२६ दिसंबर को ग्यारह बजे हम चांसलर रिसार्ट से मुन्नार शहर को कूच कर गए। कहते हैं मुन्नार शब्द मुनु (तीन) और आरू (नदी) के मिलने से बना है। ये तीन नदियाँ हैं मुद्रापुज्हा (Mudrapuzha), नल्लाथन्नी (Nallathanni) और कुंडला (Kundala)। इन तीनों नदियों के संगम पर कुंडला बाँध का निर्माण हुआ है जो शहर से करीब १३ किमी दूर है। बाँध के कुछ किमी पहले मट्टुपेट्टी झील (Mattupetty Lake) है। अगर बगल का मानचित्र देखें तो मुन्नार शहर पहुँच कर हमें पूर्व की तरफ जाने वाली सड़क पर मुड़ना था।
मुन्नार शहर एक सामान्य कस्बे की तरह दिखता है जिसे हर मोड़ पर बने छोटे बड़े होटल और सैलानियों की भीड़ बड़ा अनाकर्षक रूप दे देती है। पर इस कस्बे से एक किमी दूर आप जिधर भी बढ़ें न भीड़ भाड़ दिखती है और ना तो कंक्रीट के जंगल......।
दिखती है तो बस चारों और पहाड़ियों के बीच चाय बागानों की निर्मल स्वच्छ हरियाली।. केरल सरकार की इस बात के लिए तारीफ करनी होगी कि उन्होंने मुन्नार की नैसर्गिक सुंदरता को बचाए रखने के लिए इसके व्यापक शहरीकरण पर रोक लगाई हुई है।

रास्ते में जगह-जगह स्थानीय महिलाएँ हरी पत्तियों के साथ ताजे गाजर बेच रही थीं जो खाने के साथ देखने में भी बेहद खूबसूरत लग रहे थे। कुछ ही देर में हमारी गाड़ी मट्टुपेट्टी झील को पार कर रही थी। हमारा इरादा पहले सबसे दूर वाले स्थल
इको प्वायंट पर पहुँच कर वापसी में मट्टुपेट्टी झील के किनारे चहलकदमी करने का था। इको प्वायंट पर निराशा हाथ लगी। पर्यटकों की भारी भीड़ वहाँ पर मौजूद थी। सामने नीचे झील का जल मंद-मंद बह रहा था। झील के पार पहाड़ियों थीं।
'शायद' आवाज़ वहीं से लौटकर आती होगी।
शायद इसलिए कह रहा हूँ कि हमारे वहाँ घंटे भर बिताने के बावजूद भी किसी भी पर्यटक के चिल्लाने से कोई Echo सुनाई नहीं दी।
मट्टुपेट्टी झील और चेक डैम के आधा किमी आगे झील में
स्पीडबोट की व्यवस्था है। पर वहाँ लाइन इतनी लंबी थी कि हमने बाकी लोगों को उसकी सवारी का आनंद उठाते हुए देखकर ही संतोष कर लिया। वैसे आप अगर जाएँ तो इस सफ़र का आनंद अवश्य लें। इको प्वायंट पर पैडल बोट पर बच्चे चले गए और मैं इधर उधर चहलकदमी करने लगा। सामने ही एक छोटी दुकान पर गरम गरम पकौड़ियाँ तली जा रहीं थीं। आलू, प्याज के आलावा मिर्चे की पकौड़ी भी मेनू में थी। पर मिर्चों का आकार देख कर पहले तो खाने की हिम्मत नहीं हुई। पर बाद में खाने पर पता चला की ये मिर्चें, हमारी तरफ की मिर्चों की तरह तीखी नहीं हैं।

इस हल्की पेट पूजा के बाद अपने चालक को मट्टुपेट्टी डैम पर इंतजार करने को कह, हमने तीन किमी का सफर पैदल ही तय करने का निश्चय किया।
इको प्वायंट से मट्टुपेट्टी झील का रास्ता बेहद मनमोहक है। एक तरफ हरे भरे विरल जंगल और दूसरी ओर पहाड़ी ढलानों पर फैली हरी धानि घास के खूबसूरत कालीन। पर सुरक्षा गार्ड इन हरी कालीनों पर आपको घूमने नहीं देते। ये जगह फिल्म की शूटिंग में भी काम में आती है। पर कुछ दूर आगे जाकर एक जगह दिखाई दी जहाँ सुरक्षा गार्ड नहीं थे। बच्चों की मौज हो गई वो घास की ढ़लान पर दौड़ते और फिसलते नीचे पहुँच गए।
ऊपर आकाश की गहरी नीलिमा, सामने हरे भरे पेड़ों और चाय बागानों से लदीं पहाड़ियाँ और नीचे झील का बहता जल और बीच की ये हरी दूब..मैं तो ये देखकर बस आनंदविभोर होकर वहीं बैठ गया। 
आधे घंटे बिताने के बाद हम वहाँ से आगे बढ़े। कुछ ही दूर पर सड़क की बाँयी तरफ
इंडो स्विस डेयरी फार्म दिखा जो आम पर्यटकों के लिए खुला नहीं था। यहाँ पर स्विस प्रजाति की कई किस्मों की गायों का पालन पोषण होता है। रास्ते में बच्चे और बड़े हाथी की सवारी का आनंद ले रहे थे। स्पीड बोट वाली लाइन अब भी वैसी ही थी। झील का मोहक दृश्य पूरे रास्ते भर दिखाई देता रहा जो हमें निरंतर चलने को प्रेरित करता रहा। लौटते वक्त हम मुन्नार के
फ्लोरिकल्चर सेन्टर में रुके जिसकी सचित्र रिपोर्ट आपको शीघ्र ही
मुसाफ़िर हूँ यारों पर दी जाएगी।

शाम को हम मुन्नार के
सरवन भवन में खाने पहुँचे। सरवन भवन मुन्नार के शाकाहारी भोजनालयों में सबसे ज्यादा चर्चित है और इसका प्रमाण मुझे खाने के लिए लगी लंबी लाइन को देखकर मिला। यहाँ की एक नवीनता ये भी है कि भोजन, केले के बड़े=बड़े पत्तों पर खिलाते हैं। शाम होने वाली थी और हम अपने नए ठिकाने पर चल पड़े। अब यहाँ मात्र एक कमरे में दो परिवारों को रात गुजारनी थी। लिहाज़ा हमने जमीन पर ही अपना गद्दा बिछाया। रात को जब-जब हम सोने को उद्यत होते बगल के किसी समारोह से लाउडस्पीकर पर रह रह कर आती मलयालम लोक गीत की बहार हमारी निद्रा में खलल डाल देती और अटपटे से शब्दों को सुनकर सब को हँसी के दौरे पड़ जाते।
ग्यारह के बाद ये शोर तो कम हुआ पर ठंड बढ़ने लगी। आते वक़्त जब ट्रेन में कोई बता रहा था कि मुन्नार का तापमान दिसंबर में शून्य से भी नीचे चला जाता है तो हमें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि मात्र १५०० मीटर ऊँचाई पर स्थित हिल स्टेशन में ऍसा हो सकता है। अब अतिरक्त कंबल के नाम पर होटल वाले ने पतली सी कंबल दी थी जो उस ठंड के लिए अपर्याप्त निकली। नतीजन सारी रात करवट बदलते और ठिठुरते बीती। मन ही मन सोचा, भगवन तूने दो रातों में जीवन के दोनों रंगों से साक्षात्कार करा दिया।..
अगली सुबह हमारा
इराविकुलम राष्ट्रीय उद्यान देख कर
थेक्कड़ी निकलने का कार्यक्रम था। कैसी रही ये यात्रा ये जानते हैं इस यात्रा वृत्तांत की अगली किश्त में..

चांसलर रिसार्ट से निकलते समय पश्चिमी घाट की परत दर परत दिखती पहाड़ियाँ

झील का एक और मनोरम दृश्य

पीछे दिख रहा है '
इंडो स्विस डेयरी फार्म' जाने का रास्ता

थाली सरवन भवन की !
इस श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ
- यादें केरल की : भाग १ - कैसा रहा राँची से कोचीन का २३०० किमी लंबा रेल का सफ़र
- यादें केरल की : भाग २ - कोचीन का अप्पम, मेरीन ड्राइव और भाषायी उलटफेर...
- यादें केरल की : भाग ३ - आइए सैर करें बहुदेशीय ऍतिहासिक विरासतों के शहर कोच्चि यानी कोचीन की...
- यादें केरल की : भाग ४ कोच्चि से मुन्नार - टेढ़े मेढ़े रास्ते और मन मोहते चाय बागान
- यादें केरल की : भाग ५- मुन्नार में बिताई केरल की सबसे खूबसूरत रात और सुबह
6 comments:
वाह मनीष जी,
आपने यात्रा का बड़ा सजीव वर्णन किया है, आगे की कड़ी का बेसब्री से इंतजार रहेगा |
हिल स्टेशन के नाम पर एक बार शिमला गये थे लेकिन कंक्रीट के जंगल देखकर मन खिन्न हो गया था | मुन्नार उससे बहुत भिन्न लग रहा है, पक्का यात्रा का कार्यक्रम बनाया जायेगा |
बच्चों के फोटो देखकर लग रहा है उन्होंने मन भरकर मौज ली, इसे देखकर मेरे एक दोस्त का कथन याद आ गया,
मौज लो, रोज लो,
न मिले तो खोज लो |
आप भी ऐसे ही मौज लेते रहे और विवरण लिखते रहे |
क्या साहब, मुन्नार गये और वालपरई नहीं गये क्या?? पोलाची से जितनी दूरी पर मुन्नार है उतनी ही दूरी पर वालपरई भी है.. सन् 2006 की दिवाली मैंने मुन्नार में ही मनाई थी.. दोस्तों के साथ.. छः दिनों की ट्रिप थी.. बहुत आनंद आया था.. उस समय मैं ज्यादा ब्लौग नहीं लिखता था सो ज्यादा कुछ नहीं है मेरे पास लिखा हुआ मगर एक पोस्ट मैंने बहुत बाद में दे मारी थी.. चाहें तो एक नजर उस पर डाल लें..
http://prashant7aug.blogspot.com/2007/09/blog-post.html
har baar ki tarah sundartam chitra... ye jo mirch ki pakauri Andhra Pradesh me bhajji kahlati thi jo chay aur dal chaval dono ke sath saman roop se khai jati thi... mujhe to bahut pasand thi.
मनीष भाई इस बार की तसवीरें तो बहुत अच्छी है, ख़ास कर झील वाली फोटो और मिर्ची वाली.
आप कौन सा कैमरा इस्तेमाल करते है ? यात्रा का बड़ा सजीव वर्णन है.....केरल को आपने बहुत सुंदर बना दिया....
Good pictures & very good Travelogue - keep posting more such articles.
Rgds,
L
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