धूपगढ़, पचमढ़ी : ढलता सूरज आती शाम !
डचेश फॉल तक पहुँचने की जद्दोजहद ने हमें बुरी तरह थका दिया था । भोजन के बाद कुछ देर का आराम लाजिमी था । सवा चार बजे हम पचमढ़ी झील की ओर चल पड़े । यहाँ की झील प्राकृतिक नहीं है । जल के किसी स्रोत पर चेक डैम बनाकर ये झील अपने वजूद में आयी है । पर झील कै फैलाव और उसके चारों ओर की हरियाली को देखकर ऐसा अनुमान लगा पाना काफी कठिन है ।
दिन की चढ़ाई के बाद कोई पैडल बोट को चलाने में रुचि नहीं ले रहा था । पर धूपगढ़ जाने के पहले कुछ समय भी बिताना था। सो एक नाव की सवारी कर ली गई। झील के मध्य में पहुँचे तो दो ऊँचे वृक्षों के बीच इस छोटे से घर की छवि मन में रम गई। भांजे को तुरत तसवीर खींचने को कहा ! नतीजन वो दृश्य आपके सामने है ।
झील में सैर करते-करते पाँच बज गए । अब आज तो सूर्यास्त किसी भी हालत में छूटने नहीं देना था जैसा कि पहले दिन हुआ था। सो तुरत फुरत में सब जिप्सी में सवार हो कर चल पड़े धूपगढ़ की ओर जो कि पचमढ़ी से करीब १०-१२ किमी दूरी पर है ।
धूपगढ़ पचमढ़ी की नहीं वरन पूरे मध्य प्रदेश की सबसे ऊँची पहाड़ी है । समुद्र तल से इसकी ऊँचाई १३५९ मीटर है। धूपगढ़ तक जाने के लिये अंतिम ३ किमी का रास्ता काफी घुमावदार है और पहली बार मंजिल तक पहुँचने के पहले ही सिर भारी होने लगा । पर जिप्सी के बाहर निकलते ही चारो ओर की छटा देख कर मन प्रसन्न हो उठा । वहाँ पहुँचने तक सूर्यास्त होने में सिर्फ १५ मिनट ही रह गए थे । इसलिये वहाँ की चोटी पर ना चढ़ के हम सूर्यास्त बिन्दु की ओर चल पड़े ।
धूपगढ़ चूंकि यहाँ का सबसे ऊँचा शिखर है इसलिए यहाँ से सूर्य पहाड़ों के पीछे जा नहीं छुपता । वो तो बादलों के बीच में ही धीरे धीरे मलिन होता अपना अस्तित्व खो बैठता है और अचानक से आ जाती है एक हसीन शाम । कैसे घटता है ये मंजर वो इन छवियों के माध्यम से खुद ही देख लीजिए ।


शाम के साथ एक सफेद धुंध भी पर्वतों के चारों ओर फैल गई थी । मानो ये अहसास दिलाना चाहती हो कि सूर्य को हटाकर उसके पूरे साम्राज्य की मिल्कियत अब इसी के कब्जे में है। धुंध की चादर के बीच खड़े इस हरे भरे पेड़ को देख कर मन मुग्ध हो रहा था ।
शाम का अँधेरा ठंडक के साथ तेजी से बढ़ने लगा तो हमें धूपगढ़ से लौटना ही पड़ा ।
धूपगढ़ की ये शाम बहुत कुछ पंडितविनोद शर्मा की इन पंक्तियों की याद दिला रही थी
बुझ गई तपते हुए दिन की अगन
साँझ ने चुपचाप ही पी ली जलन
रात झुक आई पहन उजला वसन
प्राण ! तुम क्यूँ मौन हो कुछ गुनगुनाओ
चांदनी के फूल तुम मुस्कराओ.....
पचमढ़ी पड़ाव के अंतिम दिन देखा हमने एक और सुंदर झरना ! इस यात्रा की अंतिम कड़ी में आप सब को ले चलेंगे झरने के आलावा एक ऐसे बाग में जहाँ फूल तो नहीं पर फल जरूर थे !
श्रेणी : वो सफर वो डगर में प्रेषित





7 comments:
मनीषजी लेख के साथ-साथ फ़ोटो भी बहुत ही सुंदर लगे
'ढलती शाम के चित्र हैं सुन्दर,
शब्दों से वर्णन भी रूचिकर,
लेकिन ठहरी जहाँ नजर,
वो है झील किनारे का घर!'
Wah!!!! sooraj ka dhalna bhi bara ajeeb hai :) ke dekhne walon ko gar bataya na jaaye to samajh na aaye ke saanjh hai ke seher :D
amazing
Cheers
बहुत सुंदर वर्णन और चित्र. पंडितविनोद शर्मा की पंक्तियां वर्णन के साथ खुब भाई. बधाई.
nameste manish
maja aa gaya,aap badhaee ke paatr hai...
cheers
jhaji.
ps-will keep dropping in
nameste manish
maja aa gaya,aap badhaee ke paatr hai...
cheers
jhaji.
ps-will keep dropping in
भुवनेश शुक्रिया!
रचना जी वाह जी अपने विचारों को काव्यमय बनाना कोई आपसे सीखे !
डॉन सच थोड़ा अजीब तो है ! सूरज यहाँ निस्तेज होता हुआ बादलों में ही डूब जाता है ।
समीर जी शुक्रिया पसंदगी का !
संजय जी स्वागत है आपका इस चिट्ठे पर । यात्रा विवरण पसंद करने का शुक्रिया ! आशा है इस चिट्ठे पर आपसे मुलाकात होती रहेगी ।
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