Monday, January 30, 2012

वार्षिक संगीतमाला 2011 - पॉयदान संख्या 11 :धीरे धीरे ..जिया को धीरे धीरे भायो रे साएबो !

वार्षिक संगीतमाला की पिछली दो पॉयदानों पर आपने सुने मिथुन शर्मा और प्रीतम द्वारा संगीतबद्ध दो बेहद कर्णप्रिय नग्मे। आज जिस गीत को आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ वो भी उतना ही मधुर है। इस गीत की ख़ासियत है कि इसके गीत , संगीत और गायिकी सभी में अलग अलग जोड़ियों का हाथ रहा है। इसे संगीतबद्ध किया है नवोदित संगीतकार जोड़ी सचिन-जिगर ने। बोल लिखे हैं समीर और प्रिया पंचाल ने और इस युगल गीत को आवाज़ें दी हैं श्रेया घोषाल और तोची रैना ने। गीत तो आप पहचान ही गए होंगे 'धीरे धीरे नैणों को धीरे धीरे , जिया को धीरे धीरे भायो रे साएबो...।  कमाल की धुन बनाई है संगीतकार सचिन जिगर ने। गीत के शब्दों के विपरीत ये नग्मा धीरे धीरे नहीं बल्कि एक बार सुनते ही दौड़ के दिलो दिमाग पर हावी हो जाता है।

पर गीत की बात करने के पहले आपकी मुलाकात तो करा दूँ इस संगीतकार जोड़ी से। सचिन यानि सचिन संघवी और ज़िगर यानि ज़िगर सरैया की ये जोड़ी श्रोताओं के लिए नई जरूर है पर फिल्म जगत में ये पिछले कुछ सालों से काम कर रहे हैं। पहले संगीतकार  राजेश रोशन और फिर प्रीतम के लिए काम करने के बाद पिछले साल इन्होंने स्वतंत्र रूप से काम करना शुरु किया।
 
शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लिये हुए सचिन के मन में संगीतकार बनने का ख़वाब ए आर रहमान ने पैदा किया। सचिन रोज़ा में रहमान के संगीत संयोजन से इस क़दर प्रभावित हुए कि उन्होंने ठान लिया कि मुझे भी यही काम करना है। अपने मित्र अमित त्रिवेदी के ज़रिए उनकी मुलाकात ज़िगर से हुई। दो गुजरातियों का ये मेल  एक नई जोड़ी का अस्तित्व ले बैठा। सचिन ज़िगर अपने साक्षात्कारों में प्रीतम की तारीफ़ करना कभी नहीं भूलते। वे हमेशा कहते हैं कि प्रीतम जिस तरह से कच्ची धुन से पक्के गीत की प्रक्रिया को विभिन्न भागों में बाँटकर अनुशासित रूप में गुजरते हैं उस क़वायद से हम जैसे नए लोगों ने बहुत कुछ सीखा।

सचिन ज़िगर को अपनी पहली सफलता फिल्म फालतू के डांस नंबर चार बज गए मगर पार्टी .....से मिली। पिछले साल उन्होंने 'हम तुम शबाना' और शोर  इन दि सिटी के कुछ गीतों का भी संगीत संयोजन किया। शोर इन दि सिटी के इस गीत में गिटार और वॉयलिन का बेहद खूबसूरत उपयोग किया है सचिन जिगर ने। पहले इंटरल्यूड में वॉयलिन की धुन क्या कमाल की है। जरा ध्यान दीजिएगा..

ये तो हम सभी जानते हैं कि नए नए पिया यानि अपने 'साइबो' धीरे धीरे ही दिल में उतरते हैं।  दो दिलों को पास आने के लिए आँखों, लबों की कितनी कही अनकही बातों से होकर गुजरना पड़ता है , गीतकार द्वय यही तो बता रहे हैं हमें इस प्यारे से गीत में। गीत में एक ओर तो श्रेया की मिश्री सी आवाज़ है तो दूसरी ओर तोची रैना का बुलंद ज़मीनी स्वर। पर दोनों मिलकर एक ऐसा प्रभाव उत्पन्न करते हैं कि मन इस गीत का हो के रह जाता है...


मन ये साहेब जी, जाणे है सब जी
फिर भी बनाए बहाने
नैणा नवाबी जी देखें हैं सब जी
फिर भी ना समझे इशारे
मन ये साहेब जी, हाँ करता बहाने
नैणा नवाबी जी ना समझे इशारे
धीरे धीरे नैणों को धीरे धीरे
जिया को धीरे धीरे भायो रे साएबो
धीरे धीरे बेगाना धीरे धीरे
अपना सा धीरे धीरे लागे रे साएबो


सुर्खियाँ है हवाओं में, दो दिलों के मिलने की
अर्जियाँ है नज़ारों मे, लमहा ये थम जाने की
कैसी हजूरी जी ये लब दिखलाएँ
चुप्पी लगा के भी गज़ब है ये ढाएँ

धीरे धीरे नैणों को धीरे धीरे
जिया को धीरे धीरे भायो रे साएबो
धीरे धीरे बेगाना धीरे धीरे
अपना सा धीरे धीरे लागे रे साएबो



वार्षिक संगीतमाला 2011 पहुँच चुकी है उस मुकाम पर जहाँ से शुरु होती है प्रथम दस यानि TOP 10 गीतों की आख़िरी दस सीढ़ियाँ ! इन दस गीतों में रूमानियत की हवाएँ भी हैं और सूफ़ियत की झंकार भी। दुखों के बादल भी हैं और ज़िदगी को मुड कर देखने की कोशिश भी। आशा हैं हम सब मिलकर एक साथ महसूस करेंगे गीतों के इन विविध रंगों को आने वाली कड़ियों में..

Saturday, January 28, 2012

वार्षिक संगीतमाला 2011 पॉयदान संख्या 12 : Te amo...किसी को सपना लगे तू, किसी को बहती हवा

गीतों में नवीनता लाने के लिए अक़्सर संगीतकार गीतकार कुछ खास जुमले गीतों में डालने की कोशिश करते हैं। कभी ये जुमले आंचलिक भाषा की देन होते हैं तो कभी किसी विदेशी भाषा के। सुननेवाले को ये जुमले एकबारगी तो समझ नहीं आते पर सुनते सुनते वो इनका इतना अभ्यस्त हो जाता है कि मतलब ना जानते हुए भी वो उसी धुन में गीत गुनगुनाता चला जाता है। पंजाबी जुमले कतिया करूँ की बात तो हम पहले ही कर चुके हैं। पर आज जिस गीत का जिक्र है उसके मुखड़े में पिरोया शब्द देश के अंदर से नहीं पर स्पैनिश भाषा से लिया गया है। जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ संगीतकार प्रीतम के फिल्म 'दम मारो दम' के लिए रचे गीत टी एमो मी थी एमो की.. जिसका अर्थ होता है मैं तुमसे प्यार करता हूँ, क्या तुम मुझसे प्यार करती हो ?


प्रीतम पर भले ही बीच बीच में इधर उधर से धुनों के उठाए या प्रेरित होने के आरोप लगते रहे हैं पर उनके गीतों की फेरहिस्त देखी जाए तो उनकी प्रतिभा का लोहा मानना ही पड़ता है। इस गीत का सबसे मजबूत पक्ष गिटार पर बजती सुरीली धुन है जिसे जयदीप साहनी ने अपने बोलों में रूमानियत का रस घोल कर और मधुर बना दिया है। जयदीप की कलम द्वारा सपने में प्रियतम के स्पर्श को भी चोरी क़रार देने की सोच नई और अच्छी लगती है

कभी लगे छूऊँ तुम्हें यूँ ही ख़यालों में ही
कभी लगे नहीं नहीं चोरी नहीं

इस युगल गीत में पहली बार इस संगीतमाला में प्रवेश किया है सुनिधि चौहान और ऐश किंग ने। सुनिधि के लिए ये साल पिछले कुछ वर्षों की तरह उतना सफल नहीं रहा। पर इस गीत में ऐश किंग का साथ उन्होंने बखूबी दिया है।

पर इससे पहले कि आप ये गीत सुनें कुछ बातें पार्श्व गायक ऐश किंग के बारे में। ऐश किंग का वास्तविक नाम आशुतोष गाँगुली है। पर ब्रिटेन में जन्मे इस पॉप गायक ने 'जैसा देश वैसा भेष' वाली कहावत का अनुसरण करते हुए अपने नाम में बदलाव कर लिया। ऐश किंग को संगीत विरासत में मिला है। उनके पिता खुद एक संगीतकार थे और उन्होंने अपने समय के मशहूर संगीतकार अनिल विश्वास और सलिल चौधरी के सहायक के रूप में भी काम किया था।

ब्रिटिश पॉप चार्टों में अपने गीतों से धमाल मचाने वाले ऐश को हिंदी फिल्मों में गाने का सबसे पहला मौका 'दिल गिरा दफ्फतन..' के रूप में रहमान ने अपनी फिल्म दिल्ली 6 में दिया। पिछले साल उनके गाए फिल्म 'आयशा' के गीत 'सुनो आयशा' और इस साल बाडीगार्ड के गीत 'I love you...' ने खासी लोकप्रियता अर्जित की है। टी एमो में उनकी आवाज़ मन में प्रेम का अहसास जगाने में पूरी तरह सफल रही है।

प्रीतम अपने गीतों में हमेशा हिंदी के साथ अंग्रेजी के अंतरों का समावेश करते रहे हैं। तेरा होने लगा हूँ... और जाने क्या चाहे मन बावरा... जैसे गीत तो आपको याद ही होंगे। ये गीत भी उसी शैली का है। तो आइए गीत के बोलों के साथ गीत का आनंद उठाएँ..



किसी को सपना लगे तू, किसी को बहती हवा
किसी को बस बातों में, करे पल में यहाँ वहाँ
किसी के सौ झूठ सुन ले, किसी का सच भी गुनाह
किसी की बस यादों में, करे हलचल सारा ज़हाँ


Te Amo Me thi Amo, तू छाँव है तू धूप है

Te Amo Me thi Amo, तेरे हजारों रूप हैं
कोई समझा नहीं जो भी है बस खूब है,
Fallin so crazy in love..Te Amo ....


कभी लगे रातों में मैं ख़्वाबों से बाते करूँ
सुबह उन्हीं ख़्वाबों को काबू करूँ
कभी लगे तारों से भी ऊँची उड़ाने भरूँ
कभी लगे बादलों से मैं जेबें भरूँ


Te Amo Me thi Amo, तारे गिनूँ तेरे लिए
Te Amo Me thi Amo, सारे चुनूँ तेरे लिए
ख़्वाब सारे बुनूँ तेरे ही तेरे लिए
Fallin so crazy in love..Te Amo ....


कभी लगे मिली नहीं तुमसे मैं ख़्वाबों में भी
कभी लगे कहीं तो है रिश्ता कोई
कभी लगे छूऊँ तुम्हें यूँ ही ख़यालों में ही
कभी लगे नहीं नहीं चोरी नहीं
Te Amo Me thi Amo, तू पास है पर दूर है
Te Amo Me thi Amo, जाता नहीं ये नूर है


तेरी चोरी भी ये मंज़ूर मंज़ूर है
Fallin so crazy in love..Te Amo ....

Thursday, January 26, 2012

वार्षिक संगीतमाला 2011 - पॉयदान संख्या 13 : दिल सँभल जा ज़रा, फिर मोहब्बत करने चला है तू...

वार्षिक संगीतमाला की अगली तीन पॉयदानों की खासियत है कि उन पर विराजमान गीत न केवल बेहद सुरीले हैं पर रूमानियत के अहसास से लबरेज भी। ये गीत ऐसे हैं जिनकी धुन अगर आप एक बार भी सुन लें तो उसे गुनगुनाने के लोभ से आप अपने आप को शायद ही ज्यादा देर तक दूर रख पाएँ। इसी कड़ी में आज आपके सामने है युवा संगीतकार मिथुन शर्मा का संगीतबद्ध मर्डर 2 का ये नग्मा। 


वार्षिक संगीतमालाओं में पहले भी तीन दफ़े शिरक़त करने वाले 26 वर्षीय मिथुन ने ग्यारह साल की उम्र से नामी संगीत संयोजक नरेंद्र शर्मा (जो उनके पिता भी हैं) से संगीत सीखना शुरु किया था। बाद में उन्होंने पियानो और की बोर्ड की भी शिक्षा ली। हिंदी फिल्मों की दुनिया में 'बस एक पल' से शुरुआत करने वाले मिथुन अनवर, दि ट्रेन. लमहा जैसी चर्चित फिल्मों में संगीतनिर्देशन कर चुके हैं। मर्डर 2 के इस गीत में मिथुन का साथ दिया है गीतकार सईद क़ादरी और युवा गायक मोहम्मद इरफ़ान ने।


मिथुन के समव्यस्क हैदराबाद से ताल्लुक रखने वाले मोहम्मद इरफ़ान अली को भी कमल खान की तरह ही रियालटी शो की पैदाइश माना जा सकता है। वैसे तो इरफ़ान एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं पर अमूल स्टार वॉयस आफ इंडिया 2007 के प्रतिभागी के तौर पर उन्हें पहली बार संगीतप्रेमियों के बीच बतौर गायक की पहचान मिली। उस प्रतियोगिता में तो इरफ़ान सफ़ल नहीं हुए पर गायिकी की दुनिया में प्रवेश करने के लिए वे पूरी मेहनत के साथ लग गए।

एक कार्यक्रम में एस पी बालासुब्रमणियम उनके गायन से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने वादा किया कि वे रहमान से उनकी गायिकी की चर्चा करेंगे। इरफ़ान बताते हैं कि इस कार्यक्रम के डेढ़ साल बाद एक दिन सचमुच रहमान साहब का फोन आ गया और इस तरह उनकी आवाज़ फिल्म रावण के चर्चित गीत बहने दे... का हिस्सा बन गई। इरफ़ान की आवाज़ की बनावट या texture बहुत कुछ आज के लोकप्रिय पाकिस्तानी गायकों से मिलता है। इस बात का अंदाजा आपको इस गीत को सुनने से मिल जाएगा।

गीत की शुरुआत गिटार की मधुर धुन से होती है जिसमें मन रम रहा होता ही है कि इरफ़ान की आवाज़ गूँजती सी कानों में पड़ती है।

जब जब तेरे पास मै आया इक सुकून मिला
जिसे मैं था भूलता आया वो वज़ूद मिला
जब आए मौसम ग़म के तुझे याद किया
जब सहमे तनहापन से तुझे याद किया
दिल सँभल जा ज़रा, फिर मोहब्बत करने चला है तू
दिल यहीं रुक जा ज़रा, फिर मोहब्बत करने चला है तू


मिथुन ने गिटार के संयोजन में गीत का मुखड़ा बड़ी खूबसूरती से रचा है और जब इरफ़ान गीत की पंच लाइन दिल सँभल जा ज़रा, फिर मोहब्बत करने चला है तू तक पहुँचते हैं, सँभला हुआ दिल भी गीत के आकर्षण में होश खो बैठता है। मिथुन के इंटरल्यूड्स शानदार हैं। अंतरों में सईद क़ादरी के बोल और बेहतर हो सकते थे पर मिथुन का संगीत और इरफ़ान की गायिकी इस कमी को महसूस होने नहीं देती। तो आइए सुनते हैं ये गीत जिसे फिल्माया गया है इमरान हाशमी पर..




Monday, January 23, 2012

वार्षिक संगीतमाला 2011 - पॉयदान संख्या 14 : शीत लहर है,भीगे से पर हैं, थोड़ी सी धूप माँगी है...

वार्षिक संगीतमाला के दो हफ्तों का सफ़र पूरा करके हम आ पहुँचे हैं चौदहवीं पॉयदान पर जहाँ पर गीत है पिछले महिने ही प्रदर्शित हुई फिल्म 'लंका' का। गीत की गायिका हैं एक बार फिर श्रेया घोषाल। पर आज मैं बात करूँगा इस नग्मे की नवोदित युवा गीतकार‍‍-संगीतकार जोड़ी के बारे में जिनकी हिंदी फिल्म संगीत में आने की कहानी ना केवल दिलचस्प है बल्कि इस बात को पुख़्ता भी करती है कि अगर हमें अपने हुनर पर विश्वास हो तो उससे जुड़ी विधा में मुकाम बनाने के लिए भले ही संघर्ष करना पड़े पर अंततः सफलता मिलती ही है।

तो चलिए पहले बात करते हैं गीतकार सीमा सैनी की। भोपाल से ताल्लुक रखने वाली सीमा पेशे से सिविल इंजीनियर हैं। कॉलेज के समय से ही उन्हें कविताएँ लिखने का शौक़ था। कॉलेज में उन्होंने नाटकों के लिए भी काम किया।  अब इंजीनियरिंग पूरी की, तो नौकरी भी करनी थी। शुरुआत उन्होंने एक आर्किटेक्ट फर्म में काम करने से की पर दिल था कि एक अलग ही ख़्वाब बुन रहा था.... मुंबई जाने और वहाँ के फिल्म उद्योग में पाँव जमाने का ख़्वाब। माता पिता पहले अनिच्छुक थे पर बेटी की खुशियों के लिए उसे मुंबई ले जाने के लिए तैयार हो गए। नौकरी छोड़कर वर्ष 2005 में सीमा मुंबई जा पहुँची। बहुत मुश्किल से संगीतकार इस्माइल दरबार के 'दरबार' में पहुँचने का मौका मिला पर इस्माइल को उनके गीतों में कुछ खास बात नहीं दिखी। सीमा के लिए यह गहरा झटका था। वो कुछ दिन और कोशिश कर वापस भोपाल लौट आयीं।

हताशा और निराशा के इस दौर से उबरने में सीमा को तीन साल और लगे पर अंत में उन्होंने अपने दिल की बात मानी और वर्ष 2008 में अपनी किस्मत आज़माने वे एक बार फिर मुंबई जा पहुँची। कुमार शानू के एक गैर फिल्मी एलबम में  वर्ष 2009 में पहली बार उन्हें गीतकार बनने का मौका मिला। पर इससे अच्छी बात सीमा के लिए हुई वो थी एक मित्र के ज़रिए नवोदित संगीतकार गौरव डागोनकर के साथ मुलाकात।

29 वर्षीय गौरव डागोनकर अंगर आज फिल्म लंका के लिए संगीत रचना नहीं दे रहे होते तो लाखों की मासिक पगार पर वो किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी के वरीय प्रबंधक होते। भारतीय प्रबंधन संस्थान, अहमदाबाद जैसे प्रतिष्ठित कॉलेज से 2006 में MBA की डिग्री लेने वाले गौरव ने जब संगीत के क्षेत्र में कूदने की सोची तो वे चारों ओर चर्चा के पात्र बन गए। MBA की डिग्री की वज़ह से गौरव को फिल्म जगत ने पहले गंभीरता से नहीं लिया। पर दो सालों के प्रयास के बाद जब उनका एलबम College Days बाजार में आया तो लोगों को उन्हें नज़रअंदाज़ करना मुश्किल हो गया। वैसे तो सीमा के साथ गौरव दो तीन फिल्मों में काम कर रहे हैं पर इस जोड़ी की सबसे पहले प्रदर्शित फिल्म है लंका

सीमा लंका के इस गीत के बारे में बताती हैं कि..

"फिल्म में ये गीत एक ऐसी लड़की पर फिल्माया गया है जिसे शहर का दबंग नेता उसके घर से उठवा कर ले जाता है और जबरन अपने साथ रखता है। मैंने जब इस किरदार के मनोभावों को समझना चाहा तो मेरे मन में एक ऐसे पंक्षी की कल्पना जागी जिसके पर बर्फीले पानी से इस तरह तर बतर हैं कि वो चाह कर भी उड़ नहीं पा रहा है और इसीलिए मैंने लिखा..

शीत लहर है,भीगे से पर हैं
थोड़ी सी धूप माँगी है
आँखो भर है नीला गगन और
ठहरा हुआ कुछ पानी है..."
कितना सजीव चित्रण किया है सीमा ने इन परिस्थितियों के बीच फँसी एक असहाय स्त्री का! गीत के अंतरों में यह एहसास पुरज़ोर होता चला जाता है। अंतरों के बीच सीमा द्वारा रचे भावों को गौरव ने कोरस के रूप में बखूबी इस्तेमाल किया है। गीत कै दौरान जब
तिनका तिनका रात उधेड़ो, दिन आज़ाद है कह दो ना
भीतर भीतर कितनी उमस है, थोड़ी साँसें दे दो ना


का स्वर गूँजता है तो हृदय में उदासी की चादर सी बिछ जाती है। मुखड़े के पहले और इंटरल्यूडंस में गौरव का दिया संगीत गीत के मूड से आपको निकलने नहीं देता। रही श्रेया की गायिकी तो वो दिन पर दिन नए आयामों को छू रही है। तो आइए सुनते हैं इस गीत को दर्द में डूबे श्रेया के स्वर में..........


शीत लहर है,भीगे से पर हैं
थोड़ी सी धूप माँगी है
आँखो भर है नीला गगन और
ठहरा हुआ कुछ पानी है
शीत लहर है....

सुनसान राहों पे क्यूँ शर्मसार साये हैं
बददुआ सी लगती है क्यूँ, कोसती हवाएँ हैं
हमसे क्या गुनाह हुआ है, कैसी ये सज़ाएँ हैं
भीगी नज़र है, शाम ओ सहर है
थोड़ी सी ख़ैर माँगी है
आँखो भर है नीला गगन और
ठहरा हुआ कुछ पानी है
शीत लहर है....

तिनका तिनका रात उधेड़ो, दिन आज़ाद है कह दो ना
भीतर भीतर कितनी उमस है, थोड़ी साँसें दे दो ना
थोड़े थोड़े पर हैं भोले, कुछ आकाश भी दे दो ना
भीतर भीतर कितनी उमस है, थोड़ी साँसें दे दो ना, थोड़ी साँसें दे दो ना

गुमसुम पहाड़ों पे जब सूरज ये ढलता है
खारे खारे आँसुओ से जख़्म और जलता है
तैरता है रास्तों पर, इक धुआँ सा खलता है
लंबा सफ़र है, बिसरी डगर है
थोड़ी सी राह माँगी है
शीत लहर है....



(चलते चलते मैं हृदय से आभारी हूँ सीमा सैनी का जिन्होंने 'एक शाम मेरे नाम' के लिए इस गीत, अपने संगीतिक सफ़र और आज के गीत संगीत के बारे चर्चा के लिए वक़्त निकाला।)

Friday, January 20, 2012

वार्षिक संगीतमाला 2011 - पॉयदान संख्या 15 : क्या आपको भी अपने दिल पे शक़ है ?

पिछले साल एक फिल्म आई थी इश्क़िया जिसका गीत दिल तो बच्चा है जी.. वार्षिक संगीतमाला का सरताज गीत बना था। निर्देशक मधुर भंडारकर को गीत का मुखड़ा इतना पसंद आया कि उन्होंने इसी नाम से एक फिल्म बना डाली। फिल्म तो मुझे ठीक ठाक लगी, पर खास लगा इसका एक प्यारा सा नग्मा जिसे लिखा है गीतकार नीलेश मिश्रा ने।

ओ हो! लगता है मैं गलत कह गया भई नीलेश को सिर्फ गीतकार कैसे कहा जा सकता है। अव्वल तो वे एक पत्रकार थे वैसे अभी भी वे शौक़िया पत्रकारिता कर रहे हैं (आजकल यूपी चुनाव कवर कर रहे हैं)। नीलेश एक लेखक, कवि और एक ब्लॉगर भी हैं। हाल ही में राहुल पंडिता के साथ मिलकर उन्होंने एक किताब लिखी जिसका नाम था The Absent State। इस किताब में उन्होंने देश में फैले माओवाद की वज़हों को ढूँढने का प्रयास किया है। 

नीलेश एक रेडिओ कलाकार व कहानीकार भी हैं। आप में से जो एफ एम रेडिओ सुनते हों वे बिग एफ़ एम पर उनके कार्यक्रम 'याद शहर' से जरूर परिचित होंगे जिसमें वो अपनी लिखी कहानियाँ गीतों के साथ सुनवाते थे। ठहरिए भाई लिस्ट पूरी नहीं हुई नीलेश एक बैंड लीडर भी हैं। उनके बैंड का नाम है A Band Called Nine। इस अनोखे बैंड में वो स्टेज पर जाकर कहानियाँ पढ़ते हैं और फिर उनके बाकी साथी गीत गाते हैं। तो चकरा गए ना आप  इस बहुमुखी प्रतिभा के बारे में जानकर..

बड़ी मज़ेदार बात है कि नीलेश मिश्रा के गीतकार बनने में परोक्ष रूप से स्वर्गीय जगजीत सिंह का हाथ था। लखनऊ,रीवा और फिर नैनीताल में अपनी आरंभिक शिक्षा पूरी करने वाले नीलेश कॉलेज के ज़माने से कविताएँ लिखते थे। जैसा कि उनकी उम्र का तकाज़ा था ज्यादातर इन कविताओं की प्रेरणा स्रोत उनकी सहपाठिनें होती। जगजीत सिंह के वे जबरदस्त प्रशंसक थे। सो एक बार उन्होंने उनको अपनी रचना जगजीत जी को गाने के लिए भेजी पर उधर से कोई जवाब नहीं आया। पर उनके दिल में गीत लिखने का ख्वाब जन्म ले चुका था। बाद में मुंबई में अपनी किताब के शोध के सिलसिले में वो महेश भट्ट से मिले। इस मुलाकात का नतीज़ा ये रहा कि नीलेश को भट्ट साहब ने फिल्म जिस्म के गीत लिखने को दिए। इस फिल्म के लिए नीलेश के लिखे गीत जादू है नशा है... ने सफलता के नए आयाम चूमें।

वार्षिक संगीतमालाओं में नीलेश के लिखे गीत बजते रहे हैं । फिल्म रोग का नग्मा मैंने दिल से कहा ढूँढ लाना खुशी और गैंगस्टर का गीत लमहा लमहा दूरी यूँ पिघलती है उनके लिखे मेरे सर्वप्रिय गीतों में से एक है।
वार्षिक संगीतमाला की पॉयदान पन्द्रह का गीत प्रेम में पड़े दिल की कहानी कहता है। नीलेश की धारणा रही है कि असली रोमांस छोटे शहरों में पनपता है। अपने कॉलेज की यादों में  तैरते इन लमहों को अक्सर वे अपने गीतों में ढाला करते हैं। इस गीत में भी उनका अंदाज़ दिल को जगह जगह छूता है। नीरज का दिल के लिए ये कहना....

कोई राज़ कमबख्त है छुपाये
खुदा ही जाने कि क्या है
है दिल पे शक मेरा
इसे प्यार हो गया

.....मन जीत लेता है। मुखड़े के बाद अंतरों में भी नीलेश कमज़ोर नहीं पड़े हैं। गीत के शब्द ऐसे हैं कि इस नग्में को गुनगुनाते हुए मन हल्का हो जाता है। संगीतकार प्रीतम की गिटार में महारत सर्वविदित है। इस गीत के मुखड़े में उन्होंने गिटार के साथ कोरस का बेहतरीन इस्तेमाल किया है। प्रीतम ने इस गीत को गवाया हैं युवाओं के चहेते गायक मोहित चौहान जिनकी आवाज़ इस तरह के गीतों में खूब फबती है। तो आइए सुनते हैं इस गीत को..


अभी कुछ दिनों से लग रहा है
बदले-बदले से हम हैं
हम बैठे-बैठे दिन में सपने
देखते नींदें कम हैं

अभी कुछ दिनों से सुना है दिल का
रौब ही कुछ नया है
कोई राज़ कमबख्त है छुपाये
खुदा ही जाने कि क्या है
है दिल पे शक मेरा
इसे प्यार हो गया...

अभी कुछ दिनों से मैं सोचता हूँ
कि दिल की थोड़ी सी सुन लूँ
यहाँ रहने आएगी
दिल सजा लूँ मैं
ख्वाब थोड़े से बुन लूँ
है दिल पे...

तू बेख़बर, या सब ख़बर
इक दिन ज़रा मेरे मासूम दिल पे गौर कर
पर्दों में मैं, रख लूँ तुझे
के दिल तेरा आ ना जाए कहीं ये गैर पर
हम भोले हैं, शर्मीले हैं
हम हैं ज़रा सीधे मासूम इतनी ख़ैर कर
जिस दिन कभी जिद पे अड़े
हम आएँगे आग का तेरा दरिया तैर कर

अभी कुछ दिनों से लगे मेरा दिल
धुत हो जैसे नशे में
क्यूँ लड़खड़ाए ये बहके गाए
है तेरे हर रास्ते में
है दिल पे...

बन के शहर चल रात भर
तू और मैं तो मुसाफ़िर भटकते हम फिरे
चल रास्ते जहाँ ले चले
सपनों के फिर तेरी आहों में थक के हम गिरे
कोई प्यार की, तरकीब हो
नुस्खे कोई जो सिखाये तो हम भी सीख लें
ये प्यार है, रहता कहाँ
कोई हमसे कहे उससे जा के पूछ लें

मैं सम्भालूँ पाँव फिसल न जाऊँ
नयी-नयी दोस्ती है
ज़रा देखभाल सँभल के चलना
कह रही ज़िन्दगी है
है दिल पे... लूँ


Wednesday, January 18, 2012

वार्षिक संगीतमाला 2011 - पॉयदान संख्या 16 : तेरे वास्ते मेरा इश्क़ सूफ़ियाना...

वार्षिक संगीतमाला की सोलहवीं पॉयदान पर स्वागत कीजिए जी सा रे गा मा पा के 2010 के विजेता कमल खान का जिन्होंने दि डर्टी पिक्चर में आए अपने इस गीत से खासी लोकप्रियता अर्जित की है। अगर आपने सा रे गा मा पा पिछले साल देखा हो तो आप भली भांति जानते होंगे कि पंजाब के निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से आया ये २७ वर्षीय युवक गले से कितना सुरीला है। कार्यक्रम में ऊँचे सुरों पर जब कमल पंजाबी लोकगीतों की तान छेड़ते थे तो लगता था कि मानों हम एक दूसरी दुनिया में ही पहुँच गए हों।

कमल की आवाज़ को फिल्मी पर्दे पर लाने का पूरा श्रेय संगीतकार विशाल शेखर की जोड़ी को दिया जाना चाहिए जिन्होंने पहले 'तीस मार खाँ' और अब 'दि डर्टी पिक्चर' में उसका बखूबी इस्तेमाल किया है। कमल की आवाज़ में इतना दम और हुनर जरूर है कि अगर वो यूँ ही अपनी आवाज़ को तराशते रहे तो वो दिन दूर नहीं जब वो भारत के 'राहत' बन जाएँगे।

पर इस गीत को इतना मधुर बनाने में कमल के आलावा गीतकार संगीतकार जोड़ी का भी बराबर का हाथ है। मुखड़े के ठीक पहले बजती पियानो की धुन सबसे पहले आकर्षित करती है और फिर आता है मुखड़ा जिसमें गीतकार ने प्रेम को इतने मोहक रूपों में बाँधा है कि पढ़ सुन कर बस वाह या आह ही निकलती है। ज़रा आप भी देखिए ना..

रब की क़व्वाली है इश्क़ कोई
दिल की दीवाली है इश्क़ कोई
महकी सी प्याली है इश्क़ कोई
सुबह की लाली है इश्क़....
गिरता सा झरना है इश्क़ कोई
उठता सा कलमा है इश्क़ कोई
साँसों में लिपटा है इश्क़ कोई
आँखों में दिखता है इश्क़...

गीत के इंटरल्यूड्स में भी हिंदुस्तानी और पश्चिमी वाद्य यंत्रों का संयोजन ने निकली धुन गीत के आनंद को बढ़ा देती है। वैसे क्या आपको पता है ये गीत किसने लिखा है। इस गीत को लिखने वाले हैं रजत अरोड़ा। रजत के गीतकार बनने का सफ़र बहुत कुछ 'रब ने बना दी जोड़ी' वाले जयदीप साहनी जैसा है। इन दोनों ने गीतकार बनने की सीढी पटकथा लेखक बनने के बाद तय की है।

वैसे रजत हमेशा से गीतकार ही बनना चाहते थे। पर मुंबई आने पर उन्हे काम मिला पटकथा लेखक का। टैक्सी नंबर 9 दो 11,  Once Upon A Time in Mumbai और चाँदनी चौक टू चाइना जैसी फिल्मों का पटकथा लेखन करने के बाद जब उन्हे विशाल शेखर ने ये फिल्म बतौर गीतकार पेश की तो वो फूले ना समाए।। रजत कहते हैं कि पटकथा लेखन के बाद गीतों को लिखना और भी सहज हो जाता है क्यूँकि लेखक जानता है कि उसके सृजित किरदार अलग अलग परिस्थितियों में किस भावना से गुजर रहे हैं।

इस गीत में रजत ने नायक के प्रेम को सूफ़ियाना विशेषण दिया है। यानि किसी के प्रेम में ऐसा डूब जाना कि अपने अस्तित्व का पता ही ना चले। विशाल शेखर भी इस गीत को इस फिल्म की सबसे मेलोडियस रचना मानते हैं। तो आइए आनंद लेते हैं इस गीत का..


मेरे दिल को तू जान से जुदा कर दे
यूँ बस तू मुझको फ़ना कर दे
मेरा हाल तू, मेरी चाल तू
बस कर दे आशिक़ाना
तेरे वास्ते मेरा इश्क़ सूफ़ियाना
मेरा इश्क़ सूफ़ियाना ,मेरा इश्क़ सूफ़ियाना


सोचूँ तुझे तो है सुबह,
सोचूँ तुझे तो शाम है
हो ओ.. मंज़िलों पे अब तो मेरी…...
एक ही तेरा नाम है
तेरे आग में ही जल के,
कोयले से हीरा बन के
ख्वाबों से आगे चलके,
है तुझे बताना…..
तेरे वास्ते मेरा इश्क़ सूफ़ियाना.....


साथ-साथ चलते-चलते हाथ छूट जाएँगे
ऐसी राहों में मिलो ना
बातें-बातें करते-करते रात कट जाएगी
ऐसी रातों में मिलो ना
क्या हम हैं, क्या रब है
जहाँ तू है वहीं सब है
तेरे लब मिले मेरे लब खिले
अब दूर क्या है जाना
तेरे वास्ते मेरा इश्क़ सूफ़ियाना....
रब की.........इश्क़

मेरे दिल को तू ....मेरा इश्क़ सूफ़ियाना...


Monday, January 16, 2012

वार्षिक संगीतमाला 2011 - पॉयदान संख्या 17 : जानिए अमित जी का हाल - ए - दिल !

अमिताभ बच्चन के अभिनय का तो हम सभी लोहा मानते हैं। उनके धारदार अभिनय को दर्शकों के दिल में बसाने में उनकी आवाज़ का बहुत बड़ा हाथ है। बचपन मे फिल्मों के प्रोमो रेडिओ पर आते थे 'प्रायोजित कार्यक्रम' के नाम से। अगर फिल्म अमित जी की हो तो कहना ही क्या। हम उनकी आवाज़ सुनने के लिए ट्रांजिस्टर के साथ कान लगाए फिरते। अमित जी के डॉयलॉग ज्यूँ ही कानों में पड़ते लगता कि आज का दिन ही बन गया। फिल्मी पर्दे पर भी उनकी स्क्रीन प्रेसेंस का अहम हिस्सा थी उनकी आवाज़....

अमिताभ ने बहुत कम गीत गाए हैं पर जब जब उन्होंने अपनी आवाज़ का इस्तेमाल बतौर पार्श्व गायक किया उनका जादू वहाँ भी चला। जब स्कूल में थे तो उनकी फिल्म नटवरलाल का गीत 'मेरे पास आओ मेरे दोस्तों इक किस्सा सुनो..' हम बच्चों को इतना पसंद आता था कि क्या कहें। गीत सुनकर हँसते हँसते हालत खराब हो जाती थी। फिर आई उनकी फिल्म सिलसिला। किशोरावस्था में इस फिल्म के लिए उनका गाया हुआ गीत नीला आसमान सो गया... सुनते तो लगता पूरे ज़हाँ का दुख अपने दिल में ही समा गया है। वहीं रँग बरसे.. की मस्ती से पूरा बदन थिरक उठता।

विगत कुछ वर्षों में अमिताभ हर साल इक्का दुक्का फिल्मों में अपनी आवाज़ देते रहे हैं। वर्ष 2007 में विशाल भारद्वाज के संगीत निर्देशन में फिल्म निःशब्द के लिए उनका गाया संवेदनशील गीत रोज़ाना जिएँ रोज़ाना मरें तेरी यादों में हम मेरी वार्षिक संगीतमाला का हिस्सा बना था। इस साल एक बार फिर उनके गीत ने कदम रखा है संगीतमाला की सत्रहवीं पॉयदान पर। फिल्म बुड्ढा होगा तेरा बाप के इस गीत में अमिताभ पर्दे पर हेमा जी से अपने हाल- ए- दिल का इज़हार कर रहे हैं।

अमिताभ अपने एक साक्षात्कार में इस गीत के बारे में कहते हैं
जब संगीतकार विशाल शेखर ने मुझे इस फिल्म के गीत गवाने की इच्छा ज़ाहिर कि तो मुझे लगा कि मैंने एक बुरा स्वप्न देख लिया। पर वे अच्छे मित्र हैं इसलिए उनकी बात नज़रअंदाज़ भी नहीं कर सकता था। हम लोग एक साथ स्टूडिओ में बैठे। हँसी मजाक के साथ गप्पें चल रही थीं कि किसी ने कोई वाद्य यंत्र उठाया और बस यूँ ही एक धुन तैयार हो गई।

विशाल शेखर अमिताभ की आवाज़ का असर भली भांति जानते हैं। इसलिए अमिताभ जब गीत शुरु करते हैं तो संगीत संयोजन नाममात्र का ही है। अमिताभ जब एक बार गीत के मुखड़े और एकमात्र अंतरे को गा लेते हैं तो ताल वाद्यों की बढ़ती रिदम के साथ गीत की पुनरावृति होती है। बीच बीच में पार्श्व गायिका मोनाली ठाकुर की  मधुर तान गूँजती है  जो मन को भली लगती है।

इस गीत के बोलों का क्रेडिट सम्मिलित रूप से दिया गया है गीतकार स्वानंद किरकिरे और अन्विता दत्त गुप्तान को। तो आइए सुनते हैं इस मधुर गीत को..


हाल-ए-दिल हाल-ए-दिल
तुमसे कैसे कहूँ
यूँ कभी आ के मिल
तुमसे कैसे कहूँ

यादों में ख्वाबों में
आप की छब में रहें
हाल ए दिल हाल ए दिल
तुमसे कैसे कहूँ

हम तो उधड़ से रहे
होठ यूँ सिल से रहे
तेरी ही जुल्फों के धागे
यूँ तो सौ ख़त भी लिखे
कई पन्ने रट भी लिए
तेरी कहानी दोहराते
कबसे ये कह रहे
आपकी छब में रहे
हाल-ए-दिल हाल-ए-दिल.....

Saturday, January 14, 2012

अहमद फ़राज़ की कल्पनाओं की उड़ान : सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं !

आज अगर अहमद फ़राज़ हमारे साथ होते तो हम सब उनका 81 वाँ जन्मदिन मना रहे होते। फ़राज़ भले नहीं रहे पर उनकी शायरी के तेवर हमेशा याद आते रहे हैं। फ़राज़ को याद करते हुए उनकी एक लंबी पर  बेहद मशहूर ग़ज़ल याद आ रही है जिसे मुशायरों में वो बड़ा रस ले ले के सुनाया करते थे। ग़ज़ल का उन्वान था सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं.....

इस ग़ज़ल में जिस शिद्दत से शायर ने अपनी महबूबा की शान में क़सीदे काढ़े हैं उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। फ़राज़ के सारे अशआरों को पढ़कर तो ये लगता है कि उन्होंने इस ग़ज़ल को गढ़ते हुए कल्पनाओं के पंख बड़ी दूर तक फैलाए। नतीज़न ख्वाबे गुल परेशाँ हैं में लिखी इस ग़ज़ल के छपने के दशकों बाद आज भी नौजवान अपनी माशूक़ाओं की खूबसूरती बयाँ करने के लिए फ़राज़ के इन अशआरों का सहारा लेते हैं।


तो आइए एक बार फिर गौर करें कि फ़राज ने आख़िर ऐसा क्या लिखा था इस ग़ज़ल में। कोशिश की है कि जो शब्द आपको कठिन लगें उनके माएने साथ ही दे दूँ ताकि फ़राज़ साहब के इस अंदाज़ का का आप पुरा लुत्फ़ उठा सकें...

सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
सो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं

सुना है रब्त है उसको ख़राब हालों से
सो अपने आप को बर्बाद कर के देखते हैं
तंगहाल लोगों से सहानुभूति

सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उसकी
सो हम भी उसकी गली से गुज़र के देखते हैं
 नाज़ करने योग्य आँख

सुना है उसको भी है शेर-ओ-शायरी से शगफ़
सो हम भी मोजज़े अपने हुनर के देखते हैं
दिलचस्पी, चमत्कार

सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं
ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं

सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है
सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं
 आकाश के झरोखे

सुना है हश्र हैं उसकी ग़ज़ाल सी आँखें
सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं
 क़यामत,हिरणी

सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं
सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं

सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उसकी
सुना है शाम को साये गुज़र के देखते हैं
काली लंबी जुल्फ़ें

सुना है उसकी स्याह चश्मगी क़यामत है
सो उसको सुरमाफ़रोश आह भर के देखते हैं
 काली आंखें, सुरमा बेचने वाले

सुना है उसके लबों से गुलाब जलते हैं
सो हम बहार पर इल्ज़ाम धर के देखते हैं

सुना है आईना तमसाल है जबीं उसकी
जो सादा दिल हैं उसे बन सँवर के देखते हैं
शीशे की तरह ,मस्तक

सुना है जब से हमाइल हैं उसकी गर्दन में
मिज़ाज और ही लाल-ओ-गौहर के देखते हैं

सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में
पलंग ज़ाविए उसकी कमर के देखते हैं
सँभावनाओं के जंगल में विचरती कल्पना की आँखें. कोण

सुना है उसके बदन के तराश ऐसी हैं
के फूल अपनी कबाएँ कतर के देखते हैं
पत्तियाँ

वो सर-ओ-कद है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं
के उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं
( वो हुस्न की ऊँचाई पर तो है मगर इसका मतलब ये नहीं कि उसकी इच्छाएँ मर गयी हैं। हम तो अभी भी उस पेड़ पर कलियों और फलों के आने का आसरा लगाए बैठे हैं।)

बस एक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का
सो रहर्वान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं
 इच्छा रखने वाले

सुना है उसके शबिस्तान से मुत्तसिल है बहिश्त
मकीन उधर के भी जलवे इधर के देखते हैं
(सुना है उसके शयनागार यानि सोने के कमरे से सटी हुई हैं स्वर्ग की दीवारें। तभी तो वहाँ रहने वाले भी इस परी के जलवे वहीं से देखा करते हैं।)

रुके तो गर्दिशें उसका तवाफ़ करती हैं
चले तो उसको ज़माने ठहर के देखते हैं
( समय का पहिया उसकी परिक्रमा करता है)

किसे नसीब के बे-पैरहन उसे देखे
कभी-कभी दर-ओ-दीवार घर के देखते हैं
 बग़ैर वस्त्रों के

कहानियाँ हीं सही सब मुबालग़े ही सही
अगर वो ख़्वाब है ताबीर कर के देखते हैं
अतिश्योक्ति, स्वपन की आजमाइश

अब उसके शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ
फ़राज़ आओ सितारे सफ़र के देखते हैं

 तो देर किस बात की अहमद फ़राज का अंदाज़ उन्हीं की जबानी क्यूँ ना सुना जाए ?


एक शाम मेरे नाम पर अहमद फ़राज़

Friday, January 13, 2012

वार्षिक संगीतमाला 2011 - पॉयदान संख्या 18 : तेरी सीमाएँ..जब गुलज़ार और श्रेया ने घोला उदासी का रंग..

रवींद्रनाथ टैगोर के उपन्यास नौका डूबी से प्रेरित हिंदी और बंगाली फिल्म जगत में कई बार फिल्में बन चुकी हैं। इसी सिलसिले को इस बार और आगे बढ़ाया रितुपर्णा घोष ने। बंगाली में ये फिल्म पिछले साल जनवरी महिने में आई। पर हिंदी के दर्शकों के लिए मई महिने में कशमकश के नाम से प्रदर्शित हुई। फिल्म का बँगला रूप तो दर्शकों द्वारा खूब सराहा गया पर हिंदी में ये फिल्म कब आई और कब गई इसका पता ही नहीं चला।

ऐसे में इस फिल्म का संगीत आप तक पहुँचा होगा इसमें मुझे शक है। फिल्म के गीतों को गुलज़ार ने लिखा है और संगीतबद्ध किया है राजा नारायण देव और संजय दास ने। राजा साहब के इतने भारी भरकम नाम से ये ना समझ लीजिएगा कि उम्र में भी वो इतने ही दीर्घ होंगे। कोलकाता में रहने वाले राजा ने 1998 में अर्थशास्त्र से स्नातक की डिग्री ली है। इन युवा संगीतकारों ने इस पीरियड फिल्म के गीतों की प्रकृति के हिसाब से ऐसा संगीत दिया हैं जिसमें मधुरता के साथ एक तरह का ठहराव है। गीत के अर्थपूर्ण बोलों पर उनका संगीत हावी नहीं होता बल्कि पार्श्व से शब्दों के बहाव को सिर्फ दिशा प्रदान करता है।

फिल्म के बँगला संस्करण में लिखे गीत ख़ुद टैगोर के रचित हैं। ऍसा लगता है कि गुलज़ार ने टैगोर के शब्दों से हिंदी अनुवाद करते समय उसमें अपनी शैली के अनुरूप ज्यादा बदलाव नहीं किया । इस तरह के गीतों की धुन बनाना और उसे गाना आसान नहीं। गीत वियोग में डूबी नायिका का आत्मालाप है और श्रेया घोषाल ने उन भावनाओं को अपनी आवाज़ में बखूबी ढाला है।  गीत में जो उदासी का रंग है वो एक बार में आपके दिल तक नहीं पहुँचता। ये गीत मेरे लिए वैसे गीतों में है जो धीरे धीरे दिल में जगह बनाते हैं। तो आईए सुनते हैं श्रेया को इस गीत में।

तेरी सीमाएँ कोई नहीं है
बहते जाना बहते जाना है
दर्द ही दर्द है
सहते रहना सहते जाना है

तेरे होते दर्द नहीं था
दिन का चेहरा ज़र्द नहीं था
तुझसे रूठ के मरते रहना
मरते रहना है...
तेरी सीमाएँ कोई नहीं है...

मैं आधी अधूरी बैठी किनारे
नदिया नदिया आँसू आँसू रोना
बातों पे रोना नैनों की जबानी
रात दिन कहते रहना है
आग अंदर की कोई ना देखे
पलक झपकते तुम जो देखो
तुझको पाना तुझको छूना
मुक्ति का पाना है
तेरी सीमाएँ कोई नहीं है



वैसे श्रेया, गुलज़ार और राजा संजय की इस तिकड़ी के बारे में कुछ और बातें भी करनी है आपसे। पर फिलहाल उस चर्चा को स्थगित रखना होगा अंतिम दस गानों की फेरहिस्त तक पहुँवने तक क्यूँकि वहाँ इस फिल्म का एक और मधुर गीत हमारी प्रतीक्षा में है।

Thursday, January 12, 2012

वार्षिक संगीतमाला 2011 - पॉयदान संख्या 19 :तेरी मेरी मेरी तेरी प्रेम कहानी दो लफ़्ज़ों में बयाँ ना हो पाए.....

कभी कभी सीधे सहज बोल भी एक अच्छी धुन पर बेहतरीन गायकों द्वारा गाए जाएँ तो कानों को भले लगते हैं। वार्षिक संगीतमाला की 19 वीं पॉयदान पर भी एक ऐसा ही नग्मा है जिसे गाया है एक बार फिर राहत साहब ने, कोकिल कंठी श्रेया घोषाल के साथ। फिल्म बॉडीगार्ड का ये गीत संगीत रिलीज़ होने के कुछ ही दिन बाद लोगों की जुबाँ पर आ गया। गीत तो आप पहचान ही गए होंगे तेरी मेरी मेरी तेरी प्रेम कहानी दो लफ़्ज़ों में बयाँ ना हो पाए......। इस गीत को लिखा है गीतकार शब्बीर अहमद ने।

बॉडीगार्ड के साथ हीमेश रेशमिया ने फिल्म जगत से लिया अपना अस्थायी अवकाश खत्म कर दिया था। गायक और अभिनेता के किरदार की अपेक्षा वो संगीतकार के रूप में मुझे ज्यादा जँचे हैं। इस साल आई उनकी फिल्म दमादम में भी कुछ अच्छी धुनें थीं और बाडीगार्ड का गीत संगीत तो लोकप्रिय हुआ ही है। पर जहाँ तक हीमेश के इस गीत की बात आती है तो इसे एक प्रेरित यानि inspired कम्पोजीशन कहना ही उचित होगा। गीत में राहत का आलाप और बीच का अंतरा तो हीमेश का रचा हुआ है पर  मुखड़े की धुन, जो गीत में बार बार दोहरायी जाती है हूबहू इस रोमानियन ईसाई गीत La Betleem..से मेल खाती है।


इन प्रेरित धुनों के बारे में अपना नज़रिया मैं पहले भी अपने एक लेख में स्पष्ट कर चुका हूँ
भारतीय संगीतकार अपनी धुनों के साथ साथ पाश्चात्य धुनों को भारतीयता के रंग में ढाल कर उसे भारतीय श्रोताओं के सामने प्रस्तुत करते रहे और वाह वाही और निंदा दोनों लूटते रहे। मुझे इस तरह विदेशी धुनों पर हिंदी गीत बनाने में कोई आपत्ति नहीं है बशर्ते धुन के वास्तविक रचनाकार के नाम को पूरे क्रेडिट के साथ फिल्म और उसके एलबम में दिखाया जाए। पर पता नहीं क्यूँ हमारे नामी संगीतकार भी ऐसा करने से कतराते रहे हैं। कई बार ये संगीतकार गीतकारों की मदद से गीत को उसके आरिजनल से भी बेहतर बना देते हैं। पर उनकी ये मेहनत उसके मूल रचनाकार से बिना अनुमति व बिना क्रेडिट के धुल जाती है।
गीत पर पूरी वाह वाही लूटने के बाद जब हीमेश से इस बाबत पूछा गया तो उन्होंने कहा कि मैंने गीत के कुछ अंश जरूर सलमान की बताई एक लोक धुन पर आधारित किए पर बाकी तो मेरा खुद की संगीतबद्ध रचना है। हीमेश जी, अगर गीत के क्रेडिट्स में ही इस बात का उल्लेख होता तो इससे आपका कद बढ़ता ही। ख़ैर चलिए विवादों को परे रख ये प्रेम गीत सुनते हैं।



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Tuesday, January 10, 2012

वार्षिक संगीतमाला 2011 - पॉयदान संख्या 20 : इक जुनूँ इक दीवानगी हर तरफ़ हर तरफ़..

गीतमाला की पिछली दो पॉयदानों पर आपने दो अलग मिज़ाज के गीत सुने। जहाँ आईना बदल गया..... के गहरे बोलों में उदासी का रंग था तो वहीं आफ़रीन....... रूमानी रंगों से सराबोर था। वार्षिक संगीतमाला की बीसवीं पॉयदान पर जो गीत आज मैं आपको सुनवाने जा रहा हूँ वो इन दोनों रंगों से अलग है। ज़िंदगी ना मिले दोबारा के इस गीत में मौज है, मस्ती है और उस उमंग को आप तक पहुँचाने वाला जबरदस्त संगीत है।

जिन्होंने ये फिल्म देखी है या इस गीत को टीवी पर देखा है वो जानते होंगे कि इस गीत में स्पेन के ला टोमेटीना पर्व को पूरे हुड़दंग के साथ पर्दे पर क़ैद करने की कोशिश की गई है। शकर अहसान लॉए  के समक्ष चुनौती थी कि संगीत में जिस उमंग और उर्जा की जरूरत है उसे वो कैसे उत्पन्न करें? एहसान बताते हैं कि कीबोर्ड में रोबोटिक वॉयस एफेक्ट के जरिए ऊ आ... की रिदम बनी और उससे खेलते खेलते पूरे गीत का संगीत बन गया। इस गीत में इस तिकड़ी का दिया संगीत ऐसा है जो आपको अपनी जगह से उठाकर थिरकने पर मज़बूर कर दे।

जावेद साहब ने भी अपने बोलो को गीत की परिस्थिति के अनुसार रचा है। आख़िर जब हम इस तरह के माहौल में अपने आप को पाते हैं तो फिर एक नई उमंग और तरंग मन में प्रवाहित होने लगती है। और उस तरंग के साथ हमारा ख़ुद का अस्तित्व नहीं रह जाता । रहती है बस सारे समूह के साथ मस्ती के रंग में अपने को डुबो लेने की इच्छा । इसीलिए तो जावेद साहब गीत के मुखड़े में इन हालातों को कुछ यूँ बयान करते हैं

इक जुनूँ इक दीवानगी
हर तरफ़ हर तरफ़
बेखुदी बेखुदी बेखुदी
हर तरफ़ हर तरफ़

कहे हल्के हल्के,ये रंग छलके छलके
जो किस्से हैं कल के भुला दे तू
कोई हौले हौले, मेरे दिल से बोले
किसी का तू हो ले, चल जाने दे कोई जादू

और विशाल और शंकर की मुख्य आवाज़ों में ये मुखड़ा सुनते ही मन झूमने लगता है। टमाटरों की वर्षा से पूरी राह की रंगत लाल हो जाती है और फिर कोरस का स्वर उभरता है..

Oo-Aa Take The World And Paint it Red
Oo-Aa Paint it Red

जावेद अख्तर हल्के फुल्के शब्दों के साथ अगले दो अंतरों में गीत का ये मूड बरक़रार रखते हैं..

ये पल जो भरपूर हैं जो नशे में चूर हैं
इस पल के दामन में हैं मदहोशियाँ
अब तो ये अंदाज़ है हाथों हाथों साज है
आवाज़ों में घुलती है रंगीनियाँ
कहे हल्के हल्के ...जादू

सब जंजीरें तोड़ के, सारी उलझन छोड़ के
हम हैं दिल है और है आवारगी
कुछ दिन से हम लोग पर, आता है सबको नज़र
आया है जो दौर है आवारगी
कहे हल्के हल्के ...जादू
 क्या आप जानते हैं कि इस गीत में ला टोमेटीना पर्व को पुनर्जीवित करने के लिए करीब एक करोड़ रुपये में 16 टन टमाटरों को पुर्तगाल से मँगाया गया। फिल्म के पर्दे पर आपको फरहान, अभय, हृतिक और कैटरीना भले ही टमाटरों की इस फेंका फेंकी में प्रफुल्लित दिखाई पड़े पर असलियत ये थी कि शूटिंग के थोड़ी देर में ही टमाटर की बास से उनकी हालत ये थी कि हर शॉट के बाद वो गर्म पानी की बाल्टी अपने सर पर डाल रहे थे। टमाटरों के दिन भर के इस सानिध्य ने कलाकारों की ये दशा कर दी  कि उन्होंने हफ्तों अपने भोजन के किसी भी हिस्से में टमाटर का मुँह नहीं देखा। तो आइए देखते हैं इस गीत का फिल्मांकन..




Sunday, January 08, 2012

वार्षिक संगीतमाला 2011 - पॉयदान संख्या 21 : यूँ रुह की ऊँगलियों से, खींची है तूने लकीरें..आफ़रीन

दोस्तों वार्षिक संगीतमाला की चार पॉयदानों को पार करते हम आ पहुँचे हैं, गीतमाला की 21 वीं सीढ़ी पर जहाँ का गीत है फिल्म अज़ान  से। इस गीत की धुन बनाई है संगीतकार सलीम सुलेमान ने और इसे लिखने वाले हैं अमिताभ भट्टाचार्य

अमिताभ भट्टाचार्या एक शाम मेरे नाम की वार्षिक संगीतमालाओं के लिए नया नाम नहीं हैं।  वर्ष 2008 में जहाँ आमिर के लिए उनका लिखा नग्मा सरताज गीत की बुलंदियों को छू गया था वहीं पिछले साल उड़ान में लिखे उनके गीतों ने खासा प्रभावित किया था। पर गंभीर और अर्थपूर्ण लेखन से अपनी पहचान बनाने वाले अमिताभ ने इस साल हर तरह यानि हर 'जेनर' (genre) के गीत लिखे। पर थैंक्यू ,हाउसफुल, रिकी बहल.., लव का दि एण्ड जैसी तमाम फिल्मों में उन्होंने एक तरह से अपने प्रशंसकों को निराश ही किया। लोकप्रियता के मापदंडों से देखें तो इस साल उनकी सबसे बड़ी सफ़लता देलही बेली थी जिसके गीत डी के बोस के बारे में मैं अपनी राय यहाँ ज़ाहिर कर चुका हूँ। इसके आलावा फिल्मों  'रेडी' के लिए लिखा उनका आइटम सांग भी खूब बजा।

बंगाली होते हुए भी  हिंदी और उर्दू पर समान पकड़ रखने वाला ये गीतकार लखनऊ से ताल्लुक रखता है। फिल्म अज़ान में इस गीत के बोलों पर ध्यान देने से उनकी ये सलाहियत साफ नज़र आती है। इस गीत का मुखड़ा है आफ़रीन हो आफ़रीन..। अज़ान तो आप जानते ही हैं कि नमाज़ की पुकार को कहते हैं पर इससे पहले कि इस गीत के बारे में बात की जाए ये प्रश्न आपके दिल को मथ रहा होगा कि ये आफ़रीन क्या बला है? दिलचस्प बात  है कि ये शब्द अरबी, फ़ारसी, तुर्की और उर्दू में भिन्न भिन्न अर्थों से जाना जाता है। अरबी में इसका मतलब खूबसूरत, उर्दू में बेहतरीन और फ़ारसी में भाग्यशाली होता है। वैसी गीत को पर्दे पर देखने ने सहज अंदाजा लग जाता है कि यहाँ आफ़रीन नायिका की खूबसूरती को इंगित करने के लिए प्रयुक्त हुआ है।
सच पूछिए तो अज़ान के लिए अमिताभ के लिखे इस नग्मे की हर पंक्ति से प्रेम की किरणें फूटती नज़र आती हैं। गीत का प्यारा मुखड़ा गीत के मूड को बना देता है और उसके बाद सुनने वाला गीत में व्यक्त भावनाओं के साथ बहता चला जाता है

संगीतकार सलीम सुलेमान  इस फिल्म के बारे में कहते हैं कि
हमने इसके संगीत को पवित्र रखने की कोशिश की है जिससे की इसका हर गीत एक प्रार्थना के समक्ष लगे। आप देखेंगे कि फिल्म के प्रेम गीतों में भी एक भक्ति का भाव उभर कर आता है। इसके लिए हमने गीतों की गति मंद रखी ताकि उनके अंदर के भाव श्रोताओ तक पहुँचे।

मेरे ख्याल से सलीम सुलेमान का कथन आफ़रीन के संदर्भ में शत प्रतिशत सही बैठता है खासकर जब आप इसे राहत जैसे बेमिसाल गायक की आवाज़ में सुनें। गीत के इंटरल्यूड्स में गिटार और पियानो का प्रयोग मन को सुकून देता है। तो देर किस बात की आइए लगाते हैं प्रेम की वैतरणी में डुबकी फिल्म अज़ान के इस गीत के साथ..



यूँ रुह की ऊँगलियों से
खींची है तूने लकीरें
तसवीर है रेत की वो
या ज़िंदगी है मेरी रे

जख़्मों को तूने भरा है
तू मरहमों की तरह है
आफ़रीन हो आफ़रीन...आफ़रीन हो आफ़रीन

तेरे पहलू को छू के
महकी है खुशबू में
आब ओ हवा आफ़रीन हो हो
दुनिया बदल जाए
तू जो मुझे मिल जाए
इक मर्तबा आफ़रीन आफ़रीन आफ़रीन....

ये मरहबा रूप तेरा
दिल की मिटी तिश्नगी रे
सारे अँधेरे फ़ना हों
ऐसी तेरी रोशनी रे
जख़्मों को तूने भरा है
तू मरहमों की तरह है
आफ़रीन आफ़रीन...

वैसे इस गीत के दो वर्जन हैं। फिल्म में सलीम का गाया वर्सन प्रयुक्त हुआ है।

Friday, January 06, 2012

वार्षिक संगीतमाला 2011 - पॉयदान संख्या 22 : आईना देखा तो मेरा चेहरा बदल गया..

वार्षिक संगीतमाला की 22 वीं पॉयदान पर पिछली सीढ़ी की तरह ना तो ख्वाबों की उड़ान है और ना ही आशाओं का सूरज। यहाँ तो उदासी का आलम ही चारों ओर बिखरा पड़ा है। निराशा और हताशा के बादल छाए हैं और इन्हीं के बीच गूँज रहा है राहत फतेह अली खाँ का स्वर। ये गीत है फिल्प 'खाप' का। पिछले साल खाप पंचायत और उसकी रुढ़िवादी परंपराओं के किस्से टीवी और अख़बारों की सुर्खियों में रहे थे। कितने प्रेमी युगलों की जिंदगियाँ ऐसी पंचायतों के अमानवीय फैसलों से बदल गयीं। गीतकार पंछी जालोनवी का लिखा ये नग्मा ऐसे ही टूटे दिलों का दर्द बयाँ करता है।

इस गीत का सबसे सशक्त पहलू है राहत की गायिकी और पंछी जालोनवी के शब्द। राहत और उनकी गायिकी से तो आप सब पहले भी इस चिट्ठे पर कई बार रूबरू हो चुके हैं। आइए जानते हैं पंक्षी जालोनवी उर्फ सैयद अथर हसन के बारे में। ये नाम आपको नया भले लगे पर चंबल के बीहड़ों से सटे कस्बे जालोन से जुड़े इस गीतकार को फिल्म इंडस्ट्री में मकबूलियत 2005 में आई फिल्म 'दस' से ही मिल गई थी। पर इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहेंगे कि साहित्य और शायरी में रुचि रखने वाले लेखक को फिल्म उद्योग 'दस बहाने...' और 'दीदार दे...' जैसे आइटम नंबरों से जानने लगा। 

जब पंछी से मैंने इस बदलाव के बारे में पूछा तो वो कहने लगे कि समझ नहीं आता कि मैं फिल्म इंडस्ट्री में आकर बिगड़ गया या आज के मापदंडों के हिसाब से पहले से बिगड़ा हुआ था। अपनी इस छवि से निकलने की ज़द्दोज़हद पंछी करते रहे हैं क्यूंकि उन्हें अपनी शायरी पे भरोसा है..ज़रा उनकी इन पंक्तियों को देखें

बोल कड़वे हो तो जुबाँ में रख
ऐसे तीरों को तू कमान में रख
पर तो काटे हैं वक़्त ने 'पंछी'
कुछ भरोसा मगर उड़ान में रख

इस साल पंछी के लिखे रा वन के गीत काफी चर्चित हुए हैं। रा वन में उनका लिखा नग्मा बहे नैना , भरे मोरे नैना के बोल तो वाकई काबिलेतारीफ़ हैं पर मेरी संगीतमाला में स्थान बना पाया फिल्म 'खाप' का ये गीत। जालोनवी की शायरी के रंग राहत की आवाज़ से और निखर जाते हें जब राहत गाते हैं
बादल मेरी ज़मीन पे आकर यूँ थम गए
आई ज़रा जो धूप तो साया बदल गया

या फिर

उलझी रही सवालों में जीने की हर खुशी
जब बुझ गए दीये तो मिली है रोशनी
आँखों में नींद आई तो सपना बदल गया

नायक के दिल की उदासी इन बिंबों से और जीवंत हो उठती है। हालांकि गायिकी और बोल की तुलना में अनुज कप्पो का संगीत उतना दमदार नहीं लगता। खासकर खूबसूरत अंतरों के बीच के इंटरल्यूड्स और बेहतर हो सकते थे। तो आइए सुनें फिल्म खाप का ये गीत..



आईना देखा तो मेरा चेहरा बदल गया
देखते ही देखते क्या क्या बदल गया
बादल मेरी ज़मीन पे आकर यूँ थम गए
आई ज़रा जो धूप तो साया बदल गया

उलझी रही सवालों में जीने की हर खुशी
जब बुझ गए दीये तो मिली है रोशनी
आँखों में नींद आई तो सपना बदल गया
देखते ही देखते क्या क्या बदल गया

आईना देखा तो मेरा चेहरा बदल गया

क़ैद किये थे ख़्वाब किसी ने नींद किसी ने हारी
हार गयी है हार कहीं पर जीत कहीं पर हारी
तरह तरह से खूब वक़्त भी भेष बदल के आया
मिली मुझे ना धूप आज की मिला ना कल का साया

मंज़िल करीब आई तो रस्ता बदल गया
देखते ही देखते क्या क्या बदल गया
आईना देखा तो मेरा चेहरा बदल गया

Thursday, January 05, 2012

वार्षिक संगीतमाला 2011 : पॉयदान संख्या 23 - उड़े खुले आसमान में ख्वाबों के परिंदे,,,

चरखा तो आपने कल खूब चला लिया , आइए आज अपनी इस दौड़ती भागती ज़िंदगी की ओर पलट कर देखें। अगर आप अपने आस पास के लोगों की ज़िंदगी पे गौर करें तो पाएँगे कि हम सबने अपनी ज़िदगियों को एक ढर्रे से बाँध दिया है। हम उससे बाहर नहीं निकलना चाहते। अनजानी राहों पर इच्छा रहते हुए भी चलना नहीं चाहते। ज़िदगी में कुछ नया पाना नया ढूँढना नहीं चाहते। क्यूँकि हमारे दिमाग ने दिल की उड़ान पर ताला लगा दिया है। नतीजन हमारी सोच, हमारी समझ,  दिमाग के बने बनाए गलियारों में भटकती संकुचित सी  हो जाती है। 

फिल्म 'ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा' के इस गीत में जावेद अख़्तर साहब कुछ ऐसी ही  दिनचर्या से निकलकर बाहर की दुनिया में अपने सपनों के पीछे उड़ान भरने की सलाह दे रहे हैं। जावेद साहब का लिखा ये नग्मा मन को एक नई ताज़गी के अहसास से सराबोर कर देता है और मन की परेशानियाँ कुछ देर के लिए ही सही इन शब्दों को सुनकर दूर भागती सी नज़र आती हैं।

फिकरें जो थी,पीछे रह गई
निकले उन से आगे हम
हवा में बह रही है ज़िन्दगी
यह हमसे कह रही है ज़िन्दगी
ओहो, अब तो, जो भी हो सो हो

फिल्म में इस गीत को गाया है एलीसा मेंडोन्सा ने। निश्चय ही आप में से बहुतों के लिए ये एक नया नाम होगा। एलीसा, संगीतकार तिकड़ी शंकर अहसान लॉय में से लॉय मेंडोन्सा की सुपुत्री हैं। ये बात अलग है कि वो अपने पिता की वज़ह से नहीं बल्कि अपने गायन की वज़ह से जानी जाना चाहती हैं। एलीसा ने संगीत की विधिवत शिक्षा नहीं ली। अक्सर वो पिता के स्टूडियो जाया करती। एक बार शंकर महादेवन ने उनसे कुछ गाने को कहा तो पिता को लगा कि उनकी बेटी में पार्श्व गायिका बनने की काबिलियत है। फिर तो अपने पिता के मार्गदर्शन में संगीत की बारीकियों को सीखने लगीं। पिछले साल कार्तिक कालिंग कार्तिक में उनका गाया गीत उफ्फ तेरी अदा बेहद लोकप्रिय हुआ था।


स्वभाव से संकोची और मीडिया से दूर रहने वाली 21 वर्षीय एलीसा को जब यूँ ही इस गीत गाने के लिए कहा गया तो उन्हें पता भी नहीं था कि साथ साथ इस गीत की रिकार्डिंग भी हो रही है। गीत के साथ बजता हल्का हल्का एकाउस्टिक गिटार और जो भी हो सो हो के बाद प्रयुक्त धुन एलीसा की आवाज़ के साछ कानों को मानों सहलाती हुई निकल जाती हैं। तो आइए सुनते हैं वार्षिक संगीतमाला की तेइसवीं सीढ़ी पर विराजमान इस गीत को.. इस गीत में एलीसा मेंडोन्सा का संक्षिप्त साथ दिया है मोहित चौहान ने..




उड़े खुले आसमान में ख्वाबों के परिंदे
उड़े दिल के ज़हाँ में ख्वाबों के परिंदे
ओहो क्या पता जाएँगे कहाँ

उड़े खुले ....जाएँगे कहाँ
खुले हैं जो पल, कहे यह नज़र
लगता है अब हैं जागे हम
फिकरें जो थी,पीछे रह गई
निकले उन से आगे हम
हवा में बह रही है ज़िन्दगी
यह हमसे कह रही है ज़िन्दगी
ओहो, अब तो, जो भी हो सो हो

उड़े खुले ....जाएँगे कहाँ
किसी ने छुआ तो यह हुआ
फिरते हैं महके महके हम
खोई हैं कहीं बातें नयी
जब हैं ऐसे बहके हम
हुआ है यूं कि दिल पिघल गये
बस एक पल में हम बदल गये
ओहो, अब तो, जो भी हो सो हो

रोशनी मिली
अब राह में है इक दिलकशी सी बरसी
हर ख़ुशी मिली
अब ज़िन्दगी पे है ज़िन्दगी सी बरसी
अब जीना हम ने सीखा है
याद है कल, आया था वो पल
जिसमें जादू ऐसा था
हम हो गये जैसे नये
वो पल जाने कैसा था
कहे ये दिल कि जा उधर ही तू
जहाँ भी ले के जाए आरज़ू
ओहो, अब तो जो भी हो सो हो


Wednesday, January 04, 2012

वार्षिक संगीतमाला 2011 पॉयदान संख्या 24 : आख़िर 'कतिया करूँ' का मतलब क्या है?

अपनी 'शबाना'को तो मना लिया ना आपने तो चलिए थोड़ा चरखा कात कर आते हैं। क्या कहा ये गाँधी जयन्ती नहीं नए साल का शुभारंभ है। अजी तो मैंने कब कहा कि कुछ और है। पर कल्पना कीजिए कि ये चरखा आपका दिल हो और सूत के रूप आपके मन की भावनाएँ जो किसी की यादों में रची बसी हों तो भला आपको सारी रात प्रेम की चादर बुनने में कितना मज़ा आएगा। इरशाद क़ामिल को भी जरूर आया होगा तभी तो उन्होंने रॉकस्टार के लिए गीत लिखा सारी रात कतिया करूँ। 

वैसे इम्तियाज को मैंने इस गीत के बारे में बताते हुए सुना कि पंजाब में लोग इस जुमले को कुछ यूँ गाते हैं किसी की साइकिल, किसी की मोपेड, सड्डी सुजुकी तू मैं सारी रात कतिया करूँ...:)।इरशाद और मुझे ये जँच गया और हमने फ़ैसला लिया कि इसी जुमले को लेकर क्यूँ ना गीत बनाया जाए।


इस गीत को गाया है हर्षदीप कौर ने। ये वही हर्षदीप हैं जिन्होंने NDTV Imagine के कार्यक्रम जुनूँ कुछ कर दिखाने में राहत की टीम में रहते हुए सूफ़ी गायिकी की कमान थामी थी और फाइनल में लोकगीत गायिका मालिनी अवस्थी को पछाड़ कर 2008 में खिताब जीता था। श्वेता परांदे को दिए साक्षात्कार में हर्षदीप इस गीत की कहानी कुछ यूँ बताती हैं..

"रहमान सर ने एक दिन मुझे पोवइ के स्टूडियो में बुलाया और गीत के बोल पकड़ाते हुए पूछा कि ये कतिया करूँ क्या है ? मैंने उन्हें इसका मतलब समझाते हुए कहा कि इसका मतलब है कि मैं सारी रात तुम्हारी  रूई से सूत कातूँगी। बस तुम मेरे दिल रूपी चरखे की चकरी बन जाओ। मैं तुम्हारे लिए ही जियूँगी और मरूँगी। रहमान सर ने कहा मैं एक ऐसी धुन बनाना चाहता हूँ जो लोगों का तुरंत ध्यान खींचे क्यूँकि गीत की परिस्थिति में नायक नायिका दोनों मस्ती के मूड में हैं। और रहमान ने आनन फानन में यह धुन तैयार कर दी।"

चाहे वो गीत के मुखड़े में टिग लिंग लिंग के साथ की पंजाबी बीट्स हों या बीच के खूबसूरत इंटरल्यूड्स, रहमान अपने संगीत से जो मस्ती पैदा करते हैं वही इस गीत की कर्णप्रियता को बढ़ाता है। तो आइए एक बार फिर सुनें इस नग्मे को


टिंग लिंग लिंग लिंग
लिंग लिंग लिंग लिंग
कतिया करूँ, कतिया करूँ
तेरा रूँ कतिया करूँ
तेरा रूँ, तेरा रूँ,तेरा रूँ
रूँ रूँ रूँ
सारी रातें कतिया करूँ
कतिया करूँ, कतिया करूँ

सारा दिन सोचाँ विंच लँगदा
तेरे नइ हुण जियति मरूँ
एह तन मेरा चरखा होवे
होवे उलफत यार दी चंगा रु...

नचदी फिरूँ, टपदी फिरुँ
कीली मैं नपदी फिरूँ
हद करूँ, हद करूँ, हद करूँ
रूँ रूँ रूँ
यारा बुल्ले लुटिया करूँ
लुटिया करूँ, लुटिया करूँ
मैंनू डर हुण
नइयो जग दा,
तेरे नइ हुण जियति मरूँ, कट्टा रूँ..

फिल्म रॉकस्टार के इस गीत को फिल्माया गया है रणबीर कपूर और नरगिस फाख़री पर...

Monday, January 02, 2012

वार्षिक संगीतमाला 2011 - पॉयदान संख्या 25 : क्या आपकी 'शबाना 'आपसे रूठ गई है?

तो दोस्तों वक़्त आ गया है वार्षिक संगीतमाला 2011 के पच्चीस गीतों की उल्टी गिनती शुरु करने का। गीतमाला की पच्चीस वीं पॉयदान पर है फिल्म 'हम तुम शबाना'  का एक हल्का फुल्का नुग्मा जिसमें दो आशिक बहलाने की कोशिश कर रहे हैं अपनी महबूबा को। 

इस तरह के गाने कॉलेज के ज़माने में यार दोस्तों की खिंचाई करने में बड़े काम आते थे। जहाँ पता लगता कि अमुक बालक अमुक कन्या से सेंटी तो है पर कुछ कह ना पाने के दर्द से लाचार है तो ऐसे गाने काम में लिये जाते। बस उधर से कन्या बालक के साथ आती दिखी और इधर से समवेत कोरस शुरु। मसलन सागर किनारे 'बालक' पुकारे 'उस कन्या' के बिना उसका कोई नहीं  है। अब अगर आपके साथ भी परिस्थिति रूठने मनाने की हो तो समीर के लिखे इस गीत में शबाना की जगह अपनी उन का नाम  जोड़िए और हो जाइए शुरु

भोली भोली आँखों में नाराज़गी है क्यूँ
मीठी मीठी बातों में ये बेरुखी है क्यूँ
खोए खोए ना रहो,गुमसुम रहो ना यूँ
जान ले तू जान ले Girl I am in love with you
हे ना ना ना शबाना ऐसे रूठो ना
हे ना ना ना शबाना मुस्कुराओ ना
हे ना ना ना सजा ले होठों पे हँसी
हे ना ना ना बन जाएगी मेरी ज़िंदगी

वाकई क्या अंदाज है इस मान मुन्नवल का...

नवोदित संगीतकार सचिन जिगर के संगीतबद्ध इस गीत को गाया है राघव माथुर ने।


अब राघव माथुर कहने को तो देशी नाम है पर हैं ये कनाडा के निवासी। तीस वर्षीय पॉप गायक माथुर अमेरिका व यूके में खासी लोकप्रियता अर्जित कर चुके हैं। वर्ष 2004 में यूके टॉप टेन की लिस्ट में राघव के तीन गीत "So Confused", "Can't Get Enough" and "It Can't Be Right बजे। 2005 में उनका सोलो 'Angel Eyes' भी खूब चला। राघव की आवाज़ यहाँ के गायकों से अलग तो है पर आगे कितनी चल पाएगी ये तो वक़्त ही बताएगा। वैसे उनकी शुरुआत तो अच्छी हुई है। तो आइए सुनें ये गीत



फिल्म में ये गीत फिल्माया गया है तुषार कपूर, मिनिस्हा लांबा और श्रेयस तलपड़े पर

 

मेरी पसंदीदा किताबें...

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