Tuesday, December 05, 2006

किताबी कोना : आशापूर्णा देवी रचित 'लीला चिरन्तन'

आशापूर्णा देवी अहिन्दीभाषी साहित्यकारों में मेरी सर्वाधिक प्रिय कथाकार रहीं हैं । उनकी बेहद चर्चित उपन्यास-त्रयी प्रथम प्रतिश्रुति, सुवर्णलता और बकुल कथा ब्रिटिश साम्राज्य से लेकर स्वतंत्र भारत और आज के दौर की नारी की चेतना के उत्तरोत्तर विकास की अमर गाथा है । आशापूर्णा जी की नायिकाएँ हमेशा से स्वाभिमानी , दूरदर्शी और तत्कालीन सामाजिक तौर तरीकों से ना दबने वाली रही हैं ।

लीला चिरन्तन की नायिका कावेरी भी इनसे भिन्न नहीं है । वर्ना शादी के बीस सालों बाद अचानक एक सुबह कोई अपने जवान बेटे और बेटियों को छोड़कर भरी सभा में ये घोषणा कर दे कि वो अगली पूर्णमासी के दिन वैराग्य ग्रहण कर लेगा और कोई इस दर्द को चुपचाप पी कर, बिना ऊपरी रोष व्यक्त किये अपने काम में लग जाएगा, ऐसा कौन सोच सकता है भला।

वैसे घर के मुखिया आनंद लाहिड़ी ने ये निर्णय अकस्मात लिया हो ऐसा भी नहीं है । इच्छा तो जाहिर पहले ही कर चुके थे पर घर के लोग बस इसी आस में थे कि उनकी इच्छा, इच्छा ही रह जाए । आखिरकार पागलपन की हद तक बढ़ चुके प्रेम के बाद जिस दाम्पत्य बंधन का श्री गणेश हुआ हो , उसका पटाक्षेप इस तरह होगा ये किसने सोचा था ।

लीला चिरन्तन में आशापूर्णा जी ने ये कथा आनंद लाहिड़ी की युवा पुत्री के मुख से कहलवाई है ।घर की ऐसी परिस्थिति एक युवा मन को कैसे उद्वेलित करती है, इसका सटीक चित्रण इस उपन्यास में किया गया है । बिना खुद की कोई गलती के, अचानक ही अपने परिवार को लेकर सारे मोहल्ले में हो रही फूहड़ चर्चा का ना तो सामना करना आसान है ना उससे बच के निकलना । और इसी पशोपेश में पड़ी "मौ" मन में उमड़ते अनेक अनुत्तरित प्रश्नों की झुंझलाहट अपने मित्र नक्षत्र या प्यारे नक्खा पर उतारती है।

पर बात तो वहीं जाकर शुरु होती है कि आखिर आनन्द लाहिड़ी को वैराग्य पर जाने को सूझी क्यों ?
और गए तो फिर कुछ महिनों में ही गुरू आश्रम से उनका मोह भंग क्यों हुआ ?
क्या कावेरी वापस लौटे पति को क्षमा कर पाई ?

इन सारे प्रश्नों के उत्तर जानने के लिये आपको १४० पन्नों का ये लघु उपन्यास पढ़ना पड़ेगा।

आशापूर्णा जी की लेखन शैली का मैं हमेशा से कायल रहा हूँ । उनके कथानक में जरूरत से ज्यादा दार्शनिकता का पुट नहीं रहता। सीधा सहज भाष्य पाठकों की रुचि को बनाए रखता है। इसलिये कभी भी बीच- बीच के पन्नों को बिना पढ़े आगे बढ़ने की इच्छा नहीं होती । हाँ ,ये जरूर है कि ये लघु उपन्यास पात्रों के चरित्र-चित्रण में उनकी बाकी कालजयी कृतियों की तुलना में उतना कसा हुआ नहीं लगता ।

पुस्तक के बारे में

नाम - लीला चिरन्तन
लेखिका - स्व. आशापूर्णा देवी
अनुवादक - डॉ. रणजीत साहा
प्रकाशक - ज्ञानपीठ प्रकाशन
पुरस्कार - प्रथम प्रतिश्रुति के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित
मूल्य - ५० रुपये

श्रेणी : किताबें बोलती हैं में प्रेषित
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9 comments:

mY lIfE on December 04, 2006 said...

apka blog padke bahut accha lagtha hai....i am trying very hard to read through ur blog bcoz my hindi is not so good ....even though im a Jain :)) the collection of ghazals .... what you have and the way you describe them i have only one word to say WOW!!!!

Pratyaksha on December 05, 2006 said...

अच्छी समीक्षा । पढनी पडेगी ये किताब । प्रथम प्रतिश्रुति , सुवर्णलता , बकुल कथा पढकर आनन्द आया था ।

Srijan Shilpi on December 05, 2006 said...

अच्छी समीक्षा।

Udan Tashtari on December 05, 2006 said...

बढ़िया समीक्षा की गई है, बधाई!!

rachana on December 06, 2006 said...

आप इतनी अच्छी समीक्षाएँ कर, हम जैसे कम पढने वालों को निश्चित ही बहुत कुछ पढवा देंगे!

suparna on December 08, 2006 said...

mujhe anuvad ki prakriya mein vishesh ruchi hai, isiliye aapke mat jaan-na chaahoongi - aapne 'seedhe sahaj bhashya' ke baare mein tippani ki hai, par is sandarbh mein anuvadak ki bhumika bhi lakshaniya zaroor hogi. kya mool lekhani ki sahajta aur anuvadit lekh ki bhasha mein koi khaas naata hai? kya jatil bhasha sahaj roop se anuvadit ho paati hai? maine khud ek marathi aatmacharitra ko anuvaadit karne ka prayas kiya hai - kis hadd tak safalta paayi hai uska moolyamaapan ab tak ho nahin paaya hai.

Manish on December 09, 2006 said...

My Life Jaankar achcha laga ki hindi se out of touch hote huye bhi aapne itni mehnat ki meri likhi baton ko padhne kee. Shukriya ji aate rahein aap. aap ke geton ki pasand mujhse bahut milti julti hai.

Manish on December 09, 2006 said...

समीर जी, रचना जी, प्रत्यक्षा और सृजन शिल्पी समीक्षा पसंद करने का शुक्रिया !

Manish on December 09, 2006 said...

Suparna Tumhein is blog pe dekh ke khushi huyi.
1. kya mool lekhani ki sahajta aur anuvadit lekh ki bhasha mein koi khaas naata hai?

Bilkul, anuvaadak ka kaam itna aasaan nahin hai.Use lekhak ki bhasha shailee ko hoo bahu lane ki koshish karni hai. Maine Ashapoorna ji ki kareeb 10 kitabein padhi hongi aur umke anuvadak bhi bhinna bhinna the. Lekin agar anuwadak lekhak ki shailee ko apne hisaab se badal dein tab to aisa lagega ki wo sari kitabein alag alag logon ne likhin hain.

2 kya jatil bhasha sahaj roop se anuvadit ho paati hai?
Agar mool lekhak kathin bhasha ka prayog karta hai to anuwadak kyun use sahaj banayega. Anuwadak ko original writer ka style aur flow bilkul pakad kar rakhna hai .Kisi bhi vajah se vo agar deviate hota hai to vo lekhak ki mool kriti ke sath nyaay nahin kar paayega.
anyway thats what I think abt it !

 

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