Tuesday, October 30, 2007

'एक इंच मुस्कान', राजेंद्र यादव और मन्नू भंडारी का साझा उपन्यास

'एक इंच मुस्कान', राजेंद्र यादव और मन्नू भंडारी का साठ के दशक में लिखा एक साझा उपन्यास है। यूँ तो मन्नू भंडारी मेरी प्रिय लेखिका हैं और उनका लिखा महाभोज और 'आप का बंटी' मेरी पसंदीदा किताबों में हमेशा से रहा है पर जब भी मैंने पुस्तक मेले में इस किताब को उलटा पुलटा, ये मुझे आकृष्ट नहीं कर पाई। पर हाल ही में जब ये किताब मुझे अपने पुस्तकालय में हाथ लगी तो मन्नू जी की वज़ह से इसे पढ़ने का लोभ संवरण नहीं कर सका।

अब पुस्तक पढ़ ली है तो ये कहते मुझे संकोच नहीं कि ये वैसा उपन्यास नहीं जिसे आप एक बार उठा लें तो ख़त्म कर के ही दम लें। दो अलग-अलग लेखन शैली के लेखकों को जोड़ता ये उपन्यास खुद कथा लेखन में रुचि रखने वालों के लिए जरूर बेहद महत्त्व का है, पर आम पाठकों के लिए इसके नीरस हिस्सों को पार कर पाना कभी-कभी काफी दुरूह हो जाता है।

आखिर साथ-साथ लिखने की सोच कहाँ से आई? इस उपन्यास की उत्पत्ति बारे में स्वयं मन्नू भंडारी जी कहती हैं.....

".....यह सच है कि लेखन बहुत ही निजी और व्यक्तिगत होता है. लेकिन “एक इंच मुस्कान” उस दौर में लिखा गया था जब प्रयोगात्मक उपन्यास लिखने का सिलासिला चल रहा था. उस समय एक उपन्यास निकला था ''ग्यारह सपनों का देश'' इस उपन्यास को दस लेखकों ने मिलकर लिखा था. जिसने आरंभ किया था उसी ने समाप्त भी किया. लेकिन यह एक प्रयोग था जो कि पूरी तरह असफल रहा. तब लक्ष्मीचन्द्र जैन ने मुझसे और राजेन्द्र से यह प्रयोग दोबारा करने को कहा हम राज़ी हो गए. मेरा एक उपन्यास तैयार रखा था. राजेंद्र ने कहा क्यों न हम इस उपन्यास को फिर से लिख लें. हांलाकि मेरी भाषा-शैली और नज़ारिया राजेन्द्र से बिलकुल अलग है, लेकिन हमने किया यह कि मैं मुख्य रूप से महिला पात्र पर केंद्रित रही और राजेन्द्र पुरूष पात्र पर....."

पर सबसे आश्चर्य इस बात पर होता है कि इस उपन्यास को पढ़ कर इसके बारे में जो अनुभूतियाँ आपके मन में आती हैं, वही पुस्तक के अंत में दिए गए लेखक और लेखिका के अलग अलग वक्तव्यों में प्रतिध्वनित होती हैं। यानि प्रयोगात्मक तौर पर लिखे इस उपन्यास की कमियों का अंदाजा लेखकगण को भी था। खुद राजेंद्र यादव लिखते हैं

"..मुझे हमेशा मन में एक बोझ सा महसूस होता रहता था कि मेरे चैप्टर सरस नहीं जा रहे हैं जितने मन्नू के। मन्नू के लिखने में प्रवाह और निव्यार्ज आत्मीयता है, और मेरी शैली बहुत सायास और बोझिल है..यह बात कुछ ऍसे कौशल से फ़िजा में भर दी गई कि जहाँ कोई कहता कि......... आप लोगों का उपन्यास ज्ञानोदय में........कि मैं बीच में ही काटकर बोल पड़ता "जी हाँ और उसमें मन्नू के चैप्टर अच्छे जा रहे हैं।..."

मन्नू जी ने भी माना है कि कथानक के गठन और प्रवाह में जगह जगह शिथिलता है, पर वो ये भी कहती हैं कि ऐसे प्रयोगों में इससे अधिक की आशा रखना ही व्यर्थ है।
कथा के शिल्प पर तो खूब टीका-टिप्पणी हो गई पर चलिए असली मुद्दे पर लौटते हैं कि आखिर ये एक इंची मुस्कान है किन लोगों के बारे में ?

पूरा उपन्यास तीन पात्रों के इर्द गिर्द घूमता है। ये कथा है एक साहित्यकार और उसकी मध्यमवर्गीय कामकाजी प्रेमिका की, जिससे नायक आगे चलकर शादी भी कर लेता है। आप सोच रहे होंगे तो फिर परेशानी क्या है, इतनी सीधी सपाट कहानी है। पर तीसरा किरदार ही तो सारी परेशानी का सबब है और उसका चरित्र सबसे जटिल है। वो है आभिजात्य वर्ग से ताल्लुक रखने वाली साहित्यकार की एक प्रशंसिका जिसके चरित्र को मन्नू जी ने आरंभ में बड़ी खूबसूरती से उकेरा है पर आखिर तक ये पकड़ छूटती महसूस होती है।

एक रोचक बात ये भी रही किर पति-पत्नी के रुप में मन्नू भंडारी और राजेंद्र यादव ने जब ये किताब लिखी तो लोगों ने नायक नायिका के किरदार में राजेंद्र जी और मन्नू जी का अक़्स तलाशना शुरु कर दिया। आज जबकि उनके बीच कोई संबंध नहीं रहा, ये शक शायद और पुख्ता हो। पर यहाँ ये बताना लाज़िमी होगा कि मन्नू जी ने पुस्तक के अंत में अपने वक्तव्य में इसका खंडन किया है।

इस उपन्यास में बहुत सारी घटनाएँ नहीं हैं ना ही ज्यादा पात्र हैं, अगर है तो अपनी-अपनी जिंदगी में घुलते तीन इंसानों की मनोवैज्ञानिक स्थितियों का आकलन । प्रेमी को पति के रूप में पाकर भी छली जाने का अहसास ले के घुट घुट के जीती रंजना हो, या कुछ सार्थक ना लिख पाने और कमाऊ पत्नी के सानिध्य में अपने आप को हीन और कुंठित महसूस करना वाला अमर , या फ़िर अपनी जिंदगी के कड़वे सच से दूर भागती, पर दूसरों को मार्गदर्शन देती अमला ....सभी जीवन के इस चक्रव्यूह में पल पल संघर्ष करते दिखते हैं। इन चरित्रों की एक छोटी सी झलक आप उपन्यास अंश के तौर पर आप यहाँ पढ़ सकते हैं। उपन्यास ने कुछ ऐसे विषयों को छुआ है जिस के पक्ष विपक्ष में सार्थक बहस हो सकती है। मसलन...


  1. क्या कोई कलाकार अपनी कला से बिना कोई समझौता किए अपनी पत्नी और परिवार को समय दे सकता है? और अगर नहीं तो फिर क्या ऍसी हालत में उसे दाम्पत्य सूत्र में बँधने का हक़ है?


  2. क्या हमपेशा कलाकार सिर्फ़ इसी वज़ह से सफल गृहस्थ नहीं हो सकते कि दोनों कला सृजन की जैसी रचना प्रक्रिया से परिचित होते हैं? इस तर्क के समर्थन में पुस्तक के इस अंश को लें..
    "...इसलिए उनमें, एक को दूसरे के प्रति ना आस्था होती है, ना श्रृद्धा। कला सृजन के अंतरसंघर्ष के प्रति दोनों ही लापरवाह और बेलिहाज हो जाते हैं। एक को दूसरे की रचना प्रक्रिया में ना तो कुछ रहस्यमय लगता है न श्रमसाध्य.. "


  3. कहानी लेखन के लिए क्या ये जरूरी है कि कथाकार अपने पात्रों में इस कदर एकाकार हो जाए कि वो उनके हिसाब से कहानी आगे बढ़ाता रहे ? दूसरे शब्दों में क्या लेखन में कथा के पात्र लेखक पर हावी होने चाहिए या पात्रों के सुख-दुख से इतर वो सोच सर्वोपरि होनी चाहिए जिसके आधार पर लेखक ने कहानी का प्लॉट रचा है ?

एक पाठक के रूप में मैं इन प्रश्नों के सीधे सपाट उत्तर सोच पाने में अभी तक सफल नहीं हो पाया हूँ पर जानना चाहूँगा कि इस बारे में आपका क्या मत है?

पुस्तक के बारे में :
ये किताब भारत में राजपाल एंड सन्ज द्वारा प्रकाशित की गई है। भारत के बाहर यहाँ से आप इसे खरीद सकते हैं

Sunday, October 28, 2007

राँची में निजी एफ एम रेडिओ चैनल बिग , मंत्रा और धमाल का आगमन

पिछले तीन-चार दिनों से वाइरल की चपेट में हूँ चिट्ठा पढ़ना लिखना बेहद कम हो गया है। पर आज मन फिर भी बेहद खुश है। आखिर वो दिन आ ही गया जिसका मुझे कई दिनों से बेसब्री से इंतजार था। छोटे शहरों में निजी एफ एम चैनल का हाल के दिनों में तेजी से विस्तार हो रहा है और इसी क्रम में हुआ है राँची में तीन नए चैनल का एक साथ प्रवेश : बिग एफ एम, दैनिक जागरण वालों का रेडियो मंत्रा और रेडियो धमाल।

ये खुशी सिर्फ मेरी आँखों में हो ऍसी बात नहीं। कल जब मैं बिस्तर पर पड़े पड़े रेडिओ के गानों पर अपने बच्चे और हमारे यहाँ काम करने वाली लड़की को थिरकते देख रहा था तो मुझे बिलकुल संदेह नहीं रहा कि इनके चेहरे से निकलने वाली खुशी सारे राँची वासियों की खुशी का प्रतिनिधित्व करती है जिनके लिए रेडिओ अभी भी मनोरंजन का प्रमुख साधन है।

पर एक सहज प्रश्न जो किसी भी संगीत प्रेमी के मन में जरूर आता है वो ये है कि आखिर निजी रेडिओ चैनल के बढ़ते प्रचार प्रसार से 'विविध भारती' के भविष्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा ? क्या आपको नहीं लगता कि जहाँ भी विकल्प मौजूद है, किशोरों और युवा वर्ग में निजी चैनल विविध भारती की तुलना में कहीं ज्यादा लोकप्रिय होते जा रहे हैं? इस बदलते समय में आपकी विविध भारती से क्या अपेक्षाएँ रही हैं? मैंने इसी विषय को रेडिओनामा पर यहाँ विचार विमर्श के लिए उठाया है।

आशा है इस बहस का आप हिस्सा बनेंगे।

Tuesday, October 23, 2007

रात भर बुझते हुए रिश्ते को तापा हमने..गुलज़ार की नज्म उन्हीं की आवाज़ में..


इंसानी रिश्तों का क्या है..
बड़े नाजुक से होते हैं...
इनकी गिरहें खोलना बेहद मुश्किल है
जितना खोलों उतनी ही उलझती जाती हैं..
और किसी रिश्ते को यूँ ही ख़त्म कर देना इतना आसान नहीं...
कितनी यादें दफ्न करनी पड़ती हैं उसके साथ...


माज़ी के वो अनमोल पल, उन साथ बिताए लमहों की अनकही सी तपिश...
कुछ ऍसा ही महसूस करा रहें हैं गुलज़ार अपनी इस बेहद खूबसूरत नज़्म में ....
कितने सुंदर शब्द चित्रों का इस्तेमाल किया है पूरी नज़्म में गुलज़ार ने कि इसकी हर इक पंक्ति मन में एक गहरी तासीर छोड़ती हुई जाती है...


रात भर सर्द हवा चलती रही
रात भर हमने अलाव तापा
मैंने माज़ी से कई खुश्क सी शाखें काटी
तुमने भी गुजरे हुए लमहों के पत्ते तोड़े
मैंने जेबों से निकाली सभी सूखी नज़्में
तुमने भी हाथों से मुरझाए हुए ख़त खोले
अपनी इन आँखों से मैंने कई मांजे तोड़े
और हाथों से कई बासी लकीरें फेंकी
तुमने भी पलकों पे नमी सूख गई थी, सो गिरा दी

रात भर जो भी मिला उगते बदन पर हमको
काट के डाल दिया जलते अलावों में उसे
रात भर फूकों से हर लौ को जगाए रखा
और दो जिस्मों के ईंधन को जलाए रखा
रात भर बुझते हुए रिश्ते को तापा हमने..


और अगर खुद गुलज़ार आपको अपनी ये नज़्म सुनाएँ तो कैसा लगे। तो लीजिए पेश है गुलज़ार की ये नज़्म 'अलाव' उन्हीं की आवाज में....

Sunday, October 21, 2007

दुर्गापूजा की एक रात, चलिए राँची की सड़कों पर मेरे साथ...

शहर में जश्न का माहौल है। सालों साल आम जन में इस उत्साह की पुनरावृति को देखता आया हूँ। बचपन और किशोरावस्था के कई सालों में पटना की गलियों और सड़कों में इसी हुजूम का कई बार हिस्सा बना हूँ। और अब राँची में अपने बालक को जब इन पूजा पंडालों की सैर करा रहा हूँ तो वही दृश्य फिर से सामने आ रहा है। सबसे अच्छी बात यही दिखती है कि लोग बाग अपनी रोजमर्रा की जिंदगी के कष्टों को भूल कर किस तरह कर हर साल नई उमंग और उत्साह के साथ इस त्योहार में शामिल हो जाते हैं।


पिछले साल भी इस चिट्ठे पर आपको दुर्गापूजा के पंडालों में ले गया था। चलिए एक बार फिर इस सफ़र में मेरे साथ शामिल हो जाइए।

वैसे तो शाम से ही पूजा पंडालों मे दर्शनार्थियों की भीड़ उमड़ पड़ती है पर उस वक्त की धक्कमधुक्की में परिवार के साथ निकलने की हिम्मत नहीं होती। इसलिए तमाम लोग अर्धरात्रि के बाद ही निकलते हैं। रात के साढ़े ग्यारह बज रहे हैं। हमारी तैयारी पूरी हो चुकी है। पर पहली बाधा घर के बाहर . गेट के ठीक सामने खड़ी एक गाड़ी के रूप में दिखाई देती है। गाड़ी किसी दूसरे मोहल्ले से आई है, इसलिए पता नहीं चल रहा है कि किसकी है? थोड़ी पूछताछ के बाद भी जब कोई नतीजा नहीं निकलता तो गाड़ी का हार्न लगातार बजा कर सारे मोहल्ले की नींद खराब की जाती है। जिनकी नींद खराब होती है उनमें से कुछ हमारी इस खोज में शामिल होते हैं और दस मिनट के अंदर वो गाड़ीवाला, क्षमा माँगता हुआ वहाँ से गाड़ी हटाता है।

पहली बाधा पार कर हम चल पड़े हैं राँची लेक के पास के राजस्थान मित्र मंडल के पंडाल की तरफ।

रात के बारह बज चुके हैं पर भीड़ जस की तस है। अब घर से खा पी कर कौन चलता है. पंडाल होगा तो आस पास खाने की स्टॉल भी होंगी। वैसे भी इस निम्मी-निम्मी ठंड में गोलगप्पे, समोसे और चाट खाने का आनंद कुछ और है।
राँची में इस बार सर्दी कुछ जल्द ही आई है। बकरी बाजार की ओर हल्के हल्के कदम से बढ़ते हुए इस ठंडक का अहसास हो रहा है। रात के एक बजना चाहते हैं। भीड़ तेजी से कदम बढ़ाने नहीं दे रही है। गरीब, अमीर, मनचले, पियक्कड़ सब इसी टोली में कंधे से कंधा मिला रहे हैं। राँची का सबसे सुंदर पंडाल हर साल बकरी बाजार में ही लगता है। इस पंडाल का बजट दस लाख के करीब होता है। इसलिए पंडाल का अहाता विज्ञापन से अटा पड़ा है। पर दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर के मॉडल की बाहरी और आंतरिक सज्जा देखने लायक है। आखिर इसीलिए इतने लोग इतनी दूर दूर से इसे देखने के लिए आते हैं। आप भी गौर फरमाएँ..

हर बड़े पंडाल के बाहर मेले का भी आयोजन है। स्पीकर से उद्घोषक 'मौत के कुएँ ' में आने के लिए भीड़ को आमंत्रित कर रहा है। तरह-तरह के झूलों पर एक से दस साल के बच्चे बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं। पर इतनी भीड़् में हमें वहाँ रुकने का दिल नहीं कर रहा और हम सब रातू रोड की ओर बढ़ चले हैं। रातू रोड से कचहरी तक का मुख्य आकर्षण यहाँ की विद्युत सज्जा है। कहीं महाभारत की झांकियाँ हैं तो कहीं सपेरे का नाग नाच चल रहा है। मेरा पुत्र इसे देख कर बेहद उत्साहित है और मुझे इनकी तसवीरें जरूर लेने की हिदायत दे रहा है।


वैसे एक बात बताएँ आप क्या पसंद करेंगे सर्प नृत्य या 'भेज चोमीन' :)?



घड़ी की सुइयाँ तीन के पास पहुँच रही हैं । रास्ते में बाहर गाँव से आए युवा रोड के डिवाइडर पर बैठ कर झपकियाँ ले रहे हैं । रात वो इसी तरह गुजारेंगे और सुबह आवागमन का साधन उपलब्ध होने पर अपने घर चले जाएँगे। भीड़ अब कम हो रही है और अब पंडालों में दुर्गा की प्रतिमाओं का अवलोकन और नमन करना सबको ज्यादा संतोष दे रहा है। तीन बजे हम कोकर के पंडाल के अंदर हैं। यहाँ अभी भी १०० से ज्यादा लोग ध्वनि और प्रकाश के बीच महिसासुर वध का आनंद ले रहे हैं। पंडाल के बाहर 20-20 की आखिरी गेंद का दृश्य दिखाया जा रहा है और श्रीसंत को गेंद लपकते देख कर बच्चे तालियाँ बजा रहे हैं।

हमारा आखिरी पड़ाव काँटाटोली और फिरायालाल है। इतना घूमने फिरने के बाद सबके चेहरे का मीटर डाउन है। दर्शक अब चुनिंदे ही दिख रहे हैं। रास्ते में मुर्गे की बांग भी सुनाई दे रही है, शायद ये कहती हुई कि.. सुबह हो गई मामू। हमारे जैसे रात का प्राणी सुबह चार बजे की बेला बिड़ले ही देख पाते हैं। सारी रात घूमना अपने बचपन में लौट जाने जैसा ही लग रहा है। सिर्फ पात्र बदल गए हैं।


ये तो था मेरे शहर की एक रात का आँखों देखा हाल। आप बताएँ कैसे मनाया आपने दुर्गा पूजा और दशहरा ?

Friday, October 19, 2007

दुनिया करे सवाल तो हम क्या जवाब दें.. :आइए सुनें साहिर का लिखा ये खूबसूरत नग्मा

इंसान जब इश्क करता है तो उसका जुनूं उसे सारी दुनिया से लड़ने की ताकत दे देता है। लगता है कि अगर आपका महबूब आपके साथ हो तो फिर ज़हान साथ रहे, ना रहे क्या फ़र्क पड़ता है। पर जिसके भरोसे सारे जग की दुश्मनी मोल ली, अगर वही हमारी भावनाएँ समझ ना सके तो दिल का टूटना लाज़िमी है। किस किस को सफाई देते रहें और अगर दें भी तो किस अवलंब पर ? आखिर तुम्हारे ना समझ पाने का गम क्या कम है कि सारे ज़माने से लड़ते फिरें।

साहिर लुधयानवी ने इसी बात को अपनी इस नज़्म में पिरोया है। उनके सवाल के अंदर की बेबसी, लफ़्जों में उभर कर आई है। और लता जी की गायिकी साहिर के इस सवाल को दिल तक पहुँचाती है इक टीस के साथ। तो पेशे खिदमत है, रोशन का संगीतबद्ध किया हुआ फिल्म 'बहू बेगम' का ये गीत...


दुनिया करे सवाल तो हम क्या जवाब दें
तुमको न हो ख़याल तो हम क्या जवाब दें
दुनिया करे सवाल ...

पूछे कोई कि दिल को कहाँ छोड़ आये हैं
किस किस से अपना रिश्ता-ए-जाँ तोड़ आये हैं
मुशकिल हो अर्ज़-ए-हाल तो हम क्या जवाब दें
तुमको न हो ख़याल तो ...

पूछे कोई कि दर्द-ए-वफ़ा कौन दे गया
रातों को जागने की सज़ा कौन दे गया
कहने से हो मलाल तो हम क्या जवाब दें
तुमको न हो ख़याल तो ...

इस गीत के बोल अक्षरमाला से लिये गए हैं।

Wednesday, October 17, 2007

हमारा हिस्सा : आज चर्चा इस संकलन की बाकी की आठ कहानियों की- भाग 2

तिरिया चरित्तर ये नाम है इस संकलन की नवीं कहानी का जो शिवमूर्ति ने लिखी है। कहानी के पहले कुछ पन्ने पढ़े तो लगा कि ये कहानी तो सुनी-सुनी सी लग रही है। दिमाग पर जोर डाला तो याद आया कि 'राजेश्वरी सचदेव' अभिनीत ये मार्मिक कथा टीवी पर देखी थी। दरअसल १९९४ में इसी कहानी पर बासु चटर्जी ने एक कमाल की फिल्म बनाई थी। ये कथा परिवार को अपनी मेहनत मजूरी से चलाने वाली विमली की है जिसके व्यक्तित्व में उसकी आत्मनिर्भरता का आत्मविश्वास छलकता है। पर यही विमली जिसे ईंट के भट्टे पर कोई साथी मजदूर आँख तरेरने से घबड़ाता था, शादी के बाद पति की अनुपस्थिति में अपने ससुर की हवस का शिकार बनती है। और विडंबना ये कि गाँव का पुरुष प्रधान समाज ससुर के बजाए उसे ही नीच चरित्र का बता कर उस के माथे पर जोर जबरदस्ती से गर्म कलछुल दगवा देता है।

कथा सीधे दिल पर चोट करती है क्योंकि हमारे समाज में आज भी ऍसे क्रूरतापूर्ण फैसले लिए जाते रहे हैं। अपने प्रदेश की बात करूँ तो कितनी औरतों को डायन की संज्ञा देकर पीट पीट कर मार डाला जाता है। हरियाणा और पश्चिमी उत्तरप्रदेश में जाति के बाहर प्रेमी प्रेमिकाओं को मौत के घाट उतारने की घटनाएँ तो साल में कई बार दुहराई जाती हैं।

प्रश्न ये उठता है कि क्या ऍसी घटनाओं को रोकने के लिए महिलाओं का राजनैतिक सशक्तिकरण जरूरी है?

कुछ हद तक ये सही रास्ते पर जाता एक कदम जरूर है। पर इस सशक्तिकरण का दूसरा पहलू मैत्रेयी पुष्पा अपनी कहानी में दर्शाती हैं। 'फ़ैसला' एक ब्लॉक प्रमुख का अपनी पत्नी को प्रधान बनवा सत्ता के ऊपरी गलियारों तक पहुँचने की कोशिश की कहानी है। वैसे भी आज का राजनैतिक परिदृश्य तो हर जगह ऍसा ही है जहाँ नारी को दिया जाने वाला वाला पद, पुरुष के लिए सत्ता की ऊपरी सीढ़ी चढ़ने का एकमात्र ज़रिया होता है।। पर अन्याय से आँखें मूँद लेने वाली नई ग्राम प्रधान वसुमती घर में होने वाले क्लेश की परवाह ना कर नारी के मान सम्मान को तरज़ीह देने वाला फ़ैसला लेती है तो आशा की नई किरण फूटती सी दिखती है।

'बैल बनी औरत' में लवलीन ने आदिवासी समाज की कहानी कही है जिसके विकास को पुरुषों के निकम्मेपन और नशाखोरी की आदतों ने बुरी तरह जकड़ रखा है । ऐसे में अगर नायिका मुरमू खुद बैल जोतने की कोशिश करती है तो वो समाज, उसकी कर्मठता पर शाबासी देने के बजाए उसे बैल की जगह जोत देता है। साफ है कि इस समाज को ये भय है कि ऍसी आजादी देकर वो अपने आप को किसी भी प्रकार से महिलाओं से विशिष्ट नहीं ठहरा पाएगा।

जातियों में बँटी हमारी वर्ण व्यवस्था पहले की अपेक्षा आज ढ़ीली तो पड़ी है पर जड़ से बिलकुल नहीं गई है। हममें से कितने हैं जो मल मूत्र उठाने वालों को बिना किसी घिन के सिर्फ एक आम मज़दूर की तरह देखते हैं। अगर हममें से किसी को ये काम करने को कह दिया जाए तो सोच कर ही उल्टियाँ आने लगेंगी। सूरजपाल चौहान ने अपनी कहानी 'बदबू' में इसी बात को पुरजोर तरीके से उठाया है।

गाँव में हँसती खेलती, पढ़ने में होशियार संतोष की पढ़ाई छुड़वा कर उसकी शादी शहर कर दी गई और तुरंत ही सास ने उसे शहर की गंदगी ढ़ोने के काम पर लगा दिया। इस बदबू को झेलते झेलते एक हँसती मुस्कुराती लड़की एक संवेदनाहीन पत्थर बना दी गई, सिर्फ इस वज़ह से कि उसकी जाति का ये परंपरागत काम था।

क्या ये एक तरह का अन्याय नहीं है? मन ये सोचने पर विवश हो जाता है।

ये कहानियाँ अगर ग्रामीण पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं का दर्द बयां करती हैं तो विजयकांत की कहानी 'लीलावती' शहरी पढ़े लिखे समाज में भी पुरुषों के वर्चस्व को दर्शाती है जहाँ कुशाग्र बुद्धि की तनिमा मंडल आई.ए.एस. की परीक्षा तो पास कर जाती है पर एक हादसे के बारे में सच्ची बात कहने की कोशिश, उसे मानसिक अस्पताल में जबरन पहुँचवा देती है। विजयकांत की कहानी इस बात को स्पष्ट करती है कि शिक्षा से कहीं ज्यादा हमारी मानसिक रुढ़ियाँ नारी को उसका सही अधिकार दिलाने में बाधक हैं।

तनिमा जरूर असहाय है पर चित्रा मुदगल की कहानी 'प्रेतयोनि' की नायिका नीतू नहीं। अनहोनी देखिए कि एक टैक्सी ड्राइवर के बलात्कार के प्रयास से लड़ भिड़ कर सही सलामत लौटी अपनी बहादुर बेटी पर खुद उसकी माँ विश्वास नहीं कर पाती कि वो पाक रह पाई है। पिता सामाजिक पूछाताछी से बचने के लिए उसे शहर से बाहर बताने का स्वांग रचते हैं। पर क्यूँ नीतू सहती रहे आत्मग्लानि का ये लिजलिजा सा अहसास! इससे तो मर जाना ही बेहतर है , पर वो तो कायरता होगी। इसीलिए वो परिवार की इच्छा के विरुद्ध उस मुहिम का साथ देना ज्यादा पसंद करती है जो इन सामाजिक दरिंदों को पकड़वाने के लिए कटिबद्ध हो।

इन के आलावा इस संकलन में मृदुला गर्ग और सत्येन कुमार की कहानियाँ भी है।

अधिकांश कहानियों की कथा वस्तु हमारे आस पास के शहरी, कस्बाई या ग्रामीण समाज से ली गई हैं, इस लिए आम पाठकों के लिए उनसे जुड़ना सहज है। कहानियों का शिल्प कुछ ऍसा है कि कहीं भी भाषाई आडंबर की बू नहीं आती, नज़र आता है तो इन जीवित समस्याओं से कथाकार का सरोकार। यही सरोकार पाठक के मन को झिंझोड़ता है, आंदोलित करता है अपने स्तर से समाज के इन दो पाटों के बीच की असमानता को कम करने के लिए और यही इस संकलन की सफलता है।

पुस्तक के बारे में
हमारा हिस्सा : कहानी संग्रह
संपादक : अरुण प्रकाश
प्रकाशक : पेंगुइन बुक्स
मूल्य : १९० रुपये
प्रकाशन वर्ष : २००५

इस समीक्षा की पिछली कड़ी आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

Monday, October 15, 2007

हमारा हिस्सा : आज की नारी की छवि को उभारता एक सशक्त कहानी संग्रह- भाग १

मुझे उपन्यास पढ़ना एक कहानी संग्रह पढ़ने की अपेक्षा ज्यादा रुचिकर लगता है। उपन्यास में सुविधा ये है कि एक बार कथा वस्तु आपको भा गई तो फिर उसे खत्म करने के लिए समय अपने आप निकल जाता है। पर कहानी संग्रह में हर नई कहानी को तुरंत पढ़ने की बाध्यता नहीं रहती, सो मामला खिंचता चला जाता है। अब इसी कहानी संग्रह को लें। आज की नारी की तसवीर उभारती इन १६ कहानियों को पढ़ने में मैंने आठ महिने लगा दिए। पर ये कहानियाँ इतनी सशक्त हैं और इनके पात्र इतने सजीव, कि उन्हें पढ़ने के बाद भी महिनों तक इन पात्रों के इर्द गिर्द की सामाजिक परिस्थितियाँ रह-रह कर इस दौरान मन में प्रश्न करती रहीं।

इस कहानी संकलन के संपादक अरुण प्रकाश हैं जो पुस्तक की प्रस्तावना में कहते हैं कि

"...बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी कहानी ने स्त्री की कैसी छवि निर्मित की इस संकलन की चिंता इतनी भर है। इस चयन में दो बातों का ही ध्यान रखा गया स्त्री की छवि और कहानी की प्रभावशीलता..."

और इसमें कोई शक नहीं कि अरुण प्रकाश जी ने जिन कहानियों का चयन किया है, उनमें ज्यादातर इस कसौटी पर खरी उतरी हैं।

कहानी संकलन की शुरुवात पचास के दशक में लिखी गई कमलेश्वर जी की रचना 'देवा की माँ ' से होती है जो एक परित्यक्ता होने के बावजूद अपने पति को सम्मान की नज़रों से देखती है। वक़्त के साथ पति की असली छवि जब उसपे प्रकट होती है तो संस्कारगत आचरण और पूर्ण विद्रोह से परे वो अपने और अपने बेटे के लिए एक मध्यम मार्ग चुनती है।

रांगेय राघव की कहानी 'गदल' भी एक ऍसे ही एक पात्र की कहानी है जो 'देवा की माँ' की तरह ही अपनी संस्कारगत सीमाओं में रहकर अपना विद्रोह प्रकट करती हैं। गूजर समुदाय की गदल अपने पति की मृत्यु होने पर अपना भरा पूरा परिवार छोड़ कर दूसरे परिवार में शादी का निर्णय लेती है क्यूँकि पति की अनुपस्थिति में वो बहुओं के सामने अपना कद छोटा होते नहीं देखना चाहती। पर अपने आत्मसम्मान की रक्षा के साथ साथ वो अपने देवर के आत्मसम्मान पर भी चोट करना चाहती है जो उसके पति की मृत्यु के बाद चाहता तो उससे शादी कर सकता था, पर गदल का मन जानकर भी उदासीन है। देवर पर गदल की ये मनोवैज्ञानिक चोट उसके लिए प्राणघातक सिद्ध होती है। इसके बाद गदल का उठाया गया कदम कहानी और गदल के चरित्र को एक दूसरे ही स्तर तक उठा ले जाता है।

आगे की दो कहानियाँ शहरी जीवन में विवाहोपरांत स्त्री पुरुष संबंधों के बनते बिगड़ते आयाम को देखने की कोशिश है। स्वयम् प्रकाश अपनी कहानी में पति द्वारा पत्नी के प्रति अपने संबंधों और आपसी व्यवहार का पुनरावलोकन उसके साथ खेले गए बैडमिंटन मैच के दौरान करते हैं। वहीं नासिरा शर्मा ने बच्चों के सेटल हो जाने और पति के अपने काम में रमे रहने से नायिका के जीवन में आई रिक्तिता को भरने के लिए परपुरुष के सहारा लेने को अपना विषय बनाया है।

भगवान दास मोरवाल ने अपनी कहानी 'महराब' को मेवात के इलाके में रहने वाले मेव मुसलमानों के समाज पर केंद्रित किया है। ये समाज हिंदू और इस्लामी दोनों रिवाजों का पालन करता आया है । किस तरह आज की पढ़ी लिखी नई पीढ़ी, समाज की इन सामुदायिक परंपराओं के निर्वहन को गैरजरूरी बना कर आपस संबंधों का फीकापन बढ़ाती जा रही है, यही मोरवाल की कथा का विषय है। पर ये सामुदायिक परंपराएँ हर जगह अपनाने लायक हैं ऍसा भी नहीं है। अपनी कहानी 'फट जा पंचधार' में विद्यासागर नौटियाल ने गढ़वाल में प्रचलित बहु विवाह की प्रथा और जाति विभेद की मार सहती एक स्त्री जीवन की कहानी की कोशिश की है जिसे अपनी समस्या का अंत एक सामाजिक भूकंप के आए बिना नहीं दिखता।

ममता कालिया की कहानी 'आपकी छोटी लड़की' इस संकलन की सबसे मासूम कहानी है। यह कहानी, अपनी बड़ी बहन के गुणों और अपनी हीनता की छाया में रहने वाली छोटी बच्ची के अपनी काबिलियत को पहचानने की यात्रा है जो सहज दिल को छू लेती है।

पर शुरु की आठ कहानियों में दिल पर जो सबसे ज्यादा हावी रही वो थी संजीव की कहानी 'दुनिया की सबसे हसीन औरत'। जिस कहानी का चरित्र आप के अगल बगल के समाज से खींचा गया हो, उसके पात्रों की व्यथा को आप मात्र कहानी मानकर अपने दिलो दिमाग से जुदा नहीं कर सकते। झारखंड की किसी भी सवारी गाड़ी या एक्सप्रेस के सामान्य दर्जे के डिब्बे में संजीव की सब्जी बेचती आदिवासी नायिका आपको दिखाई दे जाएगी। उसकी दिन भर की पीठतोड़ मेहनत का बड़ा हिस्सा प्रशासन का ये पुलसिया टीटी तंत्र ले लेता है और हम जैसे पढ़े लिखे लोग देखकर भी मूक दर्शक बने रहते हैं। कहानी पढ़कर अपने प्रति धिक्कार की भावना उपजी कि दोष हमलोगों का भी है ।सिर्फ इसलिए अन्याय से मुँह मोड़ना कि वो हमारे साथ नहीं हो रहा भी एक अपराध है। संजीव ने अपनी कहानी के नायक के माध्यम से जो संदेश दिया है वो अनुकरणीय है।
ये तो था इस पठनीय संग्रह की पहली आठ कहानियों का लेखा जोखा। अगली आठ कहानियों की चर्चा करेंगे इस प्रविष्टि के अगले भाग में ....

इस प्रविष्टि का अगला भाग आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

Sunday, October 14, 2007

आप सब को ईद मुबारक :ऐसी न शब बरात, न बकरीद की खुशी, जैसी हर एक दिल में है इस ईद की खुशी...

सबसे पहले तो सारे चिट्ठाकार साथियों और खासकर अपने मुसलमान मित्रों को ईद की हार्दिक मुबारकबाद ! वैसे तो हर पर्व त्योहार से जीवन की सुखद स्मृतियाँ जुड़ी होती हैं पर ईद से हमारे परिवार का एक विशेष रिश्ता बन गया है। करीब छः साल पहले ईद के मुबारक मौके पर हमारे एकमात्र सुपुत्र इस दुनिया में पधारे थे। कल जब अपने बेटे को ये समझा रहे थे कि आपका एक जन्म दिन दिसंबर के आलावा कल भी है तो आनन फानन ही उसने केक की फरमाइश कर डाली। पर हमने कहा भाई कल यानि आज हम आपको केक तो नहीं पर सिवैयाँ जरूर खिलाएँगे। तो चलिए आप भी जश्न और उल्लास में शामिल हो जाइए नज़ीर अकबराबादी की इस खूबसूरत शायरी के साथ जो ईद के माहौल का बड़ा ही जीवंत विवरण प्रस्तुत करती है

है आबिदों को ताअत‍-ओ-तज़रीद की खुशी
और जाहिदों को जुह्द की तमहीद की खुशी
रिंद आशिकों को है कई उम्मीद की खुशी
कुछ दिलबरों के वस्ल की कुछ दीद की खुशी

ऐसी न शब बरात, न बकरीद की खुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की खुशी

रोज़े की खुश्कियों से जो हैं ज़र्द-ज़र्द गाल
खुश हो गए वो देखते ही ईद का हिलाल
पोशाकें तन में हैं ज़र्द, सुनहरी, सफेद, लाल
दिल क्या कि हँस रहा है तन का बाल बाल

ऐसी न शब बरात, न बकरीद की खुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की खुशी

पिछले पहर से उठके नहाने की धूम है
शीर-ओ-शकर, सिवैयाँ पकाने की धूम है
पीर-ओ-जवां की नेमतें खाने की धूम है
लड़कों को ईदगाह के जाने की धूम है

ऐसी न शब बरात, न बकरीद की खुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की खुशी

क्या ही मुआनके की मची है उलट पलट
मिलते हैं दौड़-दौड़ के बाहम झपट-झपट
फिरते हैं दिलबरों के भी गलियों में गट के गट
आशिक मजे उड़ाते हैं हर दम लिपट-लिपट

ऐसी न शब बारात, न बकरीद की खुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की खुशी

जो जो कि उनके हुस्न की रखते हैं दिल में चाह
जाते हैं उनके साथ लगे ता-ब-ईदगाह
तोपों के शोर और दोगानों की रस्म-ओ-राह
म्याने, खिलौने, सैर, मजे ऐश वाह वाह

ऐसी न शब बारात, न बकरीद की खुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की खुशी


रोज़ों की सख्तियों में न होते अगर असीर
तो ऍसी ईद की न खुशी होती दिलपज़ीर
सब शाद है गदा से लगा शाह ता वज़ीर
देखा जो हमने खूब, तो सच है मियां नज़ीर

ऐसी न शब बरात, न बकरीद की खुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की खुशी


और चलते चलते अनीक धर को हार्दिक बधाई जो कल सा रे गा मा पा कि वोटों की गिनती में राजा और अमानत से बढ़त बनाने में सफल हुए और कोलकाता के लोगों को दुर्गा पूजा के पहले एक हसीन तोहफा दे गए। दस करोड़ से ज्यादा वोटों में पहले, दूसरे और तीसरे स्थान पर रहे प्रतिभागियों के लिए वोट प्रतिशत ३४.४, ३३.२ और ३२.४ रहा जो इस बात को साबित करता है कि तीनों पर आम जनता का बराबर का प्रेम रहा। जीतना एक को था वो जीत गया पर असली जीत संगीत की हुई। तो ईद के इस मौके पर देखिए राजा हसन का गाया मातृभूमि प्रेम से ओतप्रोत ये गीत..

Thursday, October 11, 2007

'सा रे गा मा पा' : आज सुनिए हिमानी कपूर, पूनम यादव और सुमेधा करमहे की दिलकश आवाज़ को...

पिछली पोस्ट में मैंने जिक्र किया था 'सा रे गा मा पा' की उन आवाज़ों का जिन्होंने शीर्ष तीन में जगह बना ली है। पर ये गौर करने की बात है कि कोई लड़की इस साल या इसके पिछले संस्करण २००५ में प्रथम तीन में स्थान नहीं बना पाई। इसकी वज़ह हमारे देश का वोटिंग ट्रेंड है जो लड़कों के पक्ष में थोड़ा झुका हुआ जरूर है। खैर, मैं आज बात करूँगा उन तीन लड़कियों की जो 'सा रे गा मा पा' के मंच पर अपनी गायिकी से मेरा दिल जीत चुकी हैं।

हिमानी कपूर : बात २००५ की है। राहत फतेह अली खाँ का गाया गीत 'जिया धड़क धड़क जाए....' हम सबकी जुबान पर था। कितनी खूबसूरती से निभाया था राहत ने इस गीत को। पर जब एक लड़की ने इतने मुश्किल गीत को चुना और स्टेज पर लाइव इसे गा कर दिखाया की खुशी से मेरी आँखें नम हो गईं थीं।। वो लड़की थी फरीदाबाद की हिमानी कपूर जो उस वक्त १७ साल की थीं। नौ साल की उम्र से ही शास्त्रीय संगीत सीखने वाली हिमानी की गायिकी में एक खास बात ये थी कि वो कठिन से कठिन गीत को इस सहजता से गाती थी, मानो बिना किसी विशेष प्रयास के गा रही हो।

दुर्भाग्यवश, हिमानी को अपने बेहतरीन प्रदर्शन के बाद भी प्रथम तीन में जगह नहीं मिली थी, पर मुझे पूरा विश्वास था कि वो आगे जरूर सफल होगी। पिछले दो सालों से अपने पिता के साथ हिमानी, मुंबई में हैं और खुशी की बात ये है कि आजकल हिमानी HMV पर अपने पहले संगीत एलबम 'अधूरी' के लिए आखिरी तैयारियों में व्यस्त है। आशा है कुछ ही दिनों में इस एलबम का पहला संगीत वीडियो टीवी के पर्दे पर होगा।
तो लीजिए सुनिए हिमानी का 'सा रे गा मा पा' २००५ में गाया 'जिया धड़क धड़क जाए....'



इस गीत का वीडियो आप यहाँ देख सकते हैं।



पूनम जटाउ या पूनम यादव : पूनम आज भारत की हर उस लड़की की प्रेरणा स्रोत बन चुकी हैं जो साधनों के आभाव में भी अपनी प्रतिभा के बल पर कुछ कर दिखाने की तमन्ना रखती है, चाहे उसके लिए कितना भी कष्ट क्यूँ ना सहना पड़े। जिस बच्ची पर से पिता का साया जन्म लेने से पहले ही गुजर गया हो, जिसकी माँ इधर उधर घरों में काम कर घर का खर्च चलाती हो , जो खुद एक बूथ में काम करती हो..

ऍसी लड़की ने संगीत किस तरह सीखा होगा और कितनी मेहनत करनी पड़ी होगी उसे इस प्रतियोगिता में अंतिम चार तक पहुँचने के लिए.. ये सोचकर ही मन पूनम के लिए श्रृद्धा से झुक जाता है। पूनम ने पूरी प्रतियोगिता में नए, पुराने, देशभक्ति,शास्त्रीय राग पर आधारित कई तरह के नग्मे गाए और क्या खूब गाए। इस छोटे कद की २६ वर्षीया कन्या में गज़ब की उर्जा है और साथ ही है अपनी गायिकी को और बेहतर करने का समर्पण भाव । मुझे यक़ीन हे कि उनकी आवाज़ हमें आगे भी सुनने को मिलती रहेगी। वैसे तो पूनम ने ज्यादातर गंभीर किस्म के गाने गाए पर शमशाद बेगम का ये गीत 'मेरे पिया गए रंगून.....' जिस हाव भाव और मस्ती से उन्होंने गाया कि मन बाग बाग हो उठा। आप भी देखिए ये वीडियो.


सुमेधा करमहे: सचमुच की गुड़िया दिखने वाली सुमेधा, छत्तिसगढ़ के छोटे से शहर राजनंदगाँव से आती हैं। वैसे लालू जी के सामने अपनी पारिवारिक बिहारी पृष्ठभूमि को बताना वे नहीं भूलीं। इनकी आवाज में एक मिठास और सेनसुआलिटी है जो बहुत कुछ श्रेया घोषाल से मिलती जुलती है। १८ साल की उम्र में ही इतनी परिपक्वता से गाती हैं तो आगे भी इनकी आवाज में उम्र के साथ-साथ और निखार और विविधता आएगी ऐसी आशा है। इनकी प्रतिभा को देखते हुए महेश भट्ट ने इन्हें अपनी फिल्म में गाने के लिए चुना भी है।

चुलबुले और रूमानी गीतों में वो काफी प्रभावित करती हैं। उन्होंने घर से 'तेरे बिना जिया जाए ना..', युवा से 'कभी नीम नीम कभी शहद शहद...' और कारवां से 'पिया तू अब तो आ जा..' को बेहतरीन
तरीके से निभाया। पर मैं आपको दिखा रहा हूँ सुमेधा का गाया साथियां का मेरी पसंद का ये नग्मा..
यानि 'चुपके से, चुपके से रात की चादर तले.... '



तो ये बताएँ कि इनमें से कौन सी गायिका आपको सबसे ज्यादा पसंद है ?

Tuesday, October 09, 2007

'सा रे गा मा पा' के धुरंधर राजा हसन, अनीक धर और अमानत अली की बेमिसाल गायिकी...

टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम मैं नियमित रूप से नहीं देखता। पर 'सा रे गा मा पा' एक ऍसा कार्यक्रम है जिसे छोड़ पाना मेरे लिए संभव नहीं होता। हालांकि जब तब टी. आर. पी. झटकने के लिए इन कार्यक्रमों पर होने वाली नौटंकियाँ मन को व्यथित करती हैं, पर मन का विषाद इन नए प्रतिभावान युवाओं को इतने सुरीले अंदाज में गाते हुए देख कब धुल जाता हे ये पता ही नहीं चलता। जब ये बच्चे पंडित जसराज और जगजीत सिंह जैसी महान सांगीतिक विभूतियों से आशीर्वाद पाते हैं तो मेरा मन भीतर तक पुलकित हो जाता है और ये आस्था और घर कर जाती है कि आज की नई पीढ़ी भी संगीत के प्रति रुचि और समर्पण रखती है और इस विधा में अपनी मेहनत और प्रतिभा के बल पर अपनी पहचान बनाना चाहती है।

पिछले दो महिनों से 'सा रे गा मा पा' के प्रथम पाँच प्रतिभागियों ने अच्छे संगीत के माध्यम से मुझे जो खुशी दी है, उसे बयाँ करना मेरे लिए मुश्किल है। आज की मेरी ये प्रविष्टि 'सा रे गा मा पा' के इन प्रर्तिभागियों को समर्पित है जिनकी गायिकी से मैं बेहद प्रभावित हुआ हूँ। तो शुरुवात सा रे गा मा पा के इन तीन महारथियों से जिनके बीच की खिताबी जंगका निर्णायक फ़ैसला १३ अक्टूबर को होना है....

राजा हसन : २६ साल के राजा हसन बीकानेर, राजस्थान से आते हैं। कई दिनों से मुंबई में संगीत में अपना कैरियर बनाने की कोशिश कर रहे थे। राजा को संगीत विरासत में मिला है। सात साल की आयु से ही उन्होंने शास्त्रीय संगीत सीखना शुरु किया। जब जब राजा किसी राग पर आधारित या सूफियाना गीत चुनते हैं, उन्हें सुनने का आनंद अद्भुत होता है। उनकी आवाज़ में बुलंदी है, सुरों के उतार चढ़ाव में अच्छी पकड़ है। साथ ही दर्शकों को अपने व्यक्तित्व और हाव भाव से रिझाने का फन भी उनके पास है। पर राजा कमजोर पड़ते हैं हल्के फुल्के रूमानी गीतों को गाने में। कभी-कभी वो शब्द भी गलत बोल जाते हैं पर उनकी आवाज़ का जादू मानसपटल पर इस कदर हावी हो जाता है कि ये भूलें नज़रअंदाज करने को जी चाहने लगता है
आइए देखें इस राजस्थानी लोकगीत को राजा ने क्या कमाल निभाया है...





नीक धर : कहते हैं, संगीत बंगालियों के खून में होता है और सा रे गा मा पा के इस शो पर १८ साल के अनिक ये बात सच साबित करते दिखते हैं। अनिक की खूबी ये है कि जब वे कोई गीत गाते हैं वो उसमें डूब जाते हैं। पहली बार अनिक धर की आवाज़ को मैंने तबसे ध्यान देना शुरु किया था जब इसी तरह चिट्ठा लिखते समय जुबीन गर्ग का गाया गीत जाने क्या चाहे मन बावरा... गाते सुना था और वो अगले दिन ही मेरे इस चिट्ठे की नई पोस्ट के रूप में आपके सामने था। अनिक सा रे गा मा का बंगाली संस्करण जीत चुके हैं। अनिक के साथ दिक्कत ये है कि आयु कम होने की वज़ह से उनकी आवाज़ में वो बुलंदी नहीं आ पाती जो राजा में है। पर नर्म रूमानियत भरे गीतों को गाने में वे अपने प्रतिद्वंदियों को कहीं पीछे छोड़ देते हैं।

अब हाल ही में उनके गाए ओम शांति ओम के इस गीत पर नज़र डालें। उनकी अदायगी से दीपिका पादुकोण तक मुग्ध हो गईं। आप भी आनंद लें।






अमानत अली: अमानत 'सा रे गा मा पा' में पाकिस्तान से आए प्रतिभागी हैं। मोरा पिया मोसे बोले ना में उन्हें गाते सुनकर मन झूम उठा था। पर शुरु शुरु में वो मस्ती और उर्जा भरे गीतों को गाने में कमजोर दिखते थे। पर इस्माइल दरबार की शागिर्दी ने विगत कुछ सप्ताहों से उनमें जबरदस्त सुधार लाया है और अब वो हर तरह के गीत बड़ी खूबसूरती से निभा जाते हैं। आज उन्हें सा रे गा मा पा के तीन अंतिम प्रतिद्वंदियों में सबसे वर्सटाइल कहा जा रहा है। अमानत गीतों मे अपनी ओर से हमेशा अदाएगी में विविधता ले आते हैं जिसे सुन कर दिल वाह वाह किए बिना नहीं रह पाता। और जब वो कोई ग़ज़ल गाते हैं तो जगजीत सिंह जैसे कंजूस गुरु भी दिल से दाद दिए बिना नहीं रह पाते। तो लीजिए देखिए गुलाम अली की गाई ग़ज़ल "हंगामा हैं क्यूँ बरपा"...को किस खूबसूरत अंदाज में गा रहे हैं अमानत...





मुझे इन तीनों युवा प्रतिभाओं से बेहद प्यार है। इनमें से कोई जीते वो कोई खास मायने नहीं रखता। मैं तो बस यही चाहता हूँ की संगीत के क्षेत्र में ये तीनों युवा अपनी काबिलियत के बल पर वो मुकाम बना पाएँ जिनके वो वास्तविक हकदार हैं।

अगली पोस्ट में बात करूंगा अपनी पसंद की तीन अन्य प्रतिभागियों की जिनकी आवाज़ की खूबसूरती का पूरा भारत आनंद पिछले कुछ महिनों में आनंद उठाता रहा है।

Thursday, October 04, 2007

मुकेश की आवाज में जाँ निसार अख्तर का कलाम : जरा सी बात पे हर रस्म तोड़ आया था...

लमहा लमहा तेरी यादें जो चमक उठती हैं
ऐसा लगता है कि उड़ते हुए पल जलते हैं
मेरे ख़्वाबों में कोई लाश उभर आती है
बंद आँखों में कई ताजमहल जलते हैं...

जाँ निसार अख्तर





जो जल गया वो तो राख राख ही हुआ चाहता है।
कहाँ रही संबंधों में ताजमहल की शीतल सी मुलायमियत ?
अब तो धुएँ की लकीर के साथ है तो बस राख का खुरदरापन।
गुज़रे व़क्त की छोटी छोटी बातें दिल में नासूर सा बना गई और वो ज़ख्म रिस रिस कर अब फूट ही गया।
जलते रिश्तों का धुआँ आँखों मे तो बस जलन ही पैदा कर रहा है ना।
अब शायर अफ़सोस करे तो करता रहे...कुछ बातें बदल नहीं सकतीं
क्या सही था क्या गलत ये सोचने का वक़्त जा चुका है
फिर भी कमबख़्त यादें हैं कि पीछा नहीं छोड़तीं..
ऐसे सवाल करती हैं जिनका जवाब देना अब आसान नहीं रह गया है...


तो आइए सुने इन्हीं ज़ज़्बातों को उभारती मुकेश की आवाज में जावेद अख्तर के वालिद जाँ निसार अख्तर की ये ग़ज़ल। इस ग़जल की धुन बनाई थी खय्याम साहब ने।



जरा सी बात पे हर रस्म तोड़ आया था

दिल-ए-तबाह ने भी क्या मिज़ाज पाया था


मुआफ़ कर ना सकी मेरी ज़िन्दगी मुझ को
वो एक लम्हा कि मैं तुझ से तंग आया था
*शगुफ़्ता फूल सिमट कर कली बने जैसे
कुछ इस तरह से तूने बदन चुराया था

गुज़र गया है कोई लम्हा-ए-**शरर की तरह
अभी तो मैं उसे पहचान भी न पाया था

पता नहीं कि मेरे बाद उन पे क्या गुज़री
मैं चंद ख़्वाब ज़माने में छोड़ आया था
*विकसित, खिला हुआ, ** चिनगारी


मुकेश की ये बेहतरीन ग़जल HMV के कैसेट(STHVS 852512) और अब सीडी में भी मौजूद है। सोलह गैर फिल्मी नग्मों और ग़ज़लों में चार जाँ निसार अख्तर साहब की हैं। चलते-चलते पेश है इस एलबम में शामिल उनकी लिखी ये खूबसूरत ग़जल जो सुनने से ज़्यादा पढ़ने में आनंद देती है। इस ग़ज़ल के शेरों की सादगी और रूमानियत देख दिल वाह वाह कर उठता है।

अशआर मेरे यूँ तो ज़माने के लिये हैं

कुछ शेर फ़क़त उनको सुनाने के लिये हैं


अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिये हैं

आँखों में जो भर लोगे तो कांटों से चुभेंगे
ये ख़्वाब तो पलकों पे सजाने के लिये हैं

देखूँ तेरे हाथों को तो लगता है तेरे हाथ
मंदिर में फ़क़त दीप जलाने के लिये हैं

सोचो तो बड़ी चीज़ है तहज़ीब बदन की
वरना तो बदन आग बुझाने के लिये हैं

ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें
इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिये हैं

जाँ निसार अख्तर की रचनाएँ आप 'कविता कोश' में यहाँ पढ़ सकते हैं
जिन्हें मुकेश की आवाज़ बेहद पसंद है उन्हे ये एलबम जरूर पसंद आएगा। अगली पोस्ट में इसी एलबम की एक और ग़ज़ल के साथ लौटूँगा जिसकी वजह से वर्षों पहले मैंने ये कैसेट खरीदी थी।

Tuesday, October 02, 2007

हिंदी पखवाड़ा , महुआ माजी और मेरी कविता...

पिछले दस सालो से मैं हिंदी पखवाड़े में लगातार हिस्सा लेता आ रहा हूँ। मुख्य वज़ह तो यही है कि इसी बहाने हिंदी में लिखने का अवसर मिल जाया करता है और पुरस्कार मिलते हैं सो अलग। पर क्या ये पखवाड़ा मुझे राजभाषा में कार्य करने के लिए प्रेरित कर पाता है ? दरअसल ये प्रश्न ही गलत है, जिस व्यक्ति की मातृभाषा हिंदी हो उसे क्या अपनी भाषा में काम करने के लिए प्रेरित करना होगा ?

पर तक़लीफ की बात है कि करना पड़ता है और तब भी हम प्रेरित नहीं हो पाते !

मन ये बात स्वीकार करने से हिचकता है कि राजभाषा के नाम पर किये जा रहे ये सारे कार्य एक छलावा नहीं हैं औरइनका एकमात्र उद्देश्य आंकड़ों की आपूर्ति कर संविधान के अनुच्छेदों की भरपाई कर लेना भर नहीं है।

अगर राष्ट्रभाषा की अस्मिता के बारे में हमारी सरकार इतना ही सजग होती तो रोजगार के अवसरों में इस तरह राष्ट्र और आंचलिक भाषाओं के विषयों का समावेश करती, जिसमें प्राप्त अंक बाकी विषयों के साथ जुड़ते। ऍसा होने पर स्कूल के समय से ही विद्यार्थी अपनी भाषा को उपेक्षा की दृष्टि से ना देखते।

आज हालत ये है कि हाई स्कूल के पहले तक अपनी मातृभाषा पढ़ने के लिए बस इतनी मेहनत करते हैं कि वो उसमें उत्तीर्ण भर हो जाएँ। इसके बाद तो सारा तंत्र ही इस तरह का है कि जीवन मे आगे बढ़ने के लिए जितना अंग्रेजी के पास और जितना अपनी भाषा से दूर रहें उतनी ही ज्यादा सफलता की संभावना है।

इस परिपेक्ष्य में राजभाषा पखवाड़ा, समस्या की जड़ पर ना चोट कर उसके फैलने के बाद इस तरह की सालाना क़वायद महज खानापूरी नहीं तो और क्या है? पर इतना सब होते हुए भी ये पखवाड़ा व्यक्तिगत तौर पर मुझे एक सुकून देता है।

राजभाषा के प्रचार प्रसार की बात को थोड़ी देर के लिए भूल जाएँ तो एक हिंदी प्रेमी होने के नाते यही एक मौका होता है जब हिंदी पर बात करने के लिए सब वक़्त निकालते हैं। तकनीकी कार्यों के बीच अचानक ही किसी विषय पर हिंदी में लेख, कविता , कहानी, प्रश्नोत्री में भाग ले कर आना मुझे स्कूल के दिनों जैसा ही रोमांचित कर देता है। और फिर पखवाड़े के आखिरी दिन हिंदी जगत से जुड़े किसी गणमान्य व्यक्ति , जो कि हमारे कार्यक्षेत्र से बिल्कुल ही पृथक परिवेश से आते हैं, को सुनना बेहद सुखद अनुभव होता है।


इस बार हमारे कार्यालय में झारखंड की नवोदित उपन्यासकार महुआ माजी को बुलाया गया था जिनके 'राजकमल' द्वारा प्रकाशित उपन्यास 'मैं बोरिशाइल्‍ला' को इसी जुलाई में लंदन में 'इंदु शर्मा कथा सम्मान' से नवाज़ा गया था। महुआ जी ने बांगलादेश की पृष्ठभूमि पर रचे अपने उपन्यास के बारे में विस्तार से चर्चा की। लंदन प्रवास के दौरान विदेशों में बसे भारतीयों के हिंदी प्रेम से वो अभिभूत दिखीं। समाजशास्त्र में स्नात्कोत्तर करने वाली महुआ माजी का कहना था कि

"...एक बाँगलाभाषी होते हुए भी मेरे द्वारा हिंदी में लिखा गया पहला उपन्यास मुझे इतनी प्रसिद्धि दिला गया। ये साबित करता है कि हिंदी लेखन पर भी आज भी आलोचकों की नज़र है और उसे गंभीरता से लिया जा रहा है। अपनी संस्कृति को क्षय से बचाने के लिए अपनी भाषा को अक्षुण्ण रखना कितना जरूरी है, ये किसी से छुपा नहीं रह गया है। इसलिए आप चाहे अंग्रेजी में जितनी भी प्रवीणता हासिल क्यूँ ना करें, विश्व में दूसरी सबसे अधिक संख्या में बोली जाने वाली अपनी राष्ट्रभाषा को अनदेखा ना करें।....."

महुआ जी के लेखन के बारे में तो उनकी किताब पढ़ने के बाद ही पता चलेगा। वापस लौंटते हैं अपने हिंदी पखवाड़े की ओर..
इस बार के हिंदी पखवाड़े में हम कार्मिकों से वहीं एक विषय देकर निबंध, कविता और कहानी लिखवाई गई।

इस बार की कविता का विषय था 'संध्या या शाम'। ऍसे तो कविता लिखी नहीं जाती। आप तो जानते ही हैं कि कविता लिखने का मेरा हिसाब भी पखवाड़े की तरह सालाना का ही है। वैसे भी इस बार तो ये सीमित समय वाली परीक्षा थी, तो मरता क्या ना करता लिखनी ही पड़ी..

शाम..........

उसकी आहट से मन में पुलक है,
प्रतिदिन उसका रूप अलग है,
छोड़ के बैठा मैं सब काम,
देखो आने वाली शाम ...

भोर, दुपहरी के बाद वो आती
कुछ इठलाती, कुछ मुसकाती
हवा के झोंके वो संग लाती
मेरी प्यारी, निराली शाम...

सूरज का चेहरा तन जाता
विद्यालय से वापस मैं आता
बढ़ती गर्मी, तपता हर ग्राम
तब ठंडक पहुँचाती शाम...

बचपन बीता आई जवानी
जीवन की थी बदली कहानी
इंतज़ार में थी हैरानी
पर वो आती, संग शाम सुहानी...

जीवन का ये अंतिम चरण है
संग स्मृतियों के कुछ क्षण हैं
आज इन्हें जब वो लेकर आती
और भी न्यारी लगती शाम....
 

मेरी पसंदीदा किताबें...

सुवर्णलता
Freedom at Midnight
Aapka Bunti
Madhushala
कसप Kasap
Great Expectations
उर्दू की आख़िरी किताब
Shatranj Ke Khiladi
Bakul Katha
Raag Darbari
English, August: An Indian Story
Five Point Someone: What Not to Do at IIT
Mitro Marjani
Jharokhe
Mailaa Aanchal
Mrs Craddock
Mahabhoj
मुझे चाँद चाहिए Mujhe Chand Chahiye
Lolita
The Pakistani Bride: A Novel


Manish Kumar's favorite books »

स्पष्टीकरण

इस चिट्ठे का उद्देश्य अच्छे संगीत और साहित्य एवम्र उनसे जुड़े कुछ पहलुओं को अपने नज़रिए से विश्लेषित कर संगीत प्रेमी पाठकों तक पहुँचाना और लोकप्रिय बनाना है। इसी हेतु चिट्ठे पर संगीत और चित्रों का प्रयोग हुआ है। अगर इस अव्यवसायिक चिट्ठे पर प्रकाशित चित्र, संगीत या अन्य किसी सामग्री से कॉपीराइट का उल्लंघन होता है तो कृपया सूचित करें। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी।

एक शाम मेरे नाम Copyright © 2009 Designed by Bie