Tuesday, August 29, 2006

कहाँ गए संगीत के सुर ! मर गई क्या मेलोडी ?

जी नहीं ये प्रश्न मैं नहीं बल्कि हमारे अग्रज श्री जी.के.अवधिया जी पूछ रहे हैं हम सबसे परिचर्चा पर !

अवधिया जी मेरे मन में ये कहते हुये जरा भी संदेह नहीं कि भारत जैसे देश में संगीत की लय ना कभी मरी थी ना कभी मरेगी। समय के साथ साथ हमारे फिल्म संगीत में बदलाव जरूर आया है। ५० के दशक के बाद से इसमें कई अच्छे-बुरे उतार-चढ़ाव आये हैं । पर आपका ये कहना कि आज का संगीतकार 'मेलॉडियस' संरचना शायद करना ही नहीं चाहता सत्य से कोसों दूर है। इससे पहले कि मैं आज के संगीतकारों के बारे में आपकी राय पर कुछ प्रतिक्रिया दूँ फिल्म संगीत के अतीत पर नजर डालना लाजिमी होगा ।

इसमें कोई शक नहीं पुरानी फिल्मों के गीत इतने सालों के बाद भी दिल पर वही तासीर छोड़ते हैं ।
नौशाद, शंकर जयकिशन, एस. डी. बर्मन जैसे कमाल के संगीतकारों,
सहगल, सुरैया, गीता दत्त, लता, रफी, मुकेश, हेमंत, आशा, किशोर जैसे सुरीले गायकों
और राज कपूर, विमल राय, महबूब खान और गुरूदत जैसे संगीत पारखी निर्माता निर्देशकों ने ५० से ७० के दशक में जो फिल्म संगीत दिया वो अपने आप में अतुलनीय है। इसीलिये इस काल को हिन्दी फिल्म संगीत का स्वर्णिम काल कहा जाता है । ये वो जमाना था जब गीत पहले लिखे जाते थे और उन पर धुनें बाद में बनाई जाती थीं ।

वक्त बदला और ७० के दशक में पंचम दा ने भारतीय संगीत के साथ रॉक संगीत का सफल समावेश पहली बार 'हरे राम हरे कृष्ण' में किया । वहीं ८० के दशक में बप्पी लाहिड़ी ने डिस्को के संगीत को अपनी धुनों का केन्द्रबिन्दु रखा । मेरी समझ से ८० का उत्तरार्ध फिल्म संगीत का पराभव काल था । बिनाका गीत माला में मवाली, हिम्मतवाला सरीखी फिल्मों के गीत भी शुरु की पायदानों पर अपनी जगह बना रहे थे । और शायद यही वजह या एक कारण रहा कि उस समय के हालातों से संगीत प्रेमी विक्षुब्ध जनता पहली बार गजल और भजन गायकी की ओर उन्मुख हुई। जगजीत सिंह, पंकज उधास, अनूप जलोटा, तलत अजीज, पीनाज मसानी जैसे कलाकार इसी काल में उभरे।

९० का उत्तरार्ध हिन्दी फिल्म संगीत के पुनर्जागरण का समय था । पंचम दा तो नहीं रहे पर जाते जाते १९४२ ए लव स्टोरी (१९९३) का अमूल्य तोहफा अवश्य दे गए । कविता कृष्णामूर्ति के इस काव्यात्मक गीत का रस अवधिया जी आपने ना लिया हो तो जरूर लीजि॓एगा

क्यूँ नये लग रहे हें ये धरती गगन
मेंने पूछा तो बोली ये पगली पवन
प्यार हुआ चुपके से.. ये क्या हुआ चुपके से

मेंने बादल से कभी, ये कहानी थी सुनी
पर्वतों से इक नदी, मिलने से सागर चली
झूमती, घूमती, नाचती, दौड़ती
खो गयी अपने सागर में जा के नदी
देखने प्यार की ऍसी जादूगरी
चाँद खिला चुपके से..प्यार हुआ चुपके से..


पुरानी फिल्मों से आज के संगीत में फर्क ये है कि रिदम यानि तर्ज पर जोर ज्यादा है। तरह तरह के वाद्य यंत्रों का प्रयोग होने लगा है। धुनें पहले बनती हैँ, गीत बाद में लिखे जाते हैं। नतीजन बोल पीछे हो जाते हैं और सिर्फ बीट्स पर ही गीत चल निकलते हैं।
ऐसे गीत ज्यादा दिन जेहन में नहीं रह पाते। पर ये ढर्रा सब पर लागू नहीं होता ।

१९९५-२००६ तक के हिन्दी फिल्म संगीत के सफर पर चलें तो ऐसे कितने ही संगीतकार हैं जिन पर आपका कथन आज का संगीतकार 'मेलॉडियस' संरचना .................बिलकुल सही नहीं बैठता । कुछ बानगी पेश कर रहा हूँ ताकि ये स्पष्ट हो सके कि मैं ऐसा क्यूँ कह रहा हूँ।

साल था १९९६ और संगीतकार थे यही ओंकारा वाले विशाल भारद्वाज और फिल्म थी माचिस ! आतंकवाद की पृष्ठभूमि में बनी इस फिल्म का संगीत कमाल का था ! भला

छोड़ आये हम वो गलियाँ.....
चप्पा चप्पा चरखा चले.. और
तुम गये सब गया, मैं अपनी ही मिट्टी तले दब गया


जैसे गीतों और उनकी धुनों को कौन भूल सकता है ?

इसी साल यानि १९९६ में प्रदर्शित फिल्म इस रात की सुबह नहीं में उभरे एक और उत्कृष्ट संगीतकार एम. एम. करीम साहब ! एस. पी. बालासुब्रमण्यम के गाये इस गीत और वस्तुतः पूरी फिल्म में दिया गया उनका संगीत काबिले तारीफ है

मेरे तेरे नाम नहीं है
ये दर्द पुराना है,
जीवन क्या है
तेज हवा में दीप जलाना है

दुख की नगरी, कौन सी नगरी
आँसू की क्या जात
सारे तारे दूर के तारे, सबके छोटे हाथ
अपने-अपने गम का सबको साथ निभाना है..
मेरे तेरे नाम नहीं है.....


१९९९ में आई हम दिल दे चुके सनम और साथ ही हिन्दी फिल्म जगत के क्षितिज पर उभरे इस्माइल दरबार साहब ! शायद ही कोई संगीत प्रेमी हो जो उनकी धुन पर बने इस गीत का प्रशंसक ना हो

तड़प- तड़प के इस दिल से आह निकलती रही....
ऍसा क्या गुनाह किया कि लुट गये,
हां लुट गये हम तेरी मोहब्बत में...



पर हिन्दी फिल्म संगीत को विश्व संगीत से जोड़ने में अगर किसी एक संगीतकार का नाम लिया जाए तो वो ए. आर रहमान का होगा । रहमान एक ऐसे गुणी संगीतकार हैं जिन्हें पश्चिमी संगीत की सारी विधाओं की उतनी ही पकड़ है जितनी हिन्दुस्तानी संगीत की । जहाँ अपनी शुरुआत की फिल्मों में वो फ्यूजन म्यूजिक (रोजा, रंगीला,दौड़ ) पेश करते दिखे तो , जुबैदा और लगान में विशुद्ध भारतीय संगीत से सारे देश को अपने साथ झुमाया। खैर शांत कलेवर लिये हुये मीनाक्षी - ए टेल आफ थ्री सिटीज (२००४) का ये गीत सुनें

कोई सच्चे ख्वाब दिखाकर, आँखों में समा जाता है
ये रिश्ता क्या कहलाता है
जब सूरज थकने लगता है
और धूप सिमटने लगती है
कोई अनजानी सी चीज मेरी सांसों से लिपटने लगती है
में दिल के करीब आ जाती हूँ , दिल मेरे करीब आ जाता है
ये रिश्ता क्या कहलाता है


२००४ में एक एड्स पर एक फिल्म बनी थी "फिर मिलेंगे" प्रसून जोशी के लिखे गीत और शंकर-एहसान-लॉय का संगीत किसी भी मायने में फिल्म संगीत के स्वर्णिम काल में रचित गीतों से कम नहीं हैं। इन पंक्तियों पर गौर करें

खुल के मुस्कुरा ले तू, दर्द को शर्माने दे
बूंदों को धरती पर साज एक बजाने दे
हवायें कह रहीं हैं, आ जा झूमें जरा
गगन के गाल को चल जा के छू लें जरा

झील एक आदत है, तुझमें ही तो रहती है
और नदी शरारत है तेरे संग बहती है
उतार गम के मोजे जमीं को गुनगुनाने दे
कंकरों को तलवों में गुदगुदी मचाने दे


और फिर २००५ की सुपरिचित फिल्म परिणिता में आयी एक और जुगल जोड़ी संगीतकार शान्तनु मोइत्रा और गीतकार स्वान्द किरकिरे की !
अंधेरी रात में परिणिता का दर्द क्या इन लफ्जो में उभर कर आता है

रतिया अंधियारी रतिया
रात हमारी तो, चाँद की सहेली है
कितने दिनों के बाद, आई वो अकेली है
चुप्पी की बिरहा है, झींगुर का बाजे साथ


गीतों की ये फेरहिस्त तो चलती जाएगी। मेंने तो अपनी पसंद के कुछ गीतों को चुना ये दिखाने के लिये कि ना मेलोडी मरी है ना कुछ हट कर संगीत देने वाले संगीतकार।

हमारे इतने प्रतिभावान संगीतकारों और गीतकारों के रहते हुये आज के संगीत से आपकी नाउम्मीदी उनके साथ न्याय नहीं है । मैं मानता हूँ कि हीमेश रेशमिया जैसे जीव अपनी गायकी से आपका सिर दर्द करा देंते होंगे पर वहीं सोनू निगम और श्रेया घोषाल की सुरीली आवाज भी आपके पास हैं। अगर एक ओर अलताफ रजा हें तो दूसरी ओर जगजीत सिंह भी हैं । अगर आपको MTV का पॉप कल्चर ही आज के युवाओं का कल्चर लगता है तो एक नजर Zee के शो सा-रे-गा-मा पर नजर दौड़ाइये जहाँ युवा प्रतिभाएँ हिन्दी फिल्म संगीत को ऊपर ले जाने को कटिबद्ध दिखती हैं ।

सच कहूँ तो आज जैसी विविधता संगीत के क्षेत्र में उपलब्ध है वैसी पहले कभी नहीँ थी । संगीत की सीमा देश तक सीमित नहीं, और जो नये प्रयोग हमारे संगीतकार कर रहे हैँ उन्हें बिना किसी पूर्वाग्रह के हमें खुले दिल से सुनना चाहिए। जब तक संगीत को चाहने वाले रहेंगे, सुर और ताल कभी नहीं मरेंगे । जरूरत है तो संगीत के सही चुनाव की।

श्रेणी : अपनी बात आपके साथ में प्रेषित

Wednesday, August 23, 2006

धर्मवीर भारती की मर्मस्पर्शी रचना : 'गुनाहों का देवता '

कौन सा गुनाह ? कैसा गुनाह ?
किसी से जिंदगी भर स्नेह रखने का...
और वो स्नेह अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचने लगे तो उसका त्याग करने का...
है ना अजीब बात !
पर यही तो किया चंदर ने अपनी सुधा के साथ ।
इस भुलावे में कि दुनिया प्यार की ऐसी पवित्रता के गीत गाएगी...
प्यार भी कैसा...

"सुधा घर भर में अल्हड़ पुरवाई की तरह तोड़-फोड़ मचाने वाली सुधा, चंदर की आँख के एक इशारे से सुबह की नसीम की तरह शांत हो जाती थी। कब और क्यूँ उसने चंदर के इशारों का यह मौन अनुशासन स्वीकार कर लिया था, ये उसे खुद भी मालूम नहीं था और ये सब इतने स्वाभाविक ढंग से इतना अपने आप होता गया कि कोई इस प्रक्रिया से वाकिफ नहीं था.......... दोनों का एक दूसरे के प्रति अधिकार इतना स्वाभाविक था जैसे शरद की पवित्रता या सुबह की रोशनी.... "
और अपनी इस सुधा को ना चाहते हुये भी उसने उस राह में झोंक दिया जिस पर वो कभी नहीं चलना चाहती थी । सुधा तो चुपचाप दुखी मन से ही सही उस राह पर चल पड़ी और चंदर...

क्या चंदर का बलिदान उसे देवता बना पाया?

जो समाज के सामने अपने प्यार को एक आदर्श, एक मिसाल साबित करना चाहता था वो अपने खुद के अन्तर्मन से ना जीत सका । और जब अपने आपको खुद से हारता पाया तो अपना सारा गुस्सा, सारी कुंठा उन पे निकाली जिनके स्नेह और प्रेम के बल पर वो अपने व्यक्तित्व की ऊँचाईयों तक पहुँच पाया था।

तो क्या चंदर को अपनी भूल का अहसास हुआ ?
क्या वो समझ पाया कि कहाँ उसका जीवन दर्शन उसे धोखा दे गया?

पर ये भी तो सच है ना कि जिंदगी में बहुत सी बातें वक्त रहते समझ नहीं आतीं । और जब समझ आती हैं तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
चंदर हम सब से अलग तो नहीं !


चंदर ने यही गलती की कि अपने प्यार को यथार्थ के धरातल या जमीनी हकीकत से ऊपर कर के देखा, एक आदर्श प्रेम की अवधारणा को लेकर जो भीतर से खोखली साबित हुई। अपने दुख को पी कर वो जीवन में कुछ कर पाता तो भी कुछ बात थी। पर वो तो बुरी तरह कुंठित हो गया अपने आप से अपने दोस्तों से....सुधा उसे इस कुंठा से निकाल तो सकी पर किस कीमत पर ?


बहुत आश्चर्य होता है कि क्यूँ हम नहीं समझ पाते कि कभी कभी मामूली शख्स बन के जीने में ही सबसे बड़ी उपलब्धि है ! क्या हम वही बन के नहीं रह सकते जो हम सच्ची में हैं। अपने को दूसरों की नजर में ऊँचा साबित करने के लिये अपने आप को छलाबा देना कहाँ तक सही है?

किताब के बारे में
धर्मवीर भारती जी की गुनाहों का देवता सबसे पहले १९५९ में प्रकाशित हुई । हिन्दी साहित्य के दिग्गज इस उपन्यास को पात्रों के चरित्र -चित्रण के लिहाज से हिन्दी में लिखे हुये सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में से एक मानते हैं । अब तक इस उपन्यास के तीस से भी ज्यादा संस्करण छापे जा चुके हें और ये सिलसिला बदस्तूर जारी है ।

पिछले साल जून में इस उपन्यास को पढ़ा था और तभी ये पोस्ट अपने रोमन हिंदी चिट्ठे पर प्रकाशित की थी । जैसी की उम्मीद थी इसके कथानक ने मुझे हिला कर रख दिया था । सुधा की मौत को पचा पाना कितना दुष्कर था ये इस कथानक को पढ़ने वाला भली - भांति जानता है । और ऐसा अनुभव अकेला मेरा हो ऐसी बात नहीं , इस
पोस्ट पर मिली प्रतिक्रियाएँ इस बात की गवाह हैं कि पढ़ने वाला सुधा, चंदर, पम्मी, विनती के चरित्र से इस कदर जुड़ जाता है कि उनके कष्ट को अपने अंदर ही होता महसूस करता है।

खुद धर्मवीर भारती जी कहते है कि इस उपन्यास को लिखते समय उन्होंने वैसी भावनाएँ महसूस कीं जैसी कोई घोर विपदा में पूरी श्रृद्धा के साथ प्रार्थना करने में महसूस करता है .. उन्हें ऍसा लगा की वो प्रार्थना उनके हृदय में समाहित है और खुद बा खुद उसे वो दोहरा रहे हों ।

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किताबें बोलती हैं में प्रेषित

Saturday, August 19, 2006

मन्नू भंडारी की अनुपम कृति 'महाभोज'

मन्नू भंडारी के इस उपन्यास को पहली बार १९८६ में पढ़ा था ।
पिछले हफ्ते राँची के ठंडे माहौल को छोड़ कर पटना जाना पड़ा । वहाँ की चिपचिपाती गर्मी से निजात पाने के लिये इधर उधर निरुद्देश्य भटक रहा था तो सहसा अलमारी से ये पुस्तक झांकती मिली । कहानी तो अब बिलकुल याद नहीं थी पर ये जरूर याद था कि पहली बार पढ़ते वक्त ये किताब मन को बहुत भायी थी। डॉयरी के पन्नों में इस किताब के नाम के आगे मैंने तीन स्टार जड़े थे । और बाद में जब भंडारी जी का लिखा हुआ उपन्यास 'आप का बंटी' पढ़ा था तब से मन्नू जी मेरी चहेती लेखिका बन गईं थीं।

२०० पृष्ठों से भी कम की इस पुस्तक को दुबारा पढ़ने में ज्यादा समय नहीं लगा और इस बात की खुशी भी हुई कि इस किताब को फिर से पढ़ने का मौका मिल पाया । तो आइए ले चलें आपको इस उपन्यास के कथानक की ओर !
ये कहानी है विकास के हाशिये से बाहर खड़े एक गाँव सरोहा की !
एक ऐसा गाँव जहाँ बाहुल्य तो है हरिजनों का, पर तूती बोलती है जाटों की ।
यहीं मौत होती है एक पढ़े लिखे हरिजन नवयुवक बिसू की ।
वैसे तो बिसू एक सामान्य नागरिक की तरह गुमनामी की मौत मरा होता, पर परम गौरवशाली भारतीय लोकतंत्र की एक परम्परा ने ऐसा होने नहीं दिया। बिसू की मौत के कुछ दिनों पहले ही सरोहा में उपचुनाव की घोषणा हो चुकी थी । और जैसा की होता है विरोधी दल हाथ में आए इस सुनहरे मौके को कैसे जाने देते ।
कहानी आगे बढ़ती है...
शुरु होती है बिसू की मौत की तहकीकात...
या यूँ कहें कि एक आम से शख्स के करीबियों से किया गया क्रूर मजाक !
राजनीतिक रस्साकशी के इस माहौल में इस दुखद मौत पर सारे पक्ष अपनी अपनी गोटियाँ सेंकते नजर आते हैं।
चाहे वो मुख्यमंत्री हों जो जनता का ध्यान बिसू की हत्या से हटाने के लिए, लोक लुभावन योजना का चारा डालता हो...
या बिरोधी जो कत्ल के राजनीतिक लाभ के लिये जातिगत वैमनस्य को बढ़ाने से नहीं चूकते...
या आला अफसर जो केस की तह तक जाने वालों को प्रताड़ित कर अपनी पदोन्नति के रास्ते साफ करते चले जाते हैं...
या फिर मीडिया जो कागज के परमिट बढ़बाने की चाह में रातों रात सरकार की नीतियों के मुखर प्रशंसक बन जाते हैं...

लोकतंत्र के तले एक ऍसा घृणित राजनीतिक चक्र जिसमें एक हत्या , आत्महत्या बताई जाती है और फिर कुछ और .......
खैर वो बताना नहीं बताना ज्यादा मायने नहीं रखता उसे उपन्यास में ही पढ़ लीजिएगा ।
पर गौर करने वाली बात ये है कि १९७९ में लिखे इस उपन्यास को पढ़कर नहीं लगता कि हम ३० वर्ष पहले की स्थितियों से गुजर रहे हैं। उपन्यास के हर एक चरित्र को आज भी हम सब अपने इर्द-गिर्द घूमता महसूस कर सकते हैं।
एक बेहद सशक्त उपन्यास जो हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली की खामियों और निरंतर घटते राजनीतिक मूल्यों की झलक दिखलाकर मन को कचोटता हुआ सा जाता है ।

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Wednesday, August 09, 2006

आँखों की कहानी : शायरों की जुबानी (भागः2)

पिछली बार बात कर रहे थे कि किस तरह जब कोई हमारी आँखें पढ़ लेता है तो मन पुलकित हो उठता है। पर बात यहीं खत्म हो जाती तो फिर लुत्फ किस बात का था। अरे, आँखों या नजरों का इक इशारा प्यार की खुशबू बिखेरने के लिए काफी है। इसीलिये तो निदा फॉजली साहब कहते हैं

उनसे नजरें क्या मिलीं रौशन फिजाएँ हो गयीं
आज जाना प्यार की जादूगरी क्या चीज है

खुलती जुल्फों ने सिखाई मौसमों को शायरी
झुकती आँखों ने बताया महकशीं क्या चीज है

पर क्या आँखों का मोल सिर्फ इशारों तक है? नहीं जी, किसी की खूबसूरत आँखों को एक आशिक की नजरों से देखें तो आप भी शायद ये गीत गाने पर मजबूर हो जाएँ

तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है
ये उठें सुबह चले, ये झुकें शाम ढ़लें
मेरा जीना, मेरा मरना इन्हीं पलकों के तले...


और अमजद इस्लाम अमजद तो महबूब की आँखों के सामने ही रात दिन एक करने पर तुले हैं

सोएँगे तेरी आँख की खिलवत में किसी रात
साये में तेरी जुल्फ के जागेंगे किसी दिन


पर शुरु शुरु में अपने महबूब की ओर आँख उठा कर देखना आसान है क्या ?
अब इन्हें ही देखिये दिल में प्यार की शमा जल चुकी है पर ये हैं कि अभी भी निगाहें मिलाने से कतरा रहे हैं
हसरत है कि उनको कभी नजदीक से देखें
नजदीक हो तो आँख उठायी नहीं जाती
चाहत पे कभी बस नहीं चलता है किसी का
लग जाती है ये आग लगाई नहीं जाती


पर हुजूर एक बार अगर किसी से आँखों ही आँखों में बात हो भी जाये तो भी क्या कम मुसीबतें हैं। कभी तो उनकी बड़ी बड़ी आँखों का काजल दिल की धड़कनों को बढ़ाता है तो कभी आँखों आँखों में हुई वो मुलाकातें दिल में घबराहट पैदा करती हैं। बरसों पहले डॉयरी के पन्नों पे लिखी अपनी एक तुकबन्दी याद आती है

उसकी आँखों का वो काजल
जैसे गगन में काले बादल
उमड़ें घुमड़ें हाय ! मन मेरा घबराए

आँखों आँखों की वो बातें
वो नन्ही छोटी मुलाकातें
बरबस याद आ जाएँ, मन मेरा घबराए


पर ये आतुरता भरी घबराहट भी ऐसा जादू बिखेरती है कि अपनी आँखें भी किसी और की हो जाती हैं! यकीन नहीं आता तो इस नज्म की इन पंक्तियों पर गौर फरमाएँ ।

कहो वो दश्त कैसा था?
जिधर सब कुछ लुटा आये
जिधर आँखें गँवा आये
कहा सैलाब जैसा था, बहुत चाहा कि बच निकलें, मगर सब कुछ बहा आए !

कहो वो चाँद कैसा था?
फलक से जो उतर आया तुम्हारी आँख में बसने
कहा वो ख्वाब जैसा था, नहीं ताबीर थी उसकी, उसे इक शब सुला आए.. !

पर क्या आँखों से सिर्फ प्रेम की धारा बहती है?
नहीं हरगिज नहीं ! आँखें जितना दिखाती हैं उतना ही छुपा भी सकती हैं। और फिर आँसुओं की जननी भी तो ये आँखें ही हैं ना !
अगली कड़ी में देखेंगे की कैसे करती हैं आखें भावों की लुकाछिपी और क्या होता है जब उन पर चढ़ता है उदासी का रंग.....

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Tuesday, August 08, 2006

आँखों की कहानी : शायरों की जुबानी (भागः१)

आँखें ऊपरवाले की दी हुई सबसे हसीन नियामत हैं। शायद ही जिंदगी का कोई रंग हो जो इनके दायरे से बाहर रहा हो। यही वजह है कि शायरों ने इन आँखों में बसने वाले हर रंग को, हर जज्बे को किताबों के पन्नों में उतारा है। तो आज से शुरू होने वाले इस सिलसिले में पेश है शायरों की जुबानी, इन बहुत कुछ कह जाने वाली आँखों की कहानी..

आखें देखीं तो में देखता रह गया
जाम दो और दोनों ही दो आतशां
आँखें या महकदे के ये दो बाब हैं
आँखें इनको कहूँ या कहूँ ख्वाब हैं
बाब-दरवाजा

आँखें नीचे हुईं तो हया बन गयीं
आँखें ऊँची हुईं तो दुआ बन गयीं
आँखें उठ कर झुकीं तो अदा बन गयीं
आँखें झुक कर उठीं तो कजा बन गयीं
कजा किस्मत
आँखें जिन में हैं मह्व आसमां ओ जमीं
नरगिसी, नरगिसी, सुरमयी, सुरमयी...

मह्व - तन्मय
यूं तो कहते हैं कि आँखें दिल का आइना होतीं हैं पर उसे पढ़ने के लिये एक संवेदनशील हृदय चाहिये। अगर कोई बिना बोले आपकी मन की बात जान ले तो कितना अच्छा लगता है ना ! अब खुमार बाराबंकवी साहब की आँखें - देखिये किसने पढ़ लीं ?

वो जान ही गये कि हमें उन से प्यार है
आँखों की मुखबिरी का मजा हम से पूछिये

किसी का प्यारा चेहरा हो, और सामने हो उस चेहरे को पढ़ती दो निगाहें तो जवां दिलों के बीच का संवाद क्या शक्ल इख्तियार करता है वो मशहूर शायरा परवीन शाकिर की जुबां सुनिये

चेहरा मेरा था, निगाहें उस की
खामोशी में भी वो बातें उस की
मेरे चेहरे पर गजल लिखती गईं
शेर कहती हुईं आँखें उस की


खुशी की चमक हो या उदासी के साये सब तुरंत आँखों में समा जाता है।

कभी तो ये किसी की याद से खिल उठती हैं......

तेरी आँखों में किसी याद की लौ चमकी है
चाँद निकले तो समंदर पे जमाल आता है


तो कभी किसी के पास ना होने का गम उन्हें नम कर देता है

शाम से आँख में नमी सी है
आज फिर आप की कमी सी है


पर आँखों की ये भाषा हर किसी के पल्ले नहीं पड़ती। अगर ऍसा नहीं होता तो नजीर बनारसी के मन में भला ये संदेह क्यूँ उपजता ?

मेरी बेजुबां आँखों से गिरे हैं चंद कतरे
वो समझ सके तो आँसू, ना समझ सके तो पानी


अब इन्हें भी तो अपने महबूब से यही शिकायत है

पत्थर मुझे कहता है मेरा चाहने वाला
मैँ मोम हूँ उसने मुझे छू कर नहीं देखा
वो मेरे मसायल को समझ ही नहीं सकता
जिस ने मेरी आँखों में समंदर नहीं देखा


पर ऐसा भी नहीँ है कि इस समंदर को महसूस करने वाले शायरों की कमी है।
एक तरफ तो जनाब अमजद इस्लाम अमजद इसकी गहराई में उतरना चाहते हैं....

जाती है किसी झील की गहराई कहाँ तक
आँखों में तेरी डूब के देखेंगे किसी दिन

.......तो फराज अपनी आखिरी हिचकी इन आँखों के समंदर में लेने की ख्वाहिश रखते हैं

डूब जा उन हसीं आँखों में फराज
बड़ा हसीन समंदर है खूदकुशी के लिये
और इन हजरात का ख्याल भी कोई अलग नहीं
अपनी आँखों के समंदर में उतर जाने दे
तेरा मुजरिम हूँ , मुझे डूब कर मर जाने दे


तो हुजूर आज के किये तो इतना ही... आँखों की ये दास्तान तो अभी चलती रहेगी क्योंकि

इन आँखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं
इन आँखों के वाबस्ता अफसाने हजारों हैं
इक सिर्फ हमीं मय को आँखों से पिलाते हैँ

कहने को तो दुनिया में महखाने हजारों हैं


इस श्रृंखला की अगली कड़ियाँ

आँखों की कहानी : शायरों की जुबानी - भाग 2, भाग 3

Wednesday, August 02, 2006

'अभिव्यक्ति' पर मेरी पहली अभिव्यक्ति !

कल का दिन मेरे लिये अपार हर्ष का था । सुबह जब मेल बॉक्स खो ला तो देखा कि पूर्णिमा जी ने सूचना भेजी है कि मेरा सिक्किम का यात्रा विवरण अभिव्यक्ति के १ अगस्त के अंक में छप रहा है। मन खुशी से फूला ना समाया और तुरंत नाते रिश्तेदारों को खबर भिजवायी कि हमें भी लेखक बनने का सौभाग्य प्राप्त हो गया है। मन ही मन उन दोस्तों को भी धन्यवाद दिया जिन्होंने सिक्किम चलने का सुझाव दिया था। वैसे तो सिक्किम का यात्रा विवरण सुना-सुना कर मैंने आप सबको महिनों बोर किया था पर जो मेरे इस अनर्गल प्रलाप से पतली गली से साफ बच निकले हों उनके लिये अभिव्यक्ति की ये कड़ी पुनः परोस रहा हूँ ।

सिक्किम के सफर पर....

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स्पष्टीकरण

इस चिट्ठे का उद्देश्य अच्छे संगीत और साहित्य एवम्र उनसे जुड़े कुछ पहलुओं को अपने नज़रिए से विश्लेषित कर संगीत प्रेमी पाठकों तक पहुँचाना और लोकप्रिय बनाना है। इसी हेतु चिट्ठे पर संगीत और चित्रों का प्रयोग हुआ है। अगर इस अव्यवसायिक चिट्ठे पर प्रकाशित चित्र, संगीत या अन्य किसी सामग्री से कॉपीराइट का उल्लंघन होता है तो कृपया सूचित करें। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी।

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