अंडमान डॉयरी : वो पहली विमान यात्रा !
14.11.04, मंगलवार, कोलकाता - पोर्ट ब्लेयर हवाई यात्रा
एलायन्स एयरवेज की इस उड़ान में मुझे सीट पीछे वाली मिली थी । पर खिड़की से बाहर का नजारा बिना किसी अवरोध के नजर आ रहा था । मेरे बगल वाली सीट खाली थी । यात्रा की शुरुआत में ही एक विमान परिचारिका आई और उसने अपना बैग वहाँ रख दिया। मैंने मन ही मन प्रभु को धन्यवाद दिया कि वाह शुरुआत इतने शुभ तरीके से हो रही है तो आगे बात ही क्या ! पर मेरी ख्वाबों की ये उड़ान क्षणिक साबित हुई क्यूँकि बैग रखने की प्रक्रिया उसकी सहयोगियों द्वारा दोहराई जाती रही । देखते ही देखते हमारी बगल की सीट बैग स्टोरेज यार्ड में तब्दील हो गई। मन ही मन प्रभु को कोसा कि हे प्रभु ! तुम्हारी कैसी ये माया है ? पहले तो ख्वाबों के सब्जबाग दिखाते हो और फिर बड़ी बेरहमी से उनकी बाट लगाते हो ।
विमान उड़ान भर चुका था और नेताजी सुभाष चंद्र बोस हवाई अड्डे का रनवे पीछे छूट चुका था । विमान के अंदर बदले हालातों को देखकर दुखी मन से मैंने बाहर खिड़की की ओर नजर घुमाई । सामने का दृश्य भयावह था..डैने का एक हिस्सा रह-रह कर खुल जा रहा था । टेक आफ के समय विमान दुर्घटना के किस्से तो पहले ही सुन रखे थे । ऊपर से एलायन्स के खस्ता हाल विमानों पर पढ़ा हुआ लेख भी स्मृतियों की चारदीवारी लांघता हुआ एकदम से कौंध गया । प्रभु को दीन-हीन मुद्रा में मन ही मन फिर याद किया....क्यूँ अंडमान घूमें बगैर ही अपने पास बुला लेना चाहते हो ! खैर, जी को कड़ा किया और यही सोचा कि समय रहते देख लिया है । अगर डैने का कुछ हिस्सा टूट कर गिरे तो सबसे पहले मैं जरूर चालक दल को ये बता पाऊंगा कि भैया यहीं कुछ गड़बड़ लग रियो है । पर ८-१० मिनट के सूक्ष्म अध्ययन के बाद दिमाग की घंटी बजी की ये जो कुछ हो रहा है वो विमान के एयरोडॉयनमिक प्रतिरोध को कम करने के लिये हो रहा है ।अपनी जान को सुरक्षित जान अब खिड़की से बाकी सब जो दिख रहा था उस पर ध्यान देना शुरु किया । नीचे था आयताकार खेतों का जाल और उसको लकीर की तरह चीरती सड़कें और बीच-बीच में छोटे बड़े जल मग्न क्षेत्र । फिर दिखा गंगा का डेल्टा...ऐसा लगता था कि जमीन के छोटे-छोटे टुकड़ों के बीच नदी की अगिनत
धाराओं ने एक जटिल जाल सा बुन रखा है।
सब कुछ अद्भुत सा लग रहा था । शायद इसलिए भी की पहली बार इतनी ऊँचाई से इस दृश्य को देखने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा था । डेल्टा क्षेत्र के समाप्त होते ही बाहर के दृश्य धुंधले पड़ गए । सिर्फ दिख रही थी एक नीली चादर जो दूर क्षितिज के पास जाकर एक उजली लकीर में तब्दील हो जाती थी। ये चादर ऊपर फैले आकाश की है या नीचे बहते समुद्र की ये निर्णय ले पाना काफी कठिन था ।
अब ध्यान अंदर की और लौटा । दुबली पतली परिचारिकाएँ इठलाती हुई अपनी मशीनी मुस्कुराहट के साथ लोगों को जलपान करा रहीं थीं। उन्होंने अब बगल में बनाए बैग स्टोरेज यार्ड को खाली कर लिया था । मैंने उड़ती निगाह अपने सहयात्रियों पर डाली । निगाह जाकर उसी आकर्षक बाला पर टिकी जिसे पहले बस पर भी देखा था । आगे की सीट पर बैठे खेतवाल जी भी उसी को ताड़ते दिखे। सूचना भाभी जी तक पहुँची तो खेतवाल जी ने सारा इलजाम मेरे सिर मढ़ा कि मनीष ने ही बस पर चढ़ते समय उधर ध्यान दिलाया था। बतायें इस कलयुगी जमाने में है ना...नेकी कर दरिया में डालने वाली बात ।
भोजन करने के बाद परिचारिका को ट्रे वापस करने लगे तो दो एक रैपर नीचे जा गिरे । तेजी से उन्हें उठाने के लिए ज्यों ही हाथ बढ़ाया कि परिचारिका का हँसता खनखनाता सा स्वर सुनाई दिया
PLEASE RELAX !
मन ही मन गुस्सा आया कि यहाँ मैं इसकी सहायता के लिए तेजी दिखा रहा हूँ और ये समझ रही है कि इसे देख कर घबराहट में रैपर गिरा रहा हूँ । सोचा कह दूँ - इतना इतराने की जरुरत नहीं, आपसे कहीं ज्यादा सुंदर सहयात्री मौजूद हैं इस विमान में, पर कह ना सका । चुपचाप बिना देखे उसे ट्रे वापस की और ध्यान वापस मोड़ा ।सफर करते हुए एक घंटे से ज्यादा हो चुके थे और 20-25 मिनट में अंडमान आने ही वाला था । खिड़की से बादलों का घना झुंड बड़ा प्यारा लग रहा था । हमारा विमान अब नीचे की ओर जा रहा था । कुछ ही देर बाद पहला द्वीप दिखा । बीच में गहरा हरा रंग और किनारे किनारे धानि और पीले से द्वीप के चारों ओर फैली एक लकीर । पहले तो गहरे हरे और धानि के अंतर को कि इसमें जंगल का रूप कौन सा है समझ ना सका। फिर पता चला कि द्वीप के किनारे की धानि लकीर छिछले समुद्र की है और पीली लकीर बालू का किनारा है, जिसने द्वीप को चारों ओर से घेर रखा है । पाँच-दस मिनटों के बाद हम पोर्ट ब्लेयर के ऊपर मंडरा रहे थे । चारों ओर हरे भरे पेड़ और जंगल दिख रहे थे। विमान के उतरने पर थोड़ा अजीब सा अहसास होता है और सर भी घूमने सा लगता है ।
तो क्या था पोर्ट ब्लेयर की जमीं पर हमारा पहला अहसास ?
नवंबर के महिने में ३२ डिग्री की उमस और गर्मी कितनी भिन्न थी राँची की इतने ही तापमान पर रहती खुशनुमा ठंडक से । होठों पर अनायास ही ये गीत तैर गया
ये कहाँ आ गए हम, यूँ ही साथ-साथ चलके....
अगले हिस्से में आपको सुनाएँगे अंडमान में बिताये पहले दो दिनों का हाल ...







17 comments:
बड़ी रोचक रही आपकी यह विमान यात्रा. आपका सुनाने का अंदाज निराला है-वैसे यह सहयात्री को ताड़ना तक तो ठीक है, बताना कोई जरुरी नहीं. कभी ब्लॉग घर में पढ़ लिया गया तो फिर मत कहना भाई कुछ. हम तो बस चेता दे रहे हैं शुभचिंतक होने के नाते. :)
मनीष जी,
रोचक शैली और साफगोई से आपका लिखा यात्रा-वृतांत पढ़ रहा हूँ। प्रतीक्षा रहती है अगले भाग की।
और हाँ, उड़न तश्तरी जी की टिप्पणी से न घबराएं, ऐसी कोई बात होने पर बस कह दें कि यह तो मात्र ब्लॉग को रुचिकर बनाने के लिये लिखा था ;)
बहुत बढ़िया वृतांत लिखा है । जल्दी से अगला अंश भी लाइये ।
घुघूती बासूती
आपके साथ अन्डेमाान की दुबारा यात्रा करना अच्छा लगा। जगह बेहद खूबसूरत है और सागर के नीचे के दृश्य अद्भुत।
मैंने अंडमान में दो साल बिताए हैं. वह जगह इतनी खूबसूरत है कि वहा बार बार जाने का मन करता है. आपका यात्रा वरणन सुन कर लगा कि मैं एक बार फिर वहां जा पा रहा हूं .....
रोचक!
शुक्रिया!
ऊ का कहते हैं यात्रा मा सहयात्री को ताड़ेंगे नहीं तो अउर का करेंगे,एमा गलत का है ।
मनीश भाइ समीर जी के पुराने अनुभवो से लाभ उठाये (वो करते इससे ज्यादा है और छुपा सारा जाते है)और आप हमे अगर संभव हो तो फ़ोटो भी छाप कर दिखाया करे
बहुत अच्छा और रोचक वर्णन किया है आपने..खूब्सुरत दृश्य शब्दों में ही दिख गये.. और चित्र भी अच्छे लगे.. आप सजीव चित्र खींचते हैं शबदों से.. और लगता है प्रकृति के साथ और भी सौंदर्य दिखा यात्रा में.. :)
अरे वाह! ये यात्रा विवरण कुछ खास अन्दाज मे कर रहे है आप!!अच्छा है!
बहुत ही रोचक वर्णन । फोटो बहुत अच्छी है।
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gmail.comडरने की कोई बात नहीं है गुरू । एकदम ठीक जा रहे हो । और हमें बेहतरीन अंदाज़ में अंडमान दिखा रहे हो ।
इंतज़ार है अगली कड़ी का ।
समीर जी हिदायत का शुक्रिया ! पर ये बता दूँ कि उसी दिन शाम को चाय पर ये किस्सा सब के सामने ,ठहाकों के बीच एक दूसरे की खिंचाई करते वक्त दोहराया गया । :)
राजीव भाई शुक्रिया ! कोशिश यही रहेगी कि इसी साफगोई से आप तक आगे का विवरण सुनाता रहूँ । हा ,हा घबराहट वाली तो कोई बात ही नहीं जैसा की ऊपर कहा है । ;)
घुघूति जी शुक्रिया !
रत्ना जी सही कहा आपने !
योगेश जी आप भाग्यशाली हैं कि इतना समय आपको वहाँ बिताने को मिला । आप तो शायद निकोबार भी गए होंगे फिर ?
संजीत हा हा, ये भी सही है ।
अरुण जी अब समीर जी का तो पता नहीं...पर इतना तो जरूर है कि ऍसे अनुभवों से गुजरे होंगे, इसीलिए इतनी नेक सलाह दी है :)
ममता जी शुक्रिया ! वैसे सिर्फ शुरु के दो फोटो मैंने खुद लिये हैं ।
मान्या शुक्रिया जी , कोशिश यही रहती है कि अपने अनुभवों को आप तक पहुँचा सकूँ ।
हा,हा !अब प्रकृति के आलावा जो सौंदर्य दिखा उसे नजरअंदाज तो नहीं कर सकते ना !
रचना जी शुक्रिया ! अंदाजेबयां तो सामने दिख रहे दृश्य पे निर्भर हैं ना । अंडमान की धरती पर उतरने दें ,कई अन्य रंग मिलेंगे आपको देखने को इस वृत्तांत में ।
यूनुस भाई धन्यवाद, वैसे भी आप जैसा जवान साथ हो तो फिर किसी से डरने की जरूरत होगी नहीं :)
बहुत अच्छा वृतांत।
शुक्रिया जगदीश जी !
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