Wednesday, February 27, 2008

वार्षिक संगीतमाला २००७ पायदान संख्या ३ हीरे मोती मैं ना चाहूँ, मैं तो चाहूँ संगम तेरा.... कैलाश खेर

वार्षिक संगीतमाला की तीसरी सीढ़ी सुरक्षित है एक ऍसी आवाज़ के लिए जो अपने आप में दिव्य है। एक ऍसा कलाकार जो जब अपनी पूरी लय में डूबा होता है तो ऍसा लगता है कि परम पिता परमेश्वर तक उसके गायन की गूँज पहुँच रही होगी। जी हाँ मैं कैलाश खेर की बात कर रहा हूँ। मेरठ की गलियों से दिल्ली और फिर अँधेरी के प्लेटफार्म से काली होंडा सिटी की सवारी करने वाले कैलाश के सांगीतिक सफ़र की दास्तां तो मैं पहले यहाँ सुना ही चुका हूँ।

कैलाश की गायिकी में उनके बचपन के ग्रामीण परिवेश और पिता के अध्यात्म प्रेम का सीधा असर है। कैलाश कहा करते हैं, कि बचपन से उनके घर में संतों, फकीरों का आना जाना लगा रहता था। एकतारे पर गाते हुए जब कैलाश उन्हें देखते तो उनकी बातों का पूर्ण अर्थ ना समझते हुए उसे गाने लगते। लोक धुनों के प्रति कैलाश का झुकाव भी इसी परिवेश की उपज रहा है। कैलाश का मानना है जो गीत जीवन और प्रकृति के सत्यों को उद्घाटित करे वो ही मन को सबसे ज्यादा सुकून देता है और वो इसी बात को मन में रखकर अपने गीतों का ताना बाना बुनते हैं।


इस श्रृंखला का ये एकमात्र गैर फिल्मी गीत है। तीसरी पायदान का ये गीत कैलाश के इस साल रिलीज हुए एलबम झूमो रे से लिया गया है। यूँ तो सलाम-ए-इश्क में कैलाश खेर का गीत या रब्बा..... भी मुझे बेहद पसंद है पर मैं उसे इसलिए इस गीतमाला में शामिल नहीं कर सका कि गुरु की तरह सलाम- ए-इश्क का संगीत भी पिछले साल ही रिलीज हो गया था और दुर्भाग्यवश मै उसे उस वक्त सुन नहीं पाया था।

कैलाश खेर के लिखे इस गीत की धुन बनाने में सहयोग दिया है उनके बैंड के सदस्य प्रकाश कामथ और नरेस कामथ ने। इन तीनों ने मिलकर इस गीत के लिए अद्भुत संगीत रचा है। मुझे सबसे ज्यादा आकर्षित करता है अंतरे के बीच ताली और सेतार का प्रयोग। सेतार इरान का वो वाद्ययंत्र है जिससे भारतीय सितार विकसित हुआ। इस गीत में सेतार बजाने के लिए कैलाश ने इरान के सेतार वादक तहमुरेज़ को बुलाया था।

तो आइए पढ़ें प्रेम में पूरी तरह अपने आप को समर्पित करने वाली प्रेयसी की अपने सैयाँ के लिए ये प्रणय निवेदन...

हीरे मोती मैं ना चाहूँ
मैं तो चाहूँ संगम तेरा
मैं तो तेरी सैयाँ.. तू है मेरा
सैयाँ सैयाँ....


तू जो छू ले प्यार से, आराम से, मर जाऊँ
आ जा चंदा बाहों में, तुझ में ही गुम हो जाऊँ मैं
तेरे नाम में खो जाऊँ
सैयाँ सैयाँ.......


मेरे दिन खुशी से झूमें गाएँ रातें
पल पल मुझे डुबाएँ रातें जागते
तुझे जीत जीत हारूँ, ये प्राण प्राण वारूँ
हाए ऍसे मैं निहारूँ, तेरी आरती उतारूँ
तेरे नाम से जुड़े हैं सारे नाते
सैयाँ सैयाँ.......


बनके माला प्रेम की तेरे तन पे झर झर जाऊँ
मैं हूँ नैया प्रीत की संसार से हर जाऊँ मैं
तेरे प्यार से तर जाऊँ
सैयाँ सैयाँ.......


ये नरम नरम नशा है बढ़ता जाए
कोई प्यार से घूँघटिया देता उठाए
अब बावरा हुआ मन, जग हो गया है रौशन
ये नई नई सुहागन, हो गई है तेरी जोगन
कोई प्रेम की पुजारन मंदिर सजाए
सैयाँ सैयाँ.......


हीरे मोती मैं ना चाहूँ
मैं तो चाहूँ संगम तेरा
मैं ना जानूँ तू ही जाने
मैं तो तेरी, तू है मेरा


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(चित्र साभार हिंदुस्तान टाइम्स)

Sunday, February 24, 2008

वार्षिक संगीतमाला २००७ : पायदान संख्या ४ - पूछ रहे हैं स्वानंद कि क्यूँ नये नये से दर्द की फिराक़ में, तलाश में, उदास है दिल ?

वार्षिक संगीतमाला की चौथी कड़ी समर्पित है गीतकार, गायक और संवाद लेखक, रंगमंच कर्मी स्वानंद किरकिरे को जिन्होंने 'परिणिता 'और 'हजारों ख्वाहिशें ऍसी' के गीतों से मेरे दिल में पिछले तीन सालों से एक विशेष जगह बना ली थी। खोया खोया चाँद के इस गीत को जब मैंने उड़ते उड़ते सुना तो मैं आवाक रह गया कि इन्होंने तो मज़ाज लखनवी की नज़्म आवारा की पंक्तियाँ मार ली हैं। उस वक्त ये ध्यान नहीं रहा कि गीत की अगली पंक्ति में बकायदा स्वानंद ने 'मज़ाज' की प्रेरणा को चिन्हित किया था। वैसे तो मुझे पूरा गीत ही भाता है पर इसका ये हिस्सा मेरे लिए बेहद खास है ,लगता है अपनी ही भावनाओं को शब्द मिल गए हैं

दिल को समझाना कह दो क्या आसान है,
दिल तो फ़ितरत से सुन लो ना बेईमान है
ये खुश नही है जो मिला, बस माँगता ही है चला
जानता है हर लगी का, दर्द ही है बस इक सिला।
जब कभी ये दिल लगा, दर्द ही हमें मिला,
दिल की हर लगी का सुन लो दर्द ही है इक सिला !
क्यूँ नये नये से दर्द की फिराक़ में, तलाश में, उदास है दिल,
क्यूँ अपने आप से खफा-खफा ज़रा ज़रा सा नाराज़ है दिल


और जब कोई लेखक या गीतकार बार-बार ये एहसास दिलाते रहे कि वो आपकी बात कर रहा है तो दिल में उसकी जगह विशिष्ट हो जाती है। चाहे वो रात हमारी तो चाँद की सहेली हो..... या फिर बावरा मन देखने चला एक सपना..... स्वानंद ने हमेशा मेरी अनुभूतियों को छुआ है। आखिर स्वानंद में ये खासियत कहाँ से आई? चलिए ढ़ूंढ़ते हैं इस जवाब का हल उन्ही के कथ्यों द्वारा.. ..

क्या आपको पता है कि स्वानंद वाणिज्य के स्नातक हैं और उनके माता पिता खुद कुमार गंधर्व के शिष्य रहे हैं। पर स्वानंद का कहना है कि उन्होंने कभी संगीत के क्षेत्र में जाने का सपना नहीं देखा था। युवावस्था में वो यही सोचा करते कि माता पिता तो संगीत से जुड़े हैं ही, मैं कुछ नया क्यूँ ना करूँ ? उनकी ये सोच उन्हें ले गई नेशनल स्कूल आफ ड्रामा में। आज जिस बहुमुखी प्रतिभा का जौहर वो दिखा रहे हैं वो बहुत कुछ रंगमंच से जुड़े उनके दिनों की देन हैं। वो खुद कहते है कि नाटक में तो हमें सब करना होता था। धारावाहिक की कहानियों से लेकर संवाद लेखन तक, निर्देशन से गीतकार तक का ये सफ़र स्वानंद के लिए अपने विरासत मे मिले संस्कारों की तरफ बढ़ना भर है।

हाल ही में स्वानंद ने अपने एक साक्षात्कार में कहा


" मैं अभी भी बोलचाल की भाषा और दैनिक जीवन में दिखने वाले बिंबों का प्रयोग करता हूँ। नए जमाने के गीतकार की हैसियत से मैं सिर्फ तितलियों और नदी जैसे रुपकों का इस्तेमाल बारहा नहीं कर सकता। एक लेखक मूलतः अपने लिए लिखता है पर व्यवसायिक बंदिशों की वज़ह से ऐसा हमेशा नहीं हो पाता। आप भले ही खाना अच्छा बनाते हों पर एक खानसामे की हैसियत से ये भी जरूरी हे कि अगर आप ५ व्यंजन अपने ग्राहकों को खिलाएँ तो सात अपनी ओर से भी परोसें।"


गुलज़ार की तरह उनका मानना है कि गीत ऍसे ना हों जिनमें सब स्पष्ट हो, कुछ ऍसा भी होना चाहिए जो सुनने वाले को सोचने को मज़बूर करे उसे बार बार उस गीत को सुनने के लिए विवश करे। स्वानंद गीतकार का किरदार किसी भी हालत में संगीतकार से कम नहीं मानते। वो कहते हैं कि मैं खुद एक गीतकार बना क्यूंकि गाने सुनते वक्त मेरा ध्यान सबसे ज्यादा गीत के बोलों पर रहता था। आखिर सही तो कहते हें वो, ज्यादातर गीत जो हमें याद रह जाते हैं वो उनके बोलों की वज़ह से।

तो चलिए अब सुनते हैं ये गीत जिसके बोल मैंने कंचन चौहान के चिट्ठे हृदयगवाक्ष से मामूली फेर बदल के बाद लिए हैं

आज शब जो चाँद ने है रूठने की ठान ली,
गर्दिशों में है सितारे बात हमने मान ली!
अंधेरी स्याह जिंदगी को सूझती नही गली,
कि आज हाथ थाम लो इक हाथ की कमी खली
क्यूँ खोये खोये चाँद की फिराक़ में, तलाश में, उदास है दिल,
क्यूँ अपने आप से खफा-खफा ज़रा ज़रा सा नाराज़ है दिल
ये मंजिलें भी खुद ही तय करे,
ये फासले भी खुद ही तय करे
क्यूँ तो रास्तों पे फिर सहम सहम सम्हल सम्हल के चलता है ये दिल
क्यूँ खोये खोये चाँद की फिराक़ में, तलाश में, उदास है दिल,

जिंदगी सवालों के जवाब ढूँढ़ने चली,
जवाब में सवालों की इक लंबी सी लड़ी मिली।
सवाल ही सवाल हैं सूझती नही गली,
कि आज हाथ थाम लो इक हाथ की कमी खली!

जी में आता है, मुर्दा सितारे नोच लूँ
इधर भी नोच लूँ, उधर भी नोच लूँ !
एक दो का ज़िक्र क्या मैं सारे नोच लूँ !
इधर भी नोच लूँ, उधर भी नोच लूँ !
सितारे नोच लूँ मैं सारे नोच लूँ

क्यूँ तू आज इतना वहशी है, मिज़ाज में मज़ाज़ है ऐ गम ए दिल
क्यूँ अपने आप से खफा-खफा ज़रा ज़रा सा नाराज़ है दिल
ये मंजिलें भी खुद ही तय करे,
ये फासले भी खुद ही तय करे
क्यूँ तो रास्तों पे फिर सहम सहम सम्हल सम्हल के चलता है ये दिल
क्यूँ खोये खोये चाँद की फिराक़ में, तलाश में, उदास है दिल,

दिल को समझाना कह दो क्या आसान है,
दिल तो फ़ितरत से सुन लो ना बेईमान है
ये खुश नही है जो मिला, बस माँगता ही है चला
जानता है हर लगी का, दर्द ही है बस इक सिला।
जब कभी ये दिल लगा, दर्द ही हमें मिला,
दिल की हर लगी का सुन लो दर्द ही है इक सिला !
क्यूँ नये नये से दर्द की फिराक़ में, तलाश में, उदास है दिल,
क्यूँ अपने आप से खफा-खफा ज़रा ज़रा सा नाराज़ है दिल

ये मंजिलें भी खुद ही तय करे,
ये फासले भी खुद ही तय करे
क्यूँ तो रास्तों पे फिर सहम सहम सम्हल सम्हल के चलता है ये दिल
क्यूँ खोए खोए चाँद की फिराक़ में, तलाश में, उदास है दिल,
कयूँ अपने आप से खफा-खफा ज़रा ज़रा सा नाराज़ है दिल
ये मंजिलें भी खुद ही तय करे,
ये फासले भी खुद ही तय करे
क्यूँ तो रास्तों पे फिर सहम सहम सम्हल सम्हल के चलता है ये दिल
क्यूँ खोये खोये चाँद की फिराक़ में, तलाश में, उदास है दिल,

खोया खोया चाँद के इस गीत की धुन बनाई शान्तनु मोइत्रा ने और स्वानंद के साथ सहयोगी स्वर है उनके पुराने जोड़ीदार अजय झींगरन





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इस संगीतमाला के पिछले गीत

Friday, February 22, 2008

सुदर्शन फ़ाकिर सहज शब्दों में गहरी बात कहने वाला बेमिसाल शायर :मेरी श्रृद्धांजलि

कल यूनुस के चिट्ठे पर सुदर्शन फ़ाकिर के ना रहने की खबर पढ़ कर कलेजा धक से रह गया। सुदर्शन उन शायरों में से थे जिसने मेरे जैसे आम संगीत प्रेमी को ग़ज़ल से जोड़ा। उर्दू की ज्यादा जानकारी ना रखने वालों को भी गज़लों की ओर मुखातिब करने में उनका योगदान कोई भुला नहीं सकता। पिछले एक साल से उन पर आधारित एक श्रृंखला शुरु करने की मेरी मंशा थी पर ये पता ना था कि मैं अपनी ये इच्छा पूरी करूँ उससे पहले ही ये महान शायर दुनिया से रुखसत हो जाएगा।

सुदर्शन साहब ने अपने जीवन का एक अहम हिस्सा पंजाब के शहर जालंधर में बिताया। जालंधर के डी ए वी कॉलेज से राजनीति शास्त्र और अंग्रेजी में परास्नातक की डिग्री प्राप्त करने वाले फ़ाकिर ७३ साल की उम्र में एक लंबी बीमारी के बाद गत सोमवार को अपना शहर छोड़ गए। युवावस्था से फ़ाकिर को रंगमंच और शायरी का शौक था। कॉलेज के जमाने में मोहन राकेश का लिखा नाटक 'आषाढ़ का एक दिन' का उन्होंने निर्देशन किया और वो जनता द्वारा काफी सराहा भी गया। कुछ दिनों तक उन्होंने रेडिओ जालंधर में काम किया और फिर मुंबई चले आए।

अस्सी के दशक में जगजीत-चित्रा की जोड़ी को जो सफलता मिली उसमें सुदर्शन फा़किर की लिखी नायाब ग़ज़लों का एक अहम हिस्सा था। वो कागज़ की कश्ती.. इश्क़ ने गैरते जज़्बात..और पत्‍थर के ख़ुदा पत्‍थर के सनम पत्‍थर के ही इंसां पाए हैं... का जिक्र तो यूनुस अपनी पोस्ट में कर ही चुके हैं । सुदर्शन साहब की जो नज़्में और ग़ज़लें मेरे दिल के बेहद करीब रहीं हैं उनका एक छोटा सा गुलदस्ता मैं अपनी इस प्रविष्टि के माध्यम से श्रृद्धांजलि स्वरूप उन्हें अर्पित करना चाहता हूँ....

बात १९९४ की है जब इनकी ये ग़ज़ल सुनी थी और इसका नशा वर्षों दिल में छाया रहता था । आज भी जब इनकी ये ग़ज़ल गुनगुनाता हूँ तो वही मस्ती मन में समा जाती है।

चराग़-ओ-आफ़ताब ग़ुम, बड़ी हसीन रात थी
शबाब की नक़ाब ग़ुम, बड़ी हसीन रात थी

मुझे पिला रहे थे वो कि ख़ुद ही शम्मा बुझ गयी
गिलास ग़ुम शराब ग़ुम, बड़ी हसीन रात थी

लिखा था जिस किताब में, कि इश्क़ तो हराम है
हुई वही किताब ग़ुम, बड़ी हसीन रात थी

लबों से लब जो मिल गये, लबों से लब जो सिल गये
सवाल ग़ुम जवाब ग़ुम, बड़ी हसीन रात थी


जगजीत जी ने इस ग़ज़ल को गाया भी बड़ी खूबसूरती से है।

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फ़ाकिर ने कुछ फिल्मों के लिए गीत भी लिखे। फिल्म यलगार के संवाद लेखन भी उन्होंने किया। NCC कैम्पस में गाया जाने वाला समूह गान उन्हीं का रचा हुआ है। पर असली शोहरत उन्हें अपनी ग़ज़लों से ही मिली। सीधे सहज शब्दों से गहरी बात कहने का हुनर उनके पास था। अब इन्हीं शेरों पर गौर करें मरी मरी सी जिंदगी को ढ़ोने की मजबूरी पर क्या तंज कसे हैं उन्होंने बिना किसी कठिन शब्द का सहारा लिए हुए


किसी रंजिश को हवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी
मुझ को एहसास दिला दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी

मेरे रुकने से मेरी साँसे भी रुक जायेंगी
फ़ासले और बढ़ा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी

ज़हर पीने की तो आदत थी ज़मानेवालो
अब कोई और दवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी

चलती राहों में यूँ ही आँख लगी है 'फ़ाकिर'
भीड़ लोगों की हटा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी


आइए सुने इस ग़ज़ल को चित्रा सिंह की आवाज़ में
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सुदर्शन फ़ाकिर ने ना केवल अपनी ग़जलों से कमाल पैदा किया बल्कि कई खूबसूरत नज़्में भी लिखीं। उनकी ये नज़्म मुझे सरहद पार के एक मित्र से करीब दस वर्षों पहले पढ़ने को मिली और ये तभी से मेरी प्रिय नज़्मों में एक है।

ये शीशे ये सपने ये रिश्ते ये धागे
किसे क्या ख़बर है कहाँ टूट जायें
मुहब्बत के दरिया में तिनके वफ़ा के
न जाने ये किस मोड़ पर डूब जायें

अजब दिल की बस्ती अजब दिल की वादी
हर एक मोड़ मौसम नई ख़्वाहिशों का
लगाये हैं हम ने भी सपनों के पौधे
मगर क्या भरोसा यहाँ बारिशों का

मुरादों की मंज़िल के सपनों में खोये
मुहब्बत की राहों पे हम चल पड़े थे
ज़रा दूर चल के जब आँखें खुली तो
कड़ी धूप में हम अकेले खड़े थे

जिन्हें दिल से चाहा जिन्हें दिल से पूजा
नज़र आ रहे हैं वही अजनबी से
रवायत है शायद ये सदियों पुरानी
शिकायत नहीं है कोई ज़िन्दगी से


फ़ाकिर की एक और खूबसूरत ग़ज़ल है शायद मैं ज़िन्दगी की सहर जिसे गुनगुनाना मुझे बेहद प्रिय है

शायद मैं ज़िन्दगी की सहर ले के आ गया
क़ातिल को आज अपने ही घर लेके आ गया

ता-उम्र ढूँढता रहा मंज़िल मैं इश्क़ की
अंजाम ये कि गर्द-ए-सफ़र लेके आ गया

नश्तर है मेरे हाथ में, कांधों पे मैक़दा
लो मैं इलाज-ए-दर्द-ए-जिगर लेके आ गया

"फ़ाकिर" सनमकदे में न आता मैं लौटकर
इक ज़ख़्म भर गया था इधर लेके आ गया


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फ़ाकिर के बारे में उनके मित्र कहते हैं कि वो अपने आत्मसम्मान पर कभी आंच नहीं आने देते थे। छोटी छोटी बातों पर वे कभी समझौता नहीं करते थे। फ़ाकिर ने अपनी शायरी में जिंदगी और समाज के अनेक पहलुओं को छुआ चाहे वो बचपन की यादें हो, युवावस्था के स्वप्निल दिन, समाज की असंवेदनशीलता हो या बढ़ती सांप्रदायिकता। मिसाल के तौर पर उनकी ये ग़ज़ल देखें..

आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंज़र क्यूँ है
ज़ख़्म हर सर पे हर इक हाथ में पत्थर क्यूँ है

जब हक़ीक़त है के हर ज़र्रे में तू रहता है
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदिर क्यूँ है

अपना अंजाम तो मालूम है सब को फिर भी
अपनी नज़रों में हर इन्सान सिकंदर क्यूँ है

ज़िन्दगी जीने के क़ाबिल ही नहीं अब "फ़ाकिर"
वर्ना हर आँख में अश्कों का समंदर क्यूँ है

फ़ाकिर आज हमारे बीच नहीं हैं पर उनकी भाषाई क्लिष्टता से मुक्त सीधे दिल तक पहुँचने वाली शायरी हमेशा हमारे साथ रहेगी।

सुदर्शन साहब की ग़जलों का संग्रह आप कविताकोश में पढ़ सकते हैं
(सुदर्शन फ़ाकिर के बारे में व्यक्तिगत जानकारी पंजाब के अंग्रेजी अखबार 'दि ट्रिब्यून' से साभार)

Tuesday, February 19, 2008

वार्षिक संगीतमाला २००७ : पायदान संख्या ५ - तेरे बिन, सन सोणिया कोई होर नहीं ओ लभना

हाँ तो दोस्तों करीब डेढ़ महिने की संगीतमय यात्रा को पूरा कर मैं आ पहुँचा हूँ इस संगीतमाला की ५ वीं सीढ़ी पर। अब इस गीत के बारे में लिखने के लिए मुझे कुछ ज्यादा नहीं करना क्योंकि पिछले सितंबर में इस के बारे में मैं विस्तार से लिख चुका हूँ। जी हाँ पाँचवी पायदान के हीरो हैं रब्बी शेरगित जिनके इस गीत को फिल्म दिल्ली हाइट्स में शामिल किया गया था। तो आइए एक बार फिर से बात करें इस गीत के बारे में....

पश्चिमी रॉक , लोक संगीत और सूफ़ियाना बोल का मिश्रण सुनने में आपको कुछ अटपटा सा नहीं लगता। ज़ाहिर है जरुर लगा होगा। मुझे भी लगा था जब मैंने इस नौजवान को नहीं सुना था। पर २००५ में जब मैंने 'बुल्ला कि जाणा मैं कौन' सुना तो रब्बी शेरगिल की गायिकी का मैं कायल हो गया। आज, बुल्ले शाह के सूफी लफ़्जों को गिटार के साथ इतने बेहतरीन ढ़ंग से संयोजित कर प्रसिद्धि पाने वाले रब्बी शेरगिल किसी परिचय के मुहताज़ नहीं हैं। आज की तारीख़ में उनके पास प्रशंसकों की अच्छी खासी जमात है। पर रब्बी को ये शोहरत आसानी से नहीं मिली।

सितंबर १९८८ में ब्रूस स्प्रिंगस्टीन के कान्सर्ट में संगीत को अपना पेशा चुनने की ख़्वाहिश रखने वाले रब्बी सत्रह साल बाद अपना खुद का एलबम निकालने का सपना पूरा कर पाए। ख़ैर बुल्ला ..के बाजार में पहुँचने की दास्तान तो अपने आप एक पोस्ट की हकदार है, वो बात कल करेंगे। आज चर्चा करेंगे रब्बी के गाए इस गीत की जिसे एक बार सुन कर ही मन प्रेमी के शब्दों की मासूमियत में बहता चला जाता है। अब देखिए ना, पंजाबी मेरी जुबान नहीं फिर भी इस गीत के बोल, पंजाब की मिट्टी की ख़ुशबू मेरे इर्द गिर्द फैला ही जाते हैं।

अब भला एक अच्छे च्यक्तित्व के स्वामी, गिटार के इस महारथी को पंजाबी में गाने की कौन सी जरुरत आन पड़ी? रब्बी इस प्रश्न का जवाब कुछ यूं देते हैं....

"...हम जाट सिख लोगों को अपनी भाषा पर गर्व है। वो मेरे ज़ेहन से नहीं निकल सकती। दूसरी भाषा में सोचने का मतलब उसकी श्रेष्ठता को स्वीकार कर लेना होगा। वैसे भी अंग्रेजी में गाकर मुझे दूसरे दर्जे का रॉक सिंगर नहीं बनना। मैं कभी भूल नहीं सकता कि मैं कौन हूँ. ....."

काश हमारे हिंदी फिल्मों के कलाकार भी अपनी भाषा के बारे में ये सोच रखते!

खैर रब्बी की आवाज, उनके खुद के लिखे बोल, अंतरे के बीचों-बीच में गिटार की मधुर बंदिश इस गीत में खोने के लिए काफ़ी हैं। तो लीजिए इस गीत का आनंद उठाईए।

क्या कहा पंजाबी नहीं आती !

गीत का दर्द तो आप इसकी भाषा जाने बिना भी महसूस कर सकेंगे पर आपकी सुविधा के लिए इस गीत का हिंदी अनुवाद भी इसके बोल के साथ साथ देने की कोशिश की है।


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तेरे बिन, सन सोणिया
कोई होर नहींऽओ लभना
जो देवे, रुह नूँ सकून
चुक्के जो नखरा मेरा



तुम्हारे सिवा इस दुनिया में मूझे कोई और पसंद नहीं। तुम्हारे आलावा कौन है जो मेरे नखरे सहे और जिस का साथ दिल को सुकून दे सके?


वे मैं सारे घूम के वेखिया, अमरीका, रूस, मलेशिया
ना किते वी कोई फर्क सी, हर किसे दी कोई शर्त सी
कोई मंगदा मेरा सी समा, कोई हूंदा सूरत ते फ़िदा
कोई मंगदा मेरी सी वफा, ना कोई मंगदा मेरियां बला
तेरे बिन, होर ना किसे, मंगनी मेरियां बला
तेरे बिन, होर ना किसे, करनी धूप विच छां
तेरे बिन, सन सोणिया...


मैंने कहाँ कहाँ घूम कर नहीं देखा, अमरीका हो या रूस, या फिर मलेशिया। कहीं कोई फर्क नहीं है, सारे मतलबी हैं। सबकी कोई ना कोई शर्त है। कोई मेरा समय चाहता है तो कोई मेरे रूप पर मोहित है। किसी को वफादारी का वादा चाहिए।

पर मेरी कमियाँ... वो तो कोई नहीं लेना चाहता....सिवाय तेरे। इसीलिए तो मैं कहता हूँ कि तुम मेरे लिए जिंदगी की इस कड़ी धूप में एक ठंडी छाँह की तरह हो।

जीवैं रुकिया, सी तुन ज़रा, नहीं भूलना मैं सारी उमर
जीवें अखियाँ सी अक्खन चुरा, रोवेंगा सानू याद कर
हँसिया सी मैं हँसा अज़ीब, तू नहीं सी हँसिया
दिल विच तेरा जो राज सी, मैंनू तू क्यूँ नहीं दसिया
तेरे बिन, सानू एह राज, किसे होर नहींऽओ दसना
तेरे बिन, पीड़ दा इलाज, किस वैद कोलों लभना
तेरे बिन, सन सोणिया...


मैं जीवन भर भूल नहीं सकता वो दिन..जिस तरह तुम हौले से रुकी थी और मुझसे आँखे चुराते हुए कहा था कि मेरी याद तुम्हें रुलाएगी। इक अज़ीब सी हँसी हंसा था मैं पर तुम तो नहीं हँसी थी। तुमने क्यूँ नहीं कहा कि तुम्हारे दिल मे वो प्यारा सा राज नज़रबंद है। भला बताओ तो तुम्हारे आलावा ये राज मुझे कौन बता सकता है? तुम्हारे बिना वो कौन सा वैद्य है जो मेरे दिल का इलाज कर सकता है?

मिलिआँ सी अज्ज मैनू तेरा इक पत्रां
लिखिआ सी जिस तै, तुन शेर वारे शाह दा
पढ़ के सी ओस्नूँ, हांजनू इक दुलिया
आँखांच बंद सी, सेह राज अज्ज खुलिया
कि तेरे बिन, एह मेरे हांजनू, किसे होर नहींऽओ चुमना
कि तेरे बिन, एह मेरे हांजनू मिट्टी विच रुंदणा


मुझे आज ही तेरा लिखा वो ख़त मिला जिसमें तूने वारिस शाह का वो शेर लिखा था। उसे पढ़कर अनायास ही आँसू का एक कतरा नीचे ढलक पड़ा वो राज खोलता हुआ जो मेरी आँखों मे अर्से से बंद था.। अब मेरे इन आँसुओं को तुम्हारे सिवा कोई और नहीं चूमेगा। सच तो ये है कि तुम्हारे बिना मेरे लिए इन आँसुओं को मिट्टी की गर्द फाँकना ही बेहतर है।

तेरे बिन, सन सोणिया
कोई होर नहींऽओ लभना
जो देवे, रुह नूँ सकून
चुक्के जो नखरा मेरा


इस गीत को दिल्ली हाइट्स में जिमी शेरगिल और नेहा धूपिया पर फिल्माया गया है। साथ-साथ रब्बी तो हैं ही..




Sunday, February 17, 2008

वार्षिक संगीतमाला २००७ : पायदान संख्या ६ - तेरे सवालों के वो जवाब जो मैं दे ना दे ना सकूँ...

बॉलीवुड में अक्सर ऍसा होता रहा है कि जब कोई फिल्म विराट स्तर पर प्रदर्शित नहीं होती या फिर ज्यादा दिन नहीं चलती तो उसके गीत लोगों तक पहुँच ही नहीं पाते और गीतकार संगीतकार की सारी मेहनत पानी में चली जाती है। अब मुझे पूरा यक़ीन है कि आप में से बहुतों ने 'मनोरमा सिक्स फीट अंडर' के बारे में ज्यादा चर्चा नहीं सुनी होगी। समीक्षकों द्वारा अच्छा करारे जाने पर भी ये फिल्म सिनेमाघरों की शोभा ज्यादा दिनों तक नहीं बढ़ा पाई।

इसी फिल्म का एक गीत जो इसके प्रोमो को सुनते समय मन में अटक गया था आज आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ। इस गीत को गाया रूप कुमार राठौड़ और महालक्ष्मी ऐयर ने और इसके बोल लिखे मनोज तापड़िया ने। इस गीत की धुन बनाई जयेश गाँधी ने जो बतौर गायक तो कई फिल्मों में अपना स्वर दे चुके हैं पर संगीतकार की हैसियत से शायद उनकी ये पहली फिल्म है।

आतिफ असलम, मुस्तफ़ा ज़ाहिद सरीखे पाकिस्तानी गायकों के ऊँचे सुरों को पूरे कौशल से लगा सकने की महारत को जो लोकप्रियता भारत में मिली है उससे प्रभावित होकर संगीतकार यहाँ के गायकों को भी वैसे गीत दे रहे हैं। ज़ुबीन गर्ग हों , कृष्णा हों या फिर मिथुन शर्मा इन सबने इस genre के गीतों में कमाल किया है। इसलिए जब रूप कुमार राठौड़ को ऊँचे सुरों में मैंने गाते सुना
आँखों के, आलों में, चाहत की लौ जलने दो...

तो विस्मय के साथ साथ मन मुग्ध हो गया।

शब्दों की बात करें तो मनोज तापड़िया के बोल प्रेमियों की आपसी कशमकश को व्यक्त करते दिखते हैं। जिंदगी में अपने करीबी से कई बार आप कुछ नहीं कह कर भी बहुत कुछ कह जाते हैं। रिश्तों के उलझे धागों में से कई सवाल बाहर निकल कर ऐसे आते हैं जिनके जवाब आँखें , होठों से ज्यादा बेहतर तरीकें से दे पाती हैं...


तेरे सवालों के वो जवाब जो मैं दे ना दें ना सकूँ
पिघले से अरमां हैं, दो पल के मेहमां हैं
आँखों के, आलों में, चाहत की लौ जलने दो
तेरे सवालों के वो जवाब जो मैं दे ना दें ना सकूँ


कह रही है जो नज़र तुझे है खबर की नहीं
कह रही है तेरी नज़र तू बेखबर तो नहीं
तेरे बिना जिंदगी है अधूरी, तेरे बिना क्या है जीना
पिघले से अरमां हैं, दो पल के मेहमां हैं
आँखों के आलों में चाहत की लौ जलने दो


तुम कहो तो मैं रोक लूँ, जो तुम कहो तो नहीं
सीने में है ये कैसी खलिश, तेरी कशिश तो नहीं
तेरे बिना जिंदगी है अधूरी, तेरे बिना क्या है जीना
पिघले से अरमां हैं, दो पल के मेहमां हैं
आँखों के आलों में चाहत की लौ जलने दो

तेरे सवालों के वो जवाब जो मैं दे ना दें ना सकूँ
तेरे बिना जिंदगी है अधूरी, तेरे बिना क्या है जीना


तो आइए सुनते हैं छठी पायदान के इस गीत को


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