Thursday, July 31, 2008

एक कविता जिसने हरिवंश राय 'बच्चन' और तेजी बच्चन की जिंदगी का रास्ता ही बदल दिया


अमूमन जब कवि कोई कविता लिखता है तो कोई घटना, कोई प्रसंग या फिर किसी व्यक्तित्व का ताना बाना जरूर उसके मानस पटल पर उभरता है। ये ताना बाना जरूरी नहीं कि हाल फिलहाल का हो। अतीत के अनुभव और आस पास होती घटनाएँ कई बार नए पुराने तारों को जोड़ जाती हैं और एक भावना प्रकट होती है जो एक कविता की शक्ल ले लेती है। पर कभी भूत में लिखी आपकी रचना, आप ही के भविष्य की राहों को भी बदल दे तो ? हो सकता है आप के साथ भी कुछ ऐसा हुआ हों।

आज जिस प्रसंग का उल्लेख करने जा रहा हूँ वो एक बार फिर हरिवंश राय बच्चन जी के जीवन की उस संध्या से जुड़ा हुआ है जब श्यामा जी के देहांत के बाद वे एकाकी जीवन व्यतीत कर रहे थे और अपने एक मित्र प्रकाश के यहाँ बरेली पहुंचे थे। वहीं उनकी पहली मुलाकात मिस तेजी सूरी से हुई थी। अपनी आत्मकथा में मुलाकात की रात का जिक्र करते हुए बच्चन कहते हैं


"........उस दिन ३१ दिसंबर की रात थी। रात में सबने ये इच्छा ज़ाहिर कि नया वर्ष मेरे काव्य पाठ से आरंभ हो। आधी रात बीत चुकी थी, मैंने केवल एक दो कविताएं सुनाने का वादा किया था। सबने क्या करूँ संवेदना ले कर तुम्हारी वाला गीत सुनना चाहा, जिसे मैं सुबह सुना चुका था. यह कविता मैंने बड़े सिनिकल मूड में लिखी थी। मैंने सुनाना आरंभ किया। एक पलंग पर मैं बैठा था, मेरे सामने प्रकाश बैठे थे और मिस तेजी सूरी उनके पीछे खड़ीं थीं कि गीत खत्म हो और वह अपने कमरे में चली जाएँ। गीत सुनाते सुनाते ना जाने मेरे स्वर में कहाँ से वेदना भर आई। जैसे ही मैंने उस नयन से बह सकी कब इस नयन की अश्रु-धारा पंक्ति पढ़ी कि देखता हूँ कि मिस सूरी की आँखें डबडबाती हैं और टप‍‍ टप उनके आँसू की बूंदे प्रकाश के कंधे पर गिर रही हैं। यह देककर मेरा कंठ भर आता है। मेरा गला रुँध जाता है। मेरे भी आँसू नहीं रुक रहे हैं। और जब मिस सूरी की आँखों से गंगा जमुना बह चली है और मेरे आँखों से जैसे सरस्वती। कुछ पता नहीं कब प्रकाश का परिवार कमरे से निकल गया और हम दोनों एक दूसरे से लिपटकर रोते रहे। आँसुओं से कितने कूल-किनारे टूट गिर गए, कितने बाँध ढह-बह गए, हम दोनों के कितने शाप-ताप धुल गए, कितना हम बरस-बरस कर हलके हुए हैं, कितना भींग-भींग कर भारी? कोई प्रेमी ही इस विरोध को समझेगा। कितना हमने एक दूसरे को पा लिया, कितना हम एक दूसरे में खो गए। हम क्या थे और आंसुओं के चश्मे में नहा कर क्या हो गए। हम पहले से बिलकुल बदल गए हैं पर पहले से एक दूसरे को ज्यादा पहचान रहे हैं। चौबीस घंटे पहले हमने इस कमरे में अजनबी की तरह प्रवेश किया और चौबीस घंटे बाद हम उसी कमरे से जीवन साथी पति पत्नी नहीं बनकर निकल रहे हैं. यह नव वर्ष का नव प्रभात है जिसका स्वागत करने को हम बाहर आए हैं। यह अचानक एक दूसरे के प्रति आकर्षित, एक दूसरे पर निछावर अथवा एक दूसरे के प्रति समर्पित होना आज भी विश्लेषित नहीं हो सका है। ......"

तो देखा आपने कविता के चंद शब्द दो अजनबी मानवों को कितने पास ला सकते हैं। भावनाओं के सैलाब को उमड़ाने की ताकत रखते हैं वे। तो आइए देखें क्या थी वो पूरी कविता

क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूँ?

मैं दुखी जब-जब हुआ
संवेदना तुमने दिखाई,
मैं कृतज्ञ हुआ हमेशा,
रीति दोनो ने निभाई,
किन्तु इस आभार का अब
हो उठा है बोझ भारी
;
क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूँ?

एक भी उच्छ्वास मेरा
हो सका किस दिन तुम्हारा?
उस नयन से बह सकी कब
इस नयन की अश्रु-धारा?
सत्य को मूंदे रहेगी
शब्द की कब तक पिटारी?
क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूँ?

कौन है जो दूसरों को
दु:ख अपना दे सकेगा?
कौन है जो दूसरे से
दु:ख उसका ले सकेगा?
क्यों हमारे बीच धोखे
का रहे व्यापार जारी?
क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूँ?

क्यों न हम लें मान, हम हैं
चल रहे ऐसी डगर पर,
हर पथिक जिस पर अकेला,
दुख नहीं बंटते परस्पर,
दूसरों की वेदना में
वेदना जो है दिखाता,
वेदना से मुक्ति का निज
हर्ष केवल वह छिपाता;
तुम दुखी हो तो सुखी मैं
विश्व का अभिशाप भारी!
क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूँ?

क्या ये सच नहीं जब अपने दुख से हम खुद ही निबटने की असफल कोशिश कर रहे हों तो संवेदनाओं के शब्द ,दिल को सुकून पहुँचाने के बजाए मात्र खोखले शब्द से महसूस होते हैं हर्ष की बात इतनी जरूर है कि बच्चन की ये दुखी करती कविता खुद उनके जीवन में एक नई रोशनी का संचार कर गई।

वैसे ये बताएँ कि क्या आपके द्वारा लिखी कोई कविता ऍसी भी है जिसने आपके जीवन के मार्ग को एकदम से मोड़ दिया हो?

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  • एक कविता जिसने हरिवंश राय 'बच्चन' और तेजी बच्चन की जिंदगी का रास्ता ही बदल दिया !
  • Monday, July 28, 2008

    इंसान का दिल तंग हैं क्यूँ ?

    नीचे की प्रविष्टि मुंबई बम विस्फोट के बाद जुलाई २००६ में लिखी थी। पिछले दो सालों में ये सिलसिला दिल्ली, लखनऊ, हैदराबाद, जयपुर, बंगलोर और अब अहमदाबाद तक बदस्तूर ज़ारी है। दुश्मन और शातिर और चालाक होता जा रहा है और हम वहीं के वहीं हैं। कुछ भी नहीं बदला और लगता है कि हम चुपचाप से इसे अपनी तकदीर मानकर अपने शहर की बारी का इंतज़ार करते हुए फिर अपने काम धंधों पर निकल पड़ेंगे। जिनके पास कुछ कर सकने के अधिकार या दायित्व है वो लिप सर्विस के आलावा और कुछ नहीं कर रहे। करते होते तो अब तक इन पिछले धमाकों से जुड़े अपराधियों को अब तक कटघरे तक ला चुके होते।

    बार बार बात ग्राउंड इनटेलिजेंस और सही मात्रा में पुलिसिंग ना होने की होती है तो पुलिस बल में रिक्तियों को हर राज्य भरने में आतुरता क्यूँ नहीं दिखाता? क्या इसके लिए राज्य व केंद्र सरकारें दोषी नहीं हैं ? आतंकवाद के बीजों को हमारे दुश्मन देश में बोने को तैयार हो जाते हैं और आप यह कह कर बच निकलते हैं कि इनके पीछे सामाजिक आर्थिक समस्याएँ भी हैं। पर क्या देश की आम जनता ने इस समस्याओं का निवारण करने से हमारे नेताओं को रोका है। नहीं रोका फिर भी ख़ामियाजा इसी आम जनता को सहना पड़ता है।

    पर सवाल वही है जो दो साल पहले था। आखिर कब तक ऐसी त्रासदियाँ हमारी जनता सहती रहेगी ? कैसे मूक दूर्शक बने रह सकते हैं हम सब आखिर कब तक?




    ********************************************************************
    ईश्वर अल्लाह तेरे ज़हाँ में
    नफरत क्यूँ है ? जंग है क्यूँ ?
    तेरा दिल तो इतना बड़ा है
    इंसां का दिल तंग हैं क्यूँ ?















    कदम कदम पर, सरहद क्यूँ है ?
    सारी जमीं जो तेरी है
    सूरज के फेरे करती
    फिर क्यूँ इतनी अंधेरी है ?

    इस दुनिया के दामन पर
    इंसां के लहू का रंग है क्यूँ ?
    तेरा दिल तो इतना बड़ा है
    इंसां का दिल तंग हैं क्यूँ ?














    गूंज रही हैं कितनी चीखें
    प्यार की बातें कौन सुने ?
    टूट रहे हैँ कितने सपने
    इनके टुकड़े कौन चुने ?

    दिल की दरवाजों पर ताले
    तालों पर ये जंग है क्यूँ ?
    ईश्वर अल्लाह तेरे जहाँ में
    नफरत क्यूँ है? जंग है क्यूँ ?
    तेरा दिल तो इतना बड़ा है
    इंसां का दिल तंग हैं क्यूँ ?

    जावेद अख्तर

    हमारे समाज की इस सच्चाई को उजागर करते इस गीत को आप यहाँ सुन सकते हैं













    हम सब बहुत खिन्न हैं, उदास हैं इन सवालों को दिल में दबाये हुए । पर जानते हैं इन सब बातों का कोई सीधा साधा हल नहीं है। घृणा और सीमा रहित समाज की परिकल्पना अभी भी कोसों दूर लगती है। अपनी जिंदगी में ऍसा होते हुये देख पाए तो खुशकिस्मती होगी!

    Thursday, July 24, 2008

    मैं हूँ उनके साथ खड़ी, जो सीधी रखते अपनी रीढ़ : सुनिए अमिताभ के स्वर में 'बच्चन' की ये प्रासंगिक कविता

    हरिवंशराय बच्चन की कविताएँ छुटपन से ही मन को लुभाती रही हैं। दरअसल भावों के साथ उनकी कविता में जो शब्दों का प्रवाह रहता है वो मेरे मन को हमेशा से बेहद रोमांचित करता है। उनकी कविता को बार-बार बोल कर दुहराने में जिस असीम आनंद की अनुभूति होती थी, उसकी कमी इस युग की अधिकांश कविताओं में हमेशा खटकती है। खैर , इससे पहले आपके सामने बच्चन जी की इस कविता को पेश करूँ क्या ये आप नहीं जानना चाहेंगे कि बच्चन जी ने अपनी पहली कविता कब लिखी और कविता लिखने का शौक उनमें कैसे पनपा?

    कायस्थ पाठशाला में बच्चन जी ने अपनी पहली पूरी हिंदी कविता लिखी, किसी अध्यापक के विदाअभिनंदन पर जब वे सातवीं में थे। अपनी आत्मकथा में बच्चन ने लिखा है
    ".....स्कूल में शिक्षक जब निबंध लिखाते तब कहते, अंत में कोई दोहा लिख देना चाहिए। विषय से सम्बन्ध दोहा याद ना होने पर मैं स्वयं कोई रचकर लगा देता था। इन्हीं दोहों से मेरे काव्य का उदगम हुआ। 'भारत भारती' से गुप्त जी की पद्यावली, 'सरस्वती' के पृष्ठों से पंत जी की कविता और 'मतवाला' के अंकों से निराला जी के मुक्त छंदों से मेरा परिचय हो चुका था। नवीं, दसवीं कक्षा में तो मैंने कविताओं से एक पूरी कापी भर डाली। पर मेरी ये कविताएँ इतनी निजी थीं कि जब मेरे एक साथी ने चोरी से उन्हें देख लिया तो मैंने गुस्से में पूरी कॉपी टुकड़े टुकड़े करके फेंक दी। मेरे घर से खेत तक कॉपी के टुकड़े गली में फैल गए थे, इसका चित्र मेरी आँखों के सामने अब भी ज्यों का त्यों है। कविताएँ मैंने आगे भी बिल्कुल अपनी और निजी बनाकर रखीं और मेरे कई साथी उनके साथ ताक झांक करने का प्रयत्न करते रहे।....."

    वक़्त के पहिए की चाल देखिए....एक बालक जो अपने सहपाठियों में अपनी कविताएँ दिखाते हिचकता था, ने ऍसी कृतियों की रचना की जिसे सारे भारत की हिंदी प्रेमी जनता पूरे प्रेम से रस ले लेकर पढ़ती रही।

    बच्चन की ये कविता हर उस स्वाभिमानी मनुष्य के दिल की बात कहती है जिसने अपने उसूलों के साथ समझौता करना नहीं सीखा। उनके सुपुत्र अमिताभ बच्चन ने एलबम बच्चन रिसाइट्स बच्चन (Bachchan Recites Bachchan) में बड़े मनोयोग से इस कविता को पढ़ा है। तो आइए सुनें अमित जी की आवाज़ में हरिवंश राय बच्चन जी की ये कविता....





    मैं हूँ उनके साथ,खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़

    कभी नही जो तज सकते हैं, अपना न्यायोचित अधिकार
    कभी नही जो सह सकते हैं, शीश नवाकर अत्याचार
    एक अकेले हों, या उनके साथ खड़ी हो भारी भीड़
    मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़

    निर्भय होकर घोषित करते, जो अपने उदगार विचार
    जिनकी जिह्वा पर होता है, उनके अंतर का अंगार
    नहीं जिन्हें, चुप कर सकती है, आतताइयों की शमशीर
    मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़

    नहीं झुका करते जो दुनिया से करने को समझौता
    ऊँचे से ऊँचे सपनो को देते रहते जो न्योता
    दूर देखती जिनकी पैनी आँख, भविष्यत का तम चीर
    मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़

    जो अपने कन्धों से पर्वत से बढ़ टक्कर लेते हैं
    पथ की बाधाओं को जिनके पाँव चुनौती देते हैं
    जिनको बाँध नही सकती है लोहे की बेड़ी जंजीर
    मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़

    जो चलते हैं अपने छप्पर के ऊपर लूका धर कर
    हर जीत का सौदा करते जो प्राणों की बाजी पर
    कूद उदधि में नही पलट कर जो फिर ताका करते तीर
    मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़

    जिनको यह अवकाश नही है, देखें कब तारे अनुकूल
    जिनको यह परवाह नहीं है कब तक भद्रा, कब दिक्शूल
    जिनके हाथों की चाबुक से चलती हें उनकी तकदीर
    मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़

    तुम हो कौन, कहो जो मुझसे सही ग़लत पथ लो तो जान
    सोच सोच कर, पूछ पूछ कर बोलो, कब चलता तूफ़ान
    सत्पथ वह है, जिसपर अपनी छाती ताने जाते वीर
    मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़


    बच्चन की ये कविता सार्वकालिक है। आज जब हमारे समाज , हमारी राजनीति में नैतिक मूल्यों के ह्रास की प्रक्रिया निरंतर जारी है, जरूरत है हमारे नेताओं, प्रशासकों में अपने आत्म सम्मान को जगाने की, सही और गलत के बीच पहचान करने की। अगर वे इस मार्ग पर चलें तो देश की संपूर्ण जनता खुद ब खुद उनके पीछे खड़ी हो जाएगी।

    इस चिट्ठे पर हरिवंश राय 'बच्चन' से जुड़ी कुछ अन्य प्रविष्टियाँ

    Sunday, July 20, 2008

    सुनो जानां चले आओ तुम्हें मौसम बुलाते हैं : आतिफ़ सईद की एक खूबसूरत नज़्म

    पिछले साल अगस्त महिने में मैंने एक नज़्म पोस्ट की थी जिसका शीर्षक था अज़ब पागल सी लड़की है....। उसे किसने लिखा ये उस वक़्त नहीं पता था। आज मै जब इस नज़्म को पढ़ रहा था तो पता चला कि इसके लेखक वहीं हैं जिन्होंने अज़ब पागल सी लड़की है.... लिखी थी। जी हाँ, इन दोनों नज़्मों को लिखा है पाकिस्तान के नौजवान शायर आतिफ़ सईद साहब ने। आतिफ़ साहब का अपना एक जाल पृष्ठ भी है जिसका लाभ आप तभी उठा सकते हैं जब आप उर्दू लिपि के जानकार हों।

    आज उनकी जो नज़्म आप के साथ बाँट रहा हूँ वो यकीं है कि आपके लिए नई होगी। आज अंतरजाल पर जब भटक रहा था तो रोमन में ये मुझे लिखी मिली। ये नज़्म उन्होंने अपनी नई किताब 'तुम्हें मौसम बुलाते हैं' के उन्वान में लिखी है। नज़्म प्यार के हसस जज़्बातों से लबरेज़ है। अपने प्रेम और मौसम की बदलती रुतों को आपस में बेहद बेहतरीन तरीके से गुँथा है शायर ने। विश्वास नहीं होता तो खुद ही पढ़कर देखिए ना..


    मेरे अंदर बहुत दिन से
    कि जैसे जंग जारी है
    अज़ब बेइख्तियारी है
    मैं ना चाहूँ मगर फिर भी, तुम्हारी सोच रहती है
    हर इक मौसम की दस्तक से तुम्हारा अक़्स बनता है
    कभी बारिश तुम्हारे शबनमी लहजे में ढलती है

    कभी शर्मा के ये रातें
    तुम्हारे सर्द होठों का दहकता लम्स लगती हैं

    कभी पतझड़...
    तुम्हारे पाँवों से रौंदे हुए पत्तों की आवाज़ें सुनाता है

    कभी मौसम गुलाबों का
    तुम्हारी मुस्कुराहट के सारे मंज़र जगाता है
    मुझे बेहद सताता है

    कभी पलकें तुम्हारी धूप ओढ़े जिस्म ओ जान पर शाम करती हैं
    कभी आँखें, मेरे लिखे हुए मिसरों को अपने नाम करती हैं
    मैं खुश हूं या उदासी के किसी मौसम से लिपटा हूँ
    कोई महफ़िल हो तनहाई में या महफ़िल में तनहा हूँ
    या अपनी ही लगाई आग में बुझ-बुझ कर जलता हूँ

    मुझे महसूस होता है
    मेरे अंदर बहुत दिन से
    कि जैसे जंग ज़ारी है
    अज़ब बेइख्तियारी है


    और इस बेइख्तियारी में
    मेरे जज़्बे, मेरे अलफाज़ मुझ से रूठ जाते हैं
    मैं कुछ भी कह नहीं सकता, मैं कुछ भी लिख नहीं सकता
    उदासी ओढ़ लेता हूँ
    और इन लमहों की मुठ्ठी में
    तुम्हारी याद के जुगनू कहीं जब जगमगाते हैं
    ये बीते वक़्त के साये
    मेरी बेख्वाब आँखों में, कई दीपक जलाते हैं
    मुझे महसूस होता है
    मुझे तुम को बताना है
    कि रुत बदले तो पंछी भी घरों को लौट आते हैं
    सुनो जानां चले आओ तुम्हें मौसम बुलाते हैं....


    अगर आपको ये नज़्म पसंद आई तो यकीनन आप इन्हें भी पढ़ना पसंद करेंगे...

    Tuesday, July 15, 2008

    आइए झांकें उत्तरप्रदेश के लोक गीतों की गौरवशाली परंपरा में : नन्ही नन्ही बुँदिया रे, सावन का मेरा झूलना...

    'एक शाम मेरे नाम' पर पिछले हफ्ते आपने भोजपुरी, असमी और बंगाली लोकगीतों को सुना। आज बारी है उत्तर प्रदेश की। यूँ तो मैं शुरु से बिहार और झारखंड में रहा हूँ, पर शादी विवाहों में जब जब अपने ददिहाल 'बलिया' और ननिहाल 'कानपुर' में जाना हुआ तो उस वक़्त पूर्वांचल और सेन्ट्रल यूपी के कई लोकगीत सुनने को मिले।

    उत्तरप्रदेश के लोक गीतों का अपना ही एक इतिहास है। शायद ही ऍसा कोई अवसर या विषय हो जिस पर इस प्रदेश में लोकगीत ना गाए जाते हो। चाहे वो बच्चे का जन्म हो या प्रेमियों का बिछुड़ना, शादी हो या बिदाई, नई ॠतु का स्वागत हो या खेत में हल जोतने का समय सभी अवसरों के लिए गीत मुकर्रर हैं और इनका नामाकरण भी अलग अलग है, जैसे सोहर, ब्याह, बन्ना बन्नी, कोहबर, बिदाई, ॠतु गीत, सावन, चैती आदि। आपको याद होगा कि IIT Mumbai में जब हम सब ने गीत संगीत की महफिल जमाई थी तो हमारे साथी चिट्ठाकार अनिल रघुराज ने चैती गाकर हम सबको सुनाया था। उसका वीडिओ आप यूनुस के ब्लॉग पर यहाँ देख सकते हैं।
    उत्तरप्रदेश के लोक गीतों के बारे में अपनी किताब 'Folk Songs of Uttar Pradesh' में लेखिका निशा सहाय लिखती हैं....

    "...राज्य के लोकगीतों को मुख्यतः तीन श्रेणी में बाँटा जा सकता है

    • ॠतु विशेष के आने पर गाए जाने वाले गीत
    • किसी खास अवसर पर गाए जाने वाले गीत
    • और कभी कभी गाए जाने वाले गीत

    कुछ गीत केवल महिलाओं द्वारा गाए जाते हैं तो कुछ केवल मर्दों द्वारा। इसी तरह कुछ गीत सिर्फ समूह में गाए जाते हैं जब कि कुछ सोलो। समूह गान में रिदम पर ज्यादा जोर होता है जिसे लाने के लिए अक्सर चिमटा और मजीरा जैसे वाद्य यंत्रों का प्रयोग किया जाता है। इसके आलावा इन गीतों में बाँसुरी, शंख, रबाब, एकतारा, सारंगी ओर ढोलक का इस्तेमाल भी होता है। वैसे तो ये गीत ज्यादातर लोक धुनों पर ही रचित होते हैं पर कई बार इनकी गायिकी बहुत कुछ शास्त्रीय रागों जैसे पीलू, बहार, दुर्गा और ख़माज से मिलती जुलती है......."

    आषाढ खत्म होने वाला है और सावन आने वाला है तो क्यूँ ना आज सुने जाएँ वे लोकगीत जो अक्सर सावन के महिने में गाए जाते हैं।

    प्रस्तुत गीत में प्रसंग ये है कि नायिका को सावन की मस्त बयारें अपने पीहर में जाने को आतुर कर रही हैं। वो अपनी माँ को संदेशा भिजवाती है कि कोई आ के उसे पीहर ले जाए पर माँ पिता की बढ़ती उम्र और भाई के छोटे होने की बात कह कर उसकी बात टाल जाती है। नायिका ससुराल में किस तरह अपना सावन मनाती है ये बात आगे कही जाती है।

    अम्मा मेरे बाबा को भेजो री
    कि सावन आया कि सावन आया कि सावन आया
    अरे बेटी तेरा, अरे बेटी तेरा, अरे बेटी तेरा,
    बेटी तेरा बाबा तो बूढ़ा री
    कि सावन आया कि सावन आया कि सावन आया

    अम्मा मेरे भैया को भेजो री
    अरे बेटी तेरा, अरे बेटी तेरा, अरे बेटी तेरा,
    बेटी तेरा भैया तो बाला री
    कि सावन आया कि सावन आया कि सावन आया
    अम्मा मेरे भैया को भेजो री
    *************************************
    नन्ही नन्ही बुँदिया रे, सावन का मेरा झूलना,
    हरी हरी मेंहदी रे ,सावन का मेरा झूलना
    हरी हरी चुनरी रे ,सावन का मेरा झूलना

    पर इन गीतों के मनोविज्ञान में झांकें तो ये पाते हैं कि घर से दूर पर वहाँ की यादों के करीब एक नवविवाहिता को अपनी खुशियों और गम को व्यक्त करने के लिए सावन के ये गीत ही माध्यम बन पाते थे। मेरी जब इन गीतों के बारे में कंचन चौहान से बात हुई तो उन्होंने बताया कि

    "उनकी माँ की शादी जुलाई १९५३ मे हुई थी और वो बताती हैं कि वे उन दिनों यही गीत गा के बहुत रोती थी...! और शायद उन्होने भी ये गीत अपनी माँ से ही सुना होगा, कहने का आशय ये है कि बड़ी पुरानी धरोहरे हैं ये कही हम अपने आगे बढ़ने की होड़ मे इन्हें खो न दे...! .."

    इस गीत के आगे की पंक्तियाँ कंचन की माताजी ने अपनी स्मृति के आधार पर भेजा है।

    एक सुख देखा मैने मईया के राज में,
    सखियों के संग अपने, गुड़ियों का मेरा खेलना

    एक सुख देखा मैने भाभी के राज में,
    गोद में भतीजा रे, गलियों का मेरा घूमना

    एक दुख देखा मैने सासू के राज में,
    आधी आधी रातियाँ रे चक्की का मेरा पीसना

    एक दुख देखा मैने जिठनी के राज में,
    आधी आधी रतियाँ रे चूल्हे का मेरा फूँकना

    इस गीत को गाया है लखनऊ की गायिका मालिनी अवस्थी ने। मालिनी जी ने जुनूँ कुछ कर दिखाने का कार्यक्रम में में उत्तरप्रदेश के हर तरह के लोकगीतों को अपनी आवाज़ दी है। कल्पना की तरह वो भी एक बेहद प्रतिभाशाली कलाकार हैं। तो आइए देखें उनकी गायिकी के जलवे..



    Monday, July 14, 2008

    यादें केरल की समापन किश्त : केरल में बीता अंतिम दिन राजा रवि वर्मा की अद्भुत चित्रकला के साथ !

    तीस दिसंबर २००७ केरल में बिताया हमारा आखिरी दिन था। नए साल का स्वागत हम सब ट्रेन में ही करने वाले थे। हमारी वापसी की ट्रेन ३१ की सुबह एलेप्पी (Alleppy) से थी। पद्मनवा स्वामी मंदिर का बाहर से ही दर्शन के बाद हमारे पास तीन घंटे का समय और था। पता चला कि तिरुअनंतपुरम का चिड़ियाघर, संग्रहालय और चित्रालय सब एक ही जगह पर है। यानि उस इलाके में पहुँचने के बाद दो तीन घंटों का समय यूँ निकल जाना था। बच्चे साथ थे तो संग्रहालय से पहले चिड़ियाघर में घुसना पड़ा। बाकी जीव जंतु तो वही दिखे जो किसी भी चिड़ियाघर में दिखते हैं पर अब तक 'डिस्कवरी' और 'नेशनल ज्योग्राफिक चैनल ' में दिखते आए जिराफ को साक्षात देख कर खुशी हुई। चिड़ियाघर से निकलते-निकलते दो घंटे बीत चुके थे।

    चित्रालय या संग्रहालय में से किसी एक में जाने के लिए सिर्फ एक घंटे का समय हमारे पास था। लंबे चौड़े संग्रहालय को देखने के लिए ये समय सर्वथा अपर्याप्त था तो हम वहाँ के चित्रालय की ओर चले गए। यहाँ का चित्रालय केरल के महान चित्रकार राजा रवि वर्मा को समर्पित है।

    चित्रालय की पहली कला दीर्घा में राजा महाराजाओं के जीवंत चित्र देख कर आँखें ठगी की ठगी रह गईं। चित्रों में उकेरी भाव भंगिमा कुछ ऍसी थीं मानो वो कभी बोल या मुस्कुरा पड़ेंगी। दरअसल १८४८ में केरल के किलिमनूर (Kilimanoor) में जन्मे राजा रवि वर्मा बचपन से ही कूचियाँ चलाने में माहिर थे। कहा जाता है कि लड़कपन में ही उन्होंने घर की दीवारें जानवरों और रोजमर्रा की दिनचर्या से जुड़ी तसवीरें बना कर रंग दीं थी। ये वो समय था जब चित्रकारों के पास सिर्फ प्राकृतिक रंग होते थे। तैल चित्र बनाने की कला उन्होंने तिरुअनंतपुरम में आ कर सीखी। वहाँ से पोट्रेट बनाने में उन्होंने ऐसी महारत हासिल की कि उनकी प्रसिद्धि देश विदेश में फैलने लगी। १८७३ में उनके बनाए चित्र को विएना की कला दीर्घा में प्रदर्शित और पुरस्कृत किया गया। हालत ये हो गई उनके गाँव किलिमनूर में पोट्रेट्स बनाने के आग्रह के लिए इतनी चिट्ठियाँ आने लगीं कि वहाँ एक डाकखाना खोलना पड़ा।

    चित्रालयम मैं मौजूद कला दीर्घाओं में पोट्रेट्स के आलावा राजा रवि वर्मा के चित्रों को मुख्यतः दो कोटियों में बाँटा जा सकता है। एक तो वो तसवीरें हैं जो उस समय के समाज के चित्र को दर्शाती है और दूसरे हमारी पौराणिक कथाओं के विभिन्न प्रसंगों की कहानी कहती तसवीरें। हमारी प्राचीन कथाओं में राजा रवि वर्मा ने उन प्रसंगों को चुन कर अपनी कूची के रंगों में भरा जिसमें एक तरह का मेलोड्रामा है। प्रसंग में उपस्थित किरदारों का भाव निरूपण इस तरह से किया गया है कि प्रसंग का सार चित्र से सहज ही समझ आ जाता है।

    राजा रवि वर्मा ने पहली बार देवी देवताओं के चित्र हमारे आस-पास के परिदृश्य के साथ बनाने का चलन शुरु किया। देवी देवताओं की जो तसवीरें हम ज्यादातर अपने घर के कैलेंडरों में देखते हैं उसकी उत्पत्ति का श्रेय इस महान चित्रकार को जाता है। मैं करीब एक घंटे इस कला दीर्घा में रहा और त्रिवेंद्रम-कोवलम में बिताए गए समय में ये एक घंटा शायद मेरी स्मृतियों में सबसे ज्यादा दिनों तक बना रहेगा।

    चित्रालय में तसवीर खींचने की इज़ाजत नहीं थी पर आप गूगल देव की सहायता से अंतरजाल पर राजा रवि वर्मा की बनाई हुई कई तसवीरें देख सकते हैं। यहाँ अपनी पसंद की कुछ तसवीरों को पेश कर रहा हूँ..


    हाथों में लैंप लिए एक स्त्री ( Lady with a lamp)


    जटायु का वध करता रावण


    एक बंजारा परिवार (Gypsy Family)


    उत्तर भारत की एक ग्वालिन (North Indian Milkmaid)



    चित्रालय से निकलते हमें चार बज गए थे और रास्ते में खाते पीते हम करीब साढ़े आठ तक एलेप्पी पहुँच गए थे। हमारी ट्रेन सुबह पाँच बजे की थी इसलिए हमारी पहली कोशिश थी रेलवे के रिटायरिंग रूम में रात गुजारने की। पर आशा के विपरीत एलेप्पी स्टेशन बड़ा छोटा दिखाई दिया। एकमात्र रिटायरिंग रूम भरा हुआ था। स्टेशन के आस पास होटल क्या, ढंग के भोजनालय भी नहीं दिखे। स्टेशन के बिल्कुल करीब एलेप्पी या एलपुज्हा का समुद्र तट है और उसके किनारे कुछ गेस्ट हाउस भी हैं पर अब हमारे समूह को समुद्र तट देखने से ज्यादा होटल ढूँढने और सुबह सही समय स्टेशन पहुँचने की चिंता सता रही थी। होटल तो हमें मिल गया पर भोजन की तालाश में जब हम निकले तो साढ़े नौ बजे से ही एलेप्पी शहर सोता दिखाई दिया। पूर्व का वेनस (Venice of the East) कहे जाने वाले शहर में दुकाने साढ़े आठ नौ बजें ही बंद होने लगती हैं। तीस चालिस मिनट चक्कर काटने के बाद एक दुकान खुली दिखी तो वहाँ मेनू में डोसे के आलावा कुछ भी उपलब्ध नहीं था। थोड़ा बहुत खा कर हम वापस चल दिये केरल में अपनी अंतिम रात गुजारने के लिए।

    कुल मिलाकर केरल के इस दस दिनी प्रवास में हमने मुन्नार के हरे भरे बागानों और बैकवाटर में केरल के गाँवों की यात्रा सबसे अधिक भाई। मुन्नार से थेक्कड़ी का हरियाली से भरपूर रास्ता अभूतपूर्व सुंदरता लिए हुए था। कोचीन और कोवलम हमारी अपेक्षाओं से थोड़े कमतर निकले। अपने तेरह भागों के इस यात्रा वृत्तांत में मैं जो देख और महसूस कर पाया उसे आप तक पहुँचाने की कोशिश की है। जैसा कि आपसे वादा था केरल मे रहने, खाने पीने और घूमने के खर्चों की जानकारी मैं मुसाफ़िर हूँ यारों की हाल की पोस्ट में दे चुका हूँ। अब ये आप ही बता सकते हैं कि ये प्रयास कितना सफल रहा।

    इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ

    1. यादें केरल की : भाग १ - कैसा रहा राँची से कोचीन का २३०० किमी लंबा रेल का सफ़र
    2. यादें केरल की : भाग २ - कोचीन का अप्पम, मेरीन ड्राइव और भाषायी उलटफेर...
    3. यादें केरल की : भाग ३ - आइए सैर करें बहुदेशीय ऍतिहासिक विरासतों के शहर कोच्चि यानी कोचीन की...
    4. यादें केरल की : भाग ४ कोच्चि से मुन्नार - टेढ़े मेढ़े रास्ते और मन मोहते चाय बागान
    5. यादें केरल की : भाग ५- मुन्नार में बिताई केरल की सबसे खूबसूरत रात और सुबह
    6. यादें केरल की : भाग ६ - मुन्नार की मट्टुपेट्टी झील, मखमली हरी दूब के कालीन और किस्सा ठिठुराती रात का !
    7. यादें केरल की : भाग ७ - अलविदा मुन्नार ! चलो चलें थेक्कड़ी की ओर..
    8. यादें केरल की भाग ८ : थेक्कड़ी - अफरातरफी, बदइंतजामी से जब हुए हम जैसे आम पर्यटक बेहाल !
    9. यादें केरल की भाग ९ : पेरियार का जंगल भ्रमण, लिपटती जोंकें और सफ़र कोट्टायम तक का..
    10. यादें केरल की भाग १० -आइए सैर करें बैकवाटर्स की : अनूठा ग्रामीण जीवन, हरे भरे धान के खेत और नारियल वृक्षों की बहार..
    11. यादें केरल की भाग ११ :कोट्टायम से कोवलम सफ़र NH 47 का..
    12. यादें केरल की भाग १२ : कोवलम का समुद्र तट, मछुआरे और अनिवार्यता धोती की
    13. यादें केरल की भाग १३ : केरल में बीता अंतिम दिन राजा रवि वर्मा की अद्भुत चित्रकला के साथ !

    Wednesday, July 09, 2008

    नंगे हैं पाँव पर, धूप और छांव पर, दौड़ाते हैं डोला, हे डोला, हे डोला... : सुनिए कल्पना और भूपेन हजारिका के स्वर में ये मर्मस्पर्शी लोकगीत

    पिछली दो पोस्टों में आपने लोक गीतों में अंतरनिहित मस्ती और मासूमियत के रंगों से सराबोर पाया। पर आज जो लोक गीत मैं आपके सामने लाया हूँ वो अपने साथ मजदूर कहारों का दर्द समेटे हुए है। जुनूँ कुछ कर दिखाने में अब तक गाए लोकगीतों में मुझे ये सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुति लगी।

    इस लोकगीत में संदर्भ आज का नहीं है। अब तो ना वे राजा महराजा रहे , ना डोली पालकी का ज़माना रहा। पर कहारों की जिस बदहाल अवस्था का जिक्र इस लोकगीत में हुआ है उससे आज के श्रमिकों की हालत चाहे वो ईंट भट्टे में झोंके हुए हों, या आलीशान अट्टालिकाएँ बनाने में, कतई भिन्न नहीं है। अमीर और गरीब के बीच की खाई दिनों दिन बढ़ती ही गई है। और आज भी असंगठित क्षेत्र में श्रम का दोहन निर्बाध ज़ारी है।

    यही कारण है कि एक बार सुनने में ही ये गीत सीधा दिल को छूता है। वैसे भी गायिका कल्पना जब हैय्या ना हैय्या ना हैय्या ना हैय्या की तान छेड़ती हैं तो ऍसा प्रतीत होता है कि पालकी के हिचकोले से कहारों के कंधों पर बढ़ता घटता भार उनकी स्वरलहरी में एकाकार हो गया हो। कल्पना की आवाज़ अगर में एक दर्द भी है और एक धनात्मक उर्जा भी जो आपको झकझोरे हुए बिना नहीं रह पाती

    तो आइए सुने सबसे पहले कल्पना की आवाज़ में ये मर्मस्पर्शी गीत..



    हे डोला हे डोला, हे डोला, हे डोला
    हे आघे बाघे रास्तों से कान्धे लिये जाते हैं राजा महाराजाओं का डोला,
    हे डोला, हे डोला, हे डोला
    हे देहा जलाइके, पसीना बहाइके दौड़ाते हैं डोला
    हे डोला, हे डोला, हे डोला

    हे हैय्या ना हैय्या ना हैय्या ना हैय्या
    हे हैय्या ना हैय्या ना हैय्या ना हैय्या
    पालकी से लहराता, गालों को सहलाता
    रेशम का हल्का पीला सा
    किरणों की झिलमिल में
    बरमा के मखमल में
    आसन विराजा हो राजा



    कैसन गुजरा एक साल गुजरा
    देखा नहीं तन पे धागा
    नंगे हैं पाँव पर धूप और छांव पर
    दौड़ाते हैं डोला, हे डोला हे डोला हे डोला

    सदियों से घूमते हैं
    पालकी हिलोड़े पे है
    देह मेरा गिरा ओ गिरा ओ गिरा
    जागो जागो देखो कभी मोरे धन वाले राजा
    कौड़ियों के दाम कोई मारा हे मारा

    चोटियाँ पहाड़ की, सामने हैं अपने
    पाँव मिला लो कहारों...
    कान्धे से जो फिसला ह नीचे जा गिरेगा
    ह राजाओं का आसन न्यारा
    नीचे जो गिरेगा डोला
    हे राजा महाराजाओ का डोला
    हे डोला हे डोला हे डोला हे डोला......


    और अगर यू ट्यूब पर आप कल्पना की live performance देखना चाहते हों तो यहाँ देखें...

    मूलरूप से ये कहार गीत बंगाली में है जिसे सर्वप्रथम असम के जाने माने गायक और संगीतकार भूपेन हजारिका ने अपने एलबम 'आमि एक जाजाबर ' (मैं एक यायावर) में गाया था। ये गीत हिंदी में उसका अनुवाद मात्र है। शायद इसलिए कल्पना ने इसे गीत के अंत में बंगाली गीत के हिस्से को भी अपनी आवाज़ दी है ताकि इस गीत की जन्मभूमि का अंदाजा लग जाए। भूपेन दा का ये एलबम आप यहाँ से खरीद सकते हैं। पर अभी सुनिए इस गीत को दिया उनका निर्मल, बहता स्वर



    आज जब नई पीढ़ी हमारी मिट्टी से उपजे लोकगीतों से कटती जा रही है, 'जुनूँ कुछ कर दिखाने का' लोकगीतों को एक मंच देने का प्रयास अत्यंत सराहनीय है और साथ ही कल्पना और मालिनी जैसे प्रतिभाशाली कलाकारों के गायन को भी बढ़ावा देने की उतनी ही जरूरत है ताकि लोकसंगीत का प्रवाह, हर संगीतप्रेमी जन के मन में हो।

    Saturday, July 05, 2008

    असमी, झारखंडी और हिंदी लोकगीतों की अद्भुत छौंक : दैया री दैया चढ़ गयो पापी बिछुआ

    लोकगीतों में मिट्टी की सोंधी खुशबू होती है और साथ में होता है एक ऍसा भोलापन जिसे नज़रअंदाज कर पाना मुश्किल है। पिछली दफ़े आपने सुना कल्पना का गाया हुआ एक मस्त भोजपुरी गीत।

    मस्ती का रंग आज भी है पर आज के इस गीत में परिवेश है असम और उत्तर पूर्व का पर साथ ही इस गीत के तार झारखंडी गीतों की शैली से भी मिलते हैं। । अगर अलग-अलग क्षेत्रों में गाए जाने वाले लोकगीतों को एक ही गीत में पिरो कर सुनाया जाए तो वो छौंक अपना एक अलग आनंद देती है और आज के इस गीत में कुछ ऐसी ही बात है। जैसा कि मैंने आपको बताया था कि कल्पना मूलतः असम की हैं और अपनी जुबां में गाना भी बेहद पसंद करती हैं। तो तैयार हैं ना असम के बागानों से उठते इस बिहू गीत को सुनने के लिए आप। बिहू गीत वसंत के आगमन और असमी नव वर्ष के स्वागत के उपलक्ष्य में गाए जाते हैं। इस बिहू गीत में सुनें कल्पना की आवाज़ में चमेली की कहानी





    आखम देखर बाकी सारे सूवाली
    झूमोर तोमोर नासे कारो धे माली
    हे लक्ष्मी ना हई मोरे नाम चामेली
    वीरपुर ला बेटी मुर नाम चामेली

    छोटो छोटो छोकड़ी
    बड़ो बड़ो टोकरी
    नरम सकाच पाता तोले टोक टोक
    जवान बोदा राखी दे करे लक लक
    छोटो छोटो पोउ खाना करे धक धक
    कि भांति सोए हमर साहेली
    मन राख मोर नाम चामेली

    हे पाकदा आसिले कुनबा मुलका
    एसि आमि बिहू गाबो जानूँ


    और यहाँ से आगे गीत ने जो लय पकड़ी है वो बहुत कुछ झारखंड के उत्सवों पर गाए जाने वाले लोक गीतों की तरह है । यहाँ बताना मुनासिब होगा कि ऐसे गीतों को गाते वक़्त आदिवासी बालाएँ सफेद लाल पाड़ की साड़ी पहन, एक दूसरे की कमर में हाथ डाले बड़ी खूबसूरती से आगे पीछे की ओर थिरकती चलती हैं। गीत की लय ऍसी होती हे कि सुनने वाले का मन खुद ब खुद झूम जाता है जैसा कि कल्पना को सुन कर यहाँ झूम उठा

    हे हाहे हो सोरिम गयो मैना तुमा रेनू पुखुरी
    तुमा रेनू पुखुरी
    पार मैनू खोरी गोइ साला
    हे घामे घूमम गोये
    मैना तुमा रेनू हरिर
    तुमा रेनू हरिर
    माखी हइनू सूमा दिम लाला


    (शब्दों को चूंकि सुन कर लिखा है और इस भाषा की समझ ना के बराबर है इसलिए ऊपर के बोलों में गलती होने की पूरी गुंजाइश है।)

    यहाँ कल्पना वापस आ जाती हैं इस लोकप्रिय लोकगीत पर..

    हो बिछुआ हाए रे
    पीपल छैयाँ बैठी पल भर
    हो भर के गगरिया
    हाए रे हाए रे हाए रे
    दैया री दैया चढ़ गयो पापी बिछुआ
    हाय हाय रे मर गई कोई उतारो बिछुआ
    देखो रे पापी बिछुआ

    मंतर झूठा और बैद भी झूठा
    पिया घर आ रे , हाँ रे, हाँ रे, हाँ रे
    देखो रे देखो रे कहाँ उतर गयो बिछुआ
    सैयाँ को देख कर जाने किधर गयो बिछुआ
    देखो रे पापी बिछुआ

    दैया...................... बिछुआ




    पिछली पोस्ट पर कल्पना द्वारा भोजपुरी कैसेट्स में गाए सस्ते गीतों की बात उठी थी जिस पर की गई कंचन की टिप्पणी वस्तुस्थिति का खुलासा करती है। दरअसल प्रतिभाशाली गायकों को जब तक आप अपना हुनर दिखाने के लिए सही मंच नहीं प्रदान करेंगे वो बाजार की अर्थव्यवस्था के अनुरूप शासित होते रहेंगे। अपनी टिप्पणी में कंचन कहती हैं..

    "...समस्या कहे या असलियत ये है कि रेस्टोरेंट वो परोस रहे हैं जो हम खाना चाह रहे हैं.... अब समझ में नही आ रहा कि बाज़ारवाद के इस युग में गलती उपभोक्ता को दे या दुकानदार को ! भोजपुरी लोकगीतों को वही श्रोता सुन रहे हैं जो, बिलकुल नीचे तबके के हैं,..! पूरे दिन मेहनत कर के अनुराग जी के शब्दों मे जब वो अपनी सारी मेहनत का पसीना एक गिलास शराब बना कर पी जाता है, तब उसे जगजीत सिंह की गज़ल नही, ये कल्पना और गुड्दू रंगीला जैसे लोगो के गाने ही सुनने होते हैं जो उसकी झोपड़ी के २५० रु० के लोकल वाकमैन पर २५ रु के कैसेट से मनोरंजन करा देता है..! और जब कल्पना जैसे लोगो को सुनने वाला वही सुनना चाह रहा है तो वो, मजबूरी है उनकी कि वही सुनाए..!

    अगली पोस्ट में कल्पना के गाए एक और लोकगीत की चर्चा होगी जिससे यह स्पष्ट हो जाएगा कि लोकगीत मस्ती के रंगों को ही हम तक नहीं पहुँचाते पर कई बार आम जनों का दर्द भी भी श्रोताओं तक संप्रेषित करते हैं।

    Thursday, July 03, 2008

    हाथ में मेंहदी मांग सिंदुरवा बर्बाद कजरवा हो गइले : आइए सुनें गायिका कल्पना की आवाज में ये मस्ती भरा भोजपुरी लोकगीत

    पिछली पोस्ट में पंजाबी विरह गीत सुनाते वक़्त मैंने आपसे वादा किया था कि अपने इस चिट्ठे के जरिए एक नई कलाकार से आपको मिलवाउँगा। ये गायिका हैं कल्पना..।
    कल्पना ने भोजपुरी फिल्म जगत में अपनी गायिकी के जरिए एक अलग पहचान छोड़ी है और आजकल हिंदी फिल्म जगत में अपना उचित मुकाम हासिल करने के लिए संघर्षरत हैं। मज़े की बात ये है बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश में बोली जाने वाली भोजपुरी में जब कल्पना गाती हैं तो कोई कह ही नहीं सकता कि वो असम से ताल्लुक रखती हैं। पिछले दो तीन हफ्तों से NDTV Imagine के शो 'जुनूँ कुछ कर दिखाने का' में, मैं उन्हें लगातार सुन रहा हूँ।

    वे कार्यक्रम में 'माटी के लाल' समूह की सदस्या हैं। ये समूह इस कार्यक्रम में देश के विभिन्न भागों के लोकगीतों को पेश कर रहा है। कल्पना की गायिकी की सबसे बड़ी विशेषता उनकी लोकगीतों के भावों की उम्दा पकड़ है। किस पंक्ति को उसके भाव के हिसाब से कितना खींचना है, कहाँ रुक कर श्रोताओं को संगीत की ताल से रिझाना है , किस शब्द को शरारती लहजे में उच्चारित करना है ये अगर गायक या गायिका समझ जाए तो वो भोजपुरी का सफल लोक गायक अवश्य बन सकता है। और इसके लिए जरूरी है उस संस्कृति को समझना जहाँ से ये लोकगीत जन्मे हैं। कल्पना ना केवल एक संगीत सीखी हुई गायिका हैं पर उनकी गायिकी से ये भी साफ ज़ाहिर होता है कि वो भोजपुरी लोकगीतों के परिवेश को भी अच्छी तरह समझती हैं।

    अब जो लोग भोजपुरी भाषा से परिचित ना हों उनके लिए मैं इस गीत के भाव को बता देता हूँ।

    "नायिका के पति परदेश में हैं। पिया बिना उसका मन लग ही नहीं रहा। उनकी अनुपस्थिति में वो कभी श्रृंगार करती है, वर्षा ॠतु में पपीहे की बोली सुन उद्विग्न हो जाती है तो कभी सास से झगड़ा कर बैठती है। कई रातें सवेरे में बदल जाती हैं पर मन की उलझन है कि सुलझने का नाम ही नहीं लेती। "

    भोजपुरी गीतों में संगीत की भी एक अहम भूमिका होती है। हारमोनियम, झाल, मजीरे और ढोलक की थाप के बिना मस्ती का आलम आना मुश्किल है। अब इस गीत को सुनिए और संगीत के साथ कल्पना की लाजवाब गायिकी का आनंद लीजिए...

    <bgsound src="kalpana-hathmemehndi-junoon.wma">

    हाथ में मेंहदी मांग सिंदुरवा
    बर्बाद कजरवा हो गइले
    बाहरे बलम बिना नींद ना आवे
    बाहरे बलम बिना नींद ना आवे
    उलझन में सवेरवा हो गइले

    बिजुरी चमके देवा गर्जे घनघोर बदरवा हो गइले
    पापी पपीहा बोलियाँ बोले पापी पपीहा बोलियाँ बोले
    दिल धड़के सुवेरवा हो गइले
    बाहरे बलम बिन नींद न आवे
    उलझन में सुवेरवा हो गइले
    आ...................................

    अरे पहिले पहिले जब अइलीं गवनवा
    सासू से झगड़ा हो गइले
    बाकें बलम पर...अहा अहा
    बांके बलम परदेसवा विराजें
    उलझन में सुवेरवा हो गइले

    हाथ में मेंहदी मांग सिंदुरवा
    बर्बाद कजरवा हो गइले


    लोकगीतों की मस्ती कुछ ऐसी होती है कि ये भाषा और सरहदों की दीवार को यूँ तोड देती है जैसे वहाँ कोई अड़चन ही नहीं थी। अब इस वीडिओ में ही देखिए कल्पना की गायिकी का मज़ा आम जनता तो ले ही रही है, पड़ोस से आए सूफी के सुल्तान राहत फतेह अली खाँ भी कितने आनंदित होकर झूम रहे हैं।



    पर कल्पना की गायिकी का बस यही एक रूप नहीं हैं। उनके कुछ और लोकगीतों की चर्चा 'एक शाम मेरे नाम' पर जारी रहेगी.....

    Tuesday, July 01, 2008

    आइए सुनें युवा कलाकार अली अब्बास की आवाज़ में ये पंजाबी गीत : कदि आ मिल साँवल यार वे...

    गीत शब्दों से बनते हैं। गीतकार की भावनाओं को संगीत और आवाज के माध्यम से संगीतकार और गायक श्रोता के दिल में उतारते हैं। पर कई बार मेरे साथ ऍसा भी हुआ है जब गीत और संगीत दोनों पार्श्व में चले गए हों और रह गई हो तो सिर्फ एक आवाज़।


    दर्द में डूबती सी आवाज़...
    दिल में उतरती सी आवाज़...
    रोंगटे खड़ी करती आवाज़...



    पिछले दिनों NDTV IMAGINE के शो जुनूँ कुछ कर दिखाने का में मुझे कुछ ऍसी ही एक आवाज को सुनने का मौका मिला ...गायक थे फैसलाबाद , पाकिस्तान से आए अली अब्बास । अली अब्बास इस कार्यक्रम में 'सूफी के सुलतान' टीम के सदस्य हैं। अली अब्बास ने संगीत की तालीम नज़ाकत अली, हसन सिद्दिकी और इज़ाक क़ैसर से ली है। इस कार्यक्रम में गाए उनके जिस गीत की बात मैं कर रहा हूँ वो एक पंजाबी गीत है जिसे मूल रूप से पाकिस्तानी गायक मीकाल हसन साहब ने अपने एलबम 'समपूरन' में गाया था। मैंने इस गीत को सुनने के बाद मीकाल साहब का गाया हुआ वर्सन भी सुना पर उसमें वो बात नहीं दिखी जो इस युवा कलाकार की गायिकी (और वो भी Live Performance) में नज़र आई।

    इस गीत पर गौर करें तो पाएँगे कि ये प्रेम में विकल नायिका की अपने दूर जाते प्रेमी को वापस बुलाने की करुण पुकार है। अली अब्बास ने जब इस गीत को गाया तो ऍसा लगा कि ये सारा दर्द मैं खुद महसूस कर पा रहा हूँ। मुखड़े में सुर के उतार चढ़ाव तो इस खूबसूरती से लगाए गए हैं कि एक बार सुन कर ही मन वाह वाह कर उठता है।



    <bgsound src="aliabbas-kadiaamilsanwalyaar.wma">

    साजण प्रीत, लगा के..........
    दू..र दे..श मत जात
    दू......र दे.....श मत जात
    बसो हमा..री नगरी..
    मोहे सुंदर मुख दिखलात
    कदि आ मिल सांवल यार वे
    ओ कदि आ मिल साँवल यार वे
    मेरे रूं रूं चीख पुकार वे..(२)
    कदि आ......चीख पुकार वे
    कदि आ मिल साँवल यार वे...(२)

    मेरी जिंदड़ी होई उदास वे
    मेरा सांवल आस ना पास वे
    मेरी जिंदड़ी होई उदास वे
    मेरा सांवल आस ना पास वे
    मुझे मिले ना चार कहार वे
    मुझे... मिले ना चार कहा..र वे
    कदि आ मिल साँवल यार वे...(२)

    तुझ हरजाई की बाहों में
    और प्यार परीत* की राहों में (* प्रीत)
    तुझ हरजाई की बाहों में
    और प्यार परीत की राहों में
    मैं तो बैठी सब कुछ हार वे...(२)
    कदि आ मिल साँवल यार वे...(२)
    मेरे रूं रूं** चीख पुकार वे
    (यहाँ 'रूं रूं', 'रोम रोम'को कहा गया है)

    पंजाबी का बेहद अल्प ज्ञान रखता हूँ और इस गीत के लफ्ज़ सुन के यहाँ लिखे हैं। अगर कोई गलती दिखे तो बताने की कृपा कीजिएगा।

    इस गीत को यू ट्यूब पर भी देखा जा सकता है





    तो कैसा लगा ये गीत आपको ? अगले कुछ दिनों में एक और बेहतरीन कलाकार से मिलाने का मेरा वादा है जिसके गीतों में आप मिट्टी की सोंधी खशबू जरूर महसूस करेंगे...
     

    मेरी पसंदीदा किताबें...

    सुवर्णलता
    Freedom at Midnight
    Aapka Bunti
    Madhushala
    कसप Kasap
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    English, August: An Indian Story
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    स्पष्टीकरण

    इस चिट्ठे का उद्देश्य अच्छे संगीत और साहित्य एवम्र उनसे जुड़े कुछ पहलुओं को अपने नज़रिए से विश्लेषित कर संगीत प्रेमी पाठकों तक पहुँचाना और लोकप्रिय बनाना है। इसी हेतु चिट्ठे पर संगीत और चित्रों का प्रयोग हुआ है। अगर इस अव्यवसायिक चिट्ठे पर प्रकाशित चित्र, संगीत या अन्य किसी सामग्री से कॉपीराइट का उल्लंघन होता है तो कृपया सूचित करें। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी।

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