Wednesday, May 16, 2007

डॉयरी अंडमान की .....

बहुत दिनों से आप सबको कहीं घुमाने नहीं ले गया :)। अब ले भी कैसे जाते जब खुद ही कहीं नहीं गए। पर हाल ही में जब ममता जी ने अंडमान की कहानी बताई तो मुझे अपनी अंडमान टूर डायरी का ख्याल आया जो मैंने चिट्ठाकारी शुरु करने के पहले लिखी थी पर वो भी अधूरी यानि आरंभ के ५ दिनों की । यानि हैवलॉक तक के यात्रा वृतांत में तो डायरी के पन्ने आपका साथ देंगे और उसके बाद मेरी याददाश्त :) ।

मेरी अंडमान यात्रा सिक्किम और पंचमढ़ी से कहीं सुखद रही थी, पर अफसोस यही रह गया कि उस वक्त डिजिटल कैमरा मेरे पास नहीं था । इसलिए जो चित्र मैं इस यात्रा विवरण में आपको दिखाऊँगा उनमें ज्यादातर मित्रों के या तो फिर इंटरनेट से लिए हुए हैं । तो चलें इस सुहाने सफर पर...

१३.११.२००४, सोमवार, राँची
शताब्दी एक्सप्रेस में राँची से कोलकाता जाने की कल्पना अपने आप मन में कोई सुखद अहसास नहीं जगाती । और जगाए भी तो कैसे, कितनी ही बार तो इस मनहूस से सफर की यंत्रणा झेल चुके हैं हम सेल वाले दुर्गापुर जाते हुए
खाली पड़ी ए.सी. चेयर कॉर ..
खड़खड़ाते डिब्बे...
और बेकार नहीं तो अतिसाधारण सा नाश्ता पानी...
और ऊपर से चेयर कॉर का अनियंत्रित AC जिसकी ठंडक सफर की बोरियत के साथ मानो बढ़ती चली जाती हो ।

पर ये सफर क्या उन नीरस कार्यालयी दौरों की तरह होगा ? नहीं भाई आखिर अंडमान जाने की इस पहली सीढ़ी में तीन परिवारों का कुनबा अगर साथ साथ चल रहा हो तो भला कैसे ऐसा हो सकता है । पर पिछली सुबह ही तो इस साथ चलने पर प्रश्नचिन्ह सा उठ गया था । नहीं किया था खेतवाल ( मेरे सहयोगी) ने फोन कि मेंने एजेन्ट से बात कर ली है अगर कल तक बिटिया की उल्टियाँ नहीं रुकीं तो हमारा चलना संदेहास्पद है । मन ही मन सोचा नाहक परेशान हो रहे हैं। जरुर मामला बदहजमी का होगा पर बच्चों के लिए इतने लंबे सफर में कोई जोखिम लेना भी उचित नहीं था । खैर, रात तक उनकी बिटिया की तबियत काफी सुधर गई और यात्रा के दिन हम सब इकठ्ठे उस डिब्बे में मौजूद थे ।सबसे ज्यादा खुशी बच्चों के मुख पर ही दिखाई दे रही थी । एक साथ जाने की खुशी में बच्चे फूले नहीं समा रहे थे ।

कोलकाता पहुँचते -पहुँचते रात के दस बज गए । हावड़ा ब्रिज पार किया और कुछ देर बाद ही दूधिया प्रकाश से नहाया इडेन गार्डन दिखाई दिया । अंदर भारत पाक वन डे चल रहा था । जिस तरह से लोग मैच खत्म होने के पहले ही बाहर आते दिखे उससे हमने अनुमान लगाया कि लगता है भारत मैच हार गया । गेस्ट हाउस में पता चला कि हम सब का अनुमान सच्चाई से ज्यादा दूर का नहीं था । भारत तब तक हारा तो नहीं था पर हार की कगार पर था ।

१४.११.०४, मंगलवार, कोलकाता

फ्लाइट ११ बजे की थी । 9-9.30 बजे तक हम टैक्सी में सवार होकर एयरपोर्ट के रास्ते में थे । मेरे लिए या यूँ कहें कि मेरे परिवार के लिए हवाई यात्रा का वो पहला अनुभव था । हवाई अड्डे पर चेक इन की औपचारिकता से लेकर पोर्ट ब्लेयर तक पहुँचने में जो कुछ भी हुआ वो हम सब के लिए अनूठा अनजाना अनुभव था । बच्चों को एस्कलेटर पसंद आया तो मुझे समान ढ़ोने वाली ट्राली । ट्रेन के सफर में भारी भरकम बोझ को ढ़ो कर चलने के बाद इस तरह की व्यवस्था देख के मन को सुकून मिला कि चलो कुलीगिरी के काम से तो मुक्ति मिली :)।


हवाई अड्डे की लांज में सामूहिक चित्र लेने के बाद बस पर चढ़ कर विमान की ओर चल पड़े।

विमान में सीट लेने के पहले एक मसला और भी था । किसी ने हमारे टीम लीडर को बताया था कि विमान उतरते वक्त अंडमान द्वीप का सुंदर दृश्य सिर्फ दायीं ओर की खिड़की से दिखाई देता है । जाहिर है ये सूचना हमें अपने कार्यालय के पूर्ववर्ती यात्रियों से प्राप्त हुई थी । पर इस जानकारी के बावजूद हमें दाहिनी ओर की सिर्फ एक ही सीट मिली । सो हम मन मसोस कर बांयी ओर की खिड़की के पास बैठ गए । पर सूचना देने वाले ने ये निष्कर्ष सुबह की फ्लाइट में अपने अनुभव पर बताया था । विमान के समय में परिवर्तन की वजह से धूप ने अपना रुख बदला और अंडमान हमें बांयीं ओर से भी दिखा और अच्छी तरह दिखा ।

कैसी रही मेरी ये पहली विमान यात्रा ? क्या दिखा मुझे विमान के बाहर और अंदर...ये किस्सा अगले हिस्से में !

13 comments:

विपुल जैन said...

आंनद आ गया। बहतरीन। आप इसी तरह धूमते रहें और हम आंनद उठाते रहें।

Sanjeet Tripathi said...

बढ़िया!
इंतजार रहेगा अगली किश्त का

Udan Tashtari said...

वाह, अब आपके साथ अंडमान यात्रा. सोच कर ही मन रोमांचित हो रहा है. इंतजार है.

नीरज दीवान said...

अभी तो अंडमान पहुंचे भी नहीं हो दादा. इंडिया में ही घुमाकर हूल देने का इरादा है क्या? जल्दी से पहुंचों औऱ दिखाओ कैसे जंगलवासी झींगालाला हू हू करते हैं. :)

चलिए अब थोड़ा सीरियस.. cellular jail यदि गए हों तो विस्तार से लीखिएगा. इसके अलावा अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के Negrito tribes के बारे में कहा जाता है कि यह दुनिया की सबसे प्राचीन नस्ल है.

विस्तार से लिखें.. बड़ी रोचक सामग्री बन पड़ेगी.

रचना said...

आपसे आपके सिक्किम के सफ़र ही पहचान हुई थी.:) पचमढी भी गये थे आपके साथ..और अब अंडमान भी जाने को तैयार है‍!

परमजीत बाली said...

बहुत अच्छा लिखा है।बधाई।

yunus said...

मजा आया यात्रा की शुरूआत में । फिर याद आ गया कि सुनामी के बाद भारत सरकार ने अपने कर्मचारियों को अंडमान जाने और इस तरह वहां के पर्यटन व्‍यवसाय में योगदान देने के लिए प्रोत्‍साहित किया था, किंतु अपनी तथाकथित व्‍यस्‍तताओं के रहते हमारी टोली ना जा सकी । अफसोस रहेगा । आपके सहारे ही सही अंडमान घूम लेंगे ।

विकास कुमार said...

पहले चित्र ने तो मन मे अंडमान जाने की ललक जगा दी।

Jitendra Chaudhary said...

भई हम तो कब से इन्तज़ार कर रहे है आपका। चलो भई नए सफ़र पर।

Manish said...

विपुल कोशिश तो यही रहेगी ।

संजीत जल्द आएगा अगला भाग

समीर जी आप जैसे सहयात्री साथ हों तो लिखने वाले का भी उत्साह बना रहता है।

रचना जी हाँ मुझे याद है :)

Manish said...

यूनुस हम तो सुनामी कर समय का टिकट रद्द कर ठीक उसके पहले गए थे। मेरी कोशिश रहेगी कि ये वृत्तांत पढ़ने के बाद अगली बार जब ऐसा मौका मिले आप वहाँ जाने के लिए ना न कह पाएँ

परमजीत शुक्रिया !

विकास अंडमान तो सचमुच बेहद सुंदर है ।

जीतू भाई :)

Manish said...

नीरज अभी तो एक आध पोस्ट और 'हूलेंगे' इधर ही, इतनी जल्दी काहे मचाये हो :)
जेल में भी जाएंगे और आपके गुमशुदा भाईयों से भी मिलाएँगे तब जितनी चाहे झींगालाला कर लेना :p

Dawn....सेहर said...

बढ़िया! :D