चलो चलें पंचमढ़ी की ओर ! भाग : २
सुबह ९ बजे तक चलने के बजाय हम १० बजे ही निकल पाए । ८ लोगों और सामान से पैक ट्रैवेरा में मुझे पीछे ही जगह मिल पाई थी। साथ में जीजा श्री बैठे थे। मौसम साफ था । संगीत का आनंद उठाते और एक दूसरे की खिंचाई करते सफर आराम से कट रहा था । करीब ५० - ६० किमी. का सफर शायद तय हो चुका था । बीच-बीच में, रास्ते के दोनों ओर संतरे के बाग दिख जाया करते थे। अचानक विचार आया कि क्यों ना संतरे का बाग अगर सड़क के पास दिखे तो अंदर जाकर तसवीर खींची जाए। खैर वैसा बाग पास दिखा नहीं और फिर हम गपशप में मशगूल हो गए । हमारी मस्ती का आलम तब टूटा जब हमें एक जोर का झटका नीचे से लगा और पीछे की सीट में हम अपना सिर बमुश्किल बचा पाए । गाड़ी के बाहर नजर दौड़ायी तो एक तख्ती हमारी हालत पर मुस्कुराते हुये घोषणा कर रही थी
मध्य प्रदेश आपका स्वागत करता है !
अगले एक घंटे में ही मध्य प्रदेश की इन मखमली सड़कों पर चल चल कर हमारे शरीर के सारे कल पुर्जे ढ़ीले हो चुके थे । और बचते बचाते भी जीजा श्री के माथे पर एक गूमड़ उभर आया था । अब हमें समझ आया कि उमा भारती ने क्यूँ सड़कों को मुद्दा बनाकर दिग्गी राजा की सल्तनत हिला कर रख दी थी । खैर जनता ने सरकार तो बदल दी पर सड़कों का शायद सूरत-ए-हाल वही रहा ।
सौसर और रामकोना पार करते हुये हम करीब साढ़े तीन घंटे में करीबन १३० किमी की यात्रा पूरी कर जलपान के लिये छिंदवाड़ा में रुके । रानी की रसोई ( पाठक इसे रत्ना की रसोई से कनफ्यूज ना करें) हमारी ही प्रतीक्षा कर रही थी क्योंकि हमारे सिवा वहाँ कोई दूसरा आगुंतक नहीं था । जैसा कि नाम से इंगित हो रहा है खान-पान की ये जगह छिंदवाड़ा नरेश की थी ।
भोजनालय के ठीक पीछे राजा साहब ने एक महलनुमा खूबसूरत सा मैरिज हॉल बना रखा था जिसे देख कर हम सब की तबियत खुश हो गई।
राजा की बगिया में टहलते हुये इस नागफनी के पौधे पर नजर पड़ी जो हमें पिछले तीन घंटों की शारीरिक यंत्रणा का प्रतीक लगा सो तुरन्त उसकी तसवीर ली ताकि ऍसे सफर की यादगार बनी रहे ।
छिंदवाड़ा के आगे का रास्ता अपेक्षाकृत बेहतर था यानि गढ़्ढ़े लगातार नहीं पर रह रह कर आते थै । परासिया से तामिया तक का रास्ता मोहक था । सतपुड़ा की पहाड़ियाँ, उठती गिरती सड़कें और पठारी भूमि पर सरसों सरीखे पीले पीले फूल लिये खेत एक अद्भुत दृश्य उपस्थित कर रहे थे। देलाखारी पार करते करते सांझ ढ़ल आयी थी पर परासिया के बाद हमें उस रास्ते पर पचमढ़ी की तख्ती नहीं दिखी थी । देलाखारी के २०-२५ किमी चलने के बाद फिर जंगल शुरु हो गए पर मील का पत्थर ये उदघोषणा करने को तैयार ही नहीं था कि यही रास्ता पचमढ़ी को जाता है । या तो मटकुली का नाम आता था या फिर भोपाल का ।मन ही मन घबराहट बढ़ गई की हम कहीं दूसरी दिशा में तो नहीं जा रहे ।सांझ के अँधेरे के साथ ये शक बढ़ता जा रहा था। पचमढ़ी के ४५ किमी पहले एक जगह एक बेहद पुराना साइनबोर्ड जब दिखा तब हमारी जान में जान आई । बलिहारी है मध्य प्रदेश पर्यटन की कि इंडिया टुडे जैसी पत्रिकाओं में लगातार दो तीन हफ्तों से दो दो पन्ने के रंगीन इश्तिहार देने में कंजूसी नहीं करते पर पचमढ़ी जाने वाली इन मुख्य सड़कों में इतनी मामूली जानकारी देने में भी कोताही बरतते हैं ।
मुटकली आते ही हमारी सड़क पिपरिया पचमढ़ी मार्ग से मिल गई और। पचमढ़ी जाने का ये अंतिम ३० किमी का मार्ग पीछे के रास्तों से बिलकुल उलट था । सीधी सपाट सफेद धारियाँ युक्त सड़कें, हर एक घुमाव पर चमकीले यातायात चिन्ह और सड़क के दोनों ओर हरे भरे घने जंगल ! अब सही मायने में लग रहा था कि हम सतपुड़ा की रानी के पास जा रहे हैं।
वैसे सतपुड़ा के इन जंगलों के साथ हम दिन भर कई बार आँख मिचौनी कर चुके थे । भवानी प्रसाद मिश्र की पंक्तियाँ पूरे सफर में रह रह कर याद आती रही थीं
झाड़ ऊँचे और नीचे
चुप खड़े हैं आँख मींचे
घास चुप है, काश चुप है
मूक साल, पलाश चुप है
बन सके तो धँसों इनमें
धँस ना पाती हवा जिनमें
सतपुड़ा के घने जंगल
नींद में डूबे हुए से
डूबते अनमने जंगल
अगले तीन दिनों में कितना धँस पाये इन जंगलों में ये किस्सा अगले हिस्से में !
श्रेणी: वो सफर वो डगर में प्रेषित





7 comments:
मनीष भाई
जानकर दुख हुआ कि मध्य प्रदेश की सड़कों ने आपको तकलीफ पहुँचाई. अगली बार जाऊँगा तो डाटूंगा जरुर. वैसे आप बार बार जाया करो, फिर शिकायत नहीं रहेगी. इससे सड़क तो वहां ठीक नहीं होंगी मगर वैसी सड़कों पर चलने की आपकी आदत पड़ जायेगी.:)
आगे जारी रहें, वैसे भी आप पचमड़ी देखने गये हैं कोई सड़कें थोड़ी. :)
राह खड्डदार हो
ठोकरोंकी मार हो
औ' किनारे हो रहा
चाय का व्यापार हो
टिको नहीं
डिगो नहीं
बहादुरो! बढ़े चलो
भाई मनीष,
हम जैसे लोग जो चश्मा लगाकर भी ठीक से नहीं पढ़ पाते हैं, उनके लिए अगर टैम्प्लेट ठीक कर सकें तो अच्छा. सफेद पृष्ठभूमि पर काला अक्षर ही सबसे ज्यादा पठनीय होता है.
सड़कों का ऐसा हाल सिर्फ़ मध्य प्रदेश में ही नहीं वरन् बहुत जगह है, दिल्ली में भी ऐसी सड़कों की कमी नहीं!! ;) रही बात पर्यटन विभाग की तो ये लोग यह नहीं सोचते कि यदि सड़के आदि सही रखें और उचित साईनबोर्ड वगैरह लगावाएँ तो पर्यटन में खासी बढ़ौतरी होएगी। इस मामले में उत्तरांचल को ही लो, सड़के भी बढ़िया है और हर थोड़ी दूर पर सड़क किनारे दिशानिर्देशक आदि हैं, दूर दूर के इलाकों में भी, इसलिए वहाँ भटकने का डर नहीं रहता। :)
मनीषजी चिंता मत करिए आगे के सफ़र में कोई दिक्कत नहीं आयेगी।
कविता के लिए धन्यवाद।
मनीषजी चिंता मत करिए आगे के सफ़र में कोई दिक्कत नहीं आयेगी।
कविता के लिए धन्यवाद।
समीर जी जरूर डाँटें आपके धाँसू व्यक्तित्व का कुछ तो असर होगा ।:)
कम से कम मेरे इस लेख से पर्यटक इतनी सीख तो लेंगे ही कि जहाँ तक हो सके ट्रेन से सफर करना चाहिए (यानि पिपरिया तक) ताकि अपनी यात्रा का पूर्ण आनंद उठा सकें ।
रही बात सड़क देखने की तो एक बार यात्रा पर निकलें तो मेरे लिये तो राह - ए - सफर भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितनी की आखिरी मंजिल :)
राकेश जी आपकी पंक्तियाँ खूब लगीं! यकीन मानें अगले तीन दिनों में हमने अपने जोश में कोई कमी नहीं आने दी ।
रवि भाई जब भी ब्लॉग की टेमप्लेट परिवर्तित करूँगा आपकी शिकायत को ध्यान में रखूँगा । दरअसल ये सब मेरे नीले रंग से जबरदस्त आसक्ति की वजह से है ।
अमित आपकी बात सोलह आने सही है। अभी मैं सिक्किम गया था । उतनी ऊँचाई पर भी उन दुर्गम रास्तों का बहुत अच्छा रखरखाव था ।
भुवनेश अरे भइये अब तो पहुँच ही गए पचमढ़ी अब क्या दिक्कत आनी है !:)
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