Tuesday, January 29, 2008

वार्षिक संगीतमाला २००७ : पायदान १२ - हम तो ऐसे हैं भैया..

बनारस शहर से मेरा कोई खास परिचय नहीं, अलबत्ता ये जुरूर है कि एक बार यहाँ की गलियों में भटकते भटकते रास्ता भूल बैठा हूँ। अपने तरह का शहर है ये बनारस..। इसकी एक छवि पंकज मिश्रा ने भी उतारी थी अपनी किताब दि रोमान्टिक्स में...।

शहर के बदलते स्वरूप के बारे में पंकज अपनी किताब की शुरुआत में कहते हैं..
नए मध्यमवर्ग की कुलीनता बनारस में भी दिखने लगी है। सदियों से हिन्दुओं का ये पवित्र तीर्थ स्थल जहाँ लोग पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति पाने आते थे, अब एक छोटा भीड़ भरा व्यवसायिक शहर बन चुका है। इसीलिए पंकज आगे कहते हैं


".....This is as it should be: one can't feel too sad about such, changes. Benares -destroyed & rebuilt so many times during centuries of Muslim & British rule - is, the Hindus say the abode of Shiva, the god of perpetual creation & destruction.The world constantly renews itself and when you look at it that way, regret & nostalgia seem equally futile. ...."

सच ही तो है वक़्त के पहिए को कौन रोक पाया है।

पंकज ने तो बनारस की पृष्ठभूमि में अपनी कथा को आगे बढ़ाया था पर उस किताब और इस गीत में साम्य बस इतना है कि यहाँ भी उसी पृष्ठभूमि में 'लागा चुनरी में दाग' फिल्म की कथा विकसित होती है। सुबह की बेला .. मंदिर से बजती घंटियाँ और दूर किसी साधक का स्वर, मवेशियों और लोगों से पटी ऐसी ही चंद आवाज़ों के साथ बनारस की गलियों का ये संगीतमय सफ़र शुरु होता है दो बहनों की आपसी बातचीत से।

स्वानंद किरकिरे ने कुछ मिनटों के गीत में बनारस के कई रूपों को छूने की कोशिश की है । शहर के बारे में कहते-कहते वो एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार की समस्याओं को भी बड़ी खूबसूरती से बोलों में बाँध जाते हैं। स्वानंद निश्चित रूप से अपने इस प्रयास के लिए बधाई के पात्र हैं। इस गीतमाला में स्वानंद आगे भी हाज़िरी देंगे तब उनके बारे में विस्तार से चर्चा होगी।

बोलों के आलावा सुनिधि चौहान और श्रेया घोषाल की बेहतरीन युगल गायिकी को सुन कर मन से वाह वाह निकलती है। इसमें कोई शक नहीं की १२ वीं पायदान का ये गीत इस साल का सर्वश्रेष्ठ युगल गीत है। समव्यस्क बहनों के बीच जो अपनापन होता है वो इन दोनों गायिकाओं ने क्या खूब उभारा है। सुनिधि का पान खाए हुए व्यक्ति की तरह गाना तो मुझे बिलकुल कमाल लगा।

पहले स्वानंद किरकिरे के बोलों का आनंद लें..

जेब में हमरी दू ही रूपैया
दुनिया को रखें ठेंगे पे भैया
सुख दुख को खूँटी पे टांगे
और पाप पुण्‍य चोटी से बाँधें
नाचे हैं ताता थैया
हम तो ऐसे हैं भैया
ये अपना फैशन है भैया
हम तो ऐसे हैं भैया


एक गली बम बम भोले
दूजी गली में अल्‍ला-मियां
एक गली में गूंजें अज़ानें
दूजी गली में बंसी बजैया

सबकी रगों में लहू बहे है
अपनी रगों में गंगा मैया
सूरज और चंदा भी ढलता
अपने इशारों पे चलता
दुनिया का गोल गोल पहिया
हम तो ऐसे हैं भैया ....

आजा बनारस का रस चख ले आ
गंगा में जाके तू डुबकी लगा
रबड़ी के संग संग चबा लेना उंगली
माथे पे भांग का रंग चढ़ा
चूना लगई ले,पनवा खिलईदे
उसपे तू ज़र्दे का तड़का लगई दे
पटना से अईबे, पेरिस से अईबे
गंगा जी में हर कोई नंगा नहइबे
जीते जी जो कोई काशी ना आए
चार चार कांधों पे वो चढ़के आए

हम तो ऐसे हैं भईया..हम तो ऐसे हैं भईया..
ये अपनी नगरी है भईया..अरे हम तो ऐसे हैं भईया..
दीदी अगर तुझको होती जो मूँछ
मैं तुझको भईया बुलाती तू सोच
अरे छुटकी अगर तुझको होती जो पूँछ
तो मैं तुझको गैया बुलाती तू सोच
दीदी ने ना जाने क्‍यूँ छोड़ी पढ़ाई
घर बैठे अम्‍मां संग करती है लड़ाई
अम्‍मां बेचारी पिसने है आई
रात दिन सुख दुख की चक्की चलाई
घर बैठे बैठे बाबूजी हमारे
लॉटरी में ढूंढते हैं किस्‍मत के तारे
3...2....1272
मंझधार में हमरी नैया
फिर भी देखो मस्‍त हैं हम भैया
हम तो ऐसे हैं भैया

दिल में आता है यहाँ से
पंछी बनके उड़ जाऊँ
शाम ढले फिर दाना लेकर
लौट के अपने घर आऊँ
हम तो ऐसे हैं भैया , अरे हम तो ऐसे हैं भैया ...


तो अनीता कुमार जी और मनीष जोशी साहब इंतज़ार की घड़ियाँ हुई समाप्त। जितना ये गीत आप दोनों को पसंद है उतना मुझे भी है तो लीजिए सुनिए शान्तनु मोइत्रा द्वारा संगीतबद्ध इस गीत को




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इस संगीतमाला के पिछले गीत


Monday, January 28, 2008

वार्षिक संगीतमाला २००७ : पायदान १३ - ना है ये पाना, ना खोना ही है...

तो दोस्तों गीतों के इस सफ़र पर आ पहुँचे हैं हम इस संगीतमाला के ठीक मध्य में। और मेरी तेरहवीं पायदान के हीरो हैं इस गीत के गायक मोहित चौहान ! क्या कमाल किया है उन्होंने इरशाद कामिल के लिखे और प्रीतम द्वारा संगीतबद्ध इस प्यारे से नग्मे में , ये आप गीत सुनकर ही महसूस कर सकते है।


आप में से बहुतों ने मोहित चौहान को शायद ही पहले सुना हो। मैंने पहली बार इन्हें फिल्म 'मैं, मेरी पत्नी और वो' में 'गुनचा कोई तेरे नाम कर दिया...' गाते सुना था और वास्तव में उस गीत को सुनकर मैं मोहित से मोहित हुए बिना नहीं रह पाया था । उस गीत को मैंने इस चिट्ठे पर यहाँ पेश किया था

मोहित की संगीत यात्रा शुरु हुई १९९७ में। उन्हें सफलता का स्वाद उसी साल तब मिला जब मोहित की अगुवाई में बने बैंड सिल्क रूट के पहले एलबम बूंदें के गीत डूबा डूबा... को 'चैनल वी' ने अपने शो में साल के गैर फिल्मी एलबम में सबसे बढ़िया गीत के रूप में चुना। सिल्क रूट प्रथम दो वर्षों की चर्चा के बाद धीरे धीरे अपनी लोकप्रियता खोता गया। पिछले चार पाँच वर्षों में मोहित को फिल्मों में गिने चुने मौके मिले हैं। पर चाहे वो 'मैं, मेरी पत्नी और वो' या फिर 'रंग दे वसंती' या फिर इस साल की 'जब वी मेट' , उन्होंने हर मिले मौके से अपनी प्रतिभा को साबित किया है।

मोहित चौहान, हिमाचल से आते हैं। वो कहा करते हैं कि शुरुआती दिनों में अपने गायन में वो गूँज या 'थ्रो' पैदा करने के लिए व्यास नदि के किनारे चले जाते थे। हिमाचल की ज्यादातर संगीत बिरादरी के साथ उन्होंने काम किया हुआ है और वहाँ के लोक संगीत से भी वो जुड़े रहे हैं। आठ साल की उम्र से ही मोहित संगीत में दिलचस्पी लेने लगे। गाने के साथ एकाउस्टिक गिटार में भी वो उतने ही प्रवीण हैं। उनकी गायिकी की खासियत ये है कि वो गीत की संपूर्ण भावनाएँ आत्मसात कर अपनी अदाएगी में झोंक देते हैं।

इस गीत के बोलों को लिखा है पंजाब के इरशाद कामिल ने जो तत्कालीन कविता में डॉक्टरेट की उपाधि से विभूषित है। स्क्रिप्ट लेखन से अपना फिल्मी कैरियर शुरु करने वाले इरशाद अब 'जब वी मेट' में गीतकार की हैसियत से उतरे हैं और आप तो जानते ही हैं कि इस फिल्म के गीत कितने लोकप्रिय हो रहे हैं.

क्या खूबसूरत मुखड़ा दिया है उन्होंने.... ना है ये पाना, ना खोना ही है, तेरा ना होना जाने ,क्यूँ होना ही है ?....और इस लय के साथ जब मोहित की आवाज़ बहने लगती है तो इस गीत से वशीभूत हुए बिना कोई चारा नहीं बचता...

ना है ये पाना, ना खोना ही है
तेरा ना होना जाने .
क्यूँ होना ही है ?

तुम से ही दिन होता है
सुरमयी शाम आती है
तुमसे ही तुमसे ही

हर घड़ी साँस आती है
ज़िंदगी कहलाती है
तुमसे ही तुमसे ही

ना है या पाना......होना ही है ?

आँखों मे आँखें तेरी
बाहों में बाहें तेरी
मेरा न मुझमें कुछ रहा
हुआ क्या
बातों में बातें तेरी
रातें सौगातें तेरी
क्यूँ तेरा सब ये हो गया
हुआ क्या
मैं कहीं भी जाता हूँ
तुमसे ही मिल जाता हूँ
तुमसे ही तुमसे ही
शोर में खामोशी है
थोड़ी सी बेहोशी है
तुमसे ही तुमसे ही

आधा सा वादा कभी
आधे से ज्यादा कभी
जी चाहे कर लूँ इस तरह, वफा का
छोड़े ना छूटे कभी
तोड़े ना टूटे कभी
जो धागा तुमसे जुड़ गया, वफा का...

मैं तेरा सरमाया हूँ
जो भी मैं बन पाया हूँ
तुमसे ही तुमसे ही
रास्ते मिल जाते हैं
मंजिलें मिल जाती हैं
तुमसे ही तुमसे ही

ना है ये पाना....


तो आइए सुनें जब वी मेट के इस गीत को


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इस संगीतमाला के पिछले गीत


Saturday, January 26, 2008

वार्षिक संगीतमाला २००७ : पायदान १४- चंदा रे, चंदा रे धीरे से मुसका..हौले से हौले से पलकों में छुप जा

तो सज्जनों गणतंत्र दिवस के इस पावन दिन पर जॉज संगीत से बाहर निकलते हैं और चलते हैं विशुद्ध मेलोडी की दुनिया में ! और यहाँ शान से खड़ा है १४ वीं पायदान का ये गीत जो उस गीत-संगीतकार जोड़ी का है जिसकी एक रचना रतिया अँधियारी रतिया..२००४ में मेरी वार्षिक गीतमाला का सरताज गीत बनी थी। इसे गाया है एक नई गायिका ने, जो पहली बार इस गीतमाला में दाखिल हो रही हैं। पर उनकी बात थोड़े देर में..।

चंदा यानि चाँद को संबोधित इस छोटे से गीत के मुख्य सितारे हैं इसके संगीतकार शान्तनु मोइत्रा । जैसे ही आप इस गीत के मुखड़े को सुनते हैं, मन अज़ीब सी शांति से तर जाता है और इसकी सुरीली पंक्तियों को गुनगुनाने के लोभ से अपने आपको मैं अलग नहीं रख पाता। 'परिणिता' के उस सरताज गीत और इस गीत में एक समानता तो जरूर है। और वो है पार्श्व में रह-रह कर बजते घुंघरुओं की झनझनाहट। गौर करने की बात है कि पीछे से हल्के हल्के बजता संगीत आपका ध्यान गीत के बोलों पर जमाए रखता है। बीच-बीच में आती बाँसुरी और तबले की संगत भी मन को आनंदित करती चलती है। तो आइए इस गीत के बोलों से पहले रूबरू हो लें

चंदा रे, चंदा रे धीरे से मुसका
हौले से हौले से
पलकों में छुप जा
हौले से हौले से... छन छन छन छन छन छन खन छना
बादल के झूले पे...खन खन खन खन खन खन खन खना
हौले से हौले से,बादल के झूले पे
मुसका
चंदा रे, चंदा .......छुप जा

अरे लुक्का छिपी खेले चंदा तारों के संग
कौन थामे डोरी, तू है किसकी पतंग
चंदा ओ रे चंदा तेरा कैसा गुरूर
हँस दे जरा सा बरसा दे तू नूर

चंदा रे, चंदा रे धीरे से मुसका
हौले से हौले से
पलकों में छुप जा




इस गीत के बोल लिखे हैं स्वानंद किरकिरे ने जो मेरी गीतमाला में हर साल ऊपर की पायदानों में अपना दखल अवश्य रखते हैं। स्वानंद की बात इस गीतमाला में आगे भी होगी पर अगर आपने गीत सुनना शुरु कर दिया है तो आपका ध्यान हवा के झोंके सी ताज़ी इस नई आवाज़ पर अवश्य गया होगा।


इसे गाया है पुणे में जन्मी ३५ वर्षीय हमसिका अय्यर ने जो गोरेगाँव, मुंबई निवासी हैं और १९९५ में सा रे गा मा... पे हिस्सा भी ले चुकी हैं। हमसिका के पिता संगीतज्ञ हैं और बांसुरी बजाते हैं। इस गीत को सुनने के कई घंटे बाद भी उनकी स्पष्ट गायिकी दिलो दिमाग में गूंजती रहती है। आशा है हमसिका आगे भी अपने गायन से संगीतप्रेमियों का दिल जीतती रहेंगी। तो आइए सुनें एकलव्य दि रॉयल गार्ड जो इस साल भारत की ओर से आस्कर पुरस्कारों के लिए आधिकारिक तौर पर नामांकित फिल्म है, के इस गीत को



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इस संगीतमाला के पिछले गीत

Thursday, January 24, 2008

वार्षिक संगीतमाला २००७ : पायदान १५ - जब भी सिगरेट जलती है, मैं जलता हूँ...

नहीं, नहीं मैं सिगरेट नहीं पीता। सिगरेट के धुएँ से एलर्जी तो मैंने विरासत में पाई है पर कॉलेज और नौकरीपेशा जिंदगी में, सुट्टेबाजों की सोहबत में रहने का मौका, बहुधा मिला है। सिगरेट की तलब उठने पर उनके चेहरे की बेचैनी को आप नज़रअंदाज नहीं कर सकते।

मेरी इस संगीतमाला के १५ वीं पायदान का गीत इन्ही सिगरेट प्रेमियों के मनोविज्ञान को सामने लाता है। ये अपने आप में एक अनूठा गीत है एक ऍसे विषय पर, जो अब तक गीतकारों के लिए अनछुआ ही रहा है।

सिगरेट पीने के नुकसानों को भली-भांति समझने वाले भी क्यूँ उसे चाह कर भी छोड़ नहीं पाते उसे गुलज़ार साहब ने बड़ी खूबसूरती से लिखा है और इसके लिए वो तारीफ़ के पात्र हैं। पर खास बात ये है कि उतने ही बेहतरीन अंदाज में इसे अपना स्वर दिया है अदनान सामी ने। अदनान के द्वारा गाए इस गीत को सुनते ही आप को ऍसा लगता है कि आप किसी ऍसी महफिल का हिस्सा बन गए हों जहाँ संगीत और नृत्य के बीच धुएँ के कश रह-रह कर उठ रहे हों।

तो गुलज़ार के शब्दों पर गौर करें।

Hey I Waana Tell You About This Thing
This Stick Of Cigarette, Yeah

फिर तलब, तलब, है तलब, तलब
बेसबब, बेसबब फिर तलब, है तलब
शाम होने लगी है, शाम होने लगी
लाल होने लगी है, लाल होने लगी


जब भी सिगरेट जलती है, मैं जलता हूँ
आग पे पाँव पड़ता है, कमबख्त धुएँ में चलता हूँ
जब भी सिगरेट जलती है, मैं जलता हूँ
फिर किसी ने जलाई एक दियासलाई
फिर किसी ने जलाई एक दियासलाई
ओ.. आसमां जल उठा है, शाम ने राख उड़ाई
उपले जैसा सुलगता हूँ, कमबख्त धुएँ में चलता हूँ

लम्बे धागे धुएँ के, साँस सिलने लगे हैं
प्यास उधड़ी हुई है, होठ छिलने लगे हैं
शाम होने लगी है, शाम होने लगी
ओ.. लाल होने लगी है , लाल होने लगी

कड़वा है धुआँ जो निगलता हूँ
जब भी सिगरेट जलती है, मैं जलता हूँ
आग में पांव पड़ता है, कमबख्त धुएँ में चलता हूँ
जब भी सिगरेट जलती है, मैं जलता हूँ


वैसे तो 'नो स्मोकिंग' नहीं चली पर इसका गीत संगीत बम्बइया फिल्मी गीतों से कुछ हट के है। विशाल भारद्वाज की बहुमुखी प्रतिभा का अंदाज आप इस बात से लगा सकते हैं कि उन्होंने इस गीत में पश्चिमी संगीत की एक विधा जॉज का प्रयोग किया है जिसमें सेक्सोफोन, ट्रम्पेट जैसे वाद्य यंत्रों की प्रधानता रहती है। पर मुख्य बात ये है कि गीत और संगीत को इस तरह से रचा गया है कि वे एक दूसरे से गुथे नज़र आते हैं.

तो आइए सुनते हैं ये गीत

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इस संगीतमाला के पिछले गीत

वार्षिक संगीतमाला २००७ : पायदान १६ - रोज़ाना जिये रोज़ाना मरें...तेरी यादों में हम..

वार्षिक संगीतमाला की इस पायदान पर गीत वो, जिसे पहले तो मैंने रखा था बीसवीं सीढ़ी पर बार-बार सुनने के बाद ये और ज्यादा अच्छा लगने लगा। इस गीत के साथ ही एक नई तिकड़ी का आगमन हो रहा है इस गीतमाला में। ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि ये गीत, इस साल के सबसे रूमानी गीतों में एक है। इसके बोलों को लिखा चंडीगढ़ के युवा गीतकार मुन्ना धीमन ने। मुन्ना बचपन से ही लेखन में रुचि लेते आए हैं। नाटकों के लिए स्क्रिप्ट से लेकर कैडबरी के एड जिंगल तक की रचना उन्होंने की है।

इस गीत में कहीं कोई बनावटीपन नहीं दिखता। बस निश्चल प्रेम में कहे गए सीधे सच्चे से शब्द जो सीधे दिल पर जाकर लगते हैं और इसलिए असरदार साबित होते हैं।

पर मुन्ना के बोलों को अपनी गहरी संवेदनशील आवाज़ से सँवारा है अमिताभ बच्चन ने। अमिताभ के गाए गंभीर गीतों में मुझे 'सिलसिला ' का उनका गाया गीत नीला आसमान सो गया.... सबसे ज्यादा पसंद है। इस गीत को नीचे के सुरों से जैसे उन्होंने ऊपर की ओर उठाया है वो मन को छू लेता है। अपनी गायिकी में अमिताभ ने मुन्ना के भावों को यथासंभव उभारने की कोशिश की है।

इस गीत के साथ ही पहली बार इस साल आए हैं विशाल भारद्वाज इस गीतमाला में। विशाल ने पिछले साल ओंकारा में अपने बेमिसाल संगीत से सारे सुधी संगीत प्रेमियों का दिल जीत लिया था। विशाल इस गीत के बारे में कहते हैं
"कि जब इस गीत की रिकार्डिंग चल रही थी तो अमित जी ने कहा कि विशाल, तुम्हारे सामने मैं ये गीत गाने में असहज महसूस करूँगा इसलिए तुम स्टूडियो के बाहर ही बैठो।"

विशाल का मत है कि जिस खूबसूरती से अमित जी ने इस गीत को निभाया है कि उन्हें अन्य सितारों के लिए भी पार्श्व गायन करना चाहिए।

किसी ऐसे शख्स जिससे हमने कभी बेइंतहा मोहब्बत की हो, उसे जिंदगी से भौतिक रूप से अलग करना जितना सहज है, उतना ही कठिन है उसे अपनी यादों से जुदा करना। सोते जागते जिंदगी के हर लमहे में वो चेहरा मंडराता ही रहता है। किस हद तक हम इन यादों में डूबते चले जाते हैं वो आप इस गीत के लफ़्जों में महसूस कर सकते हैं
रोज़ाना जिये रोज़ाना मरें
तेरी यादों में हम...तेरी यादों में हम
रोज़ाना...

उंगली तेरी थामे हुए हर लमहा चलता हूँ मैं
उंगली तेरी थामे हुए हर लमहा चलता हूँ मैं
तुझको लिए घर लौटूँ और, घर से निकलता हूँ मैं
इक पल को भी जाता नहीं तेरे बिन कहीं
यूँ रात दिन, बस तुझमें ही, बस तुझमें ही
लिपटा रहता हूँ मैं
रोज़ाना...रोज़ाना...रोज़ाना..रोज़ाना

रोज़ाना जिये रोज़ाना मरें...
रोज़ाना जलें रोज़ाना घुलें
तेरी यादों में हम...तेरी यादों में हम
रोज़ाना...रोज़ाना...रोज़ाना..हम्म..रोज़ाना

हर दिन तेरी, आँखों से इस, दुनिया को तकता हूँ मैं
तू जिस तरह, रखती थी घर, वैसे ही रखता हूँ मैं
तेरी तरह, संग संग चलें, यादें तेरी
यूँ हर घड़ी, बातों में बस, बातों में तेरी
गुम सा रहता हूँ मैं
रोज़ाना...

कुछ गाऊँ तो याद आते हो
गुनगुनाऊँ तो याद आते हो
कुछ पहनूँ तो याद आते हो
कहीं जाऊँ तो याद आते हो
कुछ खोने पे याद आते हो
कुछ पाऊँ तो याद आते हो

रोज़ाना चले, यादों पर तेरी
ज़िंदगी का सफ़र....
तुझसे है रोशन, तुझसे है जिंदा
ये दिल का शहर... ये दिल का शहर..
रोज़ाना..रोज़ाना..रोज़ाना.........
तो आइए सुनें फिल्म निशब्द से लिया हुआ ये भावपूर्ण गीत



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इस संगीतमाला के पिछले गीत

Sunday, January 20, 2008

वार्षिक संगीतमाला २००७ : पायदान १७ - चका चका ची चा चो चक लो रम...बम बम बोले

दफ़्तर के दौरों की वज़ह से ये संगीतमाला अटकती हुई आगे बढ़ रही है और इसके लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूँ। आज सुबह ही नागपुर से लौटा हूँ और रात में फिर एक दूसरे काम से प्रस्थान करना है। खैर ये सब तो चलता ही रहेगा । तो आज आपके सामने है इस संगीतमाला की पायदान १७ जिस पर एक ऐसी फिल्म का गीत है जिसके गाने इस पूरी श्रृँखला में दो तीन बार नहीं बल्कि पूरे चार बार बजने वाले हैं। जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ 'तारे जमीं पर' कि जिसका मूल विषय नन्हे बच्चों की जिंदगी से जुड़ा है। अब जहाँ बच्चे हों और मौज मस्ती का माहौल ना हो ऍसा कहीं हो सकता है।

मेरे प्रिय गीतकार प्रसून जोशी ने बच्चों की इसी उमंग को बनाए रखा है अपने खूबसूरत बोलों के लिए। बच्चे कितना खुले दिमाग से सोचते हैं..उनकी कल्पनाएँ बिना किसी पूर्वाग्रह के रचित होती हैं..इस ख्याल को प्रसून इतने बेहतरीन अंदाज़ में शब्दों का जामा पहनाते हैं कि मन उनकी इस काबिलियत को नमन करने को होता है।

अब देखिए तो बारिश को आसमान के नल खुले होने से जोड़ना , या पेड़ की जगह किसी व्यक्ति के लबादा ओढ़ खड़े होने की बात हो। ये सोच सहज ही एक बाल मन को सामने ले आती है। प्रसून ने साथ ही इस गीत और इस फिल्म के अन्य गीतों में भी वर्तमान शैक्षिक प्रणाली में रट्टेबाजी की अहमियत को आड़े हाथों लेते हुए मौलिक चिंतन को तरज़ीह देने पर बल दिया है। उनकी ये सोच निश्चय ही प्रशंसनीय है और इस गीत के माध्यम से एक अच्छा संदेश देने में सफल रहे हैं।



इस गीत को संगीतबद्ध किया है शंकर-अहसान-लॉए की तिकड़ी ने और इसे स्वर दिया है शान के साथ खुद आमिर खान ने। कुल मिलाकर ये एक ऍसा गीत है जो बच्चों के साथ साथ बड़ों को भी गुनगुनाने में बेहद आनंद देता है। मैंने इसके बोलों को गीत के साथ सुनते हुए लिखने की कोशिश की है ताकि गीत सुनते सुनते आप भी आमिर की तरह अक्को टक्को करते चलें :)।


चका चका ची चा चो चक लो रम
गंडो वंडो लाका राका टम
अक्को टक्को इडि इडि इडि गो
इडि पाई विडि पाई चिकी चक चो
गिली गिली मल सुलु सुलु मल
माका नाका हुकू बुकू रे
टुकू बुकू रे चाका लका
बिक्को चिक्को सिली सिली सिली गो
बगड़ दुम चगड़ दुम चिकी चका चो


देखो देखो क्या वो पेड़ है
चादर ओढ़े या खड़ा कोई
बारिश है या आसमान ने
छोड़ दिए हैं नल खुले कहीं
हो... हम जैसे देखें ये ज़हां है वैसा ही
जैसी नज़र अपनी
खुल के सोचें आओ
पंख जरा फैलाओ
रंग नए बिखराओ
चलो चलो चलो चलो
नए ख्वाब बुन लें

हे हे हे........
सा पा, धा रे, गा रे, गा मा पा सा
बम बम बम, बम बम बम बोले
बम चिक बोले, अरे मस्ती में डोले
बम बम बोले.....मस्ती में डोले
बम बम बोले..मस्ती में तू डोल रे


भला मछलियाँ भी क्यू