Wednesday, December 27, 2006

बात अधूरे उदास चाँद की...हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चाँद

बिछड़ के मुझसे कभी तू ने ये भी सोचा है
अधूरा चाँद भी कितना उदास लगता है


जिंदगी में कमोबेश आप सब ने एक बात तो अवश्य महसूस की होगी । वो ये, कि हम बड़ी सहजता से हर उस इंसान से जुड़ जाते हैं जो अपने जैसे हालातों से गुजर रहा हो ! और जब अपनी बॉलकोनी से तनहा चाँद को देख ते हैं तो अपनी जिंदगी की तनहाई मानो चाँद रूपी शीशे में रह-रह कर उभरने लगती है । इसीलिए तो कहा है किसी ने

चाँद के साथ कई दर्द पुराने निकले
कितने गम थे जो तेरे गम के बहाने निकले


अब चाँद की त्रासदी देखिये, जो सूरज अपने प्रकाश से चाँद को सुशोभित करता है, हमारा ये चाँद उसे छू भी नहीं पाता.....
अपनी इस विरह-वेदना को दिल में जब्त किये चलता जाता है..चलता जाता है...
बिना रुके, बिना थके...
और चाँद का यही एकाकीपन हमें बरबस अपनी ओर खींचता है, आकर्षित करता है...


इसीलिए तो...
कभी जब हम रोजमर्रा की जिंदगी से उब से गए हों...
जब जी बिलकुल कुछ करने को नहीं करता...
नींद भी आखों से कोसों दूर रहती है...
ऐसे में अनमने से , चुपचाप इक बंद कमरे में बैठे हों...
और सामने ये चाँद दिख जाए तो...
तो वो भी अनगिनत तारों के बीच अपने जैसा अकेला प्रतीत होता है !
दिल करता है घंटों उसके सामने बैठे रहें ...
उसे निहारते रहें... उससे बातें करते रहें

कुछ उसी तरह जैसे नूरजहाँ अपने गाए इस मशहूर नग्मे में कर रही हैं

चाँदनी रातें, चाँदनी रातें..
सब जग सोए हम जागें
तारों से करें बातें..
चाँदनी रातें, चाँदनी रातें..


और ऐतबार साजिद साहब घर की राह पर निकले तो थे पर चाँद देखा तो ख्याल बदल लिया, उतर लिये राह ए सफर में ये कहते हुए

वहाँ घर में कौन है मुन्तजिर कि हो फिक्र दर सवार की
बड़ी मुख्तसर सी ये रात है, इसे चाँदनी में गुजार दो

कोई बात करनी है चाँद से, किसी शाखसार की ओट में
मुझे रास्ते में यहीं कहीं, किसी कुंज -ए -गुल में उतार दो


जिस तरह चाँदनी समंदर की लहरों को अपनी ओर खींच लेती है उसी तरह वो हमारी खट्टी- मीठी यादों को भी बाहर ले आती है, चंद शेरों की बानगी लें !

तेरी आखों में किसी याद की लौ चमकी है
चाँद निकले तो समंदर पे जमाल आता है

आप की याद आती रही रात भर
चाँदनी दिल दुखाती रही रात भर

चाँद के इतने रूपों की मैंने बातें कीं । पूर्णिमा से अमावस्या तक ना जाने ये कितनी ही शक्लें बनाता है और अपने मूड, अपनी कैफियत के हिसाब से हम इसकी भाव-भंगिमाओं को महसूस करते हैं ।

इससे पहले कि इस कड़ी को समाप्त करूँ, उस गजल से आपको जरूर रूबरू कराना चाहूँगा जिसे सुनते और गुनगुनाते ही चाँद मेरे दिल के बेहद करीब आ जाता है । अगर आपने डॉ. राही मासूम रजा की लिखी और जगजीत सिंह की गाई ये भावभीनी गजल ना सुनी हो तो जरूर सुनिएगा

हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चाँद
अपनी रात की छत पर कितना तनहा होगा चाँद

जिन आँखों में काजल बनकर तैरी काली रात
उन आँखों में आँसू का इक, कतरा होगा चाँद

रात ने ऐसा पेंच लगाया, टूटी हाथ से डोर
आँगन वाले नीम पे जाकर अटका होगा चाँद

चाँद बिना हर दिन यूँ बीता, जैसे युग बीते
मेरे बिना किस हाल में होगा, कैसा होगा चाँद

हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चाँद...

5 comments:

Udan Tashtari said...

चाँद बिना हर दिन यूँ बीता, जैसे युग बीते
मेरे बिना किस हाल में होगा, कैसा होगा चाँद

हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चाँद...


--पढ़कर बस यही कहेंगे:

आज फिर आँख में नमीं सी है.

--बहुत खुब रही चाँद चाँदनी सिरिज.बधाई. अब नया क्या ला रहे हैं?

MAN KI BAAT said...

'ज्योतिष के अनुसार चंद्रमा मन का कारक है।'
'साहित्य के अनुसार प्रकृति सबसे बड़ी उद्दीपक है। '
अनुमान लगाएं।
अच्छा लिखा है।

Manish said...

समीर जी ये गजल सुन कर भी देखिएगा ! आपके मन को अवश्य छुएगी ।
नया ...अब नए साल में तो वही करेंगे जो साल के अंत में अपने रोमन ब्लॉग पर किया करते थे !

Manish said...

प्रेमलता जी बिलकुल सही कहा आपने !
मन पर चाँद का असर /नियंत्रण
है इस पर तो दो राय हो ही नहीं सकती ।
और साहित्य सृजन का एक बड़ा हिस्सा होता ही नहीं, अगर प्रकृति नहीं होती । और प्रकृति के विविध रूपों में चाँद तो शायरों का सबसे प्रिय रहा है ।

मीनाक्षी said...

कुछ भाव दिल की गहराइयों में उतर जाते हैं और आप मूक भाव से उसमें डूब जाते हैं.
आपकी कही अपने दिल की बात लगती है.