Monday, September 19, 2011

शंकर टकर और क्लारिनेट : पश्चिमी वाद्य यंत्र पर बहती हिदुस्तानी सुर गंगा...

शंकर 'टकर' ये नाम सुन कर  कुछ अज़ीब नहीं लगता आपको ? जब आप इस अमेरिकी वादक को क्लारिनेट पर हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के साथ संगत करते देखेंगे तो आपका ये विस्मय और भी बढ़ जाएगा। कुछ ही दिनों पहले मैंने शंकर को टीवी के एक संगीत चैनल पर अपनी कला का प्रदर्शन करते देखा और एक बार में ही क्लारिनेट पर उनकी कलाकारी देख कर मंत्रमुग्ध हो गया। तो चलिए आज आपसे बातें करते हैं इस अद्भुत युवा अमेरिकी वादक के बारे में, उनकी संगीतबद्ध कुछ मधुर धुनों के साथ..

यूँ तो शंकर पिछले चौदह सालों से क्लारिनेट बजा रहे हैं पर भारतीय शास्त्रीय संगीत की तरफ उनका रुझान हाई स्कूल के बाद हुआ। बोस्टन में उन्होंने स्नातक तक की पढ़ाई 'आर्केस्ट्रा में क्लारिनेट के प्रयोगों पर की। क्लारिनेट हवा की फूँक से बजने वाले वाद्यों में एक प्रमुख वाद्य है जिसका अविष्कार अठारहवीं शताब्दी में  जर्मनी में हुआ था। कॉलेज में पढ़ते वक़्त शंकर के मन में क्लारिनेट पर हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत से ताल मेल बिठाने की इच्छा इस तरह घर कर गई थी कि स्नातक की पढ़ाई खत्म करने के बाद उन्होंने सितार वादक पीटर रो से शास्त्रीय रागों और तालों की शिक्षा ली। पीटर की मदद से ना केवल शंकर को भारत में संगीत की शिक्षा ग्रहण करने के लिए वज़ीफा मिला बल्कि साथ ही मशहूर बाँसुरी वादक हरि प्रसाद चौरसिया जैसा गुरु भी।

शंकर ने कुछ ही महिने पहले यू ट्यूब पर अपना एक नया एलबम जारी किया दि श्रुति बॉक्स (The Shruti Box)। उनके इस एलबम में ग्यारह ट्रैक्स हैं  जिनमें छः शुद्ध धुनें और बाकी पाँच विभिन्न गायकों द्वारा गाए गीत व भजन हैं। शंकर द्वारा हर ट्रैक में बजाए क्लारिनेट में कुछ ना कुछ ऐसा जरूर है जो कि आपका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है। पूरा एलबम सुनने के बाद मैं पिछले कुछ दिनों में उनके बजाए कई ट्रैक बारहा सुनता रहा हूँ। और मन में एक ऐसा सुकून तारी हुआ है जिसे लफ़्जों से बयाँ करना मुश्किल है।

बारिश का मौसम हमारी तरफ़ बदस्तूर ज़ारी हैं तो क्यूँ ना शुरुआत करें आज की इस महफ़िल का एक ऍसी धुन के साथ जो कि प्रेरित है राग मेघ मल्हार और मुंबई की बरसात से। शंकर ने इसका नाम दिया है 'नाइट मानसून' (Night Monsoon)। क्लारिनेट पर बजती इस मधुर धुन का सम्मोहन और भी बढ़ जाता है अमित मिश्रा द्वारा की गई तबले की संगत से।





शंकर आजकल मुंबई में रहते हैं। अमेरिका से भारत में बसने  की वज़ह से ज़िदगी में आए बदलाव से अभ्यस्त होने की कोशिश कर रहे हैं। पर संगीतिक रूप से वो मानते हैं कि भारत आने से जिंदगी ने एक अलग ही मोड़ ले लिया है। आज संगीत रचना करते समय वेस्टर्न नोटेशन्स को भूल कर वो भारतीय तालों के बारे में सोचने लगे हैं। उनकी ये सोच उनकी धुनों में स्पष्ट दिखती हैं जब हिंदुस्तानी शास्त्रीयता पश्चिमी वाद्य यंत्र के साथ बिना किसी मुश्किल के घुलती मिलती नज़र आती है। मिसाल के तौर पर इसी धुन को लीजिए जिसे शंकर ने लेमनग्रास (Lemongrass) का नाम दिया है।



क्लारिनेट जैसे वाद्य यंत्र को भारतीय संगीत के अनुरूप ढालना शंकर के लिए सहज नहीं था । कई बार सही सुर उत्पन्न करने की तकनीकी बाधाओं ने शंकर को हताश कर दिया। पर वो क्लारिनेट के आलावा कोई दूसरा वाद्य अपनाना नहीं चाहते थे। इसकी दो वज़हें थीं। एक तो क्लारिनेट से उनका प्रेम और दूसरे उसपर किए गया उनका वर्षों का अभ्यास जो दूसरे साज को अपनाने से बेकार चला जाता।

शंकर के एलबम श्रुति बॉक्स की मेरी सबसे पसंदीदा धुन है 'सोनू'। इस धुन को जब भी सुनता हूँ तो ऐसा लगता है कि जैसे कोई पुराना हिंदी गीत सुन रहा हूँ। इस धुन का नाम 'सोनू' क्यूँ है वो आप इसका वीडिओ देखकर जरूर समझ जाएँगे।




इंटरनेट पर शंकर टकर की इन धुनों की लोकप्रियता का ये आलम है कि कुछ ही महिनों में इनकी ये रचनाएँ यू ट्यूब पर श्रोताओं द्वारा लाखों बार बज चुकी हैं। शंकर, कुछ फिल्मों में ए आर रहमान और दक्षिण के अग्रणी शास्त्रीय गायकों के साथ काम कर चुके हैं। उनके एलबम की पसंदीदा धुनों की बात तो मैंने कर ली पर एलबम में उनके वाद्य की संगत में गाई गयी कुछ बंदिशों की चर्चा करेंगे अगली पोस्ट में। साथ ही ये जानना भी आपके लिए दिलचस्प रहेगा कि भारतीय मूल का ना होते हुए भी उनका नाम शंकर क्यूँ पड़ा?

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4 comments:

प्रवीण पाण्डेय on September 19, 2011 said...

आभार, आराम से बैठकर सुनते हैं।

Nayak Kumar on September 21, 2011 said...

Lovelyyyyyyyyyyyyy.......

रंजना on September 21, 2011 said...

सच...

अद्भुद और रोमांचक...!!!

आराम से सारे सुनती हूँ यु ट्यूब पर जा..

बहुत बहुत आभार.

सोनरूपा विशाल on November 20, 2011 said...

amazed totaly ............

 

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