Thursday, August 26, 2010

क्या आप संतुष्ट है वर्तमान शिक्षा पद्धति से? क्या सफल होगा 'Continuous Evaluation System' ?

होमवर्क शब्द अंग्रेजी का भले हो पर आज के नौनिहालों के माता पिताओं के रोज़ के शब्दकोष का अहम हिस्सा जरूर है। बच्चों को इस होमवर्क नाम के असुर से जूझते अक़्सर देखा है पर मुसीबत ये है कि अक्सर वे इस युद्ध की कमान अपने माता पिता को सौंप देते हैं। वैसे और भी शब्द हैं इस स्कूली शब्दकोष में जिनसे अभिभावक बच्चों से ज्यादा घबराते हैं मसलन 'मंडे टेस्ट', 'प्रोजेक्ट वर्क', 'मॉडल प्रिपरेशन' वैगेरह वैगेरह। कारण ये कि ऐसे तथाकथित 'एसाइनमेंट' बच्चों की नहीं बल्कि आजकल अभिभावको की क्रियाशीलता को जाँचने परखने का माध्यम हो गए हैं।

इतना सब होते हुए भी अक्सर शिक्षकों से ये सुनने को मिल जाता है कि अभिभावक घर पर बच्चों को पढ़ाने में बिल्कुल ध्यान नहीं देते। ये आरोप आज के इस भागमभागी युग में काफी हद तक सही भी है। पर ये भी सही है कि स्कूल में पचास साठ या उससे भी अधिक बच्चों को एक कक्षा में रखकर शिक्षक ही व्यक्तिगत तौर पर एक बच्चे पर कितना ध्यान दे पाते हैं। बच्चों की परेशानी का अंत यही नहीं है। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा विभिन्न कक्षाओं के लिए तैयार किया गया सिलेबस भी उनके सोचने समझने की अद्भुत ग्राह्य शक्ति का इस्तेमाल करने के बजाए रट्टा मारने की प्रवृति को ही आगे बढ़ाता है।

बाकी कक्षाओं की तो बात मुझे आगे पता लगेगी पर अभी तो आपको तीसरी कक्षा की बात बताता हूँ। मुझे अच्छी तरह याद है कि जो पाठ मैं अपनी अंग्रेजी की पाठ्य पुस्तक में कक्षा छः में पढ़ा करता था वो आजकल पहली या दूसरी में ही पढ़ा दिया जाता है। हालत ये है कि पिछले हफ़्ते अंग्रेजी में समूहवाचक संज्ञा के उदाहरण के तौर पर जो शब्द मेरे पुत्र को तीसरी कक्षा में याद करने को दिए थे वे इतने जटिल थे कि उनको देखने के लिए मुझे डिक्शनरी और नेट का सहारा लेना पड़ा।

बच्चों का शब्दज्ञान और वर्तनी जाँचने के लिए इतने कठिन शब्द दिए जाते हैं कि बच्चे के पास रटने के आलावा कोई और चारा नहीं रह जाता। सामाजिक विज्ञान पढ़ाते वक़्त जब बच्चों को राज्य के साथ केंद्र शासित राज्यों का उल्लेख देखता हूँ तो CBSE के शिक्षाविदों पर बहुत खीज़ होती है। क्या उन्हें ये समझ नहीं आता कि ये सारा ज्ञान ना केवल एक छोटे बच्चे को देना मुश्किल है बल्कि निहायत गैरजरूरी भी है।


इसीलिए पिछले हफ्ते जब बच्चों के स्कूल के प्राचार्य ने सारे अभिभावकों को बुला कर CBSE के कुछ साल पहले चालू किए गए Continuous Evaluation System को लागू करने की बात कही तो लगा कि चलो ये शिक्षा के क्षेत्र में देर से लिया गया सही कदम है।

अपने वक्तव्य में प्राचार्य महोदय ने जोर देकर कहा कि
बच्चों की शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जिससे वो इंजीनियर डॉक्टर या कोई और पेशेवर विधा हासिल करें ना करें एक जिम्मेदार और चरित्रवान नागरिक अवश्य बनें और अब इस पद्धति में उनके विषय ज्ञान के अतिरिक्त इस दृष्टि से भी उनके व्यक्तित्व का आकलन किया जाएगा। उन्होंने अभिभावकों में एक दूसरे के बच्चों की आपसी तुलना की प्रवृति की निंदा की और कहा कि इससे बच्चों का अपने पर से विश्वास घटता है। प्राचार्य ने स्कूल और सिलेबस की कमियों को भी स्वीकारा।
तीसरी से पाँचवी कक्षा के अभिभावकों को दिए गए भाषण के बाद उन्होंने अभिभावकों से उनके विचार आमंत्रित किए। एक अभिभावक की प्रतिक्रिया दिलचस्प थी।

लगता था जनाब बहुत अधीरता से अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे। माइक लेते ही उन्होंने भाइयों और बहनों की तर्ज में भाषण शुरु करते हुए कहा कि मेरा पहला अनुरोध ये है कि बच्चों को रोज़गारोन्मुख शिक्षा देनी चाहिए। उन्हें ये बताना चाहिए कि सीमेंट में कितना बालू गारा और कितना पानी मिलाना जरूरी है। (मैंने मन ही मन सोचा हाँ अगर शहरों के स्कूल में तीन से पाँच के बच्चों को ये शिक्षा दी जाए तो उसी तरह ये भी बताया जाए कि दूध में कितना दूध और पानी मिलाया जाए।) हद तो तब हो गई जब उन महाशय ने इतिहास जैसे विषय को एक सिरे से ख़ारिज़ करते हुए ये कह दिया कि ये बताना कतई जरूरी नहीं कि गौतम बुद्ध कौन थे और कहाँ पैदा हुए थे? ख़ैर उन सज्जन को चुप कराने के लिए बाकी अभिभावकों को जबरिया ताली बजानी पड़ी और तब कहीं उनका भाषण खत्म हुआ।

इस वाक़ए से ये स्पष्ट हो जाता है कि हमारी मानसिकता किस हद तक दिग्भ्रमित हो गई है। ऊपर का वक़्तव्य उन सज्जन ने नवीं दसवीं के विद्यार्थियों के लिए दिया होता तो बात समझ में आती थी। सामाजिक विज्ञान की विषय वस्तु पर बहस हो सकती है पर उनका भी एक अहम महत्त्व हमारे चरित्र निर्माण में अवश्य है और इस बात को कोई भी सिलेबस अनदेखा नहीं कर सकता।हम आज अगर अपने बच्चों को एरोगेंट पाते हैं , बड़ों के प्रति उनके व्यवहार में शिष्टता में कमी देखते हैं, समूह में घुल मिलकर रहने में उन्हें असमर्थ देखते हैं, अपनी और अपने आस पास की साफ सफाई में उन्हें उदासीन देखते हैं तो उसकी वज़ह ये भी है कि प्राथमिक शिक्षा यानि प्राइमरी एडुकेशन में कहीं ना कहीं इन तत्त्वों की उपेक्षा हुई है। वहीं आगे की कक्षाओं में प्रतियोगिता परीक्षाओं में सफलता प्राप्त करने का इतना दबाव है कि व्यक्तित्व निर्माण और सामाजिक व्यवहार के कई वांछित पहलुओं से मौज़ूदा शिक्षा प्रणाली में एक छात्र अछूता रह जाता है।

आज जोर इस बात पर होना चाहिए की निचली कक्षाओं में सिर्फ वही पढ़ाया और सिखाया जाए जो बच्चा अपने आसपास की जिंदगी से जुड़ा पाए और जिसे सीखते वक़्त वो खुशी का अनुभव करे। बच्चे के चरित्र निर्माण के लिए आवश्यक रुझान प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के दौरान ही करना चाहिए और साथ ही विषयों के साथ उसके व्यवहार का मूल्यांकन करने से वो इनके महत्त्व को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। हाई स्कूल और उसके ऊपर की शिक्षा निश्चय ही रोज़गारोन्मुख होनी चाहिए। पर इस तरह कि पद्धति तभी सफल हो सकती है जब शिक्षक छात्र का अनुपात कम हो, शिक्षक का मूल्यांकन बिना किसी पूर्वाग्रह के हो और अभिभावक भी भेड़ चाल वाली प्रवृति से निकल कर अपने बच्चों को वो करने दें जिसके वो सर्वथा योग्य हैं।

चलते चलते समाजवादी कार्यकर्ता और कवि श्याम बहादुर नम्र की ये कविता आपसे साझा करना चाहूँगा जो वर्तमान शिक्षा पद्धति की कमियों को सहज शब्दों में बखूबी उजागर करती है...

एक बच्ची स्कूल नहीं जाती, बकरी चराती है
वह लकड़ियाँ बटोर कर घर लाती है,
फिर माँ के साथ भात पकाती है।

एक बच्ची किताब का बोझ लादे स्कूल जाती है,
शाम को थकी माँदी घर आती है।
वह स्कूल से मिला होमवर्क, माँ बाप से करवाती है।

बोझ किताब का हो या लकड़ियों का दोनों बच्चियाँ ढोती हैं,
लेकिन लकड़ी से चूल्हा जलेगा, तब पेट भरेगा,
लकड़ी लाने वाली बच्ची यह जानती है।
वह लकड़ी की उपयोगिता पहचानती है।
किताब की बातें कब किस काम आती हैं?
स्कूल जाने वाली बच्ची बिना समझे रट जाती है।


लकड़ी बटोरना, बकरी चराना और माँ के साथ भात पकाना,
जो सचमुच गृहकार्य हैं, होमवर्क नहीं कहे जाते हैं।
लेकिन स्कूल से मिले पाठों के अभ्यास,
भले ही घरेलू काम ना हों, होमवर्क कहलाते हैं

ऐसा कब होगा
जब किताबें सचमुच के 'होमवर्क' से जुड़ेंगी
और लकड़ी बटोरने वाली बच्चियाँ भी ऐसी किताबें पढ़ेंगी।

Thursday, August 19, 2010

बना गुलाब तो काँटे चुभा गया इक शख़्स.... रूना लैला / उबैद्दुलाह अलीम

आज की ये पोस्ट है पाकिस्तान के मशहूर शायर उबैद्दुलाह अलीम की एक बेहतरीन ग़ज़ल के बारे में, जिसे रूना जी ने अपनी दिलकश आवाज़ से एक अलग ही ऊँचाई तक उठाया है। तो पहले जिक्र इस ग़ज़ल का और बाद में अलीम शाह की कुछ और चुनिंदा ग़ज़लों के माध्यम से रूबरू होइएगा इस शायर से...

भगवान ने हमें जो जिंदगी बख्शी है उसकी एक डोर तो ऊपरवाला अपने पास रखता ही है पर उसी डोर का एक सिरा वो हमें भी थमा कर जाता है। पर हम इस डोर को पकड़ने के लिए कब इच्छुक रहे हैं ? बचपन में ये डोर माता पिता के पास रहती है पर जवानी मे जब हम इस डोर को पकड़ने के काबिल हो भी जाते हैं तो इसे किसी और के हाथ में दे के ज़िंदगी उसके इख़्तियार में दे देते हैं। आलम ये होता है कि मैं मैं नहीं रह कर वो हो जाते हैं। बकौल मीर

दिखाइ दिये यूँ कि बेख़ुद किया
मुझे आप से ही जुदा कर चले


लीजिए अपना वज़ूद यूँ भुला दिया कि अपने आप से ही ख़ुद को जुदा पाया। पर ये बेइख़्तियारी का आलम तो तभी तक सुकून देता है जब आपकी ये डोर एक सच्चे प्रेमी के हाथ रहती है। पर आप कहेंगे सच्चा प्रेमी वो भी आज के दौर में क्यूँ मजाक कर रहे हैं जनाब ? सही है आपको मजाक लग रहा है क्यूँकि वक़्त के थपेड़ों ने आप को समझदार बना दिया है। पर इस दौर में क्या.. हर दौर में खामख्याली पालने वाले लोग रहे हैं और रहेंगे। यहाँ तक कि कल तक समझदार लगने वाले लोगों को भी मैंने अपने जीवन के इस डोर को ऐसे शख्सों के हाथ में सोंपते देखा है जो कि कभी भी उस ऐतबार के लायक नहीं थे।नतीज़ा वही जो इस ग़ज़ल में
उबैद्दुलाह अलीम फरमा रहे हैं कि

बना गुलाब तो काँटे चुभा गया इक शख़्स
हुआ चराग तो घर ही जला गया इक शख़्स


अलीम साहब की ग़ज़लों में ये ग़ज़ल मुझे बेहद पसंद है। इसका हर इक शेर दिल में उतरता सा महसूस होता है, खासकर तब जब आप इसे रूना लैला की आवाज़ में सुन रहे होते हैं। अपनी ग़ज़ल गायिकी से जो असर रूना जी पैदा करती हैं वो उनकी समकालीन भारतीय ग़ज़ल गायिकाओं में मुझे तो नज़र नहीं आता। कुछ दिनों से ये ग़ज़ल जुबाँ से उतरने का नाम ही नहीं ले रही है। तो आप भी सुनिए ना..





बना गुलाब तो काँटे चुभा गया इक शख़्स
हुआ चराग तो घर ही जला गया इक शख़्स


तमाम रंग मेरे और सारे ख़्वाब मेरे

फ़साना थे कि फ़साना बना गया इक शख़्स


मै किस हवा में उडूँ किस फ़ज़ा में लहराऊँ

दुखों के जाल हर इक सू बिछा गया इक शख़्स


मोहब्बतें भी अजब उसकी नफरतें भी कमाल

मेरी ही तरह का मुझ में समा गया इक शख़्स


रूना जी ने
उबैद्दुलाह अलीम की इस ग़ज़ल के कुछ अशआर नहीं गाए हैं। अगर उबैद्दुलाह अलीम से ही ये सारे अशआर सुन लिए जाएँ तो कैसा रहे..



वो माहताब था मरहम बदस्त आया था

मगर कुछ और सिवा दिल दुखा गया इक शख़्स


मोहब्बतों ने किसी की भुला रखा था उसे
मिले वो जख्म कि फिर याद आ गया इक शख़्स


खुला ये राज़ कि आईनाखाना है दुनिया

और उसमें मुझ को तमाशा बना गया इक शख़्स


मुझे यकीं है कि आप में से अधिकांश ने
उबैद्दुलाह अलीम साहब का नाम नहीं सुना होगा पर विभिन्न ग़ज़ल गायकों द्वारा उनके द्वारा लिखी गई ग़ज़लें जरूर सुनी होंगी। मसलन गुलाम अली की वो छोटे बहर की प्यारी सी ग़ज़ल याद है आपको

कुछ दिन तो बसो मेरी आँखों में
फिर ख़्वाब अगर हो जाओ तो क्या


कोई रंग तो दो मेरे चेहरे को

फिर ज़ख्म अगर महकाओ तो क्या


जब हम ही न महके फिर साहब

तुम बाद-ए-सबा कहलाओ तो क्या


एक आईना था,सो टूट गया

अब खुद से अगर शरमाओ तो क्या


ऐसी ही उनकी एक हल्की फुल्की ग़ज़ल और है जिसे गुनगुनाने में बड़ा आनंद आता है
तेरे प्यार में रुसवा होकर जाएँ कहाँ दीवाने लोग
जाने क्या क्या पूछ रहे हैं यह जाने पहचाने लोग


जैसे तुम्हें हमने चाहा है कौन भला यूँ चाहेगा

माना और बहुत आएँगे तुमसे प्यार जताने लोग


और उनकी इस ग़ज़ल के प्रशंसकों की भी कमी नहीं है। चंद शेर मुलाहजा फरमाएँ ..

अजीज़ इतना ही रखो कि जी संभल जाये
अब इस क़दर भी ना चाहो कि दम निकल जाये

मोहब्बतों में अजब है दिलों का धड़का सा
कि जाने कौन कहाँ रास्ता बदल जाये

उनकी ग़ज़ल कुछ इश्क था कुछ मज़बूरी थी.... को जहाँ फरीदा ख़ानम जी ने अपनी आवाज़ दी थी वहीं चाँद चेहरा सितारा
आँखें को हबीब वली मोहम्मद ने गाया था।

1939 में भोपाल में जन्में अलीम का शुमार आज़ाद पाकिस्तान के बुद्धिजीवी शायरों में होता है। कराची से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद वे साठ के दशक में कराची के दूरदर्शन केंद्र से जुड़े रहे। उनकी शायरी के दो संग्रह 'चाँद चेहरा सितारा आँखें' और 'वीरान सराय का दीया' नाम से प्रकाशित हुए हैं।

उबैद्दुलाह अलीम अहमदिया संप्रदाय से ताल्लुक रखते थे। पाकिस्तान में ये एक अल्पसंख्यक समुदाय है जिसकी आबादी करीब 40 लाख बताई जाती है। वहाँ इस संप्रदाय को गैर मुस्लिम करार दिया गया है और यहाँ तक कि उनके पवित्र स्थलों को मस्ज़िद कहने पर भी पाबंदी है। अगर आपको याद हो तो इसी साल मई में लाहौर के जिन धार्मिक स्थलों पर बम विस्फोट हुए थे (जिसमे करीब 80 लोग मारे गए थे) वो अहमदी संप्रदाय के पूजा स्थल ही थे। ख़ैर आप सोच रहे होंगे कि ग़ज़लों के जिक्र करते करते मैं इन बातों का उल्लेख आप से क्यूँ करने लगा? दरअसल उबैद्दुलाह की शायरी में अहमदियों के साथ हो रहे कत्ले आम का जिक्र बार बार मिलता रहा है। अलीम जी की इस ग़ज़ल के इन अशआरों पर गौर करें..

मैं किसके नाम लिखूँ जो आलम गुज़र रहे हैं
मेरे शहर जल रहे हैं, मेरे लोग मर रहे हैं


कोई और तो नहीं है पस-ए-खंजर-आजमाई

हमीं क़त्ल हो रहे हैं, हमीं क़त्ल कर रहे हैं


अलीम १९९८ में हृदय गति रुक जाने से इस दुनिया को छोड़ चले गए। पर उन्हें अपने लोगों पर हो रहे जुल्मों सितम का दर्द हमेशा सालता रहा। उनके दिल का दर्द उनकी इस मशहूर ग़ज़ल में साफ दिखाई देता है।

कुछ इश्क़ था कुछ मजबूरी थी सो मैंने जीवन वार दिया
मैं कैसा ज़िंदा आदमी था इक शख़्स ने मुझको मार दिया


मैं खुली हुई इक सच्चाई, मुझे जानने वाले जानते हैं

मैंने किन लोगों से नफरत की और किन लोगों को प्यार दिया

मैं रोता हूँ और आसमान से तारे टूटता देखता हूँ
उन लोगों पर जिन लोगों ने मेरे लोगों को आज़ार* दिया

*दुख

मेरे बच्चों को अल्लाह रखे इन ताज़ा हवा के झोकों ने

मैं खुश्क पेड़ खिज़ां का था, मुझे कैसा बर्ग-ओ-बार दिया


आशा है अपने लोगों के लिए जिस चैनो सुकूँ की कामना करते हुए वो इस ज़हाँ से रुखसत हुए वो उनके समुदाय को निकट भविष्य में जरूर नसीब होगा।

Saturday, August 14, 2010

एक धुन, दो गीत : I just called to say I love you, हाँ हाँ तुमसे, मैंने प्यार किया !

संगीत की कोई भाषा नहीं होती कोई सरहदें नहीं होती। अच्छा संगीत, अच्छी धुन चाहे कहीं की भी हो आपको अपने आगोश में ले लेती है। यही वज़ह है कि जहाँ जय हो... की जयकार को पूरा विश्व ध्यान दे कर सुनता है वहीं आप भी फुटबाल के खेल का मज़ा लेते हुए सकीरा के वाका वाका ..को गुनगुनाना नहीं भूलते। पर ये भी सत्य है कि जो संगीत हमारे आस पास के परिवेश में ढला होता है वो जल्द ही हमें आकर्षित करता है।

शायद यही वज़ह रही कि भारतीय संगीतकार अपनी धुनों के साथ साथ पाश्चात्य धुनों को भारतीयता के रंग में ढाल कर उसे भारतीय श्रोताओं के सामने प्रस्तुत करते रहे और वाह वाही और निंदा दोनों लूटते रहे। मुझे इस तरह विदेशी धुनों पर हिंदी गीत बनाने में कोई आपत्ति नहीं है बशर्ते धुन के वास्तविक रचनाकार के नाम को पूरे क्रेडिट के साथ फिल्म और उसके एलबम में दिखाया जाए। पर पता नहीं क्यूँ हमारे नामी संगीतकार भी ऐसा करने से कतराते रहे हैं। कई बार ये संगीतकार गीतकारों की मदद से गीत को उसके आरिजनल से भी बेहतर बना देते हैं। पर उनकी ये मेहनत उसके मूल रचनाकार से बिना अनुमति व बिना क्रेडिट के धुल जाती है। मुझे नीलेश मिश्रा का लिखा गैंगस्टर का गीत लमहा लमहा दूरी यू पिघलती है.. याद आता है जिसकी मूल धुन वारिस बेग की थी पर अभिजीत की गायिकी ने उसे और बेहतरीन बना दिया था।

पर आज जिस हिंदी फिल्म की गीत की बात आपसे कर रहा हूँ उसका मूल रूप मैंने पहले सुना था। उस वक़्त हम लोग स्कूल में थे और भारतीय क्रिकेट टीम इंग्लैंड के दौरे पर थी। क्रिकेट के मैदान में हो रही गतिविधियों को जानने के लिए अक्सर मैं बीबीसी की वर्ल्ड सर्विस का सहारा लिया करता था। ऐसे ही खेल से जुड़े कार्यक्रम को ट्यून करते वक़्त वहाँ के संगीत कार्यक्रम में ये गाना सुनने को मिल गया। गीत के शब्द अक्षरशः भले ना समझ आए हों पर गीत की भावनाएँ और गायिकी ने इस अंग्रेजी गीत का मुरीद बना दिया।

ये गीत था अस्सी के दशक में अमेरिका वा ब्रिटेन में धूम मचाने वाले गायक स्टीवी वंडर (Stevie Wonder) का। वैसे तो वंडर का वास्तविक नाम Stevland Hardaway Judkins था पर संगीत जगत से जुड़ने के बाद वो 'वंडर' हो गए। जन्म के बाद से ही आँखों की रोशनी छिन जाने के बाद भी स्टीवी वंडर ने अमेरिकी संगीत जगत में जो मुकाम हासिल किया वो उनकी जीवटता की अद्भुत मिसाल है। स्टीवी ने I just called to say I love you.. गीत अपने एलबम The Woman in Red के लिए 1984 में रिकार्ड किया और 1985 में इस गीत को श्रेष्ठ गीत का एकाडमी एवार्ड भी मिला।

गीत में स्टीवी ने बड़े प्यारे अंदाज़ में ये कहना चाहा था कि यूँ तो उनके ज़िंदगी में ऍसा कुछ भी नहीं हो रहा जो उन्हें प्रफ्फुलित कर सके। महिने दर महिने बिना किसी उल्लास के यूँ ही निकल जाते गर उन्होंने उन तीन शब्दों का मर्म नहीं समझा होता। और आज जब वो उन्हें समझ आ गया है तो मन में उमंगों की सीमा नहीं है। इसिलिए तो अपने दिल के कोरों से निकली भावनाओं को व्यक्त करने के लिए वे इतने आतुर हैं। तो लीजिए सुनिए इस रचना को मूल रूप में गीत के शब्दों के साथ।





No New Year's Day to celebrate
No chocolate covered candy hearts to give away
No first of spring
No song to sing
In fact here's just another ordinary day

No April rain
No flowers bloom
No wedding Saturday within the month of June
But what it is, is something true
Made up of these three words that I must say to you

I just called to say I love you
I just called to say how much I care
I just called to say I love you
And I mean it from the bottom of my heart

No summer's high
No warm July
No harvest moon to light one tender August night
No autumn breeze
No falling leaves
Not even time for birds to fly to southern skies

No Libra sun
No Halloween
No giving thanks to all the Christmas joy you bring
But what it is, though old so new
To fill your heart like no three words could ever do

I just called to say I love you.. bottom of my heart

मैंने तो ये गीत बीबीसी के माध्यम से सुन लिया था पर अस्सी के दशक के आखिर में इस धुन को भारतीय जनमानस तक पहुँचाने का काम किया था संगीतकार राम लक्ष्मण ने, राजश्री प्रोडक्शन्स की फिल्म 'मैंने प्यार किया' में। यूँ तो राजश्री प्रोडक्शन की हर फिल्म उस ज़माने में अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि वाली पटकथाओं और कर्णप्रिय संगीत के लिए जानी जाती थी पर सूरज बड़जात्या शायद नए नवेले नायक सलमान खाँ (तब के सलमान अपेक्षाकृत दुबले पतले, धोनी कट लंबे बालों वाले थे) और नवोदित नायिका भाग्यश्री को लेकर बनाई गई इस फिल्म को सफल होने देने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते थे। शायद इसीलिए उन्होंने राम लक्ष्मण से स्टीवी वंडर की इस धुन पर एक गीत बनवा लिया।

राम लक्ष्मण का संगीत तो फिल्म के आने से पहले ही दिल दीवाना बिन सजना के... ,आजा शाम होने आई, आया मौसम दोस्ती का.. और फिर कबूतरी गीत की वज़ह से गीतमालाओं के शीर्ष पर उड़ान भरता रहा। और इसी लोकप्रियता की वज़ह से संगीतकार राम लक्ष्मण को साल का फिल्म फेयर एवार्ड भी मिला।

पर पूरी फिल्म में मुझे स्टीवी वंडर की धुन पर बनाया ये गीत ही सबसे प्रिय लगा। मूलतः अंग्रेजी में लिखे इस गीत पर जब देव कोहली के शब्दों का कलेवर चढ़ा और गीत को मिली लता और एस पी बालासुब्रमण्यम जैसे मँजे गायकों की आवाज़ तो जैसे सोने पर सुहागा हो गया। मुझे याद है कि जब फिल्म आई थी तो ये गीत उतना नहीं बजा था जिसका ये हक़दार था। इसका एक कारण ये था कि गीत का इस्तेमाल फिल्म की शुरुआत में कास्टिंग दिखाते वक़्त किया गया था। पर अब जब इसे बारहा इसे रेडिओ पर बजते सुनता हूँ तो लगता है कि ये गीत दो दशकों बाद फिल्म का सबसे ज्यादा सुना जाने वाला गीत बन गया है।

गीत को भारतीय मिज़ाज में ढालने में देव कोहली साहब ने कमाल का काम किया था। आज तो तब भी प्रेम का भारतीय स्वरूप बहुत कुछ बदला है पर ये तो हम सब जानते हैं कि बीस साल पहले प्रेम को आमने सामने अभिव्यक्त करने में ही आशिकों के पसीने छूटने लगते थे। गुमनाम पत्र और टेलीफोन कर थोड़ी बहुत हिम्मत कुछ लोग दिखा दिया करते पर अधिकांश लुटे दिलवालों के पास दूर दूर से निहारने या नज़रों की लुकाछिपी के अतिरिक्त अपने 'उनके' दिल की भावनाओं को सोचने समझने का कोई चारा ना था। अब इस परिपेक्ष्य में देव साहब के शब्दों पे गौर करें कि उन्होंने गीत की मूल भावना से बिना छेड़छाड किए वो बात कह दी जो उस समय या कुछ हद तक आज के भारतीय प्रेमी की भावनाओं की अभिव्यक्ति करती है।

आते जाते, हँसते गाते
सोचा था मैं ने मन में कई बार
वो पहली नज़र, हलका सा असर
करता है क्यों दिल को बेक़रार
रुक के चलना, चल के रुकना
ना जाने तुम्हें है किस का इंतज़ार

तेरा वो यकीं, कहीं मैं तो नहीं
लगता है यही क्यों मुझको बार बार
यही सच है, शायद मैं ने प्यार किया

आते जाते, हँसते गाते
सोचा था मैं ने मन में कई बार
होंठों की कली कुछ और खिली
ये दिल पे हुआ है किसका इख़्तियार
तुम कौन हो, बतला तो दो
क्यों करने लगी मैं तुमपे ऐतबार

खामोश रहूँ या मैं कह दूँ
या कर लूँ मैं चुपके से ये स्वीकार
यही सच है, शायद मैं ने प्यार किया

हाँ हाँ, तुमसे, मैं ने प्यार किया

तो आइए सुनें ये गीत...


Monday, August 09, 2010

जगजीत सिंह की ग़ज़ल गायिकी का सफ़र भाग 7 : उनकी दस बेशकीमती नज़्मों के साथ !

जगजीत सिंह पर आधारित इस श्रृंखला में बात हो रही थी उनकी गाई दस सबसे बेहतरीन नज़्मों की। पिछली पोस्ट में मैंने इनमें से पाँच नज़्मों के बारे में आपसे बात की। आज बारी है बाकी की नज़्मों की। पिछली बार की नज़्मों में जहाँ एक आशिक का दर्द रह रह कर बाहर आ रहा था वहीं आज की नज़्मों में इसके आलावा आपको एक फिलासफिकल सोच भी मिलेगी। इन नज़्मों ने मुझे और निसंदेह आपको भी बारहा अपनी अब तक की गुजारी हुई जिंदगी के बारे में सोचने पर मज़बूर किया होगा। तो आज की इस कड़ी की शुरुआत करते हैं निदा फ़ाज़ली की लिखी इस नज़्म से


आपको याद होगा अस्सी की शुरुआत में एक कंपनी कलर टीवी के उत्पाद को ला कर बाजार में तेजी से उभरी थी। ये कंपनी थी 'वेस्टन'। इसी कंपनी ने 1994 में जगजीत का एक एलबम निकाला था जिसका नाम था 'Insight'। इस एलबम की खासियत थी कि इसमें सिर्फ निदा साहब की कृतियों को शामिल किया गया था। दोहों व ग़ज़लो से सजे इस एलबम में निदा जी की दो एक नज़्में भी थीं। उन्ही नज़्मों में से एक में जिंदगी के निचोड़ को चंद शब्दों मे जिस सलीके से निदा ज़ी ने बाँधा था कि एक बार सुनकर ही मन विचलित सा हो गया था।

जगजीत का संगीत संयोजन भी अच्छा था। नज़्म की शुरुआत गिटार (वादक : अरशद अहमद) और साथ में वॉयलिन (वादक : दीपक पंडित) की सम्मिलित धुन से होती है। जैसे जैसे ये नज़्म आगे बढ़ती है जगजीत नज़्म की भावनाओं के साथ नज़्म का टेंपो बदलते हैं और जब जगजीत नज़्म के आखिर में नहीं दुबारा ये खेल होगा... तीन बार दोहराते हैं तो शायर की बात आपके मस्तिष्क से होती हुई दिल में अच्छी तरह से समा चुकी होती है। तो गौर कीजिए निदा फ़ाज़ली के शब्दों और जगजीत जी की गायिकी की सम्मिलित जादूगरी पर...



ये ज़िन्दगी..

ये ज़िन्दगी..
तुम्हारी आवाज़ में ग़ले से निकल रही है
तुम्हारे लफ़्ज़ों में ढल रही है

ये ज़िन्दगी.. ये ज़िन्दगी ..

ये ज़िन्दगी
जाने कितनी सदियों से
यूँ ही शक्लें, बदल रही है
ये ज़िन्दगी.. ये ज़िन्दगी ..


बदलती शक्लों, बदलते जिस्मों
चलता-फिरता ये इक शरारा

जो इस घड़ी नाम है तुम्हारा
इसी से सारी चहल-पहल है
इसी से रोशन है हर नज़ारा
सितारे तोड़ो या घर बसाओ
क़लम उठाओ या सर झुकाओ
तुम्हारी आँखों की रोशनी तक
है खेल सारा
ये खेल होगा नहीं दुबारा
ये खेल होगा नहीं दुबारा
ये खेल होगा नहीं दुबारा


जहाँ निदा फाज़ली ने जीवन को अपनी दार्शनिकता भरी नज़्म में बाँधा वही मज़ाज लखनवी ने अपनी जिंदगी की हताशा और निराशा को अपनी मशहूर नज़्म 'आवारा' में ज्यों का त्यों चित्रित किया है और फिर जगजीत ने मजाज़ के उसी दर्द को बखूबी कहकशाँ में गाई अपनी इस नज़्म में क़ैद किया है। इस नज़्म की ताकत का अंदाज़ा इसि बात से लगता है कि मन इसे सुनकर ही नहीं पर इसे पढ़ने से ही गमगीन हो जाता है...

शहर की रात और मैं नाशाद-ओ-नाकारा फिरूँ
जगमगाती जागती सड़कों पे आवारा फिरूँ

गैर की बस्ती है कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँ ?

ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ ?


रास्ते में रुक के दम ले लूँ, मेरी आदत नहीं

लौट कर वापस चला जाऊँ, मेरी फितरत नहीं

और कोई हमनवाँ मिल जाये, ये किस्मत नहीं

ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ ? ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ ?



वैसे जगजीत ने मज़ाज साहब की इस नज़्म के कुछ ही हिस्से गाए हैं पर पूरी नज़्म और इसके पीछे मज़ाज़ की जिंदगी की कहानी आप यहाँ और यहाँ पढ़ सकते हैं।


मेरे इस संकलन की तीसरी नज़्म है एलबम 'फेस टू फेस (Face to Face)' की जिसकी कैसेट मैंने 1993 में खरीदी थी। इस एलबम में एक नज़्म थी सबीर दत्त साहब की। यह वही दत्त साहब हैं जिनकी रचना 'इक बरहामन ने कहा है कि ये साल अच्छा है........' उन दिनों बेहद मशहूर हुई थी। हाल ही में मुझे इस चिट्ठे की एक पाठिका ने मेल कर ये सवाल पूछा कि ये नज़्म क्या एक ईसाई गीत है?
सच कहूँ तो इस प्रश्न को पढ़ने के पहले तक ये ख्याल कभी मेरे ज़ेहन में नहीं उभरा था कि इस नज़्म को ऐसा कहा जा सकता है।

इसमें कोई शक़ नहीं हरियाणा के नामी शायर सबीर दत्त साहब ने इस नज़्म में भगवन जीसस की ज़िंदगी की घटनाओं को लिया है पर वो यहाँ सिर्फ एक प्रतीक, एक बिंब के रूप में इस्तेमाल हुआ है। दरअसल सबीर जी की ये नज़्म आज के दौर के इस बेईमान और भ्रष्ट समाज का आईना है। भगवन जीसस के रूपक का इस्तेमाल करते हुए वे ये बताना चाहते हैं कि जीवन में सत्य और ईमानदारी की राह पर चलने वालों को हर तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। नज़्म के अंत में हमारे समाज पर बतौर कटाक्ष करते हुए सबीर लोगों को सच ना बोलने की सलाह दे डालते हैं। जगजीत जी की इस नज़्म का संगीत संयोजन भी अपनी तरह का है। इस नज़्म में समूह स्वर का इस्तेमाल भी बेहद प्रभावी ढंग से किया गया है।


सच्ची बात कही थी मैंने
लोगों ने सूली पे चढाया

मुझ को ज़हर का जाम पिलाया

फिर भी उन को चैन न आया

सच्ची बात कही थी मैंने


ले के जहाँ भी, वक्त गया है

ज़ुल्म मिला है, ज़ुल्म सहा है

सच का ये इनाम मिला है

सच्ची बात कही थी मैंने


सब से बेहतर कभी न बनना

जग के रहबर कभी न बनना

पीर पयाम्बर कभी न बनना


चुप रह कर ही वक्त गुजारो

सच कहने पे जान मत वारो

कुछ तो सीखो मुझ से यारो

सच्ची बात कही थी मैंने...


और अगर इन सब नज़्मों को सुनने के बाद आपका मन कुछ भारी हो गया हो तो क्यूँ ना बचपन की यादों को ताज़ा कर आपके मूड को बदला जाए। सुदर्शन फ़ाक़िर साहब ने क्या उम्दा नज़्म लिखी थी हम सबके मासूम बचपन को केंद्र में रखकर। जब भी इस नज़्म को सुनता हूँ उनकी लेखनी को सलाम करने को जी चाहता है।

जगजीत साहब जब भी कान्सर्ट्स में चिर परिचित धुन के साथ इस नज़्म का आगाज़ करते थे पूरा माहौल तालियों से गूँज उठता था। वैसे तो बाद के एलबमों में इस नज़्म का संगीत थोड़ा बदल गया व चित्रा जी की आवाज़ की जगह सिर्फ जगजीत का सोलो ही सुनने को मिलता रहा पर आज यहाँ मैं उसी पुराने वर्सन को आपके सामने प्रस्तुत करना चाहूँगा


ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो,
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी
मग़र मुझको लौटा दो बचपन का सावन,
वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी

मोहल्ले की सबसे निशानी पुरानी,
वो बुढ़िया जिसे बच्चे कहते थे नानी,
वो नानी की बातों में परियों का डेरा,
वो चेहरे की झुर्रियों में सदियों का फेरा,
भुलाए नहीं भूल सकता है कोई,
वो छोटी-सी रातें वो लम्बी कहानी

कड़ी धूप में अपने घर से निकलना
वो चिड़िया, वो बुलबुल, वो तितली पकड़ना,
वो गुड़िया की शादी पे लड़ना-झगड़ना,
वो झूलों से गिरना, वो गिर के सँभलना,
वो पीतल के छल्लों के प्यारे-से तोहफ़े,
वो टूटी हुई चूड़ियों की निशानी।

कभी रेत के ऊँचे टीलों पे जाना
घरौंदे बनाना,बना के मिटाना,
वो मासूम चाहत की तस्वीर अपनी
वो ख़्वाबों खिलौनों की जागीर अपनी,
न दुनिया का ग़म था, न रिश्तों का बंधन,
बड़ी खूबसूरत थी वो ज़िन्दगानी


सच सुदर्शन जी उस ज़िंदगी का भी अपना ही एक मजा था..


दस नज़्मों के इस संकलन का समापन मैं जावेद अख्तर की लिखी इस नज़्म से करना चाहूँगा जिसे जगजीत जी ने अपने एलबम सिलसिले का हिस्सा बनाया था। ये एलबम 1998 में आई थी पर जावेद साहब ने इस नज़्म में उन अहसासात को अपने शब्द दे दिए हैं जिनसे यक़ीनन हम सभी कभी ना कभी जरूर गुजर चुके हैं या गुजरेंगे। इस माएने में ये नज़्म समय की सीमाओं से परे है और इसी वज़ह से आज की इन पाँच नज़्मों में सबसे ज्यादा प्रिय है। जगजीत साहब ने अपने रुहानी स्वर से इसे हमेशा हमेशा के लिए अज़र अमर कर दिया है।

मैं भूल जाऊँ तुम्हें मैं भूल जाऊँ तुम्हें अब यही मुनासिब है
मगर भूलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूँ
कि तुम तो फिर भी हक़ीक़त हो कोई ख़्वाब नहीं


यहाँ तो दिल का ये आलम है क्या कहूँ

कमबख़्त

भुला सका न ये वो सिलसिला जो था ही नहीं

वो इक ख़याल
जो आवाज़ तक गया ही नहीं
वो एक बात
जो मैं कह नहीं सका तुम से
वो एक रब्त

जो हम में कभी रहा ही नहीं

मुझे है याद वो सब
जो कभी हुआ ही नहीं
अगर ये हाल है दिल का तो कोई समझाए

तुम्हें भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूँ

कि तुम तो फिर भी हक़ीक़त हो कोई ख़्वाब नहीं...




तो जनाब जगजीत की गाई मेरी दस पसंदीदा नज़्में तो ये थीं
  • बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी..
  • बहुत दिनों की बात है...
  • तेरे खुशबू मे बसे ख़त मैं जलाता कैसे..
  • कोई ये कैसे बताए, कि वो तनहा क्यों है..
  • अब मेरे पास तुम आई हो तो क्या आई हो?
  • ये ज़िन्दगी जाने कितनी सदियों से यूँ ही शक्लें, बदल रही है...
  • सच्ची बात कही थी मैंने..
  • ये दौलत भी ले लो ये शोहरत भी ले लो
  • ऐ गमे दिल क्या करूँ ऐ वहशते दिल क्या करूँ...
  • तुझे भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूँ
जानना चाहूँगा कि इनमें से या इनके इतर जगजीत की गाई किस नज़्म को आपने अपने दिल में बसाया है?

Thursday, August 05, 2010

जगजीत सिंह की ग़ज़ल गायिकी का सफ़र भाग 6 : आज है मेरी पसंदीदा नज़्मों की बारी ...

जगजीत सिंह पर अपनी श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए आइए बात करें उनकी नज़्मों की। पर इसका मतलब ये नहीं कि उनकी गाई ग़ज़लों की बात खत्म हो गई। दरअसल उनकी गाई हुई पसंदीदा ग़ज़लों की फेरहिस्त इतनी लंबी है कि कभी कभी समझ नहीं आता कि इस अथाह सागर में से क्या चुनूँ और क्या छोड़ूँ। पर ग़ज़लों की अपेक्षा उनकी गाई नज़्में कम हैं और उनमें से अधिकांश बस कमाल हैं। इसीलिए जगजीत साहब के संग्रह से अपनी दस पसंदीदा नज़्मों को चुनने में मुझे कोई तकलीफ़ नहीं हुई। तो आज की पोस्ट में बात करते हैं इनमें से पाँच नज़्मों की..

पिछली बार जब आपसे जगजीत जी के एलबम 'दि अनफॉरगेटेबल्स' (The Unforgettable) की बात हो रही थी तो मैंने आपसे उस एलबम की एक बेहतरीन नज़्म की चर्चा अगली पोस्ट तक के लिए मुल्तवी कर दी थी। आज की बात उसी नज़्म से शुरु करते हैं।

अगर आपको इस बात का उदाहरण देना हो कि सिर्फ एक नज़्म के चलते किसी शायर का नाम वर्षों लिया जाता रहे तो इस नज़्म की मिसाल दी जा सकती है। यूँ तो कफ़ील आज़र बहुत सालों तक फिल्मों के लिए भी लिखते रहे, कई बेहतरीन ग़ज़लें भी कहीं पर बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी...... ने उनकी कही बात को पिछले तीन दशकों से लाखों ग़ज़ल प्रेमियों ने अपने दिल से निकलती आवाज़ माना है। दुख इसी बात का है दिल्ली में सुपुर्द-ए-खाक़ किए गए इस शायर को वो शोहरत उनकी ज़िंदगी में ना मिल सकी जो इसे गाकर हम तक पहुँचाने वाले जगजीत जी को मिली। पिछले हफ्ते जब 'यूनिवर्सल' द्वारा निकाले गए रफ़ी साहब के गाए कुछ अंतिम गीतों की चर्चा हो रही थी तो ये भी बात अनायास ही पता चली कि संगीतकार चित्रगुप्त ने ये सारे गीत कफ़ील आज़र से लिखवाए थे। बहरहाल क़फील की कुछ ग़ज़लें भी लाजवाब सा कर देती हैं। अब उनके लिखे इन चंद अशआरों की बानगी लें..

देख लो ख्व़ाब मगर ख्व़ाब का चर्चा न करो
लोग जल जायेंगे सूरज की तमन्ना न करो

वक़्त का क्या है किसी पर भी बदल सकता है
हो सके तुम से तो तुम मुझ पे भरोसा न करो

किर्चियां टूटे हुए अक़्स की चुभ जाएँगी
और कुछ रोज़ अभी आईना देखा न करो

बेख्याली में कभी उँगलियाँ जल जायेंगी
राख गुज़रे हुए लम्हों की कुरेदा न करो

जगजीत अपनी महफिलों में इस नज़्म की कहानी सुनाते हुए कहते हैं कि उन्होंने इसे पहली बार शमा पत्रिका में पढ़ा था और तभी उतार लिया था। आपको जान कर अचरज होगा कि आज हम और आप जिस नज़्म को जगजीत जी की सबसे बेहतरीन गाई हुई नज़्मों में गिनते हैं उसे जगजीत जी ने बतौर संगीत निर्देशक भूपेंद्र से गवाया था। वो एलबम नहीं आया , फिर एक फिल्म बनी उसमें भी ये नज़्म रिकार्ड हुई पर वो फिल्म बीच में ही रुक गई। पर जगजीत को इस नज़्म में बहती भावनाओं की गहराई का अंदाज़ था इसलिए जैसे ही एच. एम. वी वालों ने एक नए एलबम को निकालने के लिए उनको स्वीकृति दी जगजीत ने इसे सबसे पहले रिकार्ड किया।

क्या बताएँ कि कितनी मोहब्बत थी मुझे इस नज़्म से हाईस्कूल के ज़माने से। इसे सुनते , गुनगुनाते और ना जाने मन कैसा कैसा हो जाता। शायर के मन में चाहे जिसका भी दर्द रहा हो वो, इस नज़्म के लफ़्ज़ों को सुनकर पहले तो मन में सहानुभुति का भाव उमड़ता घुमड़ता और फिर वो कब ना जाने अपने दर्द में एकाकार हो जाता इसका पता ही नहीं लगता था। जगजीत जी की बेमिसाल गायिकी के दीवाने भी शायद हम सब तभी हुए थे।


बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी
लोग बेवजह उदासी का सबब पूछेंगे
ये भी पूछेंगे कि तुम इतनी परेशां क्यूँ हो
उँगलियाँ उठेंगी सूखे हुए बालों की तरफ
इक नज़र देखेंगे गुजरे हुए सालों की तरफ
चूड़ियों पर भी कई तन्ज़ किये जाएँगे
काँपते हाथों पे भी फ़िक़रे कसे जाएँगे
लोग ज़ालिम हैं हर इक बात का ताना देंगे
बातों बातों मे मेरा ज़िक्र भी ले आएँगे
उनकी बातों का ज़रा सा भी असर मत लेना
वर्ना चेहरे के तासुर से समझ जाएँगे
चाहे कुछ भी हो सवालात न करना उनसे
मेरे बारे में कोई बात न करना उनसे

बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी

कफ़ील साहब की नज़्म का जो मूड था जो कैफ़ियत थी उससे मिलते जुलते अहसासों से ही जुड़ी एक नज़्म उत्तर प्रदेश के मछलीशहर से ताल्लुक रखने वाले शायर सलाम मछलीशेहरी की भी थी जिसे जगजीत साहब ने अपने एलबम Ecstasies (1984) का हिस्सा बनाया था। ये नज़्म क्या थी सादे ज़बान में पहले मिले प्यार और फिर दुत्कार की कहानी थी। पर जगजीत की अदाएगी का अंदाज़ ऐसा था कि नज़्म के अंत की इन पंक्तियों तक आते आते आवाज़ रुंधने सी लगती थी।

वही हसीन शाम है
बहार जिसका नाम है
चला हूँ घर को छोड़कर
न जाने जाऊँगा किधर
कोई नहीं जो रोककर
कोई नहीं जो टोककर
कहे के लौट आइये
मेरी कसम न जाइये...
पूरी नज़्म को आप यहाँ पढ़ और सुन सकते हैं।

पर Ecstasies के बाज़ार में आने के पहले अनका एक और एलबम Milestone आया जिसकी एक नज़्म 1982 में आई फिल्म 'अर्थ' का हिस्सा बनी थी। भला राजेंद्रनाथ रहबर की लिखी वो नज़्म कोई भूल सकता है। वैसे तो रहबर साहब की ग़ज़लों को आज भी जगजीत सिंह अपने एलबमों में शामिल करते हैं पर रहबर साहब को जो शोहरत बतौर शायर के रुप में मिली है उसमें इस नज़्म का खासा हाथ रहा है। आज भले ही हाथ से लिखी चिट्ठियाँ इतिहास का हिस्सा बनती जा रही हों पर हाथ से लिखे शब्द सिर्फ उनके अर्थ तक सिमट नहीं जाते थे बल्कि उसे लिखने वाले शख्स की उस वक़्त की मनःस्थिति का आईना होते थे। आज के इस ई मेल के युग में अगर आपको मेरी बात नागवार गुजरे तो बस जगजीत की आवाज़ में इस नज़्म को सुन के देख लीजिए। थी


जिनको दुनिया की निगाहों से छुपाए रखा,
जिनको इक उम्र कलेजे से लगाए रखा,
दीन जिनको जिन्हें ईमान बनाए रखा

जिनका हर लफ्ज़ मुझे याद था पानी की तरह,
याद थे मुझको जो पैगाम-ऐ-जुबानी की तरह,
मुझ को प्यारे थे जो अनमोल निशानी की तरह,

तूने दुनिया की निगाहों से जो बचकर लिखे,
सालाहा-साल मेरे नाम बराबर लिखे,
कभी दिन में तो कभी रात को उठकर लिखे,

तेरे खुशबू मे बसे ख़त मैं जलाता कैसे,
प्यार मे डूबे हुए ख़त मैं जलाता कैसे,
तेरे हाथों के लिखे ख़त मैं जलाता कैसे,

तेरे ख़त आज मैं गंगा में बहा आया हूँ,
आग बहते हुए पानी में लगा आया हूँ

और जब फिल्म अर्थ का जिक्र हुआ हो तो फिर कैफ़ी आज़मी की ये नज़्म जो तनहाई की कितनी शामों की साथी रही, कैसे भुलाई जा सकती है।


कोई ये कैसे बताए, कि वो तनहा क्यों है

वो जो अपना था, वही और किसीका क्यों है
यही दुनिया है तो फ़िर, ऐसी ये दुनिया क्यों है
यही होता है तो, आखिर यही होता क्यों है

इक जरा हाथ बढा दे तो, पकड ले दामन
उसके सीने मे समा जाए, हमारी धडकन
इतनी कुरबत है तो फ़िर, फ़ासला इतना क्यों है?

दिल-ए-बरबाद से निकला नही अबतक कोई
इक लुटे घर पे दिया करता है दस्तक कोई
आस जो टूट गयी हैं, फ़िर से बँधाता क्यों है?

तुम मसर्रत का कहो या इसे गम का रिश्ता
कहते है प्यार का रिश्ता है जनम का रिश्ता
है जनम का जो ये रिश्ता तो बदलता क्यों है?

आपको याद होगा कि नब्बे के दशक के प्रारंभ में टीवी सीरियल कहकशाँ में मज़ाज लखनवी की लिखी नज़्म थी अब मेरे पास तुम आई हो तो क्या आई हो? उर्दू फ़ारसी के तमाम जटिल शब्दों से भरी ये ग़ज़ल अपने आप में एक अलग आलेख माँगती है। पर यहाँ मैं सिर्फ इतना कहना चाहूँगा कि बिना लफ़्ज़ों के सही मायने समझे हुए भी जब जगजीत की आवाज़ में ये पंक्तियाँ कानों में गूँजती थीं....


वो गुदाज़-ए-दिल-ए-मरहूम कहां से लाऊँ
अब मै वो जज़्बा-ए-मासूम कहां से लाऊँ
अब मेरे पास तुम आई हो तो क्या आई हो?

.....तो दिल ज़ार ज़ार हो जाया करता था।

आपने इक बात गौर की होगी कि इस आलेख में मेंने जो पाँच नज़्में चुनी वो सब प्रेम में टूटे हुए दिल की व्यथा को चित्रित करती हैं। हमारी पीढ़ी पर इनका जादू अगर सर चढ़कर बोला तो उसकी एक वज़ह ये थी कि हमने इसे किशोरावस्था से युवावस्था की सीढ़ियों को चढ़ते हुए सुना। कम से कम मेरे लिए और मेरे जैसे बहुतों के लिए ये वो दिन थे जब एकाकीपन के लमहे हमें काटने को दौड़ते थे। आज भी ये नज़्में उन दिनों की स्मृतियाँ वापस ले आती हैं। आपका क्या ख्याल है इनके बारे में ..जरूर बताइएगा।

अगली बार बाकी की पाँच नज़्मों के साथ पुनः हाज़िर होता हूँ..

Wednesday, August 04, 2010

यादें किशोर दा की : पेश है उनके जन्मदिन पर किशोर दा लेखमाला के संकलित और संपादित अंश

आज किशोर दा का जन्म दिन है। 2007अगस्त में मैंने खंडवा की इस महान विभूति के जीवन के कई पहलुओं से जुड़ी बातों पर नौ भागों में एक लंबी सिरीज की थी जिसे आप सब ने काफी सराहा था। उनके जन्म दिन के अवसर पर आज पेश है उन्हीं नौ कड़ियो के संकलित और संपादित अंश
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किसने जाना था कि एक छोटे से शहर 'खंडवा' मे पैदाइश लेने वाला 'आभास कुमार गाँगुली' नाम का बालक भारतीय संगीत के इतिहास में अपनी अमिट छाप छोड़ जाएगा। १९४८ में खेमचंद्र प्रकाश की संगीत निर्देशित फिल्म जिद्दी में अपना पहला गीत 'मरने की दुआएँ क्यूँ मागूँ' से लेकर अक्टूबर १९८७ में 'वक़्त की आवाज़' में आशा जी के साथ गाए गीत 'गुरु ओ गुरु..' तक अपने चालीस साल के संगीत सफ़र में किशोर दा ने संगीत प्रेमी करोड़ों भारतीयों का दिल जीता और आज भी जीत रहे हैं। किशोर कुमार को जब उनके बड़े भाई अशोक कुमार एक अभिनेता बनाने के लिए मुंबई लाए तो किशोर दा, मन ही मन कोई ख़ास उत्साहित नहीं थे। उनका तो सपना अपने उस वक़्त के प्रेरणास्रोत के एल सहगल से मिलने का था जो दुर्भाग्यवश पूरा नहीं हो पाया क्योंकि इनके मुंबई आगमन के कुछ ही दिन पश्चात सहगल चल बसे।

अपने शुरुआती दिनों में के एल सहगल के अंदाज का अनुकरण करने वाले किशोर दा की गायिकी में एक ख़ूबसूरत मोड़ तब आया जब उनकी मुलाकात एस डी बर्मन साहब से हुई। ये भी एक संयोग ही था कि बर्मन सीनियर, अशोक कुमार जी के घर पहुँचे और किशोर को बाथरूम में गुनगुनाते सुन कर ठिठक गए और उनसे मिल कर जाने का ही निश्चय किया। उन्होंने ही किशोर को गायन की अपनी शैली विकसित करने के लिए प्रेरित किया। किशोर दा की जिस आवाज़ के हम सब क़ायल हैं, वो पचास के उत्तरार्ध में एस डी बर्मन के सानिध्य का ही परिणाम रहा है।

अग़र बाकी गायकों की अपेक्षा किशोर दा के योगदान पर विचार करूँ तो यही पाता हूँ कि जहाँ रफी ने गायिकी में अपनी विविधता से सबका मन जीता, वहीं किशोर दा ने हिंदी फिल्म संगीत की गायिकी को आम जनता के होठों तक पहुँचाया। उनकी गायिकी का तरीका ऍसा था कि जिसे गुनगुनाना एक आम संगीत प्रेमी के लिए अपेक्षाकृत अधिक सहज है। दरअसल किशोर, मुकेश और हेमंत दा सरीखे गायकों ने अपनी आवाज़ के बलबूते पर ही संगीतप्रेमी जनमानस को अपना दीवाना बना लिया। मोहम्मद रफी और मन्ना डे जैसे गायक दिलकश आवाज़ के मालिक तो थे ही, पर साथ-साथ वे शास्त्रीय संगीत में महारत हासिल करने के बाद हिंदी फिल्मों में पार्श्व संगीत देने आए थे। किशोर दा के पास ऍसी काबिलियत नहीं थी फिर भी इसकी कमी उन्होंने महसूस नहीं होने दी और अपने मधुर गीतों को हमें गुनगुनाने पर मज़बूर करते रहे।

पचास का दशक किशोर के लिए बतौर गायक काफी मुश्किल वाला समय रहा। इस दौरान उन्होंने कई फिल्में की जिनमें 'नौकरी', 'मिस माला', 'बाप रे बाप', 'आशा', 'दिल्ली का ठग' और 'चलती का नाम गाड़ी' चर्चित रहीं। नौकरी फिल्म में एक गीत था 'छोटा सा घर होगा...' जिसे संगीतकार सलिल चौधरी, हेमंत दा से गवाना चाहते थे। किशोर दा ने जब इसे खुद गाने की पेशकश की तो सलिल दा का सीधा सा जवाब था ...

"जब मैंने तुम्हें कभी सुना ही नहीं तो ये गीत तुमसे कैसे गवा लूँ। "

बड़े मान-मुनौवल के बाद सलिल दा राजी हुए। ये वाक़या इस बात को स्पष्ट करता है कि वो समय ऍसा था जब ज्यादातर संगीत निर्देशक किशोर की आवाज़ को गंभीरता से नहीं लेते थे।

बतौर नायक किशोर कुमार का ये समय ज्यादा बेहतर रहा। १९५६ में जे के नंदा की फिल्म 'ढ़ाके का मलमल' में पहली बार वो और मधुबाला साथ साथ देखे गए। शायद इसी वक़्त उनके प्रेम की शुरुआत हुई। १९५८ में फिल्म 'चलती का नाम गाड़ी' इस जोड़ी की सबसे सफल फिल्म रही। इस जोड़ी पर फिल्माए गीत 'इक लड़की भीगी भागी सी...' और 'पाँच रुपैया बारह आना....' इसी फिल्म से थे। १९६१ में अपनी पहली पत्नी रूमा गुहा के रहते हुए किशोर ने मधुबाला से शादी की और इसके लिए मुस्लिम धर्म को अपनाते हुए अपना नाम अब्दुल करीम रख लिया। ज़ाहिर है ये सारी क़वायद दूसरी शादी करने में कानूनी पचड़ों से बचने के लिए की गई थी।


वापस बढ़ते हैं किशोर दा के संगीत के सफ़र पर। संगीतकार एस. डी. बर्मन पहले ऐसे संगीतकार थे जिन्होंने ये समझा कि किस तरह के गानों के लिए किशोर की आवाज सबसे ज्यादा उपयुक्त है। उन्हीं की वज़ह से साठ के दशक में किशोर, देव आनंद की आवाज़ बने। बरमन सीनियर द्वारा संगीत निर्देशित 'गाइड' और 'जेवल थीफ' में उनके गाए गीतों ने उनके यश को फैलने में मदद की।

पर किशोर की गायिकी के लिए मील का पत्थर साबित हुई १९६९ में बनी फिल्म 'अराधना'

एस डी बर्मन साहब इस फिल्म के गीत रफी साहब से गवाने का मन बना चुके थे। पर धुनें बना चुकने के बाद वो बीमार पड़ गए और इसके संगीत को पूरा करने की जिम्मेवारी पंचम दा पर आन पड़ी। उन्होने इन धुनों को गाने के लिए किशोर दा को चुना और उसके बाद जो रच कर बाहर निकला वो इतिहास बन गया। इस फिल्म के गीत 'रूप तेरा मस्ताना...' के लिए किशोर दा को पहली बार फिल्मफेयर एवार्ड से नवाज़ा गया।

सत्तर के दशक की शुरुआत किशोर दा के लिए जबरदस्त रही। एस. डी. बर्मन के संगीत निर्देशन में 'शर्मीली' और 'प्रेम पुजारी' के गीत चर्चित हुए। वहीं 'अराधना', 'कटी पतंग' और 'अमर प्रेम' की अपार सफलता के बाद किशोर दा पर्दे पर राजेश खन्ना की स्थायी आवाज़ बन गए।

सत्तर का दशक किशोर कुमार की गायिकी के लिए स्वर्णिम काल था। इस दशक में गाए हुए गीतों में से कुछ को छांटना बेहद दुष्कर कार्य है। कटी पतंग (1970), अमर प्रेम (1971),बुढ्ढा मिल गया(1971), मेरे जीवन साथी (1972), परिचय (1972), अभिमान(1973), कोरा कागज़(1974), मिली(1975), आँधी(1975), खुशबू(1975) में गाए किशोर के गीत मुझे खास तौर से प्रिय हैं।

पहले देव आनंद और फिर राजेश खन्ना को अपनी आवाज़ देने के बाद इस दशक में वो अमिताभ को भी अपनी आवाज़ देते नज़र आए। किशोर हर अभिनेता की आवाज़ के हिसाब से अपनी वॉयस माडुलेट करते थे। इस दौर में किशोर ने बड़े संगीतकारों में बर्मन सीनियर, पंचम, कल्याण जी-आनंद जी और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के साथ काम करते हुए फिल्म जगत को कई अनमोल गीत दिए।

चाहे वो 'बुढ्ढा मिल गया 'का रूमानी गीत 'रात कली इक ख़्वाब में...' हो या यूडलिंग में उनकी महारत दिखाता 'मेरे जीवन साथी ' का 'चला जाता हूँ किसी की धुन में...' या फिर दर्द में डूबा 'मिली' में गाया हुआ 'बड़ी सूनी सूनी है..... ' या 'आए तुम याद मुझे, गाने लगी हर धड़कन....' सब के सब किशोर दा की गायन प्रतिभा में विद्यमान हर रंग की उपस्थिति को दर्ज कराते हैं।

किशोर दा के सबसे सुरीले गीत एस. डी. बर्मन और पंचम दा के साथ हैं। पंचम को जब भी अपनी किसी फिल्म के लिए किशोर दा से गाना गवाना पड़ता था तो उसके दो दिन पहले उस गीत की धुन का टेप वो उनके यहाँ भिजवा देते थे। वे कहते थे कि इससे किशोर को गीत को महसूस करते हुए जज़्ब करने में सहूलियत होती थी और वास्तविक रिकार्डिंग का परिणाम बेहतरीन आता था।


फिल्म उद्योग में ये बात आम है कि किशोर का व्यवहार या मैनरिज्म अपने मिलने वाले लोगों से बहुधा अज़ीब तरह का होता था। ऍसा वो कई बार जानबूझ कर करते थे पर कहीं न कहीं उनका दिल, शरारती बच्चे की तरह था जो उनके दिमाग में नए-नए खुराफातों को जन्म देता था। अक्सर उनके इस नटखटपन का शिकार, उनके क़रीबी हुआ करते थे। आइए रूबरू होते हैं उनके ऍसे ही कुछ कारनामों से..

एक बार की बात है, किशोर के घर एक इंटीरियर डेकोरेटर पधारा। वो सज्जन तपती गर्मी में भी थ्री पीस सूट में आए, और आते ही अपने अमेरिकी लहजे के साथ शुरु हो गए किशोर को फंडे देने कि उनके घर की आंतरिक साज सज्जा किस तरह की होनी चाहिए। किशोर ने किसी तरह आधे घंटे उन्हें झेला और फिर अपनी आवश्यकता उन्हें बताने लगे।

अब गौर करें किशोर दा ने उन से क्या कहा....

"मुझे अपने कमरे में ज्यादा कुछ नहीं चाहिए। बस चारों तरफ कुछ फीट गहरा पानी हो और सोफे की जगह छोटी-छोटी संतुलित नावें, जिसे हम चप्पू से चला कर इधर-उधर ले जा सकें। चाय रखने के लिए ऊपर से टेबुल को धीरे धीरे नीचे किया जा सके ताकि हम मज़े में वहाँ से कप उठा चाय की चुस्कियाँ ले सकें।...."

इंटीरियर डेकोरेटर के चेहरे पर अब तक घबड़ाहट की रेखाएँ उभर आईं थीं पर किशोर कहते रहे...

"....आप तो जानते ही हैं कि मैं एक प्रकृति प्रेमी हूँ, इसलिए अपने कमरे की दीवार की सजावट के लिए मैं चाहता हूँ कि उन पर पेंटिंग्स की बजाए लटकते हुए जीवित कौए हों और पंखे की जगह हवा छोड़ते बंदर... "

किशोर का कहना था कि ये सुनकर वो व्यक्ति बिल्कुल भयभीत हो गया और तेज कदमों से कमरे से बाहर निकला और फिर बाहर निकलकर एकदम से गेट की तरफ़, विद्युत इंजन से भी तेज रफ़्तार से दौड़ पड़ा।

ये बात किशोर दा ने प्रीतीश नंदी को १९८५ में दिए गए साक्षात्कार में बताई थी। प्रीतीश नंदी ने जब पूछा कि क्या ये उनका पागलपन नहीं था? तो किशोर का जवाब था कि अगर वो शख्स उस गर्म दुपहरी में वूलेन थ्री पीस पहनने का पागलपन कर सकता हे तो मैं अपने कमरे में जिंदा काँव-काँव करते कौओं को लटकाने का विचार क्यूँ नहीं ला सकता ? ऐसे ही कुछ और किस्से आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

आखिर क्या सोचते थे किशोर, अपने समकालीनों के बारे में ?

लड़कपन से ही किशोर के. एल. सहगल के दीवाने थे। बचपन मे वे अपनी पॉकेटमनी से सहगल साहब के रिकार्ड खरीदा करते थे। सही मायने में वो उनको अपना गुरु मानते थे।जब उन्होंने खुद बतौर गायक काफी ख्याति अर्जित कर ली तो एक संगीत कंपनी ने उनके सामने सहगल के गीतों को गाने का प्रस्ताव रखा। किशोर ने साफ इनकार कर दिया। उनका कहना था....

" मैं उनके गीतों को और बेहतर गाने की कोशिश क्यूँ करूँ ? कृपया उन्हें हमारी यादों में बने रहने दें। उनके गाये गीत, उनके ही रहने दें। मुझे ये किसी एक शख्स से भी नहीं सुनना कि किशोर ने सहगल से भी अच्छा इस गीत को गाया। "

सहगल का विशाल छायाचित्र हमेशा उनके घर के पोर्टिको की शोभा बढ़ाता रहा। और उसी तसवीर के बगल में रफी साहब की तसवीर भी लगी रहती थी। किशोर, रफी की काबिलियत को समझते थे और उसका सम्मान करते थे। सत्तर के दशक में जब किशोर दा की तूती बोल रही थी, तो उनके एक प्रशंसक ने कह दिया....

"किशोर दा , आपने तो रफी की छुट्टी कर दी।..."

उस व्यक्ति को प्रत्त्युत्तर एक चाँटे के रूप में मिला। किशोर और रफी के फैन आपस में एक दूसरे की कितनी खिंचाई कर लें, वास्तविक जिंदगी में कभी इन महान गायकों के बीच आपसी सद्भाव की दीवार नहीं टूटी।

किशोर और लता जी के युगल गीत काफी चर्चित रहे हैं। इतने सालों के बाद आज भी 'आँधी', 'घर', 'हीरा पन्ना', 'सिलसिला' और 'देवता' जैसी फिल्मों के गीत को सुनने वालों की तादाद में कमी नहीं आई है।
किशोर, लता को अपना सीनियर मानते थे और इसीलिए किसी गीत के लिए उन्हें जितना पैसा मिलता वो उससे एक रुपया कम लेते।
और लता जी, साथ शो करतीं तो तारीफ़ों के पुल बाँध देतीं। हमेशा किशोर को किशोर दा कह कर संबोधित करतीं। ये अलग बात थी कि उम्र में किशोर लता से मात्र एक महिना चौबीस दिन ही बड़े थे।

किशोर और आशा जी को पंचम की धुनों में सुनने का आनंद ही अलग है। अपने एक साक्षात्कार में आशा जी ने कहा था कि
"किशोर एक जन्मजात गायक थे जो गाते समय आवाज़ में नित नई विविधता लाने में माहिर थे। इसीलिए उनके साथ युगल गीत गाने में मुझे और सजग होना पड़ता था, गायिकी में उनकी हरकतों को पकड़ने के लिए।"

किशोर दा भी मानते थे कि उनके चुलबुले अंदाज को कोई मिला सकता है तो वो थीं आशा। इसीलिए कहा करते

"She is my match at mike. "

किशोर कुमार की निजी जिंदगी

किशोर कुमार की पारिवारिक जिंदगी, उनकी शख्सियत जितनी ही पेचीदा रही।
बात १९५१ की है। उस वक्त किशोर मुंबई फिल्म उद्योग में एक अदाकार के तौर पर पाँव जमाने की कोशिश कर रहे थे। इसी साल उन्होंने रूमा गुहा ठाकुरता से शादी की। १९५२ में अमित कुमार जी की पैदाइश हुई। ये संबंध १९५८ तक चला। रूमा जी का अपना एक आकर्षक व्यक्तित्व था। एक बहुआयामी कलाकार के रूप में बंगाली कला जगत में उन्होंने बतौर अभिनेत्री, गायिका, नृत्यांगना और कोरियोग्राफर के रुप में अपनी पहचान बनाई। पर उनका अपने कैरियर के प्रति यही अनुराग किशोर को रास नहीं आया। किशोर ने खुद कहा है कि

"...वो एक बेहद गुणी कलाकार थीं। पर हमारा जिंदगी को देखने का नज़रिया अलग था। वो अपना कैरियर बनाना चाहती थीं और मैं उन्हें एक घर को बनाने वाली के रूप में देखना चाहता था। अब इन दोनों में मेल रख पाना तो बेहद कठिन है। कैरियर बनाना और घर चलाना दो अलग अलग कार्य हैं। इसीलि॓ए हम साथ नहीं रह पाए और अलग हो गए।..."


१९५८ में ये संबंध टूट गया। इससे पहले १९५६ में मधुबाला, किशोर की जिंदगी में आ चुकी थीं। पाँच साल बाद दोनों विवाह सूत्र में बँध तो गए पर किशोर दा के माता-पिता इस रिश्ते को कभी स्वीकार नहीं पाए। बहुतेरे फिल्म समीक्षक इस विवाह को 'Marriage of Convenience' बताते हैं। दिलीप कुमार से संबंध टूटने की वजह से मधुबाला एक भावनात्मक सहारे की तालाश में थीं और किशोर अपनी वित्तीय परेशानियों से निकलने का मार्ग ढ़ूंढ़ रहे थे।

पर इस रिश्ते में प्यार बिलकुल नहीं था ये कहना गलत होगा। गौर करने की बात है कि मधुबाला ने नर्गिस की सलाह ना मानते हुए, भारत भूषण और प्रदीप के प्रस्तावों को ठुकरा कर किशोर दा से शादी की। तो दूसरी ओर किशोर ने ये जानते हु॓ए भी कि उनकी होने वाली पत्नी, एक लाइलाज रोग (हृदय में छेद) से ग्रसित हैं, उनसे निकाह रचाया। पर शुरुआती प्यार अगले ९ सालों में मद्धम ही पड़ता गया।
किशोर ने Illustrated Weekly को दिए अपने साक्षात्कार में कहा था...

"...मैंने उन्हें अपनी आँखों के सामने मरते देखा। इतनी खूबसूरत महिला की ऍसी दर्दभरी मौत....! वो अपनी असहाय स्थिति को देख झल्लाती, बड़बड़ाती और चीखती थीं। कल्पना करें इतना क्रियाशील व्यक्तित्व रखने वाली महिला को नौ सालों तक चारदीवारी के अंदर एक पलंग पर अपनी जिंदगी बितानी पड़े तो उसे कैसा लगेगा? मैं उनके चेहरे पर मुस्कुराहट लाने का अंतिम समय तक प्रयास करता रहा। मैं उनके साथ हँसता और उनके साथ रोता रहा। ..."

पर मधुबाला की जीवनी लिखने वाले फिल्म पत्रकार 'मोहन दीप' अपनी पुस्तक में उनके इस विवाह से खास खुशी ना मिलने का जिक्र करते हैं। सच तो अब मधुबाला की डॉयरी के साथ उनकी कब्र में दफ़न हो गया, पर ये भी सच हे कि किशोर उनकी अंतिम यात्रा तक उनके साथ रहे और जिंदगी के अगले सात साल उन्होंने एकांतवास में काटे। अगर गौर करें तो उनके लोकप्रिय उदासी भरे नग्मे इसी काल खंड की उपज हैं।

१९७६ में उन्होंने योगिता बाली से शादी की पर ये साथ कुछ महिनों का रहा। किशोर का इस असफल विवाह के बारे में कहना था....

"...ये शादी एक मज़ाक था। वो इस शादी के प्रति ज़रा भी गंभीर नहीं थी। वो तो बस अपनी माँ के कहे पर चलती थी। अच्छा हुआ, हम जल्दी अलग हो गए।..."

वैसे योगिता कहा करती थीं कि किशोर ऍसे आदमी थे जो सारी रात जग कर नोट गिना करते थे। ये बात किशोर ने कभी नहीं मानी और जब योगिता बाली ने मिथुन से शादी की, किशोर ने मिथुन के लिए गाना छोड़ दिया। इस बात का अप्रत्यक्ष फ़ायदा बप्पी दा को मिला और मिथुन के कई गानों में उन्होंने अपनी आवाज़ दी।

१९८० में किशोर ने चौथी शादी लीना चंद्रावरकर से की जो उनके बेटे अमित से मात्र दो वर्ष बड़ी थीं। पर किशोर, लीना के साथ सबसे ज्यादा खुश रहे। उनका कहना था..

'...मैंने जब लीना से शादी की तब मैंने नहीं सोचा था कि मैं दुबारा पिता बनूँगा। आखिर मेरी उम्र उस वक़्त पचास से ज्यादा थी। पर सुमित का आना मेरे लिए खुशियों का सबब बन गया। मैंने हमेशा से एक खुशहाल परिवार का सपना देखा था। लीना ने वो सपना पूरा किया।...

... वो एक अलग तरह की इंसान है । उसने दुख देखा है..आखिर अपने पति की आँख के सामने हत्या हो जाना कम दुख की बात नहीं है। वो जीवन के मूल्य और छोटी-छोटी खुशियों को समझती है। इसीलिए उसके साथ मैं बेहद खुश हूँ।
..."

किशोर को मुंबई की फिल्मी दुनिया और उसके लोग कभी रास नहीं आए। १९८५ में संन्यास का मन बना चुकने के बाद उन्होंने कहा था...

"......कौन रह सकता है इस चालबाज, मित्रविहीन दुनिया में, जहाँ हर पल लोग आपका दोहन करने में लगे हों। क्या यहाँ किसी पर विश्वास किया जा सकता है? क्या कोई भरोसे का दोस्त मिल सकता है यहाँ? मैं इस बेकार की प्रतिस्पर्धा से निकलना चाहता हूँ। कम से कम अपने पुरखों की ज़मीन खंडवा में तो वैसे ही जी सकूँगा जैसा मैं हमेशा चाहता था। कौन इस गंदे शहर में मरना चाहेगा ?......."


दरअसल इस कथन का मर्म जानने के लिए फिर थोड़ा पीछे जाना होगा। किशोर की ये कड़वाहट उनके फिल्म जगत में बिताए शुरु के दिनों की देन है। वे कभी अभिनेता नहीं बनना चाहते थे। चाहते थे तो सिर्फ गाना पर बड़े भाई दादा मुनि का कहना टाल भी नहीं पाए। अभिनय में गए तो सफलता भी हाथ लगी पर गायक के रूप में ज्यादातर संगीत निर्देशकों ने उन्हें स्वीकार नहीं किया। खुद किशोर ने अपनी लाचारी और अपने अजीबोगरीब व्यवहार के बारे में ये सफाई पेश की है...

"...मैं सिर्फ गाना चाहता था। कुछ ऐसी परिस्थितियाँ बनीं कि मुझे अभिनय की दुनिया में आना पड़ा। मुझे अभिनय में बिताया अपना का हर एक पल नागवार गुजरा। मैंने कौन-कौन से तरीके नहीं अपनाए इस दुनिया से पीछा छुड़ाने के लिए...अपने संवाद की पंक्तियाँ गलत बोलीं, पागलपन का नाटक किया, बाल मुंडवाए, गंभीर दृश्यों के बीच यूडलिंग शुरु कर दी। मीना कुमारी के सामने वो संवाद बोले, जो किसी दूसरी फिल्म में बीना रॉय को बोलने थे..........पर फिर भी उन्होंने मुझे नहीं छोड़ा और आखिरकार एक सफल नायक बना ही दिया।...."

किशोर ने यहाँ कोई अतिश्योक्ति नहीं की थी। उनके अज़ीबोगरीब हरकतों के कुछ किस्से तो पहले भी यहाँ लिखे जा चुके हैं, अब कुछ की बानगी और लें...

भाई-भाई की शूट में निर्देशक रमन के द्वारा अपने ५००० रुपए देने के लिए अड़ गए। अशोक कुमार के समझाने पर अनिच्छा पूर्वक वो दृश्य करने को तैयार हुए। छोटे से शाँट में उन्हें सिर्फ बड़बड़ाना था और थोड़ी चहलकदमी करनी थी।

तो किशोर ने क्या किया, कुछ दूर चलते ..कलाबाजी खाते और जोर से कहते पाँच हजार रुपया। ऐसी कलाबाजियाँ खाते-खाते वो कमरे के दूसरी तरफ पहुँचे जहाँ एक पहिया गाड़ी खड़ी थी. किशोर उस पर होते हुए सीधे बाहर पहुँचे और एक छलाँग मार कर अपनी गाड़ी पर सवार होकर चलते बने । बाद में रमन ने स्वीकार किया कि वो किशोर को पैसा चुका पाने की हालत में नहीं थे।

एक निर्माता को तो उन्होंने इतना परेशान किया कि वो उनके खिलाफ़ कोर्ट से सम्मन ले आए कि किशोर उनके आदेशानुसार ही काम करेंगे।
नतीजा ये हुआ कि सेट पर अपनी कार से उतरने के पहले भी वो निर्माता का आदेश मिलने के बाद ही उतरते। एक बार वो शूटिंग के दौरान गाड़ी को लेते हुए खंडाला चले गए, तुर्रा ये कि डॉयरेक्टर ने शॉट के बाद 'कट' नहीं बोला तो मैं क्या करता...

पर ये सब उन्होंने सिर्फ फिल्मी दुनिया से निकलने के लिए किया ऐसा भी नहीं था। कुछ बचपना कह लें और कुछ उनके खुराफाती दिमाग का फ़ितूर, अपनी निजी जिंदगी में उन्होंने अपनी इमेज को ऍसा ही बनाए रखा।

उनसे जुड़ी कहानियाँ खत्म होने का नाम नहीं लेतीं। शयनकक्ष में खोपड़ी की आँखों से निकलती लाल रोशनी, ड्राइंग रूम में उल्टी पड़ी कुर्सियाँ, मेहमानों पर उनके इशारों पर भौंकते कुत्ते, गौरीकुंज के अपने आवास के बाहर लगा बोर्ड,

Beware of Kishore Kumar !

उनके मिज़ाज की गवाही देता है।

पर इतना सब जानते हुए भी उनके करीबी उनके बारे में अलग ही राय रखते थे। साथी कलाकार महमूद का कहना था

"....वो ना तो सनकी थे ना ही कंजूस, जैसा कि कई लोग सोचते हैं। वास्तव में वो एक जीनियस थे। वो राज कपूर के बड़बोले रुप थे, एक हरफनमौला जिसे सिनेमा के हर पहलू की जानकारी थी और जिसे हो हल्ला मचाकर लोगों की नज़रों में बने रहने का शौक था।....."


वहीं अभिनेत्री तनुजा का मानना था
"......मुझे समझ नहीं आता कि वो पागलपन का मुखौटा क्यूँ लगाए रहते थे?
शायद, एक आम इंसान की तरह वो दुनिया से अपने अक़्स का कुछ हिस्सा छुपाना चाहते थे। जब वो अच्छे मूड में रहते तो अपने चुटकुलों से हँसा-हँसा कर लोट पोट कर देते थे। ...."

संगीत निर्देशक कल्याण का कहना था

"....किशोर मूडी इंसान थे, पर मैं समझता हूँ कि किसी कलाकार को ये छूट तो आपको देनी ही होगी। उनसे कुछ करवाने के लिए मुझे बच्चों जैसा व्यवहार करना पड़ता था। सो मैं जो उनसे चाहता ठीक उसका उलटा बोलता।...."

किशोर के जीवन वृत को पत्रकार कुलदीप धीमन ने एक अच्छा सार दिया है। कुलदीप कहते हैं...

".....शुरुआती दौर में अपनी बतौर गायक पहचान बनाने के क्रम में मिली दुत्कार ने उनके दिल में वो ज़ख्म किए जो वक़्त के साथ भर ना पाए और जिन्होंने उन्हें एकाकी बना डाला। पर उनके अंदर का खुराफ़ाती बच्चा कभी नहीं मरा। यही वज़ह रही कि प्रशंसक और दोस्तों को उनकी कोई स्पष्ट छवि बनाने में दुविधा हुई। सामान्यतः हम जीवन में श्वेत श्याम किरदार देखने के आदि हैं पर किशोर की जिंदगी में स्याह रंग की कई परते थीं जिन्होंने उनके चरित्र को जटिल बना दिया था.... "

१९८७ में हृदयगति रुक जाने की वजह से उनकी मृत्यु हो गई।

वैसे तो इस श्रृंखला के दौरान मैंने आपको किशोर के अपने दस पसंदीदा उदासी भरे नग्मे सुनाए थे। आज उनमें से एक गीत है १९६५ की फिल्म "श्रीमान फंटूश" का जिसके बोल लिखे आनंद बख्शी ने और धुन बनाई लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी ने।

ये दर्द भरा अफ़साना, सुन ले अनजान ज़माना ज़माना
मैं हूँ एक पागल प्रेमी, मेरा दर्द न कोई जाना

मुझे ये गाना बेहद पसंद है और इसका मुखड़ा तो कुछ-कुछ किशोर दा के जीवन की कहानी कह देता है। क्या गायिकी थी और कितनी मीठी धुन कि वर्षों पहले सुने इस गीत को गाते वक्त मन खुद-बा-खुद उदास हो जाता है।


किशोर दा की आवाज़ में आप इस मधुर गीत को यहाँ सुन सकते हैं।


इस श्रृंखला को छोटी छोटी प्रविष्टियों में आप यहाँ पढ़ सकते हैं....

  1. यादें किशोर दा कीः जिन्होंने मुझे गुनगुनाना सिखाया..दुनिया ओ दुनिया
  2. यादें किशोर दा कीः पचास और सत्तर के बीच का वो कठिन दौर... कुछ तो लोग कहेंगे
  3. यादें किशोर दा कीः सत्तर का मधुर संगीत. ...मेरा जीवन कोरा कागज़
  4. यादें किशोर दा की: कुछ दिलचस्प किस्से उनकी अजीबोगरीब शख्सियत के !.. एक चतुर नार बड़ी होशियार
  5. यादें किशोर दा कीः पंचम, गुलज़ार और किशोर क्या बात है ! लगता है 'फिर वही रात है'
  6. यादें किशोर दा की : किशोर के सहगायक और उनके युगल गीत...कभी कभी सपना लगता है
  7. यादें किशोर दा की : ये दर्द भरा अफ़साना, सुन ले अनजान ज़माना
  8. यादें किशोर दा की : क्या था उनका असली रूप साथियों एवम् पत्नी लीना चंद्रावरकर की नज़र में
  9. यादें किशोर दा की: वो कल भी पास-पास थे, वो आज भी करीब हैं ..समापन किश्त
 

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