सफर सिक्किम का - भाग :२
गंगतोक पहुँचते ही हमने होटल में अपना सामान रखा । दिन भर की घुमावदार यात्रा ने पेट में हलचल मचा रखी थी । सो अपनी क्षुधा शान्त करने के लिये करीब ९ बजे मुख्य बाजार की ओर निकले । पर ये क्या एम. जी. रोड पर तो पूरी तरह सन्नाटा छाया हुआ था। दुकानें तो सारी बंद थीं ही कोई रेस्तरॉ भी खुला नहीं दिख रहा था ! पेट में उछल रहे चूहों ने इत्ती जल्दी सो जाने वाले इस शहर को मन ही मन लानत भेजी ।मुझे मसूरी की याद आई जहाँ रात १० बजे के बाद भी बाजार में अच्छी खासी रौनक हुआ करती थी । खैर भगवन ने उन चूहों की सुन ली और अंततः घूमते घामते हमें एक बंगाली भोजनालय खुला मिला । वैसे भोजन यहाँ अन्य पर्वतीय स्थलों की तुलना में सस्ता था ।

सुबह हुई और साथ वालों ने खबर दी की बाहर हो आओ अच्छा नजारा है । फिर क्या था निकल पड़े कैमरे को ले कर । होटल के ठीक बाहर जैसे ही सड़क पर कदम रखा सामने का दृश्य ऐसा था मानो कंचनजंघा की चोटियाँ बाहें खोल हमारा स्वागत कर रही हों । आप भी देखें !

सुबह का गंगतोक शाम से भी प्यारा था । पहाड़ों की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यहाँ मौसम बदलते देर नहीं लगती । सुबह की कंचनजंघा १० बजे तक तक बादलों में विलुप्त हो चुकी थी । कुछ ही देर बाद हम गंगतोक के ताशी विउ प्वाइंट (५५०० फीट MSL) पर थे । यहाँ से दो मुख्य रास्ते कटते हैं । एक पूरब की तरफ जो नाथू ला जाता है और दूसरा उत्तरी सिक्किम जिधर हमें जाना था ।

सुबह हुई और साथ वालों ने खबर दी की बाहर हो आओ अच्छा नजारा है । फिर क्या था निकल पड़े कैमरे को ले कर । होटल के ठीक बाहर जैसे ही सड़क पर कदम रखा सामने का दृश्य ऐसा था मानो कंचनजंघा की चोटियाँ बाहें खोल हमारा स्वागत कर रही हों । आप भी देखें !

सुबह का गंगतोक शाम से भी प्यारा था । पहाड़ों की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यहाँ मौसम बदलते देर नहीं लगती । सुबह की कंचनजंघा १० बजे तक तक बादलों में विलुप्त हो चुकी थी । कुछ ही देर बाद हम गंगतोक के ताशी विउ प्वाइंट (५५०० फीट MSL) पर थे । यहाँ से दो मुख्य रास्ते कटते हैं । एक पूरब की तरफ जो नाथू ला जाता है और दूसरा उत्तरी सिक्किम जिधर हमें जाना था ।

अगली किश्त में ले चलूँगा आप सबको ताशी विउ प्वाइंट से चुन्गथांग तक जहाँ से तीस्ता नदी दो जल संधियों के जुड़ने से शुरू होती हैं ।







10 comments:
हम सभी को गंगटोक की शानदार यात्रा कराने के लिये धन्यवाद
वाह, बहुत सुंदर यात्रा रही.
मज़ा आया.
समीर लाल
सुन्दर. सिक्कीम जाने की इच्छा फिर प्रज्व्ल्लीत हो उठी है.
सिक्किम का सौन्दर्य तस्वीरों से निकल कर जीवन्त रूप धारण करता जान पड़ता है।
साथ ही एक सुझाव, आप प्रविष्टि के text को justify (equally align) न करें, फ़ायरफ़ॉक्स में justified text ठीक नहीं दिखता।
तस्वीरें भी अच्छी है साथ मे आपका यात्रानामा भी बहुत सही चल रहा है, एकदम लग रहा है कि हम भी सिक्किम पहुँच गए है।मजा आ रहा है, लिखते रहिए।
बढ़िया विवरण,धांसू फोटो,लिखते रहें।
छाया जी अभी गंगतोक पूरा नहीं घुमाया , वापस लौटते समय घुमाएँगे :)
समीर जी यात्रा का सबसे खूबसूरत हिस्सा अभी बाकी है !
पंकज जरूर जाइए ! पहली बार कब गए थे आप ?
प्रतीक शुक्रिया !
आपके सुझाव पर अगली प्रविष्टि से अमल करूँगा ।
जीतू भाई असली तसवीरें अभी आनी बाकी हैं ! वैसे आप तो खुद छुट्टियाँ बिताने जाने वाले थे उस कार्यक्रम का क्या हुआ ?
अनूप जी तारीफ का शुक्रिया ! आशा है इस सफर में आगे भी आप साथ रहेंगे !
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