Friday, August 31, 2007

यादें किशोर दा की : ये दर्द भरा अफ़साना, सुन ले अनजान ज़माना - भाग : ७

किशोर कुमार की पारिवारिक जिंदगी, उनकी शख्सियत जितनी ही पेचीदा रही। आज की ये पोस्ट मेरी कोशिश है उनकी व्यक्तिगत जिंदगी के इन अनछुए पहलुओं को कुछ दुर्लभ चित्रों के साथ बाँटने की । साथ ही बात करेंगे इस श्रृंखला के दूसरे नंबर के गीत की भी।

बात १९५१ की है। उस वक्त किशोर मुंबई फिल्म उद्योग में एक अदाकार के तौर पर पाँव जमाने की कोशिश कर रहे थे। इसी साल उन्होंने रूमा गुहा ठाकुरता से शादी की। १९५२ में अमित कुमार जी की पैदाइश हुई। ये संबंध १९५८ तक चला। रूमा जी का अपना एक आकर्षक व्यक्तित्व था। एक बहुआयामी कलाकार के रूप में बंगाली कला जगत में उन्होंने बतौर अभिनेत्री, गायिका, नृत्यांगना और कोरियोग्राफर के रुप में अपनी पहचान बनाई। पर उनका अपने कैरियर के प्रति यही अनुराग किशोर को रास नहीं आया। किशोर ने खुद कहा है कि

"...वो एक बेहद गुणी कलाकार थीं। पर हमारा जिंदगी को देखने का नज़रिया अलग था। वो अपना कैरियर बनाना चाहती थीं और मैं उन्हें एक घर को बनाने वाली के रूप में देखना चाहता था। अब इन दोनों में मेल रख पाना तो बेहद कठिन है। कैरियर बनाना और घर चलाना दो अलग अलग कार्य हैं। इसीलि॓ए हम साथ नहीं रह पाए और अलग हो गए।..."




१९५८ में ये संबंध टूट गया। इससे पहले १९५६ में मधुबाला, किशोर की जिंदगी में आ चुकी थीं। पाँच साल बाद दोनों विवाह सूत्र में बँध तो गए पर किशोर दा के माता-पिता इस रिश्ते को कभी स्वीकार नहीं पाए। बहुतेरे फिल्म समीक्षक इस विवाह को 'Marriage of Convenience' बताते हैं। दिलीप कुमार से संबंध टूटने की वजह से मधुबाला एक भावनात्मक सहारे की तालाश में थीं और किशोर अपनी वित्तीय परेशानियों से निकलने का मार्ग ढ़ूंढ़ रहे थे।

पर इस रिश्ते में प्यार बिलकुल नहीं था ये कहना गलत होगा। गौर करने की बात है कि मधुबाला ने नर्गिस की सलाह ना मानते हुए, भारत भूषण और प्रदीप के प्रस्तावों को ठुकरा कर किशोर दा से शादी की। तो दूसरी ओर किशोर ने ये जानते हु॓ए भी कि उनकी होने वाली पत्नी, एक लाइलाज रोग (हृदय में छेद) से ग्रसित हैं, उनसे निकाह रचाया। पर शुरुआती प्यार अगले ९ सालों में मद्धम ही पड़ता गया।
किशोर ने Illustrated Weekly को दिए अपने साक्षात्कार में कहा था...

"...मैंने उन्हें अपनी आँखों के सामने मरते देखा। इतनी खूबसूरत महिला की ऍसी दर्दभरी मौत....! वो अपनी असहाय स्थिति को देख झल्लाती, बड़बड़ाती और चीखती थीं। कल्पना करें इतना क्रियाशील व्यक्तित्व रखने वाली महिला को नौ सालों तक चारदीवारी के अंदर एक पलंग पर अपनी जिंदगी बितानी पड़े तो उसे कैसा लगेगा? मैं उनके चेहरे पर मुस्कुराहट लाने का अंतिम समय तक प्रयास करता रहा। मैं उनके साथ हँसता और उनके साथ रोता रहा। ..."

पर मधुबाला की जीवनी लिखने वाले फिल्म पत्रकार 'मोहन दीप' अपनी पुस्तक में उनके इस विवाह से खास खुशी ना मिलने का जिक्र करते हैं। सच तो अब मधुबाला की डॉयरी के साथ उनकी कब्र में दफ़न हो गया, पर ये भी सच हे कि किशोर उनकी अंतिम यात्रा तक उनके साथ रहे और जिंदगी के अगले सात साल उन्होंने एकांतवास में काटे। अगर गौर करें तो उनके लोकप्रिय उदासी भरे नग्मे इसी काल खंड की उपज हैं।

१९७६ में उन्होंने योगिता बाली से शादी की पर ये साथ कुछ महिनों का रहा। किशोर का इस असफल विवाह के बारे में कहना था....

"...ये शादी एक मज़ाक था। वो इस शादी के प्रति ज़रा भी गंभीर नहीं थी। वो तो बस अपनी माँ के कहे पर चलती थी। अच्छा हुआ, हम जल्दी अलग हो गए।..."

वैसे योगिता कहा करती थीं कि किशोर ऍसे आदमी थे जो सारी रात जग कर नोट गिना करते थे। ये बात किशोर ने कभी नहीं मानी और जब योगिता बाली ने मिथुन से शादी की, किशोर ने मिथुन के लिए गाना छोड़ दिया। इस बात का अप्रत्यक्ष फ़ायदा बप्पी दा को मिला और मिथुन के कई गानों में उन्होंने अपनी आवाज़ दी।

१९८० में किशोर ने चौथी शादी लीना चंद्रावरकर से की जो उनके बेटे अमित से मात्र दो वर्ष बड़ी थीं। पर किशोर, लीना के साथ सबसे ज्यादा खुश रहे। उनका कहना था..

'...मैंने जब लीना से शादी की तब मैंने नहीं सोचा था कि मैं दुबारा पिता बनूँगा। आखिर मेरी उम्र उस वक़्त पचास से ज्यादा थी। पर सुमित का आना मेरे लिए खुशियों का सबब बन गया। मैंने हमेशा से एक खुशहाल परिवार का सपना देखा था। लीना ने वो सपना पूरा किया।...

... वो एक अलग तरह की इंसान है । उसने दुख देखा है..आखिर अपने पति की आँख के सामने हत्या हो जाना कम दुख की बात नहीं है। वो जीवन के मूल्य और छोटी-छोटी खुशियों को समझती है। इसीलिए उसके साथ मैं बेहद खुश हूँ।
..."



किशोर दा की बातों को आप होली के दौरान खींचे गए चित्र में सहज ही महसूस कर सकते हैं।


ये तो हुईं उनकी निजी जिंदगी से जुड़ी कुछ बातें। अब एक बार फिर किशोर के पसंदीदा गीतों के इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हैं...


गीत संख्या २ : ये दर्द भरा अफ़साना, सुन ले अनजान ज़माना...

इस श्रृंखला की दूसरी पायदान पर गीत है १९६५ की फिल्म "श्रीमान फंटूश" का जिसके बोल लिखे आनंद बख्शी ने और धुन बनाई लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी ने। मुझे ये गाना बेहद पसंद है और इसका मुखड़ा तो कुछ-कुछ किशोर दा के जीवन की कहानी कह देता है। क्या गायिकी थी और कितनी मीठी धुन कि वर्षों पहले सुने इस गीत को गाते वक्त मन खुद-बा-खुद उदास हो जाता है। मैंने इस गीत का एक अंतरा और मुखड़ा गुनगुनाने की कोशिश की है। आशा है आप इसे पसंद करेंगे..

MainHoon.mp3



ये दर्द भरा अफ़साना, सुन ले अनजान ज़माना ज़माना
मैं हूँ एक पागल प्रेमी, मेरा दर्द न कोई जाना - २

कोई भी वादा, याद न आया
कोई क़सम भी, याद न आई
मेरी दुहाई, सुन ले खुदाई
मेरे सनम ने, की बेवफ़ाई
दिल टूट गया, दीवाना
सुन ले अनजान, ज़माना ज़माना
मैं हूँ एक पागल प्रेमी ...

फूलों से मैं ने दामन बचाया
राहो में अपनी काँटे बिछाये
मैं हूँ दीवाना, दीवानगी ने
इक बेवफ़ा से नेहा लगाये
जो प्यार को न पहचाना
सुन ले अनजान ज़माना, ज़माना ...

यादें पुरानी, आने लगीं क्या
आँखें झुका लीं, क्या दिल में आया
देखो नज़ारा, दिलवर हमारा
कैसी हमारी, महफ़िल मे आया
है साथ कोई, बेगाना
सुन ले अनजान, ज़माना ज़माना
मैं हूँ एक पागल प्रेमी ...


किशोर दा की आवाज़ में आप इस मधुर गीत को यहाँ सुन सकते हैं।

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और अगर खुद किशोर दा को अस्सी के दशक में इसे स्टेज पर गाते देखना चाहें तो यहाँ देख सकते हैं, हालांकि तब तक उनकी आवाज़ में वो धार नहीं रह गई थी.



अगली पोस्ट इस श्रृंखला की आखिरी पोस्ट होगी जिसमें मैं बताऊँगा कौन है किशोर दा का गाया मेरा सबसे पसंदीदा गीत और चर्चा होगी कि आखिर क्या सोचती थीं फिल्मी हस्तियाँ किशोर के बारे में?

इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ


  1. यादें किशोर दा कीः जिन्होंने मुझे गुनगुनाना सिखाया..दुनिया ओ दुनिया
  2. यादें किशोर दा कीः पचास और सत्तर के बीच का वो कठिन दौर... कुछ तो लोग कहेंगे
  3. यादें किशोर दा कीः सत्तर का मधुर संगीत. ...मेरा जीवन कोरा कागज़

  4. यादें किशोर दा की: कुछ दिलचस्प किस्से उनकी अजीबोगरीब शख्सियत के !.. एक चतुर नार बड़ी होशियार

  5. यादें किशोर दा कीः पंचम, गुलज़ार और किशोर क्या बात है ! लगता है 'फिर वही रात है'

  6. यादें किशोर दा की : किशोर के सहगायक और उनके युगल गीत...कभी कभी सपना लगता है

  7. यादें किशोर दा की : ये दर्द भरा अफ़साना, सुन ले अनजान ज़माना

  8. यादें किशोर दा की : क्या था उनका असली रूप साथियों एवम् पत्नी लीना चंद्रावरकर की नज़र में

  9. यादें किशोर दा की: वो कल भी पास-पास थे, वो आज भी करीब हैं ..समापन किश्त

यादें किशोर दा की : किशोर के सहगायक और उनके युगल गीत - भाग : ६

पिछली पोस्ट में वादा था चौथी और तीसरी पायदानों के गीतों को पेश करने का। तो हुजूर, तीसरी पायदान पर तो रिमझिमाता सावन है और चौथी पर एक हक़ीकत जो सपना सा हो जाने का अहसास देने लगी है। पर एक और खासियत है चौथे क्रमांक के इस गीत में..ये एक युगल गीत है।
अब तक की कड़ियाँ किशोर के एकल गीतों पर ही मैंने केंद्रित रखीं थी। पर एक भी युगल गीत ना रहे तो कुछ अटपटा सा लगता है। किशोर के युगल गीतों की चर्चा करने से पहले कुछ बातें किशोर दा की, जो जुड़ी हैं उनके सहगायकों से।
आखिर क्या सोचते थे किशोर, अपने समकालीनों के बारे में ?

लड़कपन से ही किशोर के. एल. सहगल के दीवाने थे। बचपन मे वे अपनी पॉकेटमनी से सहगल साहब के रिकार्ड खरीदा करते थे। सही मायने में वो उनको अपना गुरु मानते थे।जब उन्होंने खुद बतौर गायक काफी ख्याति अर्जित कर ली तो एक संगीत कंपनी ने उनके सामने सहगल के गीतों को गाने का प्रस्ताव रखा। किशोर ने साफ इनकार कर दिया। उनका कहना था....

" मैं उनके गीतों को और बेहतर गाने की कोशिश क्यूँ करूँ ? कृपया उन्हें हमारी यादों में बने रहने दें। उनके गाये गीत, उनके ही रहने दें। मुझे ये किसी एक शख्स से भी नहीं सुनना कि किशोर ने सहगल से भी अच्छा इस गीत को गाया। "

सहगल का विशाल छायाचित्र हमेशा उनके घर के पोर्टिको की शोभा बढ़ाता रहा। और उसी तसवीर के बगल में रफी साहब की तसवीर भी लगी रहती थी। किशोर, रफी की काबिलियत को समझते थे और उसका सम्मान करते थे। सत्तर के दशक में जब किशोर दा की तूती बोल रही थी, तो उनके एक प्रशंसक ने कह दिया....

"किशोर दा , आपने तो रफी की छुट्टी कर दी।..."

उस व्यक्ति को प्रत्त्युत्तर एक चाँटे के रूप में मिला। किशोर और रफी के फैन आपस में एक दूसरे की कितनी खिंचाई कर लें, वास्तविक जिंदगी में कभी इन महान गायकों के बीच आपसी सद्भाव की दीवार नहीं टूटी।



किशोर और लता जी के युगल गीत काफी चर्चित रहे हैं। इतने सालों के बाद आज भी 'आँधी', 'घर', 'हीरा पन्ना', 'सिलसिला' और 'देवता' जैसी फिल्मों के गीत को सुनने वालों की तादाद में कमी नहीं आई है।

किशोर, लता को अपना सीनियर मानते थे और इसीलिए किसी गीत के लिए उन्हें जितना पैसा मिलता वो उससे एक रुपया कम लेते।

और लता जी, साथ शो करतीं तो तारीफ़ों के पुल बाँध देतीं। हमेशा किशोर को किशोर दा कह कर संबोधित करतीं। ये अलग बात थी कि उम्र में किशोर लता से मात्र एक महिना चौबीस दिन ही बड़े थे।



किशोर और आशा जी को पंचम की धुनों में सुनने का आनंद ही अलग है। अपने एक साक्षात्कार में आशा जी ने कहा था कि

"किशोर एक जन्मजात गायक थे जो गाते समय आवाज़ में नित नई विविधता लाने में माहिर थे। इसीलिए उनके साथ युगल गीत गाने में मुझे और सजग होना पड़ता था, गायिकी में उनकी हरकतों को पकड़ने के लिए।"

किशोर दा भी मानते थे कि उनके चुलबुले अंदाज को कोई मिला सकता है तो वो थीं आशा। इसीलिए कहा करते

"She is my match at mike. "

चौथी पायदान के इस गीत को चुनते वक्त कई और गीत मेरे ज़ेहन में आए। सबसे पहले बात 'आँधी' के गीतों की की। इस फिल्म में यू् तो इस मोड़ से जाते हैं.....तुम आ गए हो....और तेरे बिना जिंदगी में कोई शिकवा... जैसे बेहतरीन गीत हैं। पर इन गीतों को जब सुनता हूँ तो मुझे लता, गुलज़ार और पंचम दा ही मन में छाए से लगते हैं। किशोर ने यकीनी तौर पर अपने अंतरे बखूबी गाए हैं पर इन विभूतियों के सामने वो थोड़े पीछे चले जाते हैं।

पर उन्हीं लता पर वो गुलज़ार और पंचम द्वारा रचित 'घर' के इस गीत पर भारी पड़ते हैं। क्या बोल लिखे गुलज़ार ने और कितनी खूबसूरती से उन्हें निभाया किशोर और लता ने... आप भी आनंद उठाएँ


आप की आँखों में कुछ महके हुए से राज़ है
आपसे भी खूबसूरत आपके अंदाज़ हैं

लब हिले तो मोगरे के फूल खिलते हैं कहीं
आप की आँखों में क्या साहिल भी मिलते हैं कहीं
आप की खामोशियाँ भी आप की आवाज़ हैं

आप की आँखों में कुछ महके हुए से राज़ है
आप से भी खूबसूरत आपके अंदाज़ हैं
आप की आँखों में कुछ महके हुए से राज़ है

आप की बातों में फिर कोई शरारत तो नहीं
बेवजह तारीफ़ करना आप की आदत तो नहीं
आप की बदमाशियों के ये नये अंदाज़ हैं


ना.. ना.. ये गीत नहीं मेरी चौथी पायदान पर और ना ही 'हीरा पन्ना' का ये गीत जो पता नहीं कितने छोटे से मेरे दिल के क़रीब रहा है। कुछ तो है इसकी लय में जो इसे गुनगुनाते वक्त बचपन में भी मेरी आँखें नम कर देता था।
प्यारी सी ज़ीनत और सदाबहार देव आनंद पर फिल्माए हुए इस गीत को आप यहाँ देख सकते हैं।

पन्ना की तमन्ना है कि हीरा मुझे मिल जाये
चाहे मेरी जान जाये चाहे मेरा दिल जाये
हो ... पन्ना की तमन्ना है कि हीरा मुझे मिल जाये
चाहे मेरी जान जाये चाहे मेरा दिल जाये

हीरा तो पहले ही किसी और का हो चुका
किसी की, मदभरी, आँखों में खो चुका
यादों की बस से धूल बन चुका दिल का फूल

सीने पे मैं रख दूँ जो हाथ फिर खिल जाये
चाहे मेरी जान जाये चाहे मेरा दिल जाये
हो ... पन्ना की तमन्ना है कि हीरा मुझे मिल जाये
चाहे मेरी जान जाये चाहे मेरा दिल जाये
.....

गीत संख्या ४ : कभी कभी सपना लगता है...

ऊपर के गीत कई मायनों में इस गीत से बेहतर होंगे पर 'रतनदीप' फिल्म का ये गीत जो किशोर ने आशा के साथ मिलकर गाया है, मुझे बेहद पसंद है।
विशेषकर इसका मुखड़ा जिसे गुनगुनाते-गुनगुनाते मूड ही बदल जाता है। अपने जमाने में गुलज़ार और पंचम की जोड़ी के संगीत से रची ये फिल्म फ्लॉप हुई थी और उसका खामियाज़ा इस गीत को भी भुगतना पड़ा था। क़रीब दो साल पहले मैंने इस गीत के बारे में यहाँ लिखा था

ख्वाब और हक़ीकत के फ़ासले कभी कभी मिट जाते हैं..
कभी कोई हक़ीकत ख़्वाब सी लगने लगती है..
तो कभी कोई ख़्वाब हक़ीकत की शक्ल इख्तियार करने लगता है..
समझ नहीं आता कि किस पर यक़ीन करें
जो आँखों के सामने है...
या फिर उस सपने पर जो दूर होते हुए भी अपना सा लगने लगा है....


इस गीत को पहलें झेंले मेरी आवाज़ में :)
Kabhie Kabhie Sapn...


और फिर आनंद उठाएँ आशा किशोर के युगल स्वरों में
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कभी कभी सपना लगता है
कभी ये सब अपना लगता है
तुम समझा दो, मन को क्या समझाऊँ

मुझे अगर बाहों में भर लो, शायद तुमको चैन मिले
चैन तो उस दिन खोया मैंने, जिस दिन तुमसे नैन मिले
फिर भी ये अच्छा लगता है, मगर अभी सपना लगता है
तुम समझा दो, मन को क्या समझाऊँ

कभी कभी सपना लगता है......

चेहरे पे है, और एक चेहरा, कैसे उसे हटाउँ
मेरा सच गर तुम अपना लो, जनम जनम तरसाऊँ
ऐसे सब अच्छा लगता है, सब का सब सपना लगता है
तुम समझा दो, मन को क्या समझाऊँ

कभी कभी सपना लगता है.....


गीत संख्या-३ : रिमझिम गिरे सावन, सुलग सुलग जाए मन....

अग़र पिछले गीत ने आपके मन को बोझिल कर दिया हो तो इस गीत की सावनी पुकार सुनकर आपके दिल का पपीहा अपना मौन तोड़ देगा। ये गीत भी स्कूल के ज़माने से ही मेरा प्रिय रहा है। मुझे उस वक्त ये गलतफ़हमी थी कि हो ना हो इसके बोल भी गुलज़ार ने लिखे होंगे पर बहुत बाद में पता चला कि इसके गीतकार तो योगेश गौड़ साहब हैं जो मेरे और यूनुस भाई के भी चहेते हैं।

वैसे भी कल सावन की पूर्णिमा थी और आज से भादो का महिना शुरु हो रहा है पर रिम झिम तो अभी भी जोरों पर है। तो सावन को क्यूँ ना विदाई दें इस प्यारे से गीत को गुनगुनाकर।
rimjhim gire sawan...

रिम-झिम गिरे सावन, सुलग सुलग जाए मन
भीगे आज इस मौसम में, लगी कैसी ये अगन
रिम-झिम गिरे सावन, सुलग सुलग जाए मन
भीगे आज इस मौसम में, लगी कैसी ये अगन

रिम-झिम गिरे सावन ...

जब घुंघरुओं सी, बजती हैं बूंदे,
अरमाँ हमारे, पलके न मूंदे
कैसे देखे सपने नयन, सुलग सुलग जाए मन
भीगे आज इस मौसम में, लगी कैसी ये अगन
रिम-झिम गिरे सावन ...

महफ़िल में कैसे कह दें किसी से,
दिल बंध रहा है किस अजनबी से
हाय करे अब क्या जतन, सुलग सुलग जाए मन
भीगे आज इस मौसम में, लगी कैसी ये अगन
रिम-झिम गिरे सावन ...


गीतों के बोल अक्षरमाला से
अमिताभ और मौसमी चटर्जी पर फिल्माए इस गीत को आप यहाँ देख सकते हैं।



इस श्रृंखला के अगले भाग में आपके साथ बाटूँगा किशोर की पारिवारिक जिंदगी के पहलू कुछ अनमोल चित्रों के साथ........

इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ


  1. यादें किशोर दा कीः जिन्होंने मुझे गुनगुनाना सिखाया..दुनिया ओ दुनिया
  2. यादें किशोर दा कीः पचास और सत्तर के बीच का वो कठिन दौर... कुछ तो लोग कहेंगे
  3. यादें किशोर दा कीः सत्तर का मधुर संगीत. ...मेरा जीवन कोरा कागज़

  4. यादें किशोर दा की: कुछ दिलचस्प किस्से उनकी अजीबोगरीब शख्सियत के !.. एक चतुर नार बड़ी होशियार

  5. यादें किशोर दा कीः पंचम, गुलज़ार और किशोर क्या बात है ! लगता है 'फिर वही रात है'

  6. यादें किशोर दा की : किशोर के सहगायक और उनके युगल गीत...कभी कभी सपना लगता है

  7. यादें किशोर दा की : ये दर्द भरा अफ़साना, सुन ले अनजान ज़माना

  8. यादें किशोर दा की : क्या था उनका असली रूप साथियों एवम् पत्नी लीना चंद्रावरकर की नज़र में

  9. यादें किशोर दा की: वो कल भी पास-पास थे, वो आज भी करीब हैं ..समापन किश्त

Monday, August 27, 2007

यादें किशोर कीः फ़रमाइश आप सब की ! आपके अनुरोध पे मैं ये गीत सुनाता हूँ.....


जैसे-जैसे ये श्रृंखला चल रही है आप सब अपनी पसंद के गीत भी मुझे बता रहे हैं। मैंने सोचा कि इससे पहले कि ये फेरहिस्त ज्यादा लंबी हो जाए, किशोर की कहानी को आगे बढ़ाने से पहले इन गीतों को आपको सुनाता चलूँ। दरअसल इतने मँजे हुए कलाकार के दस गीतों को चुनना समुद्र की गहराई नापने के बराबर है। आपने जिन गीतों का जिक्र किया वो मेरे भी प्रिय रहे हैं पर मैं उन्हें पहले दस की सूची में समेटने में असमर्थ रहा।

तो आइए आज की शुरुआत करें आलोक मलिक जी की पसंद 'मेरे अपने' के इस गीत से जिसकी धुन बनाई थी सलिल दा ने और लिखा था गुलज़ार नें। अब गुलज़ार का जिक्र हो और आँख, ख्वाब और नींद जैसे लफ्ज ना आएँ ऐसा हो सकता है भला ! किशोर ने अपने ज़िगर का सारा दर्द अपने गायन में उड़ेल सा दिया है। जिंदगी में अकेलेपन का अहसास कितनी भयावहता के साथ आपको तोड़ सकता है, ये इस गीत को सुनकर आप महसूस कर सकते हैं।

आँखों में नींद न होती
आंसू ही तैरते रहते
ख़्वाबों में जागते हम रात भर
कोई तो ग़म अपनाता
कोई तो साथी होता
कोई होता जिसको अपना...

कोई होता जिसको अपना
हम अपना कह लेते यारों
पास नहीं तो दूर ही होता
लेकिन कोई मेरा अपना


इस गीत को सुनना चाहें तो यहाँ क्लिक करें अन्यथा विनोद खन्ना पर फिल्माए गीत का आनंद आप यहाँ देख कर उठा सकते हैं।


अब सुनिए हैदराबाद की अन्नपूर्णा जी की पसंद फिल्म 'जहरीला इंसान' से। काफी मुलायमित से गाया है मजरूह के लिखे इस गीत को किशोर ने। पंचम ने इस गीत में धुन भी कमाल की दी थी। अभी हाल में पंचम दा के गीतों का इस्तेमाल कर एक फिल्म बनी थी ..दिल विल प्यार व्यार ! उसमें भी इसे रखा गया था।
O Hansini - Zehree...



ओ हंसिनी मेरी हंसिनी कहां उड़ चली
मेरे अरमानों के पंख लगाकर कहां उड़ चली
देर से लहरों में कमल सँभाले हुए मन का
जीवन ताल में भटक रहा रे तेरा हंसा


मजरूह का लिखे एक और गीत को सुनना चाहा था नीरज रोहिल्ला और समीर जी ने ! अब किशोर के रूमानी गीतों में "रात कली एक ख्वाब में आयी" अव्वल नंबर पर आता है। कैरोके तो मेरे बस का नहीं भाई तो सिर्फ गुनगुना भर रहा हूँ
raat kali.mp3

पूरा गीत यहाँ से सुनें या फिर देख ही लें



ममता जी ने फिल्म 'दूर गगन की छाँव' से "आ चल के तुझे मैं ले के चलूँ .." सुनवाने की इच्छा ज़ाहिर की थी। गौरतलब है कि निर्देशन के आलावा इस फिल्म का संगीत और बोल भी किशोर कुमार ने ही दिए थे। सहज शब्दों में इतने प्यारे बोल लिखना किशोर की बहुमुखी प्रतिभा को दर्शाता है ...

सूरज की पहली किरण से, आशा का सवेरा जागे
चंदा की किरण से धुल कर, घनघोर अंधेरा भागे

कभी धूप खिले कभी छाँव मिले
लम्बी सी डगर न खले
जहाँ ग़म भी नो हो, आँसू भी न हो ..

बस प्यार ही प्यार पले

आ चल के तुझे मैं ले के चलूँ
इक ऐसे गगन के तले
जहाँ ग़म भी नो हो, आँसू भी न हो
बस प्यार ही प्यार पले


तो लीजिए ममता जी सुनिए अपना पसंदीदा नग्मा
Aa Chal Ke Tujhe M...



अब वो गीत जो कि मेरी दस की लिस्ट में शामिल होते होते रह गया। दरअसल 'मिली' के सारे गीत मुझे बेहद पसंद हैं। इस फिल्म में उदासी का पुट काफी ज्यादा है और फिल्म के हर इक नग्मे में ये परिलक्षित भी होता है। दुख की बात ये भी रही की महान संगीतकार एस. डी. बर्मन की बनाई आखिरी धुन बड़ी सूनी सूनी है... इसी फिल्म से है। इस गीत की धुन बनाने के बाद बर्मन दा कोमा में चले गए। इस फिल्म के गीत योगेश ने लिखे हैं और सारे गीत दिल को छू लेते हैं। अब इसी गीत को लें जिसे सुनना चाहा है लखनऊ की कंचन चौहान ने!इस गीत का ये अंतरा मुझे बेहद मर्मस्पर्शी लगता है।

जब मैं रातों को तारे गिनता हूँ
और तेरे कदमों की आहट सुनता हूँ
लगे मुझे हर तारा तेरा दरपन
आए तुम याद मुझे ...

हर पल मन मेरा मुझसे कहता है
जिसकी धुन में तू खोया रहता है
भर दे फूलों से उसका दामन
आए तुम याद मुझे ...


आए तुम याद मुझे
गाने लगी हर धड़कन
खुशबू लाई पवन, महका चंदन....


जया और अमिताभ बच्चन पर फिल्माए इस गीत को यहाँ देखें


तो ये थी आपकी फर्माइश के कुछ गीत..शीघ्र लौटूँगा इस श्रृंखला के अगले गीतों के साथ....

Friday, August 24, 2007

यादें किशोर कीः पंचम, गुलज़ार और किशोर क्या बात है ! लगता है 'फिर वही रात है'..भाग ५

पिछली पोस्ट में बात हुई थी किशोर दा की अजीबोगरीब शख्सियत की.....आज वापस लौटते हैं उनके गीतों के सफ़र पर। आप सब जो मुझे पढ़ते आए हैं, भली भांति जानते हैं कि गुलज़ार का लिखा हुआ मुझे कितना पसंद आता है। यही वजह है कि किशोर के गाए मेरे सबसे प्रिय गीतों में से चार गुलज़ार ने लिखे हैं।

अब क्या करूँ मैं !
जब पंचम दा की मधुर धुन हो , शब्द हों गुलज़ार के और आवाज हो किशोर कुमार की तो उस गीत की कै़फि़यत सालों साल दिलो दिमाग में नक़्श सी हो जाती है। कितना भी इन्हें सुन लूँ, गुनगुना लूँ ये ज़ेहन से नहीं हटते, मानो मन के आँगन में खूँटा गाड़े बैठे हों। तो इस क्रम में परिचित होते हैं परिचय फिल्म के इस गीत से।

गीत संख्या ६ : मुसाफिर हूँ यारों / आने वाला पल... जाने वाला है

जी हाँ मेरी इस श्रृंखला की छठी पायदान पर एक नहीं दो गीत है। इन दोनों में से एक को चुनना मेरे लिए काफी मुश्किल था।

तो पहले बात करें परिचय के इस सदाबहार नग्मे की..

परिचय में पहली बार पंचम ने गुलज़ार के साथ काम किया था। पंचम और गुलज़ार के साझे संगीत सत्रों में इन गीतों की रचना होती थी। हुआ यूँ कि गुलजार मुखड़े को लेकर जब राजकमल स्टूडियो पहुँचे तो वहाँ दूसरी फिल्म के पार्श्व संगीत की रिकार्डिंग चल रही थी। मुखड़ा पंचम को थमा कर गुलज़ार वापस चले आए। रात को एक बजे पंचम, गुलज़ार के पास आए और कहा चलो नीचे। दिन भर में पंचम एक कैसेट में उस गाने की धुन बना चुके थे। बांद्रा की सड़कों पर गाड़ी दौड़ती रही..डैशबोर्ड पर धुन बजती रही और ख्याल लफ़्जों की शक्ल लेने लगे और इस तरह ये गीत अपने अस्तित्व में आया।

किशोर ने जिस मस्ती और बेफिक्रपन से इस गीत को गाया है कि मन रूपी मुसाफिर गीत के साथ ही इस प्यारे से सफ़र में साथ हो लेता है, वो भी मंजिल को जाने बगैर. ..
तो तैयार हैं ना साथ साथ इस गीत को गुनगुनाने के लिए




मुसाफ़िर हूँ यारों
ना घर है ना ठिकाना
मुझे चलते जाना है, बस, चलते जाना
मुसाफ़िर...

एक राह रुक गई, तो और जुड़ गई
मैं मुड़ा तो साथ-साथ, राह मुड़ गई
हवा के परों पर, मेरा आशियाना
मुसाफ़िर...

दिन ने हाथ थाम कर, इधर बिठा लिया
रात ने इशारे से, उधर बुला लिया
सुबह से शाम से मेरा, दोस्ताना
मुसाफ़िर...
जीतेंद्र पर फिल्माये इस गीत को आप यहाँ देख सकते हैं।


इस पायदान पर दूसरा गीत फिल्म 'गोलमाल' से है। इसके लिए १९७९ में गुलज़ार को फिल्मफेयर पुरस्कार मिला था। पंचम की जबरदस्त धुन के बीच किशोर की गूँजती आवाज में इस गीत को सुनना मन को एक शांति से भर देता है।




आने वाला पल जाने वाला है
हो सके तो इस में
ज़िंदगी बिता दो
पल जो ये जाने वाला है

एक बार यूँ मिली, मासूम सी कली
खिलते हुए कहा, उश बाश? मैं चली
देखा तो यहीं हैं,ढूँढा तो नहीं हैं
पल जो ये जाने वाला हैं

एक बार वक़्त से, लमहा गिरा कहीं
वहाँ दास्तां मिली,लमहा कहीं नहीं
थोड़ा सा हँसा के, थोड़ा सा रुला के
पल ये भी जाने वाला है

इस गीत को अमोल पालेकर और बिंदिया गोस्वामी पर फिल्माया गया है।

गीत संख्या ५ : फिर वही रात है ...

याद आता है बी.आई.टी. मेसरा के हॉस्टल नम्बर एक का वो छोटा सा कमरा..
अलमारी पर रखा छोटा सा टेप रिकार्डर..
कमरे में घुप्प अंधकार...
पंचम..गुलज़ार...किशोर के इस जादुई गीत संगीत का ख़ुमार.. इस कदर सर चढ़ता था कि बीसियों बार कैसेट पर इस गीत को रिवर्स कर कर के सुनते थे।
कितनी रातें बर्बाद..नहीं यूँ कहना चाहिए कि आबाद कीं इस गीत ने.....

सपने देखना सिखाया इस गीत ने...वो भी सोती नहीं बल्कि जागती आँखों से..
आप भी इसे महसूस करना चाहेंगे मेरे साथ......



फिर वही रात है ...

फिर वही रात है, फिर वही रात है ख्वाब की
हो ... रात भर ख्वाब में,देखा करेंगे तुम्हे
फिर वही रात है ...

मासूम सी नींद में, जब कोई सपना चले
हो ... हम को बुला लेना तुम, पलकों के पर्दे तले
हो ये रात है ख्वाब की, ख्वाब की रात है
फिर वही रात है...फिर वही रात है
फिर वही रात है ख्वाब की
काँच के ख्वाब हैं, आँखों में चुभ जायेंगे
हो ... पलकों पे लेना इन्हें, आँखों में रुक जायेंगे
हो ... ये रात है ख्वाब की, ख्वाब की रात है
फिर वही रात है..., फिर वही रात है
फिर वही रात है ख्वाब की

फिर वही रात है ...


विनोद मेहरा पर फिल्माए इस गीत को आप यहाँ देख सकते हैं।


गीतों के बोल मूलतः विनय जैन के जाल पृष्ठ अक्षरमाला से कुछ मामूली सुधार के बाद यहाँ चस्पा किए गए हैं।
अगले भाग में बात होगी पायदान संख्या चार, तीन और दो के गीतों की...जिनमें दो, एक बार फिर गुलज़ार के और एक योगेश का लिखा है।

इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ

  1. यादें किशोर दा कीः जिन्होंने मुझे गुनगुनाना सिखाया..दुनिया ओ दुनिया

  2. यादें किशोर दा कीः पचास और सत्तर के बीच का वो कठिन दौर... कुछ तो लोग कहेंगे

  3. यादें किशोर दा कीः सत्तर का मधुर संगीत. ...मेरा जीवन कोरा कागज़
  4. यादें किशोर दा की: कुछ दिलचस्प किस्से उनकी अजीबोगरीब शख्सियत के !.. एक चतुर नार बड़ी होशियार
  5. यादें किशोर दा कीः पंचम, गुलज़ार और किशोर क्या बात है ! लगता है 'फिर वही रात है'
  6. यादें किशोर दा की : किशोर के सहगायक और उनके युगल गीत...कभी कभी सपना लगता है
  7. यादें किशोर दा की : ये दर्द भरा अफ़साना, सुन ले अनजान ज़माना
  8. यादें किशोर दा की : क्या था उनका असली रूप साथियों एवम् पत्नी लीना चंद्रावरकर की नज़र में
  9. यादें किशोर दा की: वो कल भी पास-पास थे, वो आज भी करीब हैं ..समापन किश्त

यादें किशोर दा की: कुछ दिलचस्प किस्से उनकी अजीबोगरीब शख्सियत के ! भाग ४

फिल्म उद्योग में ये बात आम है कि किशोर का व्यवहार या मैनरिज्म अपने मिलने वाले लोगों से बहुधा अज़ीब तरह का होता था। ऍसा वो कई बार जानबूझ कर करते थे पर कहीं न कहीं उनका दिल, शरारती बच्चे की तरह था जो उनके दिमाग में नए-नए खुराफातों को जन्म देता था। अक्सर उनके इस नटखटपन का शिकार, उनके क़रीबी हुआ करते थे। आइए रूबरू होते हैं उनके ऍसे ही कुछ कारनामों से..

एक बार की बात है, किशोर के घर एक इंटीरियर डेकोरेटर पधारा। वो सज्जन तपती गर्मी में भी थ्री पीस सूट में आए, और आते ही अपने अमेरिकी लहजे के साथ शुरु हो गए किशोर को फंडे देने कि उनके घर की आंतरिक साज सज्जा किस तरह की होनी चाहिए। किशोर ने किसी तरह आधे घंटे उन्हें झेला और फिर अपनी आवश्यकता उन्हें बताने लगे।

अब गौर करें किशोर दा ने उन से क्या कहा....

"मुझे अपने कमरे में ज्यादा कुछ नहीं चाहिए। बस चारों तरफ कुछ फीट गहरा पानी हो और सोफे की जगह छोटी-छोटी संतुलित नावें, जिसे हम चप्पू से चला कर इधर-उधर ले जा सकें। चाय रखने के लिए ऊपर से टेबुल को धीरे धीरे नीचे किया जा सके ताकि हम मज़े में वहाँ से कप उठा चाय की चुस्कियाँ ले सकें।...."

इंटीरियर डेकोरेटर के चेहरे पर अब तक घबड़ाहट की रेखाएँ उभर आईं थीं पर किशोर कहते रहे...

"....आप तो जानते ही हैं कि मैं एक प्रकृति प्रेमी हूँ, इसलिए अपने कमरे की दीवार की सजावट के लिए मैं चाहता हूँ कि उन पर पेंटिंग्स की बजाए लटकते हुए जीवित कौए हों और पंखे की जगह हवा छोड़ते बंदर... "

किशोर का कहना था कि ये सुनकर वो व्यक्ति बिल्कुल भयभीत हो गया और तेज कदमों से कमरे से बाहर निकला और फिर बाहर निकलकर एकदम से गेट की तरफ़, विद्युत इंजन से भी तेज रफ़्तार से दौड़ पड़ा।

ये बात किशोर दा ने प्रीतीश नंदी को १९८५ में दिए गए साक्षात्कार में बताई थी। प्रीतीश नंदी ने जब पूछा कि क्या ये उनका पागलपन नहीं था? तो किशोर का जवाब था कि अगर वो शख्स उस गर्म दुपहरी में वूलेन थ्री पीस पहनने का पागलपन कर सकता हे तो मैं अपने कमरे में जिंदा काँव-काँव करते कौओं को लटकाने {काकेश भाई ध्यान दें :)}का विचार क्यूँ नहीं ला सकता ?

एक बार एक युवा पत्रकार किशोर दा से मिलने आई। उस वक़्त किशोर घर पर अकेले रहा करते थे। पत्रकार ने उनसे पूछा कि वो अपनी जिंदगी में काफी अकेलापन महसूस करते होंगे?
किशोर जवाब में उन्हें बाहर ले गए और उसका परिचय अपने मित्रों जनार्दन, रघुनंदन, गंगाधर, बुद्धुराम और झटपटाझटपट से करवाया। सबसे गले मिले, बातें की और कहा ये सारे, इस दुष्ट संसार में मेरे असली मित्र हैं।

आप सोच रहे होगें इसमें खास बात क्या थी!

खास बात ये थी जनाब कि ये सब उनकी बगिया के पेड़ थे जिनसे किशोर खाली समय में बड़ी आत्मीयता से बात करते रहते थे।

अपने संघर्ष के दिनों में उन्हें अपनी अदाकारी के पैसों के लिए निर्माताओं की काफी हुज्जत करनी पड़ी थी। पर किशोर भी कम ना थे, एक बार ऐसे ही एक निर्माता को सबक सिखाने के लिए शॉट के ठीक पहले उन्होंने अपने बाल ही मुड़वा डाले। किसी दूसरे निर्माता ने आधे पैसे दिए तो चेहरे के सिर्फ एक ओर मेकअप कर शॉट देने पहुँचे।

बदलते मूड के साथ अपनी कही बात खुद मानने से इनकार कर देते। रिश्तेदारों को खाने पर बुलाते और ऍन वक्त पर जब कोई आता तो बाहर से ही विदा कर देते। किसी से ख़फा रहते तो उसके आते ही अपने कुत्तों को इशारा कर देते और फिर तो आने वाले की शामत ही आ जाती।

अपनी इन नौटंकियों को निजी जिंदगी के आलावा उन्होंने सेल्युलाएड पर भी बड़े बेहतरीन तरीके से उतारा। अब पड़ोसन के गीत
'एक चतुर नार कर के सिंगार.....' को लें। किशोर कहा करते थे कि इस किरदार को निभाने के लिए उन्होंने अपने लंबे बाल रखने वाले, काजल लगाने और हमेशा पान चबाने वाले मामा की नकल उतारी। इनकी बेहतरीन अदाकारी का ये असर हुआ कि सुनील दत्त और महमूद को अपना अभिनय किशोर की तुलना में बेजान लगने लगा और उन्होंने दो दिन के लिए शूटिंग रोक कर अपना गेटअप बदला और विग लगाकर फिर से शूटिंग की। पड़ोसन का ये गीत फिल्म इतिहास के हास्य गीतों में गायन और प्रस्तुतिकरण दोनों ही लिहाज से अव्वल स्थान रखता है।




उनके उछल कूद भरे अभिनय का फिल्म 'चलती का नाम गाड़ी' में दर्शकों ने खूब आनंद उठाया। इस फिल्म में तीनों भाई यानि अशोक कुमार, अनूप कुमार और किशोर साथ-साथ आए थे। आप खुद ही देखिए, इस फिल्म के लोकप्रिय गीत 'मैं था, वो थी और समा रंगीन समझ गए ना में...' उनके हाव भावों को......


किशोर कुमार के इस अजूबे भरे व्यक्तित्व का एक अलग पहलू ये भी था कि जब उन्होंने खुद कोई फिल्म बनाई तो विषयवस्तु के निर्वाह उन्होंने बड़े संजीदा ढ़ंग से किया। 'दूर गगन की छांव में..' उनकी ऍसी ही फिल्म रही जो उस सिपाही की दास्तान कहती है जो युद्ध से थक हार कर जब घर लौटता है तो पाता है कि उसका घर जला दिया गया है और उस त्रासदी को झेलने वाला उसका बुरी तरह भयभीत बेटा कुछ भी बता सकने में असमर्थ है। बाकी की कहानी पिता पुत्र के प्रगाढ़ होते संबंधों का लेखा-जोखा है जिसे किशोर ने खूबसूरती से फिल्माया था। ऍसे विषय को चुनना ये दर्शाता है कि उनके शरारती दिमाग के पीछे एक संवेदनशील हृदय भी था जो रह-रह कर उन्हें वास्तविक जिंदगी से जुड़े विषयों पर फिल्म निर्माण के लिए प्रेरित करता था।

अगले भाग में पुनः लौटेंगे अपनी दस गीतों की श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए छठे और पाँचवे नंबर के उन गीतों के साथ जिन्हें गुलज़ार ने लिखा और जो किशोर दा के गाए हुए मेरे सबसे प्रिय गीतों में रहे हैं।


इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ


  1. यादें किशोर दा कीः जिन्होंने मुझे गुनगुनाना सिखाया..दुनिया ओ दुनिया
  2. यादें किशोर दा कीः पचास और सत्तर के बीच का वो कठिन दौर... कुछ तो लोग कहेंगे
  3. यादें किशोर दा कीः सत्तर का मधुर संगीत. ...मेरा जीवन कोरा कागज़

  4. यादें किशोर दा की: कुछ दिलचस्प किस्से उनकी अजीबोगरीब शख्सियत के !.. एक चतुर नार बड़ी होशियार

  5. यादें किशोर दा कीः पंचम, गुलज़ार और किशोर क्या बात है ! लगता है 'फिर वही रात है'

  6. यादें किशोर दा की : किशोर के सहगायक और उनके युगल गीत...कभी कभी सपना लगता है

  7. यादें किशोर दा की : ये दर्द भरा अफ़साना, सुन ले अनजान ज़माना

  8. यादें किशोर दा की : क्या था उनका असली रूप साथियों एवम् पत्नी लीना चंद्रावरकर की नज़र में

  9. यादें किशोर दा की: वो कल भी पास-पास थे, वो आज भी करीब हैं ..समापन किश्त

Tuesday, August 21, 2007

यादें किशोर दा कीः सत्तर का मधुर संगीत. भाग ३ (आज का गीत- मेरा जीवन कोरा कागज़..)

सत्तर का दशक किशोर कुमार की गायिकी के लिए स्वर्णिम काल था। इस दशक में गाए हुए गीतों में से कुछ को छांटना बेहद दुष्कर कार्य है। कटी पतंग (1970), अमर प्रेम (1971),बुढ्ढा मिल गया(1971), मेरे जीवन साथी (1972), परिचय (1972), अभिमान(1973), कोरा कागज़(1974), मिली(1975), आँधी(1975), खुशबू(1975) में गाए किशोर के गीत मुझे खास तौर से प्रिय हैं।

पहले देव आनंद और फिर राजेश खन्ना को अपनी आवाज़ देने के बाद इस दशक में वो अमिताभ को भी अपनी आवाज़ देते नज़र आए। किशोर हर अभिनेता की आवाज़ के हिसाब से अपनी वॉयस माडुलेट करते थे। इस दौर में किशोर ने बड़े संगीतकारों में बर्मन सीनियर, पंचम, कल्याण जी-आनंद जी और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के साथ काम करते हुए फिल्म जगत को कई अनमोल गीत दिए।

चाहे वो 'बुढ्ढा मिल गया 'का रूमानी गीत 'रात कली इक ख़्वाब में...' हो या यूडलिंग में उनकी महारत दिखाता 'मेरे जीवन साथी ' का 'चला जाता हूँ किसी की धुन में...' या फिर दर्द में डूबा 'मिली' में गाया हुआ 'बड़ी सूनी सूनी है..... ' या 'आए तुम याद मुझे, गाने लगी हर धड़कन....' सब के सब किशोर दा की गायन प्रतिभा में विद्यमान हर रंग की उपस्थिति को दर्ज कराते हैं।

किशोर दा के सबसे सुरीले गीत एस. डी. बर्मन और पंचम दा के साथ हैं। पंचम को जब भी अपनी किसी फिल्म के लिए किशोर दा से गाना गवाना पड़ता था तो उसके दो दिन पहले उस गीत की धुन का टेप वो उनके यहाँ भिजवा देते थे। वे कहते थे कि इससे किशोर को गीत को महसूस करते हुए जज़्ब करने में सहूलियत होती थी और वास्तविक रिकार्डिंग का परिणाम बेहतरीन आता था।

वैसे मुझे मिली में योगेश का लिखा गीत 'आए तुम याद मुझे...' बेहद प्रिय है पर एस डी बर्मन की धुन का आनंद तो आप पहले भी ले चुके हैं तो आज पहली बार इस श्रृंखला में पेश हैं कल्याण जी-आनंद जी के संगीतबद्ध ये दो नग्मे

गीत संख्या ८..जीवन से भरी तेरी आँखें

ये गीत फिल्म सफ़र का है। इस गीत के बोल बेहद खूबसूरत हैं। इन्हें लिखा था इंदीवर ने। कौन कहेगा कि ये वही इंदीवर हैं जिन्होंने अस्सी के दशक में बप्पी दा के साथ मिलकर कुछ ऐसे गीत लिखे जिसमें कविता की छाया तो लेशमात्र भी नहीं है।

आँखें ख़ुदा की दी हुई हसीन नियामत हैं। शायरों ने इनकी कहानी अपने अशआरों में तो खूब बयाँ की है जिसका जिक्र इस चिट्ठे पर यहाँ और यहाँ पहले भी हो चुका है। इसलिए इंदीवर भी इस गीत
में अग़र आँखों के इन सागरों में डूबते नज़र आ रहे हैं तो अचरज कैसा !
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जीवन से भरी तेरी आँखें
मजबूर करे जीने के लिये
सागर भी तरसते रहते हैं
तेरे रूप का रस पीने के लिये
जीवन से भरी तेरी आँखें ...

तस्वीर बनाये क्या कोई
क्या कोई लिखे तुझपे कविता
रंगों छंदों में समाएगी
किस तरह से इतनी सुंदरता
इक धड़कन है तू दिल के लिये
इक जान है तू जीने के लिये
जीवन से भरी तेरी आँखें ...

मधुबन की सुगंध है साँसों में
बाहों में कंवल की कोमलता
किरणों का तेज है चेहरे पे
हिरनों की है तुझ में चंचलता
आंचल का तेरे एक तार बहुत
कोई चाक ज़िगर सीने के लिये
जीवन से भरी तेरी आँखें ...




इस गीत को आप यहाँ देख सकते हैं।


गीत संख्या ७....मेरा जीवन कोरा कागज़



कोरा कागज़ का ये गीत इस मायने में भी महत्त्वपूर्ण है कि १९७४ में बिनाका गीत माला कि पहली पायदान पर ये विराजमान था। इस गीत के बोल एम. जी. हशमत के थे और मुझे बहुत भाते हैं। कल्याण जी-आनंद जी की धुन गीत की उदासी को हृदय तक पहुँचा देती है।



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पूरा गीत आप यहाँ से भी सुन सकते हैं।

मेरा जीवन कोरा कागज़ कोरा ही रह गया...२
जो लिखा था...... आँसुओं के संग बह गया
मेरा जीवन
मेरा जीवन कोरा कागज़ कोरा ही रह गया
इक हवा का झोंका आया,
हो..इक हवा का झोंका आया
टूटा डाली से फू..ल...टूटा डाली से फू..ल
ना पवन की ना चमन की
किसकी है ये भू..ल.. किसकी है ये भू..ल
हो गई.... खुशबू हवा में कुछ ना रह गया
मेरा जीवन
मेरा जीवन कोरा कागज़ कोरा ही रह गया
उड़ते पंछी का ठिकाना
मेरा ना कोई जहाँ..मेरा ना कोई जहाँ
ना डगर है ना खबर है
जाना है मुझको कहाँ..जाना है मुझको कहाँ
बन के सपना हमसफ़र का साथ रह गया


इस गीत को आप यहाँ देख सकते हैं।



इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ


  1. यादें किशोर दा कीः जिन्होंने मुझे गुनगुनाना सिखाया..दुनिया ओ दुनिया
  2. यादें किशोर दा कीः पचास और सत्तर के बीच का वो कठिन दौर... कुछ तो लोग कहेंगे
  3. यादें किशोर दा कीः सत्तर का मधुर संगीत. ...मेरा जीवन कोरा कागज़

  4. यादें किशोर दा की: कुछ दिलचस्प किस्से उनकी अजीबोगरीब शख्सियत के !.. एक चतुर नार बड़ी होशियार

  5. यादें किशोर दा कीः पंचम, गुलज़ार और किशोर क्या बात है ! लगता है 'फिर वही रात है'

  6. यादें किशोर दा की : किशोर के सहगायक और उनके युगल गीत...कभी कभी सपना लगता है

  7. यादें किशोर दा की : ये दर्द भरा अफ़साना, सुन ले अनजान ज़माना

  8. यादें किशोर दा की : क्या था उनका असली रूप साथियों एवम् पत्नी लीना चंद्रावरकर की नज़र में

  9. यादें किशोर दा की: वो कल भी पास-पास थे, वो आज भी करीब हैं ..समापन किश्त

Sunday, August 19, 2007

यादें किशोर दा कीः पचास और सत्तर के बीच का वो कठिन दौर... भाग २ (आज का गीत- कुछ तो लोग कहेंगे..)

पचास का दशक किशोर के लिए बतौर गायक काफी मुश्किल वाला समय रहा। इस दौरान उन्होंने कई फिल्में की जिनमें 'नौकरी', 'मिस माला', 'बाप रे बाप', 'आशा', 'दिल्ली का ठग' और 'चलती का नाम गाड़ी' चर्चित रहीं। नौकरी फिल्म में एक गीत था 'छोटा सा घर होगा...' जिसे संगीतकार सलिल चौधरी, हेमंत दा से गवाना चाहते थे। किशोर दा ने जब इसे खुद गाने की पेशकश की तो सलिल दा का सीधा सा जवाब था ...



"जब मैंने तुम्हें कभी सुना ही नहीं तो ये गीत तुमसे कैसे गवा लूँ। "

बड़े मान-मुनौवल के बाद सलिल दा राजी हुए। ये वाक़या इस बात को स्पष्ट करता है कि वो समय ऍसा था जब ज्यादातर संगीत निर्देशक किशोर की आवाज़ को गंभीरता से नहीं लेते थे।

बतौर नायक किशोर कुमार का ये समय ज्यादा बेहतर रहा। १९५६ में जे के नंदा की फिल्म 'ढ़ाके का मलमल' में पहली बार वो और मधुबाला साथ साथ देखे गए। शायद इसी वक़्त उनके प्रेम की शुरुआत हुई। १९५८ में फिल्म 'चलती का नाम गाड़ी' इस जोड़ी की सबसे सफल फिल्म रही। इस जोड़ी पर फिल्माए गीत 'इक लड़की भीगी भागी सी...' और 'पाँच रुपैया बारह आना....' इसी फिल्म से थे। १९६१ में अपनी पहली पत्नी रूमा गुहा के रहते हुए किशोर ने मधुबाला से शादी की और इसके लिए मुस्लिम धर्म को अपनाते हुए अपना नाम अब्दुल करीम रख लिया। ज़ाहिर है ये सारी क़वायद दूसरी शादी करने में कानूनी पचड़ों से बचने के लिए की गई थी।

कानूनी पचड़ों की बात चली है तो ये बताना भी लाज़िमी होगा कि आयकर वालों से किशोर दा सनकपन की हद तक घबड़ाते थे। कहा जाता है कि 'चलती का नाम गाड़ी' उन्होंने ये सोच कर बनाई कि ये फिल्प फ्लॉप हो जाएगी और इसके नुकसान को बढ़ा-चढ़ा कर दिखा वो टैक्स चुकाने से बच जाएँगे। पर हुआ ठीक इसका उलट। 'चलती का नाम गाड़ी' हिट हुई। किशोर इस बात से इतने कुपित हुए कि उन्होंने इस फिल्म से मिलने वाली सारी रॉयल्टी अपने सचिव अनूप शर्मा के नाम कर दी :)।
किशोर दा के बारे में कहा जाता है कि आयकर वालों और अवांछित मेहमानों से बचने के लिए हर तीन चार महिने पर वो अपने बँगले में आने के मुख्य द्वार को बदलते रहते थे, ताकि रेड पड़ने के दौरान वो सबको चकमा दे सकें।

वापस बढ़ते हैं किशोर दा के संगीत के सफ़र पर। संगीतकार एस. डी. बर्मन पहले ऐसे संगीतकार थे जिन्होंने ये समझा कि किस तरह के गानों के लिए किशोर की आवाज सबसे ज्यादा उपयुक्त है। उन्हीं की वज़ह से साठ के दशक में किशोर, देव आनंद की आवाज़ बने। बरमन सीनियर द्वारा संगीत निर्देशित 'गाइड' और 'जेवल थीफ' में उनके गाए गीतों ने उनके यश को फैलने में मदद की।

पर किशोर की गायिकी के लिए मील का पत्थर साबित हुई १९६९ में बनी फिल्म 'अराधना'

एस डी बर्मन साहब इस फिल्म के गीत रफी साहब से गवाने का मन बना चुके थे। पर धुनें बना चुकने के बाद वो बीमार पड़ गए और इसके संगीत को पूरा करने की जिम्मेवारी पंचम दा पर आन पड़ी। उन्होने इन धुनों को गाने के लिए किशोर दा को चुना और उसके बाद जो रच कर बाहर निकला वो इतिहास बन गया। इस फिल्म के गीत 'रूप तेरा मस्ताना...' के लिए किशोर दा को पहली बार फिल्मफेयर एवार्ड से नवाज़ा गया।

सत्तर के दशक की शुरुआत किशोर दा के लिए जबरदस्त रही। एस. डी. बर्मन के संगीत निर्देशन में 'शर्मीली' और 'प्रेम पुजारी' के गीत चर्चित हुए। वहीं 'अराधना', 'कटी पतंग' और 'अमर प्रेम' की अपार सफलता के बाद किशोर दा पर्दे पर राजेश खन्ना की स्थायी आवाज़ बन गए। किशोर दा के बारे में बाकी बातें तो आगे भी होती रहेंगी पर अब चलें इस श्रृंखला के अगले गीत पर


गीत संख्या:९ - कुछ तो लोग कहेंगे...

'अमर प्रेम' में आनंद बख्शी ने कमाल के गीत लिखे हैं। चाहे वो 'चिंगारी कोई भड़के..' हो...या 'फिर ये क्या हुआ ..' कोई भी संगीत प्रेमी इनके प्रभाव से बच नहीं पाता। अंतरजाल पर तो भारत के बाहर के लोगों को जिन्हें हिंदी या उर्दू नहीं आती, को भी मैंने इन गीतों के अंग्रेजी अनुवाद की तारीफ़ करते पाया।

इस फिल्म से इस संकलन के लिए इन बेमिसाल गीतों में से एक को चुनना बेहद कठिन था। अगर मैंने ये गीत 'कुछ तो लोग कहेंगे....' चुना है तो वो इसलिए कि इसके बोल मेरे दिल को इन तीनों गीतों में सबसे ज्यादा छूते हैं। किशोर की गायिकी और एस डी बर्मन की धुनें (वैसे तो काग़जी तौर पर आर डी बर्मन इसके संगीत निर्देशक कहे जाते हें , पर विभिन्न संगीत समीक्षक बार-बार ये कह चुके हैं कि इस फिल्म की धुन बर्मन सीनियर की थीं) मन के आर-पार हो जाती हैं।

तो सुनें मेरी कोशिश इस गीत को गुनगुनाने की...



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कुछ तो लोग कहेंगे
लोगों का काम है कहना
छोड़ों बेकार की बातों में कहीं बीत ना जाए रैना
कुछ तो लोग कहेंगे....

कुछ रीत जगत की ऍसी है, हर एक सुबह की शाम हुई
तू कौन है, तेरा नाम है क्या, सीता भी यहाँ बदनाम हुई
फिर क्यूँ संसार की बातों से भींग गए तेरे नैना
कुछ तो लोग कहेंगे....

हमको जो ताने देते हैं, हम खोए हैं इन रंगरलियों में
हमने भी उनको छुप-छुप के आते देखा इन गलियों में
ये सच है झूठी बात नहीं , तुम बोलो ये सच है ना
कुछ तो लोग कहेंगे....



अमरप्रेम फिल्म के गीतों को आप यहाँ भी सुन सकते हैं।


राजेश खन्ना और शर्मीला टैगोर अभिनीत इस गीत को आप यहाँ देख सकते हैं।


इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ


  1. यादें किशोर दा कीः जिन्होंने मुझे गुनगुनाना सिखाया..दुनिया ओ दुनिया
  2. यादें किशोर दा कीः पचास और सत्तर के बीच का वो कठिन दौर... कुछ तो लोग कहेंगे
  3. यादें किशोर दा कीः सत्तर का मधुर संगीत. ...मेरा जीवन कोरा कागज़

  4. यादें किशोर दा की: कुछ दिलचस्प किस्से उनकी अजीबोगरीब शख्सियत के !.. एक चतुर नार बड़ी होशियार

  5. यादें किशोर दा कीः पंचम, गुलज़ार और किशोर क्या बात है ! लगता है 'फिर वही रात है'

  6. यादें किशोर दा की : किशोर के सहगायक और उनके युगल गीत...कभी कभी सपना लगता है

  7. यादें किशोर दा की : ये दर्द भरा अफ़साना, सुन ले अनजान ज़माना

  8. यादें किशोर दा की : क्या था उनका असली रूप साथियों एवम् पत्नी लीना चंद्रावरकर की नज़र में

  9. यादें किशोर दा की: वो कल भी पास-पास थे, वो आज भी करीब हैं ..समापन किश्त

Saturday, August 18, 2007

यादें किशोर दा कीः जिन्होंने मुझे गुनगुनाना सिखाया... भाग १ (आज का गीत- दुनिया ओ दुनिया)

किसने जाना था कि एक छोटे से शहर 'खंडवा' मे पैदाइश लेने वाला 'आभास कुमार गाँगुली' नाम का बालक भारतीय संगीत के इतिहास में अपनी अमिट छाप छोड़ जाएगा। १९४८ में खेमचंद्र प्रकाश की संगीत निर्देशित फिल्म जिद्दी में अपना पहला गीत 'मरने की दुआएँ क्यूँ मागूँ' से लेकर अक्टूबर १९८७ में 'वक़्त की आवाज़' में आशा जी के साथ गाए गीत 'गुरु ओ गुरु..' तक अपने चालीस साल के संगीत सफ़र में किशोर दा ने संगीत प्रेमी करोड़ों भारतीयों का दिल जीता और आज भी जीत रहे हैं। किशोर कुमार को जब उनके बड़े भाई अशोक कुमार एक अभिनेता बनाने के लिए मुंबई लाए तो किशोर दा, मन ही मन कोई ख़ास उत्साहित नहीं थे। उनका तो सपना अपने उस वक़्त के प्रेरणास्रोत के एल सहगल से मिलने का था जो दुर्भाग्यवश पूरा नहीं हो पाया क्योंकि इनके मुंबई आगमन के कुछ ही दिन पश्चात सहगल चल बसे।

अपने शुरुआती दिनों में के एल सहगल के अंदाज का अनुकरण करने वाले किशोर दा की गायिकी में एक ख़ूबसूरत मोड़ तब आया जब उनकी मुलाकात एस डी बर्मन साहब से हुई। ये भी एक संयोग ही था कि बर्मन सीनियर, अशोक कुमार जी के घर पहुँचे और किशोर को बाथरूम में गुनगुनाते सुन कर ठिठक गए और उनसे मिल कर जाने का ही निश्चय किया। उन्होंने ही किशोर को गायन की अपनी शैली विकसित करने के लिए प्रेरित किया। किशोर दा की जिस आवाज़ के हम सब क़ायल हैं, वो पचास के उत्तरार्ध में एस डी बर्मन के सानिध्य का ही परिणाम रहा है।

अग़र बाकी गायकों की अपेक्षा किशोर दा के योगदान पर विचार करूँ तो यही पाता हूँ कि जहाँ रफी ने गायिकी में अपनी विविधता से सबका मन जीता, वहीं किशोर दा ने हिंदी फिल्म संगीत की गायिकी को आम जनता के होठों तक पहुँचाया। उनकी गायिकी का तरीका ऍसा था कि जिसे गुनगुनाना एक आम संगीत प्रेमी के लिए अपेक्षाकृत अधिक सहज है। दरअसल किशोर, मुकेश और हेमंत दा सरीखे गायकों ने अपनी आवाज़ के बलबूते पर ही संगीतप्रेमी जनमानस को अपना दीवाना बना लिया। मोहम्मद रफी और मन्ना डे जैसे गायक दिलकश आवाज़ के मालिक तो थे ही, पर साथ-साथ वे शास्त्रीय संगीत में महारत हासिल करने के बाद हिंदी फिल्मों में पार्श्व संगीत देने आए थे। किशोर दा के पास ऍसी काबिलियत नहीं थी फिर भी इसकी कमी उन्होंने महसूस नहीं होने दी और अपने मधुर गीतों को हमें गुनगुनाने पर मज़बूर करते रहे।


चार अगस्त को किशोर दा का जन्मदिन था। सो इस महान शख़्सियत को अपनी श्रृंद्धांजलि स्वरूप, आज से मैं 'किशोर दा' के उन दस गीतों को आपके सामने पेश करूँगा जिन्हें गुनगुनाना मुझे बेहद प्रिय है। दरअसल आज हमारे सरीखे लोग अगर बाथरूम सिंगर बन पाए हैं तो उसका बहुत बड़ा श्रेय किशोर दा को जाता है :)। किशोर दा कि ख़ुशमिज़ाज गायिकी से तो हम सभी वाकिफ़ हैं। यूडलिंग के साथ गाए उन गीतों के साथ होता हूँ, तो मन हल्का-हल्का सा लगने लगता है। पर मैंने इन दस गीतों में ज्यादातर वैसे गीतों को चुना है जिनमें एक उदासी का पुट है।

वैसे तो जिंदग़ी खुशी और मायूसी का संगम है पर खुशी तो सब के साथ बँटती रहती है, रह गई उदासी तो वो दिल के किसी कोने में मुंह छुपाए बैठी रहती है। और कभी एकांत के पलों में आप दिल के क़रीब वक़्त गुजारने जाते हैं तो इसी उदासी से रूबरू हो बैठते हैं।


खैर, तो चलें गीतों कि इस उलटी गिनती को शुरु करें ।

गीत संख्या १०.: दुनिया ओ दुनिया, तेरा जवाब नहीं ...

इस श्रंखला का पहला गीत फिल्म नया ज़माना से है। ये फिल्म १९७१ में रिलीज हुई। इस गीत के बोल लिखे थे आनंद बख्शी ने और धुन बनाई थी एस डी बर्मन ने।

बड़ी पेचदगी है इस दुनिया में....

जैसे लोग दिखते हैं वो होते नहीं...
सहजता से सब पर विश्वास करने वाला, कभी ना कभी ठोकर खाता ही है...
महान जन कहते हैं कि ऍसे ठोकरें खा के आदमी परिपक्व बनता है।

पर क्या ये सच नहीं कि हम सभी का जीवन ऍसी ही होशियारी जमा करते-करते, कुटिलता के उस मुकाम तक पहुंच जाता है कि कभी-कभी अपने बच्चों की मासूमियत देख, ख़ुद पर शर्म आती है। मन सोचने पर मज़बूर हो जाता हे यार ! हम भी कभी ऍसे थे... दुनिया के ऍसे ही रूप की झलक दिखाता हे ये गीत।

तो पहले सुनिए गुनगुनाहट इस बाथरूम सिंगर की...।



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वैधानिक चेतावनी : ऊपर की रिकार्डिग सुनने के लिए आप बाध्य नहीं हैं। उसे सुनकर आए किसी दुष्प्रभाव की जिम्मेदारी प्रस्तुतकर्त्ता की नहीं है :)


इस गीत को पूरा आप यहाँ से भी सुन सकते हैं


दुनिया ओ दुनिया, तेरा जवाब नहीं
तेरी जफ़ाओं का, बस कोई हिसाब नहीं

तू छांव है या है धूप खबर किसको
क्या है तेरा असली रूप खबर किसको
आये नज़र कैसे तू आँसू है, ख़्वाब नहीं
दुनिया ओ ...

तेरे ज़ुबां पे है, ज़िक्र सितारों का,
तेरे लबों पे है, नाम बहारों का
पर तेरे दामन में, काँटे हैं, गुलाब नहीं
दुनिया ओ ...

ये किन खयालों में, खो गये हैं आप,
क्यों कुछ परेशाँ से, हो गये हैं आप
आपसे तो मुझको कुछ शिक़वा जनाब नहीं
दुनिया ओ ...

इस गीत के बोल अक्षरमाला से लिए गए हैं।

धर्मेंद्र, प्राण और हेमा मालिनी पर अभिनीत इस गीत को आप यहाँ देख सकते हैं।


इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ


  1. यादें किशोर दा कीः जिन्होंने मुझे गुनगुनाना सिखाया..दुनिया ओ दुनिया
  2. यादें किशोर दा कीः पचास और सत्तर के बीच का वो कठिन दौर... कुछ तो लोग कहेंगे
  3. यादें किशोर दा कीः सत्तर का मधुर संगीत. ...मेरा जीवन कोरा कागज़

  4. यादें किशोर दा की: कुछ दिलचस्प किस्से उनकी अजीबोगरीब शख्सियत के !.. एक चतुर नार बड़ी होशियार

  5. यादें किशोर दा कीः पंचम, गुलज़ार और किशोर क्या बात है ! लगता है 'फिर वही रात है'

  6. यादें किशोर दा की : किशोर के सहगायक और उनके युगल गीत...कभी कभी सपना लगता है

  7. यादें किशोर दा की : ये दर्द भरा अफ़साना, सुन ले अनजान ज़माना

  8. यादें किशोर दा की : क्या था उनका असली रूप साथियों एवम् पत्नी लीना चंद्रावरकर की नज़र में

  9. यादें किशोर दा की: वो कल भी पास-पास थे, वो आज भी करीब हैं ..समापन किश्त

Wednesday, August 15, 2007

ये कैसी आजादी :सिर फूटत हौ, गला कटत हौ, लहू बहत हौ, गान्‍ही जी !

साठ सालों में हमने काफी तरक्की की है। विकास के नए नए मुक़ाम हासिल किये हैं और आगे भी करेंगे। फिर भी ये विकास समाज के सभी वर्गों तक एक रूप से नहीं पहुँच सका है। इसकी वजह सिर्फ पूंजीवादी नीतियों का होना है, ऍसा मैं नहीं मानता।

उससे ज्यादा गुनाहगार हैं इन नीतियों को कार्यान्वित करने वाले लोग जिनमें मानवीय संवेदना मर सी गई है। चाहे वो बाँध बनाने का प्रश्न हो या पिछड़े इलाकों में उद्योग लगाने का, हर बार इनका विरोध होने की वजह यही रही है कि लोग ये जान गए हैं कि इनके बदले सरकार द्वारा घोषित पुनर्वास, नौकरी आदि के वायदे क़ागज तक ही सीमित रहने वाले हैं। पुनर्वास में लगाया जाने वाला धन बंदरबांट के तहत कहाँ गायब हो जाता है वो आम जनता को कभी पता नहीं चलता।

गाँधी के इस देश में भ्रष्टाचार और हिंसा का ग़र बोलबाला है तो इसकी वजह सिर्फ इतनी है कि देश के कानून से इन लोगों को कोई भय नहीं है।

कहाँ गए गाँधी के मूल्य? बेचारे खुद गाँधी जी आज इंटरनेट पर चुटकुलों के किरदार हो गए हैं। हाल ही में समाचारपत्र में एक ऐसे ही चुटकुले का जिक्र था।

गाँधीजी,सलमान खाँ, मल्लिका और में क्या समानता है?
उत्तर था

एक ने कपड़े उतारे देश के लिए
दूसरे ने ऍश के लिए
और तीसरे ने कैश के लिए
..
ये स्थिति हो गई है इस देश और राष्ट्रपिता की... :(

आज के इस समय में देशगान के लिए कैलाश गौतम जी की ये कविता सर्वथा उपयुक्त लगती है जो बापू को संबोधित है और कुछ दिनों पहले मोहल्ले पर भी आई थी।
सिर फूटत हौ, गला कटत हौ, लहू बहत हौ, गान्‍ही जी
देस बंटत हौ, जइसे हरदी धान बंटत हौ, गान्‍ही जी

बेर बिसवतै ररूवा चिरई रोज ररत हौ, गान्‍ही जी
तोहरे घर क' रामै मालिक सबै कहत हौ, गान्‍ही जी

हिंसा राहजनी हौ बापू, हौ गुंडई, डकैती, हउवै
देसी खाली बम बनूक हौ, कपड़ा घड़ी बिलैती, हउवै
छुआछूत हौ, ऊंच नीच हौ, जात-पांत पंचइती हउवै
भाय भतीया, भूल भुलइया, भाषण भीड़ भंड़इती हउवै

का बतलाई कहै सुनै मे सरम लगत हौ, गान्‍ही जी
केहुक नांही चित्त ठेकाने बरम लगत हौ, गान्‍ही जी
अइसन तारू चटकल अबकी गरम लगत हौ, गान्‍ही जी
गाभिन हो कि ठांठ मरकहीं भरम लगत हौ, गान्‍ही जी

जे अललै बेइमान इहां ऊ डकरै किरिया खाला
लम्‍बा टीका, मधुरी बानी, पंच बनावल जाला
चाम सोहारी, काम सरौता, पेटैपेट घोटाला
एक्‍को करम न छूटल लेकिन, चउचक कंठी माला

नोना लगत भीत हौ सगरों गिरत परत हौ गान्‍ही जी
हाड़ परल हौ अंगनै अंगना, मार टरत हौ गान्‍ही जी
झगरा क' जर अनखुन खोजै जहां लहत हौ गान्‍ही जी
खसम मार के धूम धाम से गया करत हौ गान्‍ही जी

उहै अमीरी उहै गरीबी उहै जमाना अब्‍बौ हौ
कब्‍बौ गयल न जाई जड़ से रोग पुराना अब्‍बौ हौ
दूसर के कब्‍जा में आपन पानी दाना अब्‍बौ हौ
जहां खजाना रहल हमेसा उहै खजाना अब्‍बौ हौ

कथा कीर्तन बाहर, भीतर जुआ चलत हौ, गान्‍ही जी
माल गलत हौ दुई नंबर क, दाल गलत हौ, गान्‍ही जी
चाल गलत, चउपाल गलत, हर फाल गलत हौ, गान्‍ही जी
ताल गलत, हड़ताल गलत, पड़ताल गलत हौ, गान्‍ही जी

घूस पैरवी जोर सिफारिश झूठ नकल मक्‍कारी वाले
देखतै देखत चार दिन में भइलैं महल अटारी वाले
इनके आगे भकुआ जइसे फरसा अउर कुदारी वाले
देहलैं खून पसीना देहलैं तब्‍बौ बहिन मतारी वाले

तोहरै नाम बिकत हो सगरो मांस बिकत हौ गान्‍ही जी
ताली पीट रहल हौ दुनिया खूब हंसत हौ गान्‍ही जी
केहु कान भरत हौ केहू मूंग दरत हौ गान्‍ही जी
कहई के हौ सोर धोवाइल पाप फरत हौ गान्‍ही जी

जनता बदे जयंती बाबू नेता बदे निसाना हउवै
पिछला साल हवाला वाला अगिला साल बहाना हउवै
आजादी के माने खाली राजघाट तक जाना हउवै
साल भरे में एक बेर बस रघुपति राघव गाना हउवै

अइसन चढ़ल भवानी सीरे ना उतरत हौ गान्‍ही जी
आग लगत हौ, धुवां उठत हौ, नाक बजत हौ गान्‍ही जी
करिया अच्‍छर भंइस बराबर बेद लिखत हौ गान्‍ही जी
एक समय क' बागड़ बिल्‍ला आज भगत हौ गान्‍ही जी

Thursday, August 09, 2007

अज़ब पागल सी लड़की है...इस सिलसिले की दूसरी नज़्म

कल आपने इसी मुखड़े से एक नज़्म पढ़ी। नज़्म का मूल भाव यही था कि प्रेम में अपना पराया कुछ नहीं रह जाता।
पर इस तरह का भाव जिंदगी में कितनी देर ठहर पाता है?
अगर ठहर पाता तो दुनिया में इतनी हिंसा, इतना द्वेष कहाँ से पनपता?
ख़ैर जाने दीजिए, वापस लौटते हैं इस नज़्म पर।

आज की नज़्म का मुखड़ा तो वही है. फ़र्क सिर्फ 'थी' और 'है ' भर का है। यानि शायर के जीवन में ये प्रेम बरक़रार है.. ये नज़्म संवाद-प्रतिसंवाद की शैली में लिखी गई है, यानि पहले प्रेमिका के कभी ना ख़त्म होने वाले सवालों की फेरहिस्त है और फिर है, उसका जवाब...

देखें ये नज़्म आप पर कैसा असर छोड़ती है? :)

अज़ब पागल सी लड़की है...
मुझे हर ख़त में लिखती है
मुझे तुम याद करते हो ?
तुम्हें मैं याद आती हूँ ?
मेरी बातें सताती हैं
मेरी नीदें जगाती हैं
मेरी आँखें रुलाती हैं....

दिसम्बर की सुनहरी धूप में, अब भी टहलते हो ?
किसी खामोश रस्ते से

कोई आवाज़ आती है?
ठहरती सर्द रातों में

तुम अब भी छत पे जाते हो ?
फ़लक के सब सितारों को

मेरी बातें सुनाते हो?

किताबों से तुम्हारे इश्क़ में कोई कमी आई?
वो मेरी याद की शिद्दत से आँखों में नमी आई?
अज़ब पागल सी लड़की है
मुझे हर ख़त में लिखती है...

जवाब उस को लिखता हूँ...
मेरी मशरूफ़ियत देखो...
सुबह से शाम आफिस में
चराग़-ए-उम्र जलता हूँ
फिर उस के बाद दुनिया की..
कई मजबूरियाँ पांव में बेड़ी डाल रखती हैं
मुझे बेफ़िक्र चाहत से भरे सपने नहीं दिखते
टहलने, जागने, रोने की मोहलत ही नहीं मिलती
सितारों से मिले अर्सा हुआ.... नाराज़ हों शायद
किताबों से शग़फ़ मेरा अब वैसे ही क़ायम है
फ़र्क इतना पड़ा है अब उन्हें अर्से में पढ़ता हूँ

तुम्हें किस ने कहा पगली, तुम्हें मैं याद करता हूँ?
कि मैं ख़ुद को भुलाने की मुसलसल जुस्तजू में हूँ
तुम्हें ना याद आने की मुसलसल जुस्तजू में हूँ
मग़र ये जुस्तजू मेरी बहुत नाकाम रहती है
मेरे दिन रात में अब भी तुम्हारी शाम रहती है
मेरे लफ़्जों कि हर माला तुम्हारे नाम रहती है
पुरानी बात है जो लोग अक्सर गुनगुनाते हैं
उन्हें हम याद करते हैं जिन्हें हम भूल जाते हैं

अज़ब पागल सी लड़की हो
मेरी मशरूफ़ियत देखो...
तुम्हें दिल से भुलाऊँ तो तुम्हारी याद आए ना
तुम्हें दिल से भुलाने की मुझे फुर्सत नहीं मिलती
और इस मशरूफ़ जीवन में
तुम्हारे ख़त का इक जुमला
"तुम्हें मैं याद आती हूँ?"
मेरी चाहत की शिद्दत में कमी होने नहीं देता
बहुत रातें जगाता है, मुझे सोने नहीं देता
सो अगली बार अपने ख़त में ये जुमला नहीं लिखना


अज़ब पागल सी लड़की है
मुझे फिर भी ये लिखती है...
मुझे तुम याद करते हो ?
तुम्हें मैं याद आती हूँ ?

(फ़लक-आकाश, शग़फ़-रिश्ता, मसरूफ- व्यस्त, मुसलसल-लगातार)



शायर : आतिफ़ सईद
 

मेरी पसंदीदा किताबें...

सुवर्णलता
Freedom at Midnight
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Madhushala
कसप Kasap
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Five Point Someone: What Not to Do at IIT
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Jharokhe
Mailaa Aanchal
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मुझे चाँद चाहिए Mujhe Chand Chahiye
Lolita
The Pakistani Bride: A Novel


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स्पष्टीकरण

इस चिट्ठे का उद्देश्य अच्छे संगीत और साहित्य एवम्र उनसे जुड़े कुछ पहलुओं को अपने नज़रिए से विश्लेषित कर संगीत प्रेमी पाठकों तक पहुँचाना और लोकप्रिय बनाना है। इसी हेतु चिट्ठे पर संगीत और चित्रों का प्रयोग हुआ है। अगर इस अव्यवसायिक चिट्ठे पर प्रकाशित चित्र, संगीत या अन्य किसी सामग्री से कॉपीराइट का उल्लंघन होता है तो कृपया सूचित करें। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी।

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