Wednesday, May 10, 2006

सफर सिक्किम का : भाग -१

गर्मियाँ अपने पूरे शबाब पर हैं । आखिर क्यूँ ना हों, मई का महिना जो ठहरा । अगर ऐसे में भी सूर्य देव अपना रौद्र रूप हम सबको ना दिखा पायें तो फिर लोग उन्हें देवताओं की श्रेणी से ही हटा दें :)। अब आपके शहर की गर्मी तो मैं कम कर नहीं सकता, कम से कम इस चिट्ठे पर ही ले चलता हूँ एक ऐसी जगह जहाँ पिछले महिने तमाम ऊनी कपड़े भी हमारी ठंड से कपकपीं कम करने में पूर्णतः असमर्थ थे ।
बात ७ अप्रैल की है जब हमारा कुनबा रांची से रवाना हुआ । अगली दोपहर हम न्यू जलपाईगुड़ी पहुँचे । हमारा पहला पड़ाव गंगतोक था जो कि सड़क मार्ग से सिलीगुड़ी से ४ घंटे की दूरी पर है । सिलीगुड़ी से ३० किलोमीटर दूर चलते ही सड़क के दोनों ओर का परिदृश्य बदलने लगता है पहले आती है हरे भरे वृक्षों की कतारें जिनके खत्म होते ही ऊपर की चढ़ाई शुरू हो जाती है।
हाँ, एक बात तो बतानी रह ही गई कि सिलीगुड़ी से निकलते ही हमारे इस समूह को इक नयी सदस्या मिलने वाली थीं। वो यहाँ से जो साथ हुईं....क्या बताऊँ पूरा सफर उसकी मोहक इठलाती तो कभी बलखाती अदाओं को निहारने में ही बीता। खैर,कुछ भी हो उसकी वजह से पूरी यात्रा खुशनुमा रही ।
क्या कहा आपने नाम क्या था उनका? अजी छोड़िए नाम में क्या रखा है पर फिर भी आप सब की यही इच्छा है तो बताये देते हैँ....नाम था उनका तीस्ता । कहीं आप कुछ और तो उम्मीद नहीं लगाये बैठे थे ?
खैर तीस्ता की हरी भरी घाटी और घुमावदार रास्तों में चलते चलते शाम हो गई और नदी के किनारे थोड़ी देर के लिये हम टहलने निकले। नीचे नदी की हल्की धारा थी तो दूर पहाड़ पर छोटे छोटे घरों की बगल से निकलती उजले धुँऐ की लकीर।

गंगतोक से अभी भी हम ६० किलोमीटर की दूरी पर थे। करीब ७.३० बजे हमें ऊँचाई पर बसे शहर की जगमगाहट दूर से ही दिखने लगी । पर गंगतोक में तो हमारी इस यात्रा का संक्षिप्त ठहराव था । हमें अभी बहुत दूर और बहुत ऊपर जाना था ......
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9 comments:

Pratik on May 10, 2006 said...

आपका यात्रा-विवरण बढिया लगा, अगले भाग की प्रतीक्षा रहेगी। साथ ही पसन्द आया गद्य में छायावादी शैली के माध्यम से तीस्ता का परिचय।

ई-छाया on May 11, 2006 said...

भ्रमण अनुभव पसन्द आया, अगले आंक की प्रतीक्षा रहेगी।

Udan Tashtari on May 11, 2006 said...

बहुत बढिया शैली मे यात्रा वृतांत प्रस्तुती के लिये बधाई.
समीर लाल

Jitendra Chaudhary on May 11, 2006 said...

अच्छा विवरण है, मजा आ रहा है, लेकिन जल्दी जल्दी लिखिए। हिन्दी ब्लॉग मे अब पढने के लिये तरह तरह का मैटेरियल मौजूद है।आप सभी लोगों पर हिन्दी ब्लॉगिंग को भविष्य मे ले जाने की जिम्मेदारी है।

लिखते रहिए।हम सब आपके साथ साथ यात्रा कर रहे है।

अनुनाद सिंह on May 11, 2006 said...

आपका यात्रा-वृतान्त सुनकर हममे भी सिक्किम के दर्शन की इच्छा जग गयी | भारत में ही तमाम सारे स्विट्जरलैण्ड भी हैं, पर हम सब अनजान हैं |

रत्ना on May 12, 2006 said...

यात्रा रोचक रही ।

Anonymous said...

Good job...I am impressed with your Hindi.

Manish on May 13, 2006 said...

प्रतीक ,e-छाया, समीर, जीतू, रत्ना और अनाम भाई आप सबको मेरा ये वृतांत पसंद आया जानकर बेहद खुशी हुई !
आशा है आगे भी सफर में बिताये इन पलों को आप सब के संग बांटने का मौका मिलेगा ।

रजनीश मंगला on May 17, 2006 said...

सचमुच, मैंने भी अभी पूरबी उत्तरी भारत तो देखा ही नहीं है। देखने का बहुत मन है।

 

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