Saturday, November 11, 2006

पचमढ़ी का वो पहला दिन भाग : २

अपराह्न में खाना खाने के बाद हम जा पहुँचे हांडी खोह के पास ।
३५० फीट गहरे इस खड्ड में ऊपर से देखने पर भी बड़े बड़े वृक्ष,बौने प्रतीत होते हैं। इस दृश्य को देख कर ही शायद कवि के मन में ये बात उठी होगी


जागते अँगड़ाईयों में ,
खोह खड्डे खाईयों में
सतपुड़ा के घने जंगल
नींद में डूबे हुए से
डूबते अनमने जंगल





हांडी खोह से महादेव का रास्ता हरे भरे जंगलों से अटा पड़ा है। सड़क के दोनों ओर की हरियाली देखते ही बनती थी ।

महादेव की गुफाओं की ओर जाते वक्त चौरागढ़ की पहाड़ी पर स्थित शिव मंदिर स्पष्ट दिखता है। महाशिवरात्रि के समय हजारों श्रृद्धालु वहाँ त्रिशूल चढ़ाने जाते हैं । ना तो अभी शिवरात्रि थी और ना ही हमारे समूह में कोई इतना बड़ा शिवभक्त कि १२५० सीढ़ियाँ चढ़कर वहाँ पहुँचने का साहस करता।

तो चौरागढ़ ना जाकर हम सब बड़े महादेव की गुफा की ओर चल पड़े । कैमरा गाड़ी में ही रख दिया क्यो.कि इस बार वानर दल दूर से ही उछल कूद मचाता दिख रहा था । समुद्र तल से १३३६ मी. ऊँचाई पर स्थित ये गुफा २५ फीट चौड़ी और ६० फीट. लम्बी है। गुफा के अंदर प्राकृतिक स्रोतों से हर समय पानी टपकता रहता है । अंदर एक प्राकृतिक शिव लिंग है जिसके ठीक सामने एक पवित्र कुंड है जिसे भस्मासुर कुंड कहते हैं ।

भस्मासुर की कथा यहाँ के तीन धार्मिक स्थलों चौरागढ़, जटाशंकर और महादेव गुफाओं से जुड़ी है । अपने कठिन जप-तप से उसने भगवान शिव को प्रसन्न कर ये वरदान ले लिया कि जिस के सर पर हाथ रखूँ वही भस्म हो जाए । अब भस्मासुर ठहरा असुर बुद्धि, वरदान मिल गया तो सोचा क्यूँ न जिसने दिया है उसी पर आजमाकर देखूँ । भगवन की जान पर बन आई तो भागते फिरे कभी जटाशंकर की गुफाओं में जा छिपे तो कभी गुप्त महादेव और अन्य दुर्गम स्थानों पर । पर भस्मासुर कोई कम थोड़े ही था भगवन को दौड़ा - दौड़ा कर तंग कर डाला। भगवन की ये दुर्दशा विष्णु से देखी नहीं गई और उतर आये पृथ्वी पर मोहिनी का रूप लेकर । अपने नृत्य से मोहिनी ने भस्मासुर पर ऍसा मोहजाल रचा कि खुद भस्मासुर उसी लय और हाव भाव में थिरकते अपने सिर पर हाथ रख बैठा । कहते हैं कि बड़े महादेव की उस गुफा में ही भस्मासुर भस्म हो गया ।

बड़े महादेव से ४०० मीटर दूर परएक बेहद संकरी गुफा हे जो कि गुप्त महादेव का निवास स्थल है । इस गुफा में एक समय ८ ही व्यक्ति घुस सकते हैं । ऐसी गुफा में कोई मोटा व्यक्ति घुस जाए तो रास्ता जॉम ही समझिए । गुफा में आप साइड आन ही चल सकते हैं। खुद को पतला समझ कर मैंने एक बार सीधा होने की कोशिश की तो कमर को दो चट्टानों के बीच फँसा पाया। पहले १० फीट पार हो जाए तो गुफा में घना अँधेरा छा जाता है । कहने को गुफा के अंतिम छोर पर शिवलिंग के ऊपर एक बल्ब है पर वो भी जलता बुझता रहता है । जल्दी -जल्दी में प्रभु दर्शन निबटाकर हम झटपट गुफा से बाहर निकले ।

वापसी में राजेंद्र गिरी से सूर्यास्त देखने का कार्यक्रम था पर हमारे रास्ता भटक जाने की वजह से सूर्य देव हमारे वहाँ पहुँचने से पहले ही रुखसत हो लिये । पहले दिन का ये अध्याय तो यहीं समाप्त हुआ ।
अगले दिन की शुरुआत तो एक ऐसे दुर्गम ट्रेक से होनी थी जिसमें बिताये गए पल इस यात्रा के सबसे यादगार लमहे साबित हुये । क्या थी हमारी मंजिल और कैसा था हमारा वहाँ तक पहुँचने और लौटने का अनुभव ये बताऊँगा मैं आपको अगले हिस्से में


श्रेणी वो सफर वो डगर में प्रेषित

4 comments:

Anonymous said...

सुन्‍दर चित्रों के साथ अच्‍छा वृत्‍तान्‍त वर्णन किया है। अगली कडी का इन्‍तजार रहेगा।

Anonymous said...

लगता है पंचमड़ी दुबारा जाना पड़ेगा।

Udan Tashtari on Sat Nov 11, 09:41:00 PM 2006 said...

वाह, मनीष भाई, बड़ा सजीव चित्रण चल रहा है. काफी यादें ताजा होती जा रही हैं. इंतजार है अगली कड़ी का.

Manish on Wed Nov 15, 03:53:00 PM 2006 said...

शुक्रिया प्रमेन्द्र ,उनमुक्त और समीर जी सराहना के लिये !

 

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