Saturday, May 10, 2008

ख़ुमार-ए-गम है महकती फिज़ा में जीते हैं..तेरे ख़याल की आबो हवा में जीते हैं

पिछली पोस्ट में फिल्म लीला के गीत 'जाग के काटी सारी रैना..' को आपने सुना था। इसी फिल्म की एक ग़ज़ल हे जो मुझे बेहद प्रिय है। इसे गाया और संगीत दिया है जगजीत सिंह ने। अब संगीत में तो कुछ खास नयापन नहीं है पर इसके बोल जो गुलज़ार ने लिखे हैं लाज़वाब हैं। खासकर इसका मतला तो दिल खुश कर देता हैऔर मुझे इन पंक्तियों को गुनगुनाना बेहद पसंद है

ख़ुमार-ए-गम है महकती फिज़ा में जीते हैं
तेरे ख़याल की आबो हवा में जीते हैं


बड़े तपाक से मिलते हैं मिलने वाले मुझे
वो मेरे दोस्त हैं तेरी वफ़ा में जीते हैं

फ़िराक-ए-यार में साँसों को रोके रखते हैं
हर एक लमहा उतरती क़ज़ा में जीते हैं
फ़िराक-वियोग

और गुलज़ार हों और सपनों की बात ना हो ये कैसे हो सकता है। सपना भी कैसा... आधा अधूरा। अब अधूरे सपनों की वेदना तो हम सबने झेली है। इसलिए तो वे अपनी बात कुछ यूँ रखते हैं।

ना बात पूरी हुई थी कि रात टूट गई
अधूरे ख़ाब की आधी सजा में जीते हैं


तुम्हारी बातों में कोई मसीहा बसता है
हसीं लबों से बरसती शफ़ा में जीते हैं
शफ़ा- चमक , तन्दरुस्ती

तो आइए सुनें इस ग़ज़ल को



डिंपल कपाड़िया पर फिल्माए इस गीत को यू ट्यूब पर यहाँ देख सकते हैं।

लीला फिल्म की सीडी आप यहाँ से खरीद सकते हैं।

9 comments:

राकेश जैन said...

khoobsurat ghazal ke lie bahut shukriya...

Udan Tashtari said...

बहुत सुन्दर!!! वाह वाह!!!

mamta said...

भाई मनीष जी आपके यहां हमे अनसुने गीत और गजल सुनने को मिलते है। इसके लिए आभार।

DR.ANURAG ARYA said...

manish you made my day today....

Parul said...

is jodi ki to baat hai! mazaa aa gayaa ..thx manish

अभिषेक ओझा said...

एक बार फिर से... बहुत खूब.

कंचन सिंह चौहान said...

ख़ुमार-ए-गम है महकती फिज़ा में जीते हैं
तेरे ख़याल की आबो हवा में जीते हैं

बड़े तपाक से मिलते हैं मिलने वाले मुझे
वो मेरे दोस्त हैं तेरी वफ़ा में जीते हैं

ना बात पूरी हुई थी कि रात टूट गई
अधूरे ख़ाब की आधी सजा में जीते हैं

तुम्हारी बातों में कोई मसीहा बसता है
हसीं लबों से बरसती शफ़ा में जीते हैं

kya baat hai... !

मीत said...

वाह भाई. इतनी अच्छी ग़ज़ल एक मुद्दत बाद सुनने को मिली. कोई शब्द नहीं...... बस ग़ज़ब. कमाल.

Anonymous said...

Aaj aise hi net surfing karte karte aapka blog mila... aur usme yeh gazal jo mujhe had se jayada pasand hai..
"tumhari baatoin mein koi maseeha basta hai...
haseeie labo se barasti shafa mein jeete hai.

Bahut hi accha tareeka hai apne shauk/pasand jo is bhagti daudti zindgi mein zinda rakhne ki.

Shubheccha,
-N