पचमढ़ी की पहली सुबह जैसे ही हम सब नाश्ते के लिये बाहर निकले तो पाया कि सड़क के दोनों ओर हनुमान के दूत भारी संख्या में विराजमान हैं। दरअसल पिछली शाम को जहाँ चाय पीने रुके थे वहीं का एक वानर दीदी के हाथ पर कुछ भोजन मिलने की आशा में कूद बैठा था । रात में होटल वालों ने बताया था कि बंदरों ने यहाँ काफी उत्पात मचाया हुआ है और टी.वी. पर केबल अगर नहीं आ रहा तो ये उन्हीं की महिमा है। सुबह जब ये फिर से दिखाई पड़े तो कल की सारी बातें याद आ गयीं सो जलपानगृह पहुंचते ही हमने अपनी शंकाओं को दूर करने के लिये सवाल दागा ।
भइया क्या यहाँ बंदर कैमरे भी छीन लेते हैं?
बीस साल बाद के लालटेन लिये चौकीदार की भांति भाव भंगिमा और स्थिर आवाज में उत्तर मिला
हाँ सर ले लेते हैं ।
पापा की जिज्ञासा और बढ़ी पूछ बैठे और ऐनक ?
हाँ साहब वो भी, अरे सर पिछले हफ्ते जो सैलानी आये थे उनके गर्मागरम आलू के पराठे भी यहीं से ले कर चलता बना था । :)
सारा समूह ये सुनकर अंदर तक सिहर गया क्योंकि उस बक्त हम सभी पराठों का ही सेवन कर रहे थे।
पचमढ़ी पूरा घूमने के बाद हमें लगा कि बन्दे ने कुछ ज्यादा ही डरा दिया था । महादेव की गुफाओं और शहर को छोड़ दें तो बाकी जगहों पर ये दूत सभ्यता से पेश आते हैं ।
यहाँ पर सबसे पहले हमने रुख किया जटा शंकर की ओर । मुख्य मार्ग से यहाँ पहुँचने के लिये पर्वतों के बीच से २०० मी नीचे की ओर उतरना पड़ता है । बड़ी बड़ी चट्टानों के नीचे उनके बीच से रिसते शीतल जल पर नंगे पाँव चलना अपनी तरह का अनुभव है । प्राकृतिक रुप से गुफा में बने इस शिवलिंग की विशेषता ये है कि इसके ऊपर का चट्टानी भाग कुंडली मारे शेषनाग की तरह दिखता है ।

जटाशंकर से हम पांडव गुफा पहुँचे । पहाड़ की चट्टानों को काटकर बनायी गई इन पाँच गुफाओं यानि मढ़ी के नाम पर इस जगह का नाम पचमढ़ी पड़ा । कहते हैं कि पाण्डव अपने १ वर्ष के अज्ञातवास के समय यहाँ आकर रहे थे । पुरातत्व विशेषज्ञ के अनुसार इन गुफाओं का निर्माण ९ -१० वीं सदी के बीच बौद्ध भिक्षुओं ने किया था । इन गुफाओं का शिल्प देखकर मुझे भुवनेश्वर के खंडगिरी (यहाँ देखें) की याद आ गई जो जैन शासक खारवेल के समय की हैं।
पांडव गुफाओं के ऊपर से दिखते उद्यान , आस पास की पहाड़ियाँ और जंगल एक नयनाभिराम दृश्य उपस्थित करते हैं और इस सौंदर्य को देखकर मन वाह-वाह किये बिना नहीं रह पाता ।खैर यहाँ से हम सब आगे बढ़े अप्सरा विहार की ओर । थोड़ी ही देर में हम जंगलों की पगडंडियों पर थे । अप्सरा विहार में अप्सराएँ तो नहीं दिखी अलबत्ता एक छोटा सा पानी का कुंड जरूर दिखा । हम नहाने के लिये ज्यादा उत्साहित नहीं हो पाए, हाँ ये जरूर हुआ कि मेरे पुत्र पानी में हाथ लगाते समय ऐसा फिसले कि कुंड में उन्होंने पूरा गोता ही लगा लिया ।
पास ही कुछ दूरी पर ही यही पानी ३५० फीट की ऊँचाई से गिरता है और इस धारा को रजत प्रपात के नाम से जाना जाता है । प्रपात तक का रास्ता बेहद दुर्गम है सो दूर से जूम कर ही इसकी तस्वीर खींच पाए ।
वापस ऊपर चढ़ते चढ़ते सबके पसीने छूट गए और एक एक गिलास नीबू का शर्बत पीकर ही जान में जान आई । खैर ये तो अभी शुरुआत थी . अगले दिन तो हाल इससे भी बुरा होना था । पर अभी तो भोजन कर महादेव की खोज में जाना था ।

पर देख रहा हूँ पहले दिन की ये कथा कुछ ज्यादा ही लम्बी होती जा रही है तो हुजूर एक अल्पविराम लेना बनता है मेरा भी और आपका भी ।
अगले हिस्से में जानेंगे कि भगवान शिव को क्या पड़ी थी जो इन गहरे खड्डों खाईयों में विचरते आ पहुँचे ।
श्रेणी वो सफर वो डगर में प्रेषित




7 comments:
"पचमढ़ी में वो पहला दिन भाग : १"
जानकारी से भरा हुआ, जीवंत चित्रों से सजा सुंदर लेख। पचमढ़ी का दर्शन कराने के लिए धन्यवाद ।
भैये खूब घूमें अपनी नगरिया में.. मैं पचमढ़ी में महीनों रहा हूं. नौनिहाल है. अप्सरा विहार में अप्सराएं तो आती हैं भैये.. आपको नहीं दिखी. हाय क़िस्मत. रजत प्रपात देखा वाह. बी फाल और डचेस फाल देखा कि नहीं? ये तस्वीरें देखकर बहुत खुशी हुई. गुप्त महादेव पर प्रकाश डालें ताकी पाठक शिव महिमा गान का आनंद ले सकें
वाह, जगह तो सही लग रही है भईये। अब तो मन कर रहा है कि यहाँ भी होकर आया जाए। बताओ कि यहाँ जाने के लिए कौन सा मौसम ठीक रहता है? आगे के संस्मरण का इंतज़ार है। :)
मनीष भैया आपने तो घर बैठे ही सैर करा दी वादियों की टी.वी. पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम की तरह आपके यात्रा विवरण का इंतजार रहता है
बड़ी सुंदर जगह है - पंचमढ़ी। प्रोग्राम बनाना पड़ेगा!
आपने लिखा भी बहुत सुंदर है।
हमने तो सोचा था कि पंचमढी विधायको को हाईजैक कर सुरक्षित रखने की जगह है! इन तस्वीरों कि देखने के बाद लगता है कि हमें भी पंचमढी घूम आना चाहिए। अगली कढी का इंतजार रहेगा।
प्रभाकर जी लेख आपको अच्छा लगा जान कर प्रसन्नता हुई ।
नीरज अरे पहले बताया होता तो आपके ननिहाल के चक्कर लगाकर लौटते और आपसे अप्सरा दर्शन के बहुमूल्य टिप्स जरूर लेते । रही बाकी सभी जगह देखने की बात तो इंतजार करें आगे के विवरण का ।
अमित अक्टूबर से मार्च तक सही वक्त है यहाँ आने का । दीपावली के बाद वैसे गुजराती छा जाते हैं पंचमढ़ी के ऊपर । इसलिये उस समय आने के लिये पहले से आरक्षण जरूरी है ।
भुवनेश भाई, तुम्हारा प्रदेश है ये तो, पहले हम करा देते हैं सैर ,बाद में खुद भी हो आना एक बार !
अनुराग सराहने का शुक्रिया !
इदन्नम्म जरूर मित्र ! खासकर तब अगर आपको पहाड़ी रास्तों पर चलना पसंद हो !
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