Thursday, December 20, 2007

क्या औचित्य है रोमन में हिंदी ब्लॉगिंग का ? विषय आधारित चिट्ठे और लोकप्रियता ? आइए इन सवालों का हल तालाशें इन आंकड़ों के मद्दे नज़र

पिछले हफ्ते मेरे रोमन हिन्दी चिट्ठे Ek Shaam Mere Naam ने एक नया मुकाम प्राप्त किया, एक लाख पेज लोड्स को पार करने का। करीब साल भर पहले प्रतीक पांडे ने अपनी एक पोस्ट में रोमन हिंदी में ब्लॉगिंग करने के औचित्य पर राय मांगी थी। मेरी यह पोस्ट पिछले ढाई सालों में रोमन हिंदी ब्लॉगिंग के मेरे अनुभवों का निचोड़ है और मेरी कोशिश ये होगी की आंकड़ों की मदद से मैं ब्लागिंग से जुड़े कुछ अहम मुद्दों पर अपनी राय आगे रख सकूँ।


सवाल नंबर १ : रोमन हिंदी ब्लागिंग करने का औचित्य क्या है ?
इसका सीधा उत्तर है ज्यादा से ज्यादा लोगों तक अपनी बात को पहुँचाना। एक रोमन हिंदी चिट्ठा दो तरीकों से इस कार्य में आपकी मदद करता है

  • ये गैर हिंदी भाषी पाठक वर्ग को आपकी ओर खींचता है। ये वर्ग भारत के अंदर भी हो सकता है और बाहर भी। उदाहरण के लिए आप देख सकते हैं कि पिछले पाँच सौ पेज लोड्स में करीब ३० -४० उर्दूभाषी देशों से थे और २९२ भारत से थे। इस २९२ का करीब दो तिहाई अनुमानतः वो हिस्सा है जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं।

ये अप्रत्यक्ष रूप से आपके हिंदी चिट्ठे की आवाजाही को आगे बढ़ाता है। आज भी हिंदी भाषा के इंटरनेट में हिंदी लिखने पढ़ने के प्रति अनिभिज्ञता बरकरार है। इसका प्रमाण यही है कि बहुत सारे लोग जो हिंदी भाषी हैं वो पहले रोमन चिट्ठे पर किसी सर्च इंजन के माध्यम से पहुँचते हैं. इनमें से मेरे खुद के विश्लेषण के हिसाब से ई करीब एक तिहाई जो हिंदी में अभ्यस्त हैं वो हिन्दी चिट्ठे पर भी आ जाते हैं। ३३ प्रतिशत का आंकड़ा मैंने अपने चिट्ठे पर "came from" tool का आकलन कर के निकाला है।




यही वजह है कि आप देख रहे हैं कि पहले भोमियो और अब चिट्ठाजगत और ब्लॉगवाणी भी आपकी फीड को रोमन हिंदी में दिखा रहे हैं

सवाल नंबर २ : नए चिट्ठाकार कैसे इस भीड़ में अपना स्थान बनाएँ ?

मेरे हिसाब से इसका एक ही मूलमंत्र है कि आप जब भी कुछ लिखें, उसमें अपनी सारी मानसिक उर्जा लगाएँ। ये जरूर सोचें कि मेरा लिखा किस तरह दूसरों के लिए उपयोगी और रोचक रहेगा। अगर आप लगातार इस तरह का समर्पण बनाए रखेंगे, लोग जरूर उसे पढ़ने खोज-खोज कर आएँगे। आप अगर सिर्फ चिट्ठाकारों को अपना पाठक वर्ग मान कर चलेंगे, उनकी पसंद नापसंद को अपने लेखन का आधार बनाएंगे तो वो आपको क्षणिक लोकप्रियता के आलावा कुछ नहीं दिलाएगा। पोस्ट का साइज छोटा रखने से, दुनिया भर के टैग लगाने से, एक दूसरे को लिंक कर के अगर कोई प्रसिद्धि की राह पर चला जाता तो फिर बात ही क्या थी। मैं ये नहीं कहता कि इन सबका फायदा नहीं होता। होता है पर एक हद तक, मूल बात आपका विषय और परोसी गई सामग्री है। रवि जी ने ये बात कई बार कही है और इस विषय पर मेरा उनसे मतैक्य है.

और सबसे बड़ी बात धैर्य रखें। आप आंकड़ों पर गौर करें जब मैंने रोमन हिन्दी चिट्ठा २००५ में शुरु किया था तो मुझे शुरु-शुरु में २० से ३० हिट्स मिलती थीं। फिर ये आंकड़ा पिछले साल प्रतिदिन ५०‍-६० और इस साल अब ३०० तक जा पहुँचा है। वो भी तब जब रोमन हिंदी चिट्ठे को किसी एग्रगेटर का सहयोग नहीं है। हिंदी में लिखना मैंने पिछली अप्रैल से शुरु किया था और वहाँ भी परिणाम धीरे-धीरे ही अच्छा हुआ है और इसमें रोमन ब्लॉगिंग का भी योगदान रहा है।







सवाल नंबर तीन: क्या सारे चिट्ठे विषय आधारित होने चाहिए ?

चिट्ठाजगत में ये सवाल बार बार उठाया जा रहा है। मेरे ख्याल से इसका कोई सीधा फार्मूला नहीं है। ये फ़ैसला बहुत कुछ निर्भर करता है कि

आपका चिट्ठाकारी करने का उद्देश्य क्या है? किसी खास विषय पर आपकी पकड़ कितनी है? आपके पास कितना समय उपलब्ध है? आपका पाठक वर्ग कैसा है?

विषय आधारित चिट्ठे की खासियत इस बात में है कि वो एक विशेष रुचि से जुड़े पाठकों को आपके चिट्ठे का नियमित पाठक बना लेता है। गंभीर मुद्दों पर लोगों का ध्यान खींचने का ये एक प्रभावी हथियार है। पर अमूमन एक आम चिट्ठाकार के मन में तरह तरह की बातें आती हैं जिसे वो लोगों से बाँटना चाहता है। मैं खुद ही 'यात्रा वृत्तांत', गीत-संगीत, ग़ज़लों, किताबों के बारे में लिखता हूँ। अब अगर सबके लिए मैं अलग अलग चिट्ठे शुरु करूँ तो कोई कोई चिट्ठा तो महिनों में अपडेट होगा और चार चिट्ठों को सँभालने में वक़्त जाएगा सो अलग। इस दशा से निबटने के लिए अगर विषय आधारित चिट्ठों को सामूहिक रूप से चलाया जाए तो बेहतर रहेगा।

दूसरी बात ये है कि जब आप अपने पसंद के विषयों को एक साथ अपने चिट्ठे पर रखते हैं तो पढ़ने वाला धीरे-धीरे आपके व्यक्तित्व का एख खाका खींचने लगता है और अगर उसकी सोच भी वैसी ही हुई तो वो आपके चिट्ठे से जुड़ सा जाता है।

एक बात जरूर जान लें कि ऍसा नहीं है कि आप विषय आधारित चिट्ठा नहीं बनाएँगे तो लोग आपकी पुरानी पोस्ट लोग नहीं पढ़ेंगे। उदहारण के लिए मैं आपको रोमन हिंदी चिट्ठे की आज की की-वर्ड एनालिसिस दिखाता हूँ। कलिंग वार, सिक्किम , परवीन शाकिर, गोरा, गुनाहों का देवता और कविताओं , गीतों से जुड़ी पोस्ट जो एक से दो साल पहले लिखी गईं पर भी लोग पहुँच रहे हैं। सर्च इंजन से आने वाली जनता बिना ये जाने आती है कि ये चिट्ठा किस प्रकृति का है।




पर इसका मतलब ये नहीं की विषय आधारित चिट्ठे नहीं बनाने चाहिए। पर इस तरह का जब आप निर्णय लें तो ऊपर लिखे प्रश्नों को खुद से पूछें जरूर।


ये संभवतः इस साल की मेरी आखिरी पोस्ट हैं क्योंकि आज ही केरल के लिए कूच कर रहा हूँ। मेरे हिंदी और रोमन हिंदी चिट्ठों के पाठकों को नए साल की हार्दिक शुभकामनाएँ। आशा है आपका साथ मुझे आगे भी मिलता रहेगा। तो दोस्तों मिलते हैं, नए साल में हमेशा की तरह वार्षिक संगीतमाला २००७ के साथ.....

Monday, December 17, 2007

खुल के मुसकुरा ले तू, दर्द को शर्माने दे....: सुनिए प्रसून जोशी का लिखा ये खूबसूरत नग्मा

कई बार आप सब ने गौर किया होगा। रोजमर्रा की जिंदगी भले ही कितने तनावों से गुज़र रही हो, किसी से हँसी खुशी दो बातें कर लेने से मन हल्का हो जाता है। थोड़ी सी मुस्कुराहट मन में छाए अवसाद को कुछ देर के लिए ही सही, दूर भगा तो डालती ही है। पर दिक्कत तब होती है जब ऐसे क्षणों में आप बिलकुल अकेले होते हैं। बात करें तो किससे , मुस्कुराहट लाएँ तो कैसे ?

पर सच मानिए अगर ऍसे हालात से आप सचमुच गुजरते हैं तो भी किसी का साथ हर वक़्त आपके साथ रहता है। बस गौर करने की जरूरत भर है। जी हाँ, मेरा इशारा आपके चारों ओर फैली उस प्रकृति की ओर है जिसमें विधाता ने जीवन के सारे रंग समाहित किए हैं।

चाहे वो फुदकती चिड़िया का आपके बगीचे में बड़े करीने से दाना चुनना हो...
या फिर बाग की वो तितली जो फूलों के आस पास इस तरह मँडरा रही हो मानो कह रही हो..अरे अब तो पूरी तरह खिलो, नया बसंत आने को है और अभी तक तुम अपनी पंखुड़ियां सिकोड़े बैठे हो ?
या वो सनसनाती हवा जिसका स्पर्श एक सिहरन के साथ मीठी गुदगुदी का अहसास आपके मन में भर रहा हो....
या फिर झील का स्थिर जल जो हृदय में गंभीरता ला रहा हो...
या उफनती नदी की शोखी जो मन में शरारत भर रही हो..
या बारिश की बूदें जो पुरानी यादों को फिर से गीला कर रहीं हों...


हम जितने तरह के भावों से अपनी जिंदगी में डूबते उतराते हैं, सब के सब तो हैं इस प्रकृति में किसी ना किसी रूप में...
मतलब ये कि अपने आस पास की फ़िज़ा को जितना ही महसूस करेंगे, अपने दर्द, अपने अकेलेपन को उतना ही दूर छिटकता पाएँगे।

कुछ ऍसी ही बातें प्रसून जोशी ने अपने इस गीत में करनी चाही हैं जो फिल्म फिर मिलेंगे से लिया गया है। मुझे ये गीत बेहद बेहद पसंद है और इसीलिए ये मेरी पसंद के गीतों की सूची में वर्ष २००४ में अव्वल नंबर पर रहा था। जोशी जी के काव्यात्मक गीतों में ये मुझे सबसे बेहतरीन लगता है। इसे बड़ी संवेदनशीलता से गाया है बाम्बे जयश्री ने और धुन दी है शंकर एहसान और लॉ॓ए ने जो कमाल की है। अब गीत चूंकि मुझे बेहद पसंद है अतः इसे गुनगुनाने का लोभ संवरण नहीं कर सका...



खुल के मुसकुरा ले तू, दर्द को शर्माने दे
बूदों को धरती पर साज एक बजाने दे
हवाएँ कह रही हैं आजा झूमें ज़रा
गगन के गाल को चल, जा के छू लें ज़रा

झील एक आदत है तुझमें ही तो रहती है
और नदी शरारत है, तेरे संग बहती है
उतार ग़म के मोजे जमीं को गुनगुनाने दे
कंकरों को तलवों में, गुदगुदी मचाने दे
खुल के मुसकुरा ले तू, दर्द को शर्माने दे...


बाँसुरी की खिड़कियों पे सुर क्यूँ ठिठकते हैं
आँख के समंदर क्यूँ बेवजह छलकते हैं
तितलियाँ ये कहती हैं अब वसंत आने दे
जंगलों के मौसम को बस्तियों में छाने दे
खुल के मुसकुरा ले तू, दर्द को शर्माने दे...


खूबसूरत बोल और बेहतरीन संगीत के इस संगम को कभी फुर्सत के क्षणों में सुनें, आशा है ये गीत आपको भी पसंद आएगा।

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Tuesday, December 11, 2007

ये आलम शौक़ का देखा न जाए , वो बुत है या ख़ुदा देखा न जाए

अहमद फ़राज पाकिस्तान के मशहूर और मक़बूल शायरों में से एक हैं जिन्हें भारत में भी उतने ही चाव से पढ़ा जाता है। आज पेश है उनकी लिखी एक ग़ज़ल जिसे फ़राज ने खुद भी अपनी पसंदीदा माना है। इसे मैंने पहली बार १९८७ में सुना था और एक बार सुनकर ही इसकी खूबसूरती मन को भा गई थी। ऊपर से गुलाम अली की गायिकी और हर शेर के बाद की तबले की मधुर थाप पर मन वाह-वाह कर उठा था। पर जिस कैसेट में ये ग़ज़ल थी उसमें इसके कुल चार ही शेर थे। बहुत दिनों से पूरी ग़ज़ल की तालाश में था, वो आज भटकते भटकते इंटरनेट पर मिली। लीजिए अब आप भी इसका लुत्फ उठाइए।

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ये आलम शौक़ का देखा न जाये
वो बुत है या ख़ुदा देखा न जाये

ये किन नज़रों से तुमने आज देखा
कि तेरा देखना देखा न जाये

हमेशा के लिये मुझसे बिछड़ जा
ये मंज़र बारहा देखा न जाये


ग़लत है जो सुना पर आज़मा कर
तुझे ऐ बा-वफ़ा देखा न जाये

यही तो आशनां बनते हैं आखिर
कोई ना आशनां देखा ना जाए

ये महरूमी नहीं पस-ए-वफ़ा है
कोई तेरे सिवा देखा न जाये

'फ़राज़' अपने सिवा है कौन तेरा
तुझे तुझसे जुदा देखा न जाये


वैसे गुलाम अली साहब के आलावा पाकिस्तानी गायिका ताहिरा सैयद ने भी इस ग़ज़ल को अपनी आवाज़ दी है जिसे अर्सा पहले एक पाक फीचर फिल्म में भी शामिल किया गया था। ये वही ताहिरा सैयद हैं जिनकी गाई एक बेहतरीन ग़ज़ल "बादबां खुलने के पहले का इशारा देखना" मैंने परवीन शाकिर वाली पोस्ट में पेश की थी।

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इन दोनों रूपों में मुझे तो गुलाम अली वाला वर्सन हमेशा से ज्यादा रुचिकर लगा। अब आप बताएँ आपकी राय क्या है?

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गुलाम अली की गाई ग़ज़ल हमने हसरतों के दाग से संबंधित मेरी पिछली प्रविष्टि आप यहाँ देख सकते हैं।

Sunday, December 09, 2007

IIT Bombay और पोवई झील की एक शाम, मेरे कैमरे की नज़र में...

नवंबर का आखिरी हफ्ता IIT Bombay में स्थित पोवई लेक के आस-पास गुजरा था। दिन तो अध्ययन में गुजर जाता था, पर सुबह और शामें अपनी हुआ करती थीं। मुंबई की चिरपरिचित भीड़भाड़ से निकल कर जब आप आई. आई. टी. का के आहाते में आते हैं तो सर्वत्र हरियाली देख मन पुलकित हो उठता है। इन्हीं दृश्यों को अपनी यादों में सहेजने के लिए मैंने इन्हें अपने कैमरे में क़ैद करने की कोशिश की है। तो आप भी चलिए ना इस झील के आस पास के इलाके में मेरे साथ सैर पर ...

वैसे तो मुंबई में उजाला छः साढ़े छः बजे तक आ जाता है पर मैं जब वन विहार गेस्ट हाउस के बाहर निकला तो सात बजने वाले थे। सामने था पेड़ों की झुंड के बीच से झांकता ये कृत्रिम ताल..


हम ही हैं इस ताल के स्थायी निवासी...





ट्रेनि्ग के बीच विश्राम करते मेरे रूममेट। पीछे दिख रही है पोवई झील



और कैमरे में क़ैद किया मेरा सबसे खूबसूरत लमहा। झील के बीच ताड़ वृक्षो के बीच ढलता सूरज। देखिए तो जाते-जाते भी आकाश को कैसी लालिमा दे जाता है। सूरज के डूबने के बाद भी आसमान के रंगों को बदलते देखना कितना सम्मोहक है ना?










जहाँ प्रकृति का सौंदर्य इस कदर बिखरा हो, वहाँ की वादियों से प्रेम दूर कैसे रह सकता है। बाँस की बल्लियों पर स्थित इस लवर्स प्वाइंट पर एक प्रेमी युगल।

Saturday, December 08, 2007

"इति श्री चिट्ठाकारमिलन कथा" भाग ४ : देखिए गीतों भरी इस शाम में जलवे विमल वर्मा के ..

शनिवार यानि तीस नवंबर को मुझे वापस जाना था। गुरुवार यूनुस से बात हुई.. कहने लगे मैंने तुमसे वादा किया था कि सत्या और माचिस का बैकग्राउंड स्कोर देना है। अब जून में किए इस वादे को मैं तो भूल ही चुका था पर वे नहीं भूले थे। मैंने कहा कि कहाँ मिला जाए? अनीता जी के यहाँ या फिर किसी और जगह। यूनुस का तपाक से जवाब आया कि अभी तो तुम्हारे यहाँ ही बैठक जमाते हैं..हाँ बाद में जब हम अनीता जी के यहाँ डिनर खाएँगे तो तुम्हें फोन से सूचित कर देंगे कि क्या क्या खाया...और फिर सुनाई दिया एक जोर का ठहाका जो भीतर तक मुझे जला गया। फिर विमल भाई से बात हुई। मैंने उनसे कहा कि आपकी गायिकी से दिल नहीं भरा। एक बार फिर अवश्य आईए और उनका आने का आत्मीय आश्वासन भी तुरत मिल गया। अभय जी (जो बेहद व्यस्त थे) को छोड़ कर बाकी सारे लोगों ने पुनः आने की सहर्ष स्वीकृति दे दी।

इस बार विमल, यूनुस और विकास छः बजे तक आ चुके थे। गप्पों का दौर शुरु हुआ। शुरुआत निजी चैनल्स में धारावाहिक निर्माण के तौर तरीकों पर शुरु हुई। विमल जी ने अपने अंदाज में सारा किस्सा बयां किया यानि पूरी ग्राफिक डिटेल्स के साथ। उनकी बातों का निचोड़ यही था कि सारा कुछ टी. आर. पी. का खेल है। बाकी कहानी क्या है, स्क्रिप्ट कैसी है, उस से ज्यादा ध्यान इस बात पर है कि कैसे जनता को सफाई से मूर्ख बना कर उसे बाँधे रखा जाए। फिर विमल भाई ने क्रिकेट में अपनी अंपायरी का एक बेहद दिलचस्प किस्सा सुनाया, जिसे यहाँ कार्यालय में सुनाकर मैं कईयों को हँसा चुका हूँ।

विमल भाई से प्रमोद जी के बारे में बताने को कहा गया क्योंकि वो खुद अपने बारे में ज्यादा कहते नहीं। कॉलेज के समय प्रमोद जी के कमरे और उसकी अनूठी साज सज्जा का जिक्र हुआ। विमल भाई रंगमंच के उन दिनों की याद करने लगे जब दिल्ली का 'मंडी हाउस' के पास का इलाका उनका और प्रमोद जी का अड्डा हुआ करता था। ये वो ज़माना था जब मनोज बाजपेयी विमल जी के रूममेट हुआ करते थे। विमल जी ने वो मज़ेदार प्रकरण भी सुनाया कि किस तरह पहली मुलाकात में ही प्रमोद जी ने मनोज की क्लॉस ले ली थी।

फिर यूनुस भाई से मैंने पूछा कि विविध भारती की अपनी दिनचर्या के बारे में बताएँ। बातों-बातों में ये जानकर मुझे आश्चर्य हुआ कि विविध भारती में सिर्फ ८ उद्घोषक हैं जिनमें से एक शिफ्ट में सिर्फ चार लोग होते हैं। यूनुस ने भी अमीषा पटेल से हाल ही में लिए गए साक्षात्कार के बारे में बताया कि कितनी मुश्किल से उन्होंने अमीषा के दिये गए ५ मिनटों को करीब आधे घंटे तक खींचा। इस दौरान अमीषा की बचकानी (मेरा और विकास का मत था कि उसे चुलबुली कहना ज्यादा सही रहेगा :)) अदाओं से यूनुस बेहद परेशान रहे। रेडिओ की बात पर यूनुस ने बताया कि एक बार उनकी बात हृशिकेष दा से हुई और उन्होंने पूछा कि दादा ये बताइए कि आपकी हर फिल्म में रेडियो क्यूँ बजता दिखता है ? दादा का उत्तर था कि रेडिओ ऍसा माध्यम है जो जितना दिखता नहीं उससे ज्यादा बैक आफ माइंड (यानि अंडरकरेंट) में रहता है और इसीलिए मैं उसे दिखाता हूँ।

गपशप कब गीत-संगीत पर आ गई ये मुझे भी याद नहीं पर फिर ऍसा समा बँधा कि बँधता ही चला गया। यूनुस की फ़र्माइश पर शुरुआत हुई इसी गीत से.."जब आपकी प्लेट खाली है तो सोचना होगा कि खाना कैसे खाओगे".. जिसके बोल आप विमल जी के ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं। विमल भाई की आवाज़ का कायल तो मैं पिछली मुलाकात में ही हो चुका था। अब आप इस वीडियो को देखें और मुझे पूरा विश्वास है कि आप की राय मेरे से भिन्न नहीं होगी।

वीडियो ठीक से देखने के लिए स्क्रीन की ब्राइटनेस लेवल बढ़ा लें।


इसे सुनकर फ़ैज की नज़्म सब ताज उछाले जाएँगे, सब तख्त गिराए जाएँगे..की याद आ गई। यूनुस ने उसकी कुछ पंक्तियाँ सुनाईं। विमल जी ने फिर एक और गीत सुनाया। पुराने दिनों की याद करते हुए कहने लगे कि इसका असर ये होता है था
कि आस पास खड़े लोग भी ला....लल...ला... की तान में शामिल हो जाते थे। ऍसा ही हाल हमारे साथ भी हुआ। यहाँ देखें..



इसके बाद विमल जी ने मेरे पसंदीदा कवि गोपालदास नीरज की ये कविता खास 'नीरज' के अंदाज में सुनाईं

अब के सावन में शरारत भी मेरे साथ हुई
मेरे घर छोड़ के सारे शहर में बरसात हुई


इसी बीच प्रमोद जी, अनीता जी और अनिल भाई भी गीतों की इस महफ़िल में शामिल हो चुके थे। आते के साथ, अनिल रघुराज को हॉट सीट पर बैठा दिया गया और उन्होंने जो लोकगीत सुनाए वो यूनुस के चिट्ठे पर यहाँ मौजूद है।

गीतों का सिलसिला फिर विकास और मैंने आगे बढ़ाया। इस दोरान तीन घंटे कैसे बीते ये पता ही नहीं चला। सबने अनीता जी की लाई पूड़ी-सब्जी पर हा्थ साफ किया। अनीता जी के जाने के बाद महफ़िल गीतों से हटकर गंभीर चर्चा पर मुड़ी। घड़ी की सुईयाँ बढ़ती गईं। तकनीकी समस्याएँ, वेब रेडिओ, फिल्म निर्देशन, रोमन में हिंदी ब्लॉगिंग, सिनेमा देखने वाला दर्शक वर्ग, तरह-तरह के नए मुद्दे उछलते गए। रात्रि के बारह बजे तक ये सिलसिला चलता रहा और फिर सबने एक दूसरे से विदा ली।

दोस्तों, बहुत अच्छा लगा आप सब के साथ बिताई इन दो शामों का साथ। आशा है फिर आपसे मुलाकात होती रहेगी। तो चलते-चलते उस शाम का आनंद उठाएँ इन चित्रों के माध्यम से...

लो भई शुरु हो गया गप्पों का दौर...

पीली कमीज, लटकता चश्मा, चढ़ी आँखें..बालक तो बिना पिये मदहोश हो गया..

आओ बिखेरें फोटोजेनिक मुसकान !

मैं क्या जानूँ , क्या जानूँ क्या जादू है !

देखो कैसे बदले मेरे रंग चिट्ठाकारी के पहले...और अब चिट्ठाकारों के संग :) !

अरे अब तो मेमोरी कार्ड भी पूरा भर गया !

अब हर संडे के संडे, लेंगे तुमसे फंडे


किस्सा कुर्सी का...

रात होती गई..गुफ़्तगू चलती रही

पका डाला सालों ने...

Wednesday, December 05, 2007

"अथ श्री चिट्ठाकारमिलन कथा" भाग ३ : वो शाम जो मिलकर भी पूरी होने का अहसास नहीं दे पाई...

२७ तारीख की शाम के बारे में अभय और अनीता जी विस्तार से लिख चुके हैं इसलिए मेरे लिए समस्या विकट है कि नया क्या लिखूँ। पर ऍसा भी नहीं कि बिलकुल स्कोप नहीं है..और ना भी हो तो बनाना पड़ेगा :) तो हुजूर शाम के साढ़े छः बजे का वक्त तय था। विकास तयशुदा समय पर आ चुका था और बता रहा था कि कैसे वो यूनुस से फोन पर बात करते ही घबड़ा जाता है..आखिर मैं हुं स्टूडेंट और वो हैं इतनी बड़े सेलेब्रेटी। पर मेरी घबड़ाहट कुछ दूसरे तरह की थी... सोच रहा था कि लोग आएँगे तो चाय पानी का इंतजाम कैसे होगा? विकास ने कहा कि कहिये तो आप का नाम लेते हुए यूनुस भाई और बाकियों को कह दूँ कि जहाँ कहीं भी हों वहीं से कुछ लेते हुए चले आएँ। मैंने मन ही मन सोचा कि ऍसे धाँसू आइडिया अगर ये बालक कार्यान्वित कर दे तो इस ब्लॉगर मीट को ब्लॉगर रिट्रीट में तब्दील होने में ज्यादा वक़्त नहीं लगेगा। इसी बीच एक बुरी खबर ये भी आ चुकी थी कि कुछ दिनों पहले तक दिल्ली में पाए जाने वाले 'अज़दक' वाले प्रमोद सिंह भी आ रहे हैं :)

सात बजे तक जब यूनुस जी का पता नहीं चला तो फोन घुमाया गया। पता चला बिलकुल IIT गेट के करीब हैं। विकास ने कहा कि नीचे चलिए, वहीं से सबको बटोर लेंगे। गेस्ट हाउस के गेट तक पहुँचे ही थे कि नारंगी कमीज और झोला लिये एक सज्जन की मोटरबाइक धड़धड़ाती हुई बगल में आ कर रुकी। प्रमोद जी को पहचानने में हम दोनों को ज़रा भी वक़्त नहीं लगा पर इससे पहले कि हम दोनों कुछ कहें..प्रमोद जी ने पहला गोला विकास की ओर दागा। कहने लगे "जान रहे हो कि इतने लोग आने वाले हैं तो तुम्हें गेट पर रहना चाहिए"। इससे पहले विकास हकलाते
हुए ...मैं...वो....नीचे ही.....कहता कि दूसरा गोला हाज़िर था.."अरे जब ये गेस्ट हाउस में ठहरे हैं तो सबको हॉस्टल में मिलने की बात क्यूँ कही गई"। विकास ने शीघ्र ही इस बाउंसर को डक करते हुए कहा कहीं मनीष जी ने ही तो यूनुस भाई को.........मुझे समझ आ गया कि ये सब किया कराया विविध भारती वालों का है। रात दिन इतनी जगहों का नाम पढ़ते रहते हैं कि कनफ्यूज होना स्वाभाविक है।

फिर प्रमोद जी ने मेरा हुलिया गौर से देखा। पूछा कहाँ से आते हो? पटना में घर होने की बात होते ही उद्विग्न हो उठे। कहने लगे कैसे रह लेते हो उस शहर में, जहाँ अभय सिंह जैसे लोग पत्रकारों की सरे आम पिटाई करते हों ?

अब भला इसका क्या उत्तर देते ? विकास ने कहा नहीं हालात अब पहले से अच्छे हैं, राज्य विकास के रास्ते पर हैं, रोड वोड बन रही हैं।
ये सुनते ही प्रमोद भाई बिफर उठे, कहने लगे तुम लोग रोड के बनने को विकास कहते हो यार! ये तो बहुत बेसिक सी चीज है... हमने समवेत स्वर में कहा - वहाँ तो वो भी बनते देखे एक अर्सा हो गया था तो अपेक्षाएँ काफी कम हो गईं हैं। हम दोनों की क्लॉस कुछ और देर चलती यदि ऐन वक़्त पर भगवन की असीम अनुकंपा से अनीता जी ना पधार गई होतीं। प्रमोद जी उनसे परिचय लेने में व्यस्त हुए और तभी अभय, यूनुस और विमल वर्मा भी आ पहुँचे।

प्रमोद जी की बातचीत की अदा निराली है। बड़े नपे तुले अंदाज में रुक-रुक कर बोलते हैं और वो भी धीमी संयत आवाज़ में। इसके बाद पूरी शाम वो ज्यादा नहीं बोले...सबकी सुनते रहे।

अब बैठक कमरे में जम चुकी थी और उसकी कमान यूनुस और अभय भाई ने सँभाल ली थी। अब आप सोच रहे होंगे कि कमान यूनुस के हाथ में हो तो माहौल में संगीत की स्वरलहरियाँ गूँज रही होंगी। नही भाई नहीं, बात हो रही थी क्रेडिट और डेबिट कार्ड से जुड़ी घपलेबाजियों की। अपनी बात के दौरान कार्डों की फेरहिस्त दिखलाते हुए युनूस ने ये साबित कर दिया कि उनके बटुए का वज़न, उनकी खनखनाती आवाज़ से कम नहीं है।



क्रेडिट कार्ड की बात खत्म हुई इतने में अभय जी का फोन आया तो बात अनीता कुमार जी की उस पोस्ट की ओर मुड़ गई जिसमें उन्होंने ठगों से जुड़ी किताब 'फिरंगी' की पुस्तक समीक्षा की थी। अनीता जी मनोविज्ञान की प्रोफेसर हैं। उन्होंने भी अपनी आरकुट से चिट्ठाजगत की यात्रा के बारे में विस्तार से बताया। 'आवारा बंजारा' वाले संजीत उनके चिट्ठा गुरु हैं। पचास की आयु को पार करने के बाद चिट्ठाकारिता में आने की वज़हों के बारे में उन्होंने कहा कि अब तक की जिंदगी उन्होंने कैरियर पर ध्यान रखकर जी, पर जब उसमें ठहराव आ गया तो उन्हें लगा कि अब कुछ वक्त उन्हें खुद के लिए भी निकालना चाहिए। अनीता जी ने पूरी मीट के दौरान 'Official Food Sponser 'का दायित्व बिना कहे उठाया और इसके लिए हम सब तहेदिल से उनके उदरमंद हैं।

इसी बीच अनिल रघुराज भी आ चुके थे। अनिल भाई का हेयर स्टाइल कमाल का है, चिट्ठे में अपनी तसवीर के मुकाबले ज्यादा युवा नज़र आते हैं। वैसे उनकी एक विशेषता है कि वो कम बोलने और ज्यादा सुनने में विश्वास रखते हैं।

अभय जी वापस आए तो उन्होंने गुमनाम और ना पहचाने जाने वाले IP address की तकनीकी तह तक जाना चाहा। विकास ने जवाब में अपने फंडे देने शुरु किए। अब आप विमल भाई, अनिल जी,अनीता जी और मेरी दशा समझ ही रहे होंगे। हमारे पास अच्छे बच्चों की तरह चुपचाप विद्वान जनों की बातें सुनने के आलावा कोई चारा ना था। विकास के तकनीकी ज्ञान को देखते हुए हम सबने प्रश्नों की झड़ी लगा दी। अभय जी ने जोर दे कर कहा कि अगर लोकप्रिय चिट्ठाकार बनना है तो तकनीक पर लिखो क्योंकि बाकी सब विषयों पर तो जिसको जो मन में आता है वो लिख देता है। खैर लोकप्रियता की बात आई तो अभय भाई के कानपुर प्रवास में क्रिकेट खेलने और "मोस्ट डैशिंग मैरिड ब्लॉगर" का खिताब अर्जित करने का जिक्र आया और माहौल ठहाकों से गूँज उठा।

डेढ़ घंटे बीतने जा रहे थे पर विमल और अनिल जी से कुछ खास बात तो क्या, ठीक से परिचय भी नहीं हो पाया था। सो बातों को रोकते हुए मैंने विमल जी को अपने बारे में कुछ बताने को कहा। पता चला विमल,अभय , प्रमोद और अनिल भाई सब इलाहाबाद विश्वविद्यालय की पैदाइश हैं और एक समय ये चौकड़ी 'दस्ता' नामक समूह की सदस्य थी और उस दौर में ये घूम घूम कर नुक्कड़ नाटकों का मंचन किया करते थे। ये एक सुखद संयोग ही है कि छात्र जीवन के बाद सारे अलग अलग रास्तों से होते हुए मुंबई नगरिया में वापस लौटे हैं। विमल जी को चिट्ठाजगत में खींचने में प्रमोद जी का मुख्य हाथ है।

अभय जी टेलीविजन सीरियलों के लिए स्क्रिप्ट लिखते हैं और वो अपने को इस इंडस्ट्री का मजदूर कहते हैं। वैसे देखा जाए तो ये बात हम सब पर किसी ना किसी रूप में लागू होती है। अनिल और विमल जी स्टार और सहारा वन से जुड़े हैं। प्रमोद जी ने मीडिया के क्षेत्र में थोड़ा थोड़ा सब कुछ किया है फिर भी कहते हैं कि कुछ नहीं किया है अब इसके मायने आप चाहे जो निकाल लें।

अनीता जी को दूर जाना था सो करीब दस बजे सब लोगों ने उनसे विदा ली। गेट से निकलते निकलते मुझसे छठ का गीत सुनाने की पेशकश की गई। अब चिट्ठे पर जब उसे डाला था तो बोल सामने थे, यहाँ इतने धुरंधरों के बीच याददाश्त ने भी जवाब दे दिया था सो मैंने अपनी असमर्थता ज़ाहिर की। मेरी हिचक को देखते हुए खिंचाई और शुरु हुई पर अभय भाई ने मौके पर हमारा बचाव किया। फिर विमल, अभय और अनिल भाई का सम्मिलित गान हुआ। अनीता जी को फिर विदा देकर हम कैंटीन की ओर चल पड़े। कैंटीन में भी अभय जी का दिमाग उन पुराने गीतों में खोया रहा। पोवई लेक की बगल में थोड़ा टहलने के बाद जब सभा विसर्जित हुई तो सब को लग रहा था कि एक बार और महफ़िल जमनी चाहिए...

(अंतिम चित्र अभय जी के चिट्ठे सेः बाएँ से मैं, अनिल रघुराज, डंडे की ओट में यूनुस, विमल वर्मा, विकास, प्रमोद और बैठी हुईं अनीता कुमार)

तीस तारीख को हमारा फिर से मिलना मेरे लिए इस समूची यात्रा की सबसे यादगार कड़ी रहा...क्यूँ हुआ ऍसा ये जानते हैं इस श्रृंखला के अगले और अंतिम भाग में..

Monday, December 03, 2007

"अथ श्री चिट्ठाकारमिलन कथा" भाग २ : आइए मिलवाते हैं आपको रंगमंच कलाकार, युवा कवि विकास से

विकास से पहले का मेरा खास परिचय नहीं था। साहित्य प्रेमी बालक है, कविता और गद्य लेखन में रुचि है उसके चिट्ठे पर आते जाते मैं इतना तो जान गया था। २६ की शाम को बुलाते ही आज्ञाकारी बालक की तरह रूम पर आ गया। मैंने बात कविता लेखन से शुरु की पर कवि कहने से वो झेंप गया। कहने लगा क्यूँ मजाक़ उड़ा रहे हैं?
मैंने कहा कि ये सब नहीं चलेगा , कविता लिखते हो तो फक्र से कहो कि कवि हूँ।

अब आगे बताओ कि तुम्हारी प्रेरणा कौन है?
पर IIT का छात्र ठहरा हमारे प्रश्न को यूँ चलता किया कि हम तो दूसरों के दर्द को महसूस करते हैं और लिखते हैं। यहाँ तक कि प्रमाण के तौर पर दो दिन बाद अपनी एक रचना के प्रेरणा स्रोत को साक्षात सड़क पर दिखा दिया और कहा कि इसकी गर्ल फ्रेंड ने जब इसे छोड़ा था तो वो मेरी एक कविता की रचना का कारण बना था। अब ऍसे साक्षात प्रमाणों के सामने हम क्या बोलते। चुप हो कर रह गए पर दिमाग में संशय वर्त्तमान रहा।

अगले दिन गेस्ट हाउस में इंटरनेट सर्फिंग करते वक़्त इनके चिट्ठे पर एक कविता नज़र आई शुरु की पंक्तियाँ पढ़ कर हम अभिभूत हो गए। आप भी देखिए, इन्होंने जिंदगी के यथार्थ को अपनी पैनी नज़रों से किस खूबसूरती से सारगर्भित किया है...
जिंदगी चलती है
अगरबत्ती जलती है
फर्क नहीं दिखता़।

दोनों के अंत में
बचती है सिर्फ राख।
और थोड़ी खुशबू
और थोड़ी आग।

जो चंद पलों में मिट जाती है।
कोई तर्क नहीं बचता।
कोई फर्क नहीं दिखता।


उस दिन की बातें और फिर ये सब हमने बात मन ही मन मान ली थी कि वाकई सारे संसार का दर्द इनके संवेदनशील हृदय को छूता है पर ये क्या ..मैंने पूरी कविता तो पढ़ी ही नहीं थी। आगे की दो पंक्तियों में कविता अचानक ही दूसरा मोड़ ले बैठी थी

क्या तुम मेरी खुशबू सँजो सकोगी?
क्या तुम कभी मेरी हो सकोगी?

हमें दाल में क