May 07, 2012 said...

हर इंसान दिन में कितनी बार आशा और निराशा के दर्बियान झूलता रहता है - आशा न हो तो जीवन समाप्त करने में कितना समय लगता है..



सब जीए चले जा रहे हैं - कुछ अच्छा होने की आशा में.... बाकि सब निराशा ही हैं.

वाणी गीत on May 08, 2012 said...

गीत के साथ आपका सन्दर्भ भी उत्तम है !

rashmi ravija on May 08, 2012 said...

आशावादी और निराशावादी के बीच एक शब्द यथार्थवादी भी होना चाहिए.... जो कुछ आस-पास घटता है..उस से वे आँखें नहीं चुरा सकते...

बहुत ही ख़ूबसूरत गीत का जिक्र किया है....हो सकता है..कनु रॉय ने हिंदी फिल्मो में कम संगीत दिया हो पर बंगाली फिल्मो में सफल रहे हों...ये महज एक अनुमान है.

Dilip Kawathekar on May 08, 2012 said...

All is Well का आशावाद कोई पलायनवाद नहीं हैं.कुदरत में या ईश्वर में आपकी आस्था या विश्वास का परिचायक है. विवेकानंद जी नें कहा था कि There is no difference in Life & Death. तो किसीने पूछा तो फ़िर हम मर क्यों नहीं जाते. तो उन्होने कहा था , कोई फ़र्क नहीं है तो जीना ही बेहतर है, क्योंकि जीवन से हम भगवान के रचे इस सुंदर रचना निसर्ग से रूबरू होते हैं, जिसे हमारे लिये ही बनाया है.

bahut hi madhur..
इस गाने में मैं पहले समझता था कि यूं शब्द हैं >> फ़िर कहीं कोई दीप जला, मंदिर ना कहो उसको....(मंज़िल की जगह). अभी भी लगता है कि मंज़िल से मंदिर ही बेहतर expression है.

Manish Kumar on May 08, 2012 said...

दिलीप जीआशावाद से किसी को कोई बैर नहीं पर आशाओं का दीपक तो कर्म रूपी दीये में जलकर ही पल्लवित हो पाता है। दिक्कत ये है कि लोग बिना उस मेहनत के वो उम्मीद लगा लेते हैं जिसके हम काबिल नहीं।

आप बिल्कुल सही कह रहे हैं गाना सुनते समय मेंने भी मंदिर ही लिखा था पर अंतरजाल पर कई जगह मंजिल लिखा देखा तो भ्रम में पड़ गया। अभी फिर स्लो कर के सुना तो मंदिर ही लगा।

Manish Kumar on May 08, 2012 said...

दीपिका जानकर खुशी हुई कि उस कच्ची कविता के भाव ओपको रुचिकर लगे।

अनु वाह ये भी अच्छा है कम से कम आपके साथ जो ऐसी मुसीबत में फँसेगा उसे संबल देने वाला कोउ तो रहेगा।

दीपक जी सही कहा आशाएँ और ख्वाब ही तो जीने की नई उर्जा देते हैं।

प्रवीण गीत के लिए मधुर और फिलासफिकल कहना क्याा ज्यादा उचित नहीं रहेगा

वाणी जी शुक्रिया

Manish Kumar on May 08, 2012 said...

भूपेश सही कहा..बासु भट्टाचार्य के फिल्मों की पटकथाएँ, उनके चुने कलाकारों का अभिनय और गीत संगीत बेहतरीन होता है। तीसरी कसम तो याद ही होगी आपको। अनुभव को हाल फिलहाल में देख नहीं पाया हूँ। आपने कल इसे देखा जान कर प्रसन्नता हुई। बासु दा और कनु रॉय से जुड़ी इस श्रृंखला की अगली कड़ी में आपको उनके व्यक्तित्व का एक अलग हिस्सा देखने को मिलेगा।

Manish Kumar on May 08, 2012 said...

पूनम जी इस कड़ी में कनु राय के चार और गीतों की चर्चा होनी है जिसमें दो कपिल कुमार और दो गुलज़ार के लिखे हुए हैं। उम्मीद करता हूँ कि वो गीत भी आपके पसंदीदा होंगे। मुझे इस श्रृंखला की तैयारी करते वक़्त कनु दा के बारे में बहुत कुछ दिलचस्प जानने को मिला जिसे मैं अगली कुछ कड़ियों में आप से साझा करूँगा।

Manish Kumar on May 08, 2012 said...

रश्मि जी यथार्थवाद से जुड़े आपके कथन से बिल्कुल सहमत हूँ।

उन्होंने बंगाली फिल्मों में सलिल दा के साथ काम किया। पर ज्यादा काम वहाँ भी नहीं कर सके। मुंबई वो संगीत निर्देशक बनने की तमन्ना ले कर आए भी नहीं थे। कनु दा के बारे में विस्तार से आपको अगली कुछ पोस्टों में बताऊँगा।

 

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