चलो चलें पंचमढ़ी की ओर ! भाग : १
१४ अक्टूबर की सुबह आ चुकी थी । और हम नागपुर की ओर कूच करने को तैयार थे । वहीं मेरी बहन का अभी का निवास है। दरअसल इस बार सारे परिवार को इकठ्ठा होने के लिये हमने पंचमढ़ी को चुना था । नागपुर तक ट्रेन से जाना था और उसके बाद सड़क मार्ग से पंचमढ़ी पहुँचना था । समय से आधे घंटे पहले हम हटिया स्टेशन पर मौजूद थे ।
अब यात्रा की शुरुआत एकदम सामान्य रहे तो फिर उसका मजा ही क्या है । कार की डिक्की खुलते ही इस रहस्य से पर्दाफाश हुआ कि माँ की एक अटैची तो घर ही में छूट गयी है। गाड़ी खुलने में २५ मिनट का समय शेष था और स्टेशन से वापस घर का रास्ता कार से ८-१० मिनट में तय होता है । आनन फानन में कार को वापस दौड़ाया गया । खैर गाड़ी खुलने के ७-८ मिनट पहले ही अटैची वापस लाने का मिशन सफलता पूर्वक पूरा कर लिया गया।
आगे की यात्रा पारिवारिक गपशप में आराम से कटी । दुर्ग पहुँचते पहुँचते हमारी ट्रेन २ घंटे विलंबित हो चुकी थी। यानि ११.३० बजे रात की बजाय हम १.३० बजे पहुँचने वाले थे । गाड़ी तो खैर १.१० तक पहुँच गयी पर रात की ठंडी हवा का असर था या मेरी पिछली पोस्ट का नागपुर के ठीक २ घंटे पहले से छींकने का जो दौर चालू हुआ वो यात्रा के पहले दो दिन बदस्तूर कायम रहा । मुझे तो यही लगा कि ये सब ऊपरवाले की ही महिमा थी । भगवन को याद किया तो कानों में उनका यही स्वर गूँजता मिला कि
अरे नामाकूल मुझसे छींकने को कह रहा था ! ले अब भुगत ।
पूरी यात्रा शांति से कट जाए ये भला भारतीय रेल में संभव है । हम अलसाते हुये नीचे उतरने का उपक्रम कर ही रहे थे कि स्लीपर के अतिरिक्त डिब्बे को सामान्य डिब्बा समझ स्थानीय ग्रामीणों की फौज ने बोगी में प्रवेश करने के लिये धावा बोल दिया । अब न हम गेट से बाहर निकल पा रहे थे और ना उनका दल पूरी तरह घुसने में कामयाब हो रहा था । भाषा का भी लोचा था । खैर अंत में हमारी सम्मिलित जिह्वा शक्ति काम में आई और किसी तरह धक्का मुक्की करते हुये हम बाहर निकल पाए । खैर इस प्रकरण से एक फायदा ये रहा कि हम सब की नींद अच्छी तरह खुल गई ।
अगला दिन आराम करने में बीता । शाम को हम दीक्षा भूमि पहुँचे । सन १९५६ में लाखों समर्थकों के साथ डा. बाबासाहेब आंबेडकर ने यहीं बौद्ध धर्म की दीक्षा ग्रहण की थी । दीक्षा भूमि स्तूप का गुम्बद करीब १२० फीट ऊँचा और इतने ही व्यास का है । बाहर से देखने में पूरी इमारत बहुत सुंदर लगती है । अंदर के हॉल में बुद्ध की प्रतिमा के आलावा प्रदर्शनी कक्ष भी है जिसमें भगवान बुद्ध और बाबा साहेब के जीवन से जुड़ी जानकारी दी जाती है । एक बात जरूर खटकी कि इतनी भव्य इमारत के अंदर और स्तूप परिसर में साफ सफाई का उचित इंतजाम नहीं था ।
शाम ढ़लने लगी थी । पास के एक मंदिर से लौटते हुये हमें एक नई बात पता चली कि संतरे के आलावा नागपुर के समोसे भी मशहूर हैं । और तो और यहाँ तो इन की शान में पूरी दुकान का नाम भी उन्हीं पर रखा गया है , मसलन समोसेवाला, पकौड़ीवाला.. . खैर सबने चटपटी पीली हरी चटनी के साथ समोसों का आनंद उठाया और चल पड़े तेलांगखेड़ी झील की तरफ ।
झील तो आम झीलों की तरह ही थी पर आस पास का माहौल देख के ये जरूर समझ आ गया कि इस झील का नागपुर के लोगों के लिये वही महत्त्व है जो मुंबई वासियों के लिये मैरीन ड्राइव का ये कलकत्ता के लोगों के लिए विक्टोरिया गार्डन का । उमस काफी हो रही थी सो कुछ समय बिता, इस लाल रंगत बिखेरते फव्वारे की छवि लेकर हम वापस लौट गए ।
अगली सुबह असली सफर के शुरुआत की थी । किस तरह स्वागत किया समीर, भुवनेश और रचना जी के प्रदेश मध्य प्रदेश ने ये जानते हैं अगले हिस्से में !
श्रेणी : वो सफर वो डगर में प्रेषित





7 comments:
यात्रा विवरण बढि़या है मनीषजी अगले भाग का इंतजार है
भाग-१ बढ़ियां है, इंतजार है भाग-२ का.
आहा , हटिया स्टेशन देख कर मज़ा आ गया ।पुराने दिन ,हाय वो पुराने दिन कहाँ गये
बैठे बिठाए मुफ्त मे यात्रा करवाने के लिए आपका धन्यवाद
अगले भाग का इनतेज़ार रहेगा
बढ़िया है, मनीष जी, बहुत शुक्रिया।
चित्रो के साथ अच्छा यात्रा विवरण है। बहुत अच्छा
यात्रा विवरण को सराहने के लिये आप सब को धन्यवाद ! आशा है इस सफर में आप सब आगे भी साथ रहेंगे ।
Post a Comment